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Jan 24, 2016

क्रिकेट का संक्षेपण प्रक्रिया - मेरी राय

७० के दशक तक आते-आते लोग अपने दैनिक दिनचर्या में ज्यादा व्यस्त से होने लगे थे। अब उनके पास समय और धैर्य दोनों की कमी सी होने लगी थी। अब लोगों को लगातार ५-६ दिनों तक, बैट और बॉल के संघर्ष, और उस दौरान हो रहे रक्षात्मक खेल, कलात्मक तरीके से "कॉपी बुक स्टाइल" में खेले शॉट और इसी तरह के बारीकियों को देखने में कोई बहुत ज्यादा दिलचस्पी नहीं रह गई थी।

विदेशों में टीवी के आ जाने से क्रिकेट का लाइव कवरेज का प्रचलन तेज़ी से बढ़ते लगा था। अब लोग खेल को, देश की प्रतिष्ठा से कही ज्यादा, मनोरंजन के रूप में देखना चाहते थे। वे चाहते थे कि क्रिकेट को तेज़ गति से खेला जाए। साथ ही वे चाहते थे कि खेल का कोई परिणाम भी निकले। वैसे तो टेस्ट क्रिकेट में भी यह संभव है कि हर मैच में कोई परिणाम निकले, पर उन दिनों उस तरीके के नतीजे के लिए सकारात्मक टेस्ट क्रिकेट खेले जाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

टेस्ट -क्रिकेट : दर्शकों के धैर्य का टेस्ट

इसके लिए टेस्ट-क्रिकेट को समझने की आवश्यकता है, जिसमें इतने तरह के नियम हैं कि परिणाम के अनेक सारे संभावनाएं हो सकती हैं। किसी भी समय टेस्ट मैच कोई एक नया मोड़ ले सकता है। इसलिए अंतिम समय तक दर्शक को यह समझ में नहीं आता है कि कोई परिणाम निकलेगा भी या नहीं! मैदान में खेल रहे खिलाड़ी - ख़ास कर बैट्समेन, अगर चाहे तो खेल को कोई सा भी नया मोड़ दे सकते हैं। इस तरह से अगर कोई बैट्समैन मैच के अंतिम घड़ी में बॉल के साथ कम से कम छेड़छाड़ करे, तो इसका मतलब हैं कि रक्षात्मक तरीके से खेलते हुए ड्रॉ के लिए खेला जा रहा है।

इस तरह के बल्लेबाज के निर्णय का प्रभाव, टेस्ट मैच के परिणाम पर पड़ सकता है। कई बार जिस मैच को जीता जा सकता है, उसे रन के लक्ष्य का पीछा करने वाले ड्रा की ओर ले जाते हैं, क्योंकि वे उस क्रम में अपना विकेट गवां कर मैच हारना नहीं चाहते होंगे, या कोई और वजह - जैसे किसी का शतक बनाना खेल के परिणाम से ज्यादा महत्वपूर्ण लगता हो आदि आदि। पर अंत में जो भी हो, खेल को देखने वाले ठगा सा महसूस करने लगते हैं।

लोगो का अपने दैनिक दिनचर्या में से समय निकाल कर, क्रिकेट को देखना, एक स्वस्थ मनोरंजन के उद्देश्य से होता है। लोग दिन भर के व्यस्त जीवन से निकाले इन आराम के क्षणों में मनोरंजन चाहते हैं - जिसमे रोमांच हो, और खेल के फॉर्मेट कुछ ऐसा हो कि खिलाड़ी मज़बूर हो कर प्रतिस्पर्धा के कारण हर मैच में अपना १००% दें। टेस्ट क्रिकेट में वैसे क्षण कम ही रहते हैं और ऐसे ही कुछ कारणों से टेस्ट-क्रिकेट को देखने वालों में तेज़ी से गिरावट आने लगी है।

७०-८० के दशक में हालात इतने खस्ता हो गए थे कि ऐसा लगने लगा था कि क्रिकेट सिर्फ खेलने वालों का खेल बन के रह जाएगा। सप्ताह के अंत हो या छुट्टी के दिन, बड़े शहरों में टेस्ट मैच के दौरान, स्टेडियम खाली रहने लगी थी!

टेस्ट मैच के लिए छोटे शहर में सभी लॉजिस्टिक की सुविधाएँ भी नहीं होती थी - अच्छे पांच दिनों तक के बॉलिंग फील्डिंग के लायक पिच और मैदान के अलावा खिलाडियों के रहने खाने और अन्य सुविधाओं का भी ख्याल करना पड़ता था। 

इन सब कारणों से टेस्ट क्रिकेट सिर्फ बड़े शहरों में ही किया जा सकता था, और वहां बड़ी संख्या में खेल को देखने वाले आते नहीं थे। कुल मिला कर टेस्ट क्रिकेट काफी फीकी पड़ने लगी थी।

एकदिवसीय क्रिकेट : टेस्ट क्रिकेट की बाल-छंटाई

नए दौर में खेल भी एक व्यवसाय का रूप ले चुका था। विज्ञापन के द्वारा बहुत पैसे आने लगे थे और इसको लोगों में पॉपुलर बनाने के लिए टेस्ट क्रिकेट से हट कर वन-डे क्रिकेट खेल जाने लगा।

एकदिवसीय क्रिकेट को देखने के लिए ज्यादा लोग जुटने लगे थे। मगर क्रिकेट खेलने के इस नए फॉर्मेट के लिए उस दौर के क्रिकेट खिलाड़ी बिलकुल ही तैयार नहीं था। बेहतरीन बात यह यह हुई कि इस नए बदले खेल के फॉर्मेट में हरेक बॉलर को अधिकतम १२ ओवर्स (अब १०) और एक इनिंग में कुल मिला कर निर्धारित ६० (अब ५०) ओवर्स ही फेंकने होते हैं।

साथ ही बल्लेबाजों को भी अधिकतम रन का लक्ष्य बना कर विपक्षी टीम को देना होता है। दूसरे इनिंग में बैटिंग साइड को इस लक्ष्य का पीछा करना होता है। "करो या मरो" की नीति पर रनों के लक्ष्य का पीछा करने के नया फॉर्मेट दर्शकों को बहुत रास आया और देखते देखते यह लोकप्रिय होने लगा। अब क्रिकेट के भी वर्ल्ड कप होने लगे थे। और इस तरह से क्रिकेट, अब चलने के बजाय दौड़ने सा लगा था।

The scoreboard at the start of the match © ESPNcricinfo Ltd 

मगर उस दौर में क्रिेकट के कई सारे पुराने विचारधारा वाले - जो स्वयं को क्रिकेट के संरक्षक, "प्यूरिस्ट" या "महा-पंडित" से मानते थे - इस नए फॉर्मेट में खेले जाने वाले एकदिवसीय या ओडीआई को हेय दृष्टि से देखते, और यह कहते नहीं थकते थे कि असल क्रिकेट तो ५ दिन वाला टेस्ट मैच ही होता है। इस तरह के आलोचना या प्रतिक्रिया के बावजूद, दर्शको को इस तरह का खेल ज्यादा पसंद आने लगा था, और इसकी लोकप्रियता तेज़ी से बढ़ने लगी थी।
वर्तमान दौर में क्रिकेट का स्तर

जहाँ तक क्रिकेट के स्तर में ह्रास का प्रश्न है, मेरा मानना है कि इसके दोनों अपेक्षित और अनापेक्षित परिणाम सामने आये हैं। १९७१ से शुरू हुए एकदिवसीय खेल करीब ४००० बार खेला जा चुका है, २००५ में शुरू हुए टी-२० फॉर्मेट खेल करीब ५०० बार औपचारिक रूप से और उससे कई गुना ज्यादा बार अनेको तरह के लीग में खेले जा रहे हैं।

इसे और दूसरे परिपेक्ष्य में देखा जाना चाहिए- पिछले दस सालों में करीब ५०० टेस्ट मैच, १५०० एकदिवसीय और ५०० टी-२० मैच हुए हैं। पिछले ५ सालों में, जब से आईपीएल और अन्य टी-२० के लीग शुरू हुए हैं, सिर्फ २०० टेस्ट मैच, ६५० एकदिवसीय और करीब ३०० टी-२० खेल हुए हैं। टेस्ट क्रिकेट अब शनैः शनैः अवसान की ओर है।

टी-२० के आक्रामक और सकारात्मक खेल के कारण पुराने धारणाओं के विपरीत हर तरह के क्रिकेट के स्तर मे काफी इज़ाफ़ा ही हुआ है। यह एक विवाद का विषय है कि क्या आज के युग के क्रिकेटर - ख़ास कर बल्लेबाजों - में धैर्य की कमी आ गयी है, जिसके कारण अब किसी कठिन परिस्थिति में पहले की तरह बल्लेबाजों में जुझारूपन नही दीखता है।

ऐसा सम्भव है, क्योंकि बहुत ज्यादा एकदिवसीय और टी-२०, जहाँ "करो या मरो" के कारण वे बहुत तेज़ी से खेलना चाहते हैं - नतीज़ा यह है कि आजकल ज्यादातर टेस्ट मैच के परिणाम निकलते हैं। और ५ दिनों के जगह टेस्ट मैच अब ३-४ दिनों में ही ख़त्म हो जाते है - कहाँ गया वह मुदस्सर नज़र जैसे रक्षात्मक बल्लेबाजी का प्रदर्शन जब उसने ५५७ मिनटों में १०० रन बनाये थे! 

मगर अब टेस्ट मैचों में जितने शतक, दोहरे और तिहरे शतक लगते हैं, जितने चौके और छक्के लगते हैं, शायद वह वापस लोगों को टेस्ट मैच के तरफ आकर्षित कर पायेंगे!

आज के बल्लेबाजों को रन बनाने के लिए जिस स्तर के गेंदबाज और पहले के जमाने के कल्पनातीत चुस्त क्षेत्ररक्षण का सामना करना पड़ रहा है, वैसे स्तर के क्रिकेट में शायद पुराने खिलाडियों को अपने सारे "महान" रिकार्ड्स के आधे बनाने के लिए भी काफी पसीना चुआना पड़ता। 

पर इतिहास अपने हिस्से का मेहनत करके सोया हुआ है, इस लिए उनके उपलब्धियों को, इस सांत्वना के साथ कि उनके युग में भी जो बेहतरीन खिलाड़ी थे उनके बीच वे सारे कीर्तिमान बने हैं, तो उनको भी सलाम! साथ ही इस बात का उनको धन्यवाद देना होगा कि उन्हीं के प्रदर्शन के कंधे पर सवार होकर क्रिेकट आज के इस दौर में आ पाया है।

Jan 23, 2016

क्रिकेट का संक्षेपण प्रक्रिया - केरी पैकर का प्रभाव

कहा जाता है कि जो दीखता है वही बिकता है। क्रिकेट भी इसका अपवाद नहीं है। क्रिेकट के शुरुआती दौर में इस खेल का जो भी महत्त्व रहा हो, परंतु हाल के दशक तक आते-आते, यह वर्तमान के व्यवहारिक जीवन के साथ सामंजस्य नहीं बैठा पा रहा था। तदोपरांत पहले तो टेस्ट क्रिकेट में सुधार लाया गया, फिर एकदिवसीय खेल का दौर शुरू हुआ।

फिर भी क्रिकेट उतना रोचक नहीं बन पा रहा था, जितना कि यूरोप में फुटबॉल का खेल है या अमेरिका में बेसबॉल। वैसे भी क्रिकेट की लोकप्रियता ब्रिटिश साम्राज्य के देन के तौर पर ही है, और सिर्फ चंद कॉमनवेल्थ देशों में ही इस खेल को खेला जाता है। उस पर से देखने वालों की घटती संख्या से ऐसा लगने लगा था मानो उन दिनों क्रिकेट का भविष्य अंधकारमय सा था। साफ तौर पर उन दिनों टेस्ट क्रिकेट बड़ी तादाद में दर्शकों को अपने और खींचने में सक्षम नहीं रह गया था।

जाहिर है जहाँ आवश्यकता है वहां उसकी भरपाई करने के लिए बिज़नेस ऑपर्च्युनिटी भी होती है और इसीलिये संसार के परिवर्तन में पूंजीपतियों का बहुत बड़ा योगदान है! क्रिकेट इस से अछूता नहीं हो सकता था, और इस कारण से - केरी पैकर नाम के एक शख्सियत का प्रादुर्भाव हुआ।

यहाँ एक बात बताना आवश्यक है कि पहला एकदिवसीय क्रिेकट ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच १९७१ में शुरू हुआ था। इसके बाद  १९७५ में पहला वर्ल्ड कप भी आयोजित हुआ था, जिसे इंग्लॅण्ड के प्रूडेंशियल नाम के एक इंश्युरेंस कम्पनी ने प्रायोजित किया था। आगे आने वाले सालों में अनेक कंपनी ने व्यावसायिक रूप से क्रिकेट के अन्य २-३ देशों के एकदिवसीय श्रृंखला को प्रायोजित किया था। जल्द ही क्रिकेट का व्यवसायीकरण शुरू हो गया था और इस खेल में और भी पैसे आने लगे थे। लेकिन केरी पैकर की सोच महज स्पॉन्सरशिप से कही बहुत आगे की थी।

केरी पैकर: क्रिकेट का सफ़ेद से रंगीनियों तक का दौर 

बदलते दौर में इस नए एकदिवसीय क्रिकेट में तड़क-भड़क का तड़का लगना बाकी था। ऑस्ट्रेलिया के केरी पैकर नाम के एक बिजनेस मैन, जो शायद चैनल 9 के मालिक भी थे, उसने इसमें सबसे पहले पहल की।



उसने एक नए टूर्नामेंट - वर्ल्ड सीरीज़ कप - की शुरुआत की जिसमे उसने विश्व के सबसे बेहतरीन खिलाडियों को एक जगह ला कर अपने बनाये हुए "ऑट्रेलिया की टीम" के साथ बाकी खिलाडियों के एक टीम को बना कर आपस में खेलने के लिए एक लीग सा बना दिया। उसने इस बात को भांप लिया था कि लोग अच्छे क्रिकेट देखना चाहते थे। लाजमी है कि सभी अच्छे खिलाडियों को एक जगह एकत्रित करके आपस में खिलाया जाए तो खेल के प्रतिस्पर्धा का स्तर काफी ऊपर हो जाएगा। हालाँकि इसके और भी कई पहलू थे और इसका हर क्रिकेट बोर्ड और मीडिया ने जम के विरोध किया। केरी को आंशिक सफलता ही मिल पाई। कई मायने में आज का आईपीएल उसी की पुनरावृत्ति सी है।

पर आज के आईपीएल पर उतना विरोध नहीं होता है पर उन दिनों केरी पैकर को अपने इस प्रयास के लिए पूरे क्रिकेट जगत से खासा विरोध का सामना करना पड़ा था। बल्कि यों कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी कि उसे क्रिकेट के विलेन के रूप में देखा जाता था। पूरा क्रिकेट जगत दो खेमे में बँट गया था- टोनी ग्रेग, वेस्ट इंडीज़ और ऑस्ट्रेलिया के दिग्गज खिलाड़ी, और भी अतीत के कई सारे महान खिलाडियों ने खुल कर केरी का समर्थन किया।

केरी ने हर देश के क्रिकेट बोर्ड के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया था। केरी के विरोधियों ने उसके "वर्ल्ड सीरीज़ कप" को "केरी-सर्कस" का नाम दे दिया गया था, और जिन खिलाडियों ने उनके साथ करार कर लिया था - उन्हें "विद्रोही" का दर्ज़ा दे दिया गया। हर ऐसे खिलाडियों को उनके अपने देश के तरफ से खेलने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। मुझे याद है कि लोग क्रिकेट के भविष्य को लेकर बहुत चिंतित से हुआ करते थे। कारण स्पष्ट सा था कि विश्व के सबसे बेहतरीन खिलाड़ी पेशेवर बनकर पैसा कमाना चाहते थे, और शायद वे अच्छे खेल का प्रदर्शन करके और ज्यादा शोहरत और पैसे भी कमाना चाहते थे - भले वह किसी "सर्कस" के लिए ही हो।

केरी ने भारत से सुनील गावस्कर और बेदी को अपने "सर्कस" में शामिल होने का न्योता दिया था- पर उन्होंने उसे ठुकरा दिया।सभी देश के क्रिकेट बोर्ड्स ने संयुक्त रूप से इसका विरोध किया और अंततः केरी पैकर ने घुटने टेक दिए और इस तरह से सभी क्रिकेटर वापस अपने अपने देश के लिए खेलने लगे थे।

कई मायने में केरी पैकर ने क्रिकेट का आधुनीकिकरण सा कर दिया। केरी के वर्ल्ड सीरीज टूर्नामेंट में बहुत जल्दी-जल्दी में खेल होता था - जिस कारण से खिलाडियों को चुस्त -दुरुस्त रहना पड़ता था। साथ ही अपने उत्कृष्टतम खेल को दिखाना पड़ता था। इस प्रकार से क्रिकेट "सुस्त-आलसियों" के चंगुल से निकल कर वास्तव में एक "खिलाडियों" का खेल बनने लगा था। वरना छह दिनों वाले टेस्ट मैच में बहुत सारे खिलाड़ी तो ऐसे थे जो वास्तव में - शारीरिक और चुस्ती के मामले में खिलाड़ी कहलाने के योग्य भी नहीं थे,  कुछ बहुत आलसी से थे। जाहिर है, इस तरह के खिलाडियों से सिर्फ बोरिंग खेल की उम्मीद की जानी चाहिए थी । 

भारत के टीम में हर समय कुछ ऐसे खिलाड़ी भी हुआ करते थे जो अपने कलात्मक खेल और गौरवशाली इतिहास के वजह से टीम में थे - सिर्फ इसलिये कि वे "कभी कई सालों पहले कोई एक मैच जीता दिए थे"! इस तरह के दकियानूसी धारणाओं के ओट में शायद "स्वयं के लिए ही खेल रहे थे", देखने वाले दर्शकों के दुर्दशा पर उनका कोई ध्यान नहीं था।

केरी पैकर बहुत पैसेवाला था और एक टीवी चैनल का मालिक था। इस कारण से उसने टीवी पर क्रिकेट के कवरेज में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया। केरी पैकर ने क्रिकेट के खेल को टीवी पर बहुत ही रोचक और देखने योग्य बनाने में बहुत योगदान दिया - मैदान के अलग अलग कोने पर कैमरा लगा कर, उम्दा किस्म के कैमरा से क्लोज़-अप दिखाना, विकेट में माइक्रोफोन लगाना - और भी न जाने इस तरह के कितने प्रकार के प्रयोग हुये। एक तरह से उसने पूरे क्रिकेट के खेल को नया जामा पहना दिया था। 

इसी क्रम में खिलाडियों को भी रंगीन कपडे पहनाया गया - सफ़ेद कपडे के "वर्दी" से क्रिकेट खिलाडियों को मुक्ति मिलने लगा था। लोगों के सुविधा के हिसाब से क्रिकेट को पूरे दिन भर खेलने के बजाय, लाइट में रात-दिन के खेले जाने के शुरुआत का श्रेय भी केरी पैकर को ही जाता है। लाइट में गेंद को देखने में दिक्कत होती थी, इसलिए क्रिकेट के लाल गेंद को उजले गेंद से बदल दिया।

केरी पैकर के बाद क्रिकेट का दौर  

पर केरी पैकर ने कई मायने में क्रिकेट को पुनर्जीवित कर दिया। उनका क्रिकेट को आधुनिकीकरण करने में जो योगदान है, उसे इतिहास में स्वर्णाक्षर में लिखा जाना चाहिये, पर वैसा नहीं होगा - क्योंकि उसने जिस तरह से पारम्परिक क्रिकेट बोर्ड्स को धत्ता बताया था, उसकी कड़वाहट, क्रिकेट के "महा-पंडितों" में आज तक बरक़रार सा है। दरअसल उसने जिस अनुबंधित राशि का प्रलोभन विश्व के सभी खिलाड़ियों को दिया था, उतना हर देश के क्रिकेट बोर्ड्स अपने खिलाडियों को दे पाने में असमर्थ थे।

आज जब आईपीएल में वही सब कुछ, वैसा ही हो रहा है, जिसकी कल्पना केरी पैकर भाई साहब ने ३० साल पहले की थी - तो मैं उसके दूरदर्शिता के लिए नत-मस्तक हूँ। आज दबे स्वरों में लोग उनके प्रयास को जरूर सराहते होंगे। पर इतिहास में ये कोई पहली बार नहीं हुआ है, जब अज्ञानता और भय के घने बादल, हठता में बदल कर, नए विचार के किरणों को ढंकने की कोशिश करते रहे और अंततः प्रकाश ने अपना रास्ता ढूंढ ही लिया हो। केरी पैकर ने क्रिकेट के नए रूप का जो पौध लगाया वह आज टी-२० और आईपीएल सरीखे अनेकों लीग के बनकर बरगद पेड़ सा बन चुका है और शायद क्रिकेट का यही रूप आने वाले कई बरसों तक चलने वाला है !

कुल मिला कर क्रिकेट एक नए दौर में आ गया था। केरी के क्रांतिकारी परिवर्तन का असर था कि अब खेल का स्तर काफी ऊंचा हो गया था।  वैसे भी बदलते दौर में लोगों के पास कुछ काम-काज सा आने लगा था और क्रिकेट को देखने के आलावा भी कुछ करने जैसा और भी काम आ गया था इस लिए अब लोग छह दिनों तक के धीमी गति वाले खेल से ऊबने लगे थे।

समय के नज़ाकत को समझते हुए धीरे धीरे टेस्ट मैच से "रेस्ट डे" को अब हटा दिया गया है और लगातार पूरे पांच दिनों तक खेला जाता है। वैसे टेस्ट मैच में लोगों की, ख़ास कर नयी पीढ़ी के गिरते लोकप्रियता से ये अटकलें लगाई जा रही है कि - आखिर और कब तक? टेस्ट मैच अपनी अंतिम सांसें गिन रही हैं, क्योंकि अब दर्शकों के पास पूरे एक दिन का समय वन-डे देखने के लिए भी नहीं है और सभी टी -२० ज्यादा पसंद करने लगे हैं।

शुरुआत में वन डे इंटरनेशनल - ओडीआई - ६० ओवर्स का होता था और धीरे-धीरे उसमे कई सारे परिवर्तन लाये गए। अब यह सिर्फ ५० ओवर्स का खेल हो गया है। कई तरह के और परिवर्तन आये जैसे फील्ड रेस्ट्रिक्शन्स, पावर प्ले, नो बॉल के बाद एक बोनस बॉल पर -फ्री हिट - जिस पर बल्लेबाज आउट नहीं हो सकते हैं, इस तरह के और भी कई सारे फेर-बदल!

क्या सोचते हैं आज केरी के आलोचक?

क्रिकेट खेल में लोगों की रोचकता पहले से बहुत ज्यादा बढ़ गयी है।  अब ५० ओवर्स से कही ज्यादा २० ओवर्स के टी-२० ने ज्यादा लोकप्रियता पा ली है। आज अगर केरी पैकर्स होते तो उन्हें बहुत आश्चर्य सा होता कि उनके धुर -विरोधी भी उन्ही के क्रांतिकारी परिवर्तन की देन - क्रिकेट के व्यवसायीकरण के कारण खुशहाली के दिन देख पा रहे हैं! सुनील गावस्कर और बिशन सिंह बेदी ने भले ही केरी पैकर के प्रस्ताव को ठुकरा दिया हो, पर आज कमेंट्री बॉक्स में बैठ कर एकदिवसीय, टी-२० और न जाने असंख्य लीग मैचों के ऊपर अपनी प्रतिक्रिया देकर जितने पैसे कमाए हैं, उस कारण उनकी अंतरात्मा, एक बार केरी पैकर को जरूर धन्यवाद देता होगा!

४० सालों बाद, आज भी पुराने दिनों के लोग मानते हैं कि "वनडे क्रिकेट के आ जाने से, क्रिकेट के कलात्मक खेल के स्तर में ह्रास हुआ है।" परन्तु वे यह भूल जाते हैं कि उस कलात्मकता को बचाये रखने के चक्कर में आज शायद क्रिकेट के प्रति लोगों का प्यार ही ख़त्म हो जाता। समय के हिसाब से बदलाव जरूरी है- अगर लोग किसी खेल में बदलाव चाहते हैं, और उनके इच्छा की अपेक्षा होती रहे, तो धीरे धीरे लोग उस खेल के प्रति अपना नजरिया बदलने लगते हैं - और अंततः किसी दूसरे विकल्प की खोज में निकल पड़ते हैं। अगर क्रिकेट में बदलाव नहीं होता तो शायद लोग क्रिकेट को छोड़ किसी और खेल में ज्यादा रूचि लेने लगते।

केरी पैकर ने क्रिकेट में आज से कई साल पहले जितने भी प्रयोग किये थे, लगभग उन सभी को आज आईपीएल में सफलता पूर्वक प्रयोग में लाया जा रहा है और मेरा उनके दूरदर्शिता को सलाम! उनके और वैसे ही सोच वालों के, उनके समय के अनेक रूढ़िवादी विचारधारा के लाखों विरोध के बावजूद, क्रांतिकारी पहल का नतीज़ा है कि अब क्रिकेट अपने नए फॉर्मेट टी-२० में अमेरिका और कई और अन्य देशों में भी धीरे धीरे लोकप्रिय होता जा रहा है।

Dec 31, 2015

आगमन २०१६ का

हमारे जीवन के कितने रंग हैं  - कितने सारी कड़ियाँ और कितने सारे अनसुलझे सी गुत्थियां- पर इन सब के बीच, समय अपना चक्र चलाता रहता है - हर घड़ी एक नयी चुनौती, नया अवसर, नया अनुभव।

जब बीते सालों का अवलोकन करता हूँ, तो पाता हूँ कि हर नए साल की शुरुआत - एक मील के पत्थर के सामान होता है - जब बीते साल और साथ में कई बार पूरे अतीत के बारे में सोच कर, मन में अपने भूले-बिसरे क्षणों के साथ-साथ उनसे जुड़े कई सारे यादों के विचार आते हैं।

बचपन में दीवार पर कैलेंडर टंगे होते थे, और हर महीने के पेज को बदलते हुए, साल के अंत में कैलेंडर को ही बदल दिया जाता था। अब समय का दौर बदल गया, और अब बदलाव के तरीके भी बदल गए - अब तो कैलेंडर होता ही नहीं है, बल्कि उसके जगह सब कुछ डिजिटल हो गया है। जीवन का एक झंझट तो कम हो गया है, पर साथ ही साथ, हमारे समक्ष सदैव कुछ नयी चुनौतियाँ, अपने नए रूप में आ जाते हैं। जीवन की ऐसी ही उलझनें, हमें अपने जमीन, अपने वजूद और अपने वास्तविकता से जोड़े रखते हैं। कल्पना और यथार्थ के बीच, प्रयास के तार जुड़े हुए हैं, और उपलब्धियाँ, उनका प्रतिफल है।

कई बार वांछित फल न पाकर मन बहुत दुखी हो जाता है या जीवन में कुछ कटुता सी आ जाती हैं। मैंने कहीं पढ़ा या किसी से सुना था -"Life is unfair" - इस वाक्य को दो रूप से समझना चाहिए - Life is unfair अथवा Life is not fair? दोनों में अंतर है, काफी अंतर है। और, अगर इस कथन में, समय के दौर और अंतराल को भी जोड़ दिया जाए, तो सर्वथा ज्यादा स्पष्टता आ जाएगी। पहला का अभिप्राय है कि जीवन छली है, तो दूसरा का अर्थ यह निकलता है कि जीवन यथोचित नहीं करता। मेरा मानना है की प्रतिबिम्ब को देख कर आकृति का अनुमान लगाना गलत है। जीवन हमेशा सबके मूल तत्व सा है, इसके बिना हमारा कोई अस्तित्व ही नहीं है - तो फिर यह कभी भी किसी के लिए अन्यायी नहीं हो सकता है।  समय के दौर में अच्छे और बुरे परिणाम का न्याय सा हो जाता है और समय आने पर ही पता चलता है कि अनेकों अथक प्रयास के बाद भी जिस वांछित फल की मनोकामना की गयी थी, उसके नहीं मिलने का अंततः परिणाम स्वरुप क्या हुआ? कई बार असफलता के जड़ से ही भविष्य के सफलता के वृक्ष का सृजन होता है!

जीवन सबों के लिए एकसमान नहीं होता - एक जैसे प्रयास के फलस्वरूप, कभी किसी को अधिकतम तो किसी को न्यूनतम देता है। पर साथ ही अनुभव कहता है कि समय के लम्बे दौर में कई बार जीवन के खोये -पाये का योग सब कुछ बराबर कर देता है। और निष्ठापूर्वक किये प्रयास के बाद जो हासिल होता है, उसे जब दूसरों के साथ तुलना कर के देखते हैं, तब ही अच्छे और खराब का बोध होता है। इसलिए जीवन में काफी कटु अनुभवों, और उनसे उपजे मानसिक क्लेश के बाद, मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि जीवन को अपने दृष्टिकोण से ही देखना चाहिए,न कि तुलनात्मक रूप से।

सर्वप्रथम, यह समझ में आया कि जीवन को जितना सरल बनाया जाए, और अपने प्रयास को सिर्फ यथोचित प्राप्ति के लिए ही सीमित किया जाए, तो काफी कुछ यूँ ही सरल हो जाते हैं। अपने अतीत का पुनरावलोकन करने से, इस बात का भी बोध हुआ कि कई सारे वांछित फल सरलता पूर्वक मिल गए, तो कई के लिए अथक प्रयास करनी पड़ी। और, कई ऐसे भी हैं, जिसके पास तक भी नहीं पहुँच पाया- पर प्रयास जारी है। परन्तु अपने जीवन में अनेक सारे अपूरित वांछित फलों में से - कई ऐसे हैं जो एक समय बहुत ही आवश्यक से लगते थे या जिनकी बहुत चाहत सी थी - परन्तु, अचानक समय के दौर में वे सूक्ष्म से सूक्ष्मतर और कई तो दृष्टिगोचर होते चले गए। अर्थात, प्रबल इच्छा होना - उसके आवश्यक होने का द्योतक कतई नहीं है!

मुझे यह बात समझाने वाला कोई नहीं था कि - जीवन के सुख और सर्वांगीण प्रसन्नता के लिए किन उपलब्धियों की और कब किन सुविधाओं की आवश्यकता है? इस बात को काफी देर से समझ पाया कि जीवन की असली खुशी उसके अपने ही रूप में है। स्वतः रूप से जीवन की आवश्यकताओं को अपने प्रयास से प्राप्त कर के प्रसन्न रहना - एक कला है, जिसकी प्रशिक्षण दी जानी चाहिए - इस से जीवन के हर पहलू के साथ बराबर का न्याय हो पता है, न कि एक संकीर्ण अंधाधुंध दौड़!

हर कथित उपलब्धियों के लिए प्रयासरत हो जाने के अंधाधुंध दौड़ में कई मानसिक दुःख और क्लेश को अनुभव करने के बाद यह समझ पाया कि - मैंने कभी स्वावलोकन किया ही नहीं था कि - "आखिर, मुझे क्या चाहिए था?"  प्रयास की अपनी प्रतिबंधतायें हैं - और सब कुछ हासिल नहीं किया जा सकता - और गौर से देखने और समझने पर, यह भी समझ में आया कि शायद उनकी आवश्यकता भी नहीं हैं।

आज कई सालों बाद, साल के अंतिम दिन, कुछ एकांत के क्षण मिले हैं। मैंने सोचा कि अपने मन के उदगार को व्यक्त कर दूँ। जीवन अपने पूरी मस्ती में है - खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ काफी संतुष्ट सा हूँ। गुजरे साल भी बहुत अच्छे और समृद्ध अनुभवों को अपने दामन में सिमटे से हैं, और आने वाले नये साल से भी ऐसी ही उम्मीद है कि संतोषप्रद रहेगा। अच्छा और ख़राब, तो मन के भाव ही हैं- अस्तित्व का उल्लास मानना चाहिए!

इन्हीं शब्दों के साथ, सबों को नूतन वर्ष २०१६ के अनेकानेक शुभकामनाये!

Dec 13, 2015

तिमिर और परसाई के टॉर्च

आज अनायास ही हरिशंकर परसाई जी का कथा-संग्रह - "प्रेमचंद के फटे जूते" पढ़ने लगा।

आज आपसे एक मज़ेदार बात भी शेयर करता हूँ, मैं कभी भी उपन्यास को, सिल-सिलेबार ढंग से नहीं पढता हूँ। बल्कि मैं, रैंडम-आर्डर में, कही से भी पढ़ने लगता हूँ- "राग-दरबारी" को पिछले १० सालों से पढ़ ही रहा हूँ- और लगता है कि आगे भी पढता ही रहूँगा!

उसी क्रम में, आज परसाई के इस पुस्तक के एक कथा - "टॉर्च बेचने वाला" को पढ़ा। उसके पढ़ते ही, कथा के पात्र, उनके चित्रण और दिए सन्देश - सभी के मनन करने का दिल करने लगा। फिर क्या था,  इस पुस्तक को छोड़, मैं खूब सोचने लगा। हर दिशा से, मानस पटल पर, उमड़-घुमड़ कर बादलों की तरह, अनेको तरह के विचार के बरसात से होने लगे।

इस कहानी में - मानव धर्म और समाज में व्याप्त धारणाओं का - बड़ा ही सटीक चित्रण किया गया है। एक जैसे विचारों का, सिर्फ माध्यम और उपयोगिता का परिपेक्ष्य बदल दिया जाए, तो उस विचार और "विचारक" के प्रति समाज की अवधारणा को, बदलते देर नहीं लगता। कई मिलते जुलते विचार, मन में आने लगे।

तुरंत, पीटर सेलर्स अभिनीत - "Being There" - का स्मरण हो गया। इस सिनेमा मे बहुत ही रोचक ढंग से, सांसारिकता से अनभिज्ञ - एक गार्डनर यानी माली का चित्रण है, जो पूरी जिंदगी, कभी भी अपने घर के बाहर कदम तक नहीं रखा होता है। अपने पूरे जीवन-काल में उसे, सिर्फ और सिर्फ पेड़-पौधे और बागवानी का ही जानकारी हो पाता है। पर, अब बदले माहौल में, उसे उस चहारदीवारी से बाहर निकलना पड़ता है। अब वह संसार के दुसरे हिस्से में भी - जहाँ पहले कभी नहीं गया होता है - वहां भी जाता है।

घर से बाहर निकलते ही, उस गार्डनर को, अनेकों ऐसे प्रश्नो का सामना करना पड़ता है, जिनके बारे में उसे कोई अनुभव ही नहीं होता है। परन्तु पूरी तरह से अनभिज्ञ होकर भी, वह अपने मौलिक - बागवानी - के अनुभव और ज्ञान पर आधारित, उत्तर देता रहता है। जैसा सिनेमा में चित्रण है, प्रश्नकर्ता और बाकी लोग ये पाते हैं कि - गार्डनर का दिया हर एक बागवानी से जुड़ा मौलिक सा उत्तर - उन सभी समस्या, माहौल या प्रश्न के लिए, बिलकुल सटीक बैठता है। इस फिल्म को देखते समय, बार-बार इस बात का स्मरण होता है कि - महात्मा बनते नही हैं, बल्कि स्वतः बन जाते हैं - या बना दिए जाते हैं ।

प्रसिद्द हिंदी फिल्म - गाइड - में भी कुछ ऐसा ही चित्रण है। जब राजू-गाइड के आडंबर और वेश भूषा को देख कर, अकाल-पीड़ित गाँव के भूखे और मरणासन्न निवासी - उसमे ही आखरी उम्मीद के किरण के रूप में, ईश्वर का प्रभाव देखने लगते हैं। विवशता-वश, सारे गाँव वाले उनके चरणो में लेट कर, उससे ही बारिश करवाने के लिए, ईश्वर की प्रार्थना और उपवास करने की मांग कर बैठते हैं। 

आस्था का जन्म - विवशता के शव से हो के गुजरती है। और यह प्रक्रिया अति संक्रामक होता है - विश्वास - आस्था का ही जुड़वा होता है, एक का अनुभव, दुसरे के लिए विश्वसनीयता और तत्पश्चात आस्था का स्त्रोत - और फिर, लोग स्वयं ही प्रश्न करते हैं, और किसी - महापुरुष - के वाणी में, स्वतः ही उत्तर भी ढूंढ लेते हैं।

परसाई के इस कथा - "टॉर्च बेचनेवाला" में, दो मित्र- विपन्नता से ग्रसित हैं। दोनों अपने जीविकोपार्जन के लिए, किसी भी तरह के "धंधा" करके के सोचते हैं। "3 Idiots" - की तरह, पांच साल बाद, दोनों वापस मिल कर, अपने अपने चुने रास्ते का स्वावलोकन और सफलता का आंकलन करने की सोचते हैं। कहानी में जैसा विदित है, वे पुनः मिलते हैं। संयोगवश, दोनों "अंधकार और प्रकाश" के ही धंधे में होते हैं। लोगो को "अन्धकार" से डराने, और फिर उसके निदान के रूप में - प्रकाश - का सौदा।


जहाँ एक मित्र, लोगो को सामान्य जीवन में अन्धकार के नुक्सान और उससे बचने के लिए उजाले देने वाले टॉर्च के फायदे बता कर, "सूरज छाप" टॉर्च बेचता है। तो वही दूसरा मित्र, मनुष्य के जीवन की सूक्ष्मता और फिर आत्मा के अन्धकार में होने के बारे में उन्हें अवगत कराता है। निदान स्वरुप, लोगों को - "साधना -मंदिर" में आने का हल बताता है। यहाँ, वह भी सबों को प्रकाश की ओर ले जाने में मदद करने वाले, "अदृश्य-टॉर्च" को ही बेच कर, "सनातन" व्यवसायी के रूप में, सफल होकर एक फलता-फूलता व्यवसाय को चला रहा है ।

परसाई जी के लेखनी का कमाल है, कि पाठक को यह समझने में देर नहीं लगता कि दोनों के वक्तव्यों में बहुत समानतायें हैं। पर - सन्दर्भ और परिपेक्ष्य के अंतर ने - उन्ही वक्तव्यों के गूढ़ता और गहराई में, मीलों का फासला ला दिया हैं। फलस्वरूप, जहाँ पहले को टॉर्च बेचकर लोगों से पैसे की मांग करनी पड़ती है, वहीं दूसरी ओर - उसके मित्र के द्वारा, जीवन के परिपेक्ष्य में दिए वैसे ही वक्तव्यों पर - बड़ी संख्या में श्रद्धालु समर्पण के भाव से, नत-मस्तक होकर - स्वतः धन को उन्मुक्त भाव  से "अर्पित" कर रहे होते हैं।  कहना नहीं होगा कि "बाबा" बन चुके मित्र का "धंधा" फल-फूल रहा है। कहानी, समाज में व्याप्त धर्मांधों और धर्म-गुरुओं के ढकोसले पर सटीक कटाक्ष है। 

कथा पढ़ते समय, मेरे मन में एक और विचार आया - अन्धकार क्या है? वस्तुतः अन्धकार कुछ होता नहीं है, अपितु, प्रकाश का अभाव ही अन्धकार है। प्रकाश के अभाव में बने, अंधकार को ही दूर करने के लिए - प्रकाश के पूरक के रूप में, टॉर्च की आवश्यकता होती है।

मुझे स्मरण हुआ कि कुछ साल पहले, मैं अपने घर में, एक मीडिया रूम बना रहा था। उस क्रम में, प्रोजेक्टर लगाते समय अनुभव किया कि - परदे पर पड़ रहे सिनेमा के सजीवता को, और प्रखर बनाने के लिए, मुझे - ब्लैक के लेवेल - को, और बढ़ाने की आवश्यकता थी। ब्लैक के लेवल बढाने का अर्थ था कि अन्धकार को और बढ़ाना! प्रोजेक्टर से अन्धकार को नहीं लाया जा सकता था। बल्कि अन्धकार को बढ़ाने के लिए, कमरे के इर्द-गिर्द के रोशनी को ही बंद करना पड़ा था।

जीवन में भी, जब हम प्रकाश के सभी स्त्रोत को बंद करते जाते हैं तो - प्रकाश के कमी से - अंधकार बढ़ता जाता है। फिर, हमें भय सा होने लगता है - या फिर, कोई बाहर से भय को और उजागर करने के लिए - टॉर्च जैसे अस्थायी और सीमित ज्योति -पुंज से हमारा परिचय करा देता है, जिस पर हम आश्रित से होने लगते हैं - क्योकि अन्धकार से हमें अब भय होने लगता है।अंततः, जब तक हम अपने अन्तः ज्योति को जागृत न करें - जीवन अन्धकारमय ही रह जाता है - टॉर्च जैसे प्रकाश के स्त्रोत से आगे, हमें किसी स्थाई प्रकाश के ओर अग्रसारित होने की प्रबल इच्छा होने लगता है।

करना तो हमें स्वयं ही होता है, पर विकल्पों के तलाश में हम बाहर की ओर झांकते फिरते हैं - कबीर के दोहे में व्यक्त कस्तूरी मृग की भाँति -
कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढत बन माहि | ज्यो घट घट राम है, दुनिया देखे नाही |
जैसा कि कहीं पढ़ा या सुना था -
उम्र भर यही भूल करता रहा, धूल था चेहरे पर और आईना साफ़ करता रहा। 

Dec 7, 2015

किंकर्तव्यविमूढ़

यह चित्र मुझे इंटरनेट पर मिल गया। मैं नहीं जानता कि यह चित्र कैसे, कहाँ से और किस प्रयोजन से लिया गया है - बहरहाल, मुझे यह बहुत पसंद आया, और मुझे इस पर, कुछ लिखने का मन कर गया, इस लिए, इसे यहाँ प्रस्तुत किया हूँ।




इस चित्र में, एक गधे को मझधार में पड़े एक नाव पर, बिना किसी सहारे के दिखाया गया है। गौर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि गधे को, इस बात का कोई इल्म भी नही है, कि वह किस मुसीबत में फंस चुका है! ऐसा उसका गधा होने के कारण है या स्थिति ने उसे गधा बना दिया है - गधा एक संज्ञा के रूप में लेना चाहिए या विशेषण? गधा - तो गधा होता ही है, पर क्या स्थिति भी किसी को "गधा" बना देता है?
मुझे इस गधे को देख कर, अपने देश की शिक्षा पद्धत्ति के परिणाम के तौर पर, कॉलेज से डिग्री ले कर निकले छात्रों का बोध होता है। कुछ विचार-बिंदु :
१. चारों तरफ पानी काफी गहरा है- इस से साबित होता है कि मामला काफी गंभीर है।
२. इस स्थिति में वह स्वयं नहीं आया है, बल्कि किसी ने लाकर छोड़ दिया है।
३. इतनी दूर तक वह हठात् नहीं आ गया है, बल्कि आने में काफी considerable समय लगा होगा।
४. यथास्थित में बने रहना कोई option नहीं है।
५. "What got you here will not take you there" - स्पष्ट रूप से यहाँ तक आने का जो भी तरीका था, अब वह इसके लिए नहीं उपलब्ध है, अतः किनारे तक वापस जाने के लिए, इसे तैरना होगा या फिर कोई और जुगत लगानी पड़ेगी।
६. यह परिस्थिति, इस गधे के लिए एक "टर्निंग पॉइंट" हो सकता है - क्योंकि इसके बाद वह काफी जागरूक रहेगा और इस तरह के स्थिति में स्वयं को कभी नही देखना चाहेगा।

मैं बचपन में, विनोबा भावे का लिखा एक निबंध - "जीवन और शिक्षण"  - पढ़ा था,  जिसमे विद्यार्थी जीवन से यथार्थ के यात्रा को - "हनुमान -कूद" - की उपमा दी गयी है! ये एक विसंगति नहीं है तो क्या है कि - शिक्षण पद्धति को यथार्थ जीवन के लिए व्यवहारिक बनाने हेतु, उनके बताये सुझावों और अन्य सन्देशों का, हमारे शिक्षा-विदों पर यह असर हुआ कि - व्यवहारिकता के समावेश या ज्यादा महत्व देने वाले इस निबंध को ही पाठ्य-कर्म में डाल कर उनके विचारों की तिलांजलि दे दी गयी। हम सभी ने इस निबंध के रट्टे लगा कर, अच्छे अंक प्राप्त कर लिए, और विनोबा के ज्ञानों को रद्दी के टोकरी में डाल कर, लगभग उनका उपहास ही कर बैठे, और उस निबंध के ५० साल बाद भी समस्या यथावत है और आज भी छात्र जीवन से यथार्थ की कूद - "हनुमान -कूद" ही है! लेख की कुछ पंक्तियों बरबस याद आ जाते हैं। इतने साल के अनुभव के साथ आज वे ज्यादा तर्कसंगत लगते हैं-

संम्पूर्ण गैरजिम्मेदारी से संम्पूर्ण जिम्मेदारी में कूदना तो एक हनुमान-कूद ही हुई । ऐसी हनुमान-कूद की कोशिश में हाथ-पैर टूट जाय तो क्या अचरज? - विनोबा भावे
आज भी, हमारे देश की शिक्षा-पद्धति, व्यवहारिक से इतनी दूर है, कि जब छात्र पढ़ाई पूरी कर के वास्तविक जीवन में प्रवेश करता है - तो स्कूल में पढ़ाये गए सभी ज्ञान - धरे के धरे रह जाते हैं, और हर किसी के लिए, हकीकत की दुनिया, एक बिलकुल नयी सी  - जहाँ पूरी की पूरी पढाई निरर्थक, और कोई मतलब की नहीं नज़र आती है! हर कोई स्वयं को एक बिलकुल अजीबोगरीब सी स्थिति में पाता है - "किंकर्तव्यविमूढ़"!

Nov 5, 2015

बचपन के वो पल

बचपन की याद आते ही - स्कूल के क्लास की कहानियां, साथ खेलने वाले मित्रों के साथ बिताये अनेकों पल, और इन सबों से मिलते जुलते अनेकों घटनाएं - अचानक से किसी दुसरे दुनिया में ले जाते हैं। किसी घुमावदार पहाड़ी सड़क की तरह अनेकों मोड़ को लेते हुए यादों का काफिला आगे बढ़ती जाती हैं। इतने सालों बाद भी बचपन के बिताये वो हर पल आज भी उतनी ही ताज़ी और अपना सा लगता है- उन यादों के जंगल में जितनी बार जाओ, जी चाहता है कि बस भटकता ही जाऊँ!
इस सड़क पर कितनी मर्तबा दौड़े, गिरे, और फिर दौड़े थे..... 

तीन-पुलिया - इसके आगे जाना वर्जित था, हमारे घर के सुरक्षा कवच से बाहर का क्षेत्र सा  

इस खिड़की से मैं गली में बच्चों को इकट्ठा कर -"ढैन टन-न ना" के धुन पर सिनेमा जैसा कुछ दिखाता था! 

मेरे बचपन के स्वर्णिम यादों के  बरगद पेड़ सा - "नानी-घर"


मेरे मिठाइयों से प्रथम साक्षात्कार इसी मथुरा मिष्टान्न भंडार से हुआ था  

बचपन के दूसरे चरण का रंग-मंच  

रमेश स्टेशनरी दूकान का रमेश - इंजीनियरिंग के तैयारी के दौरान ढेर सारी कॉपियाँ खरीदने के कारण इनसे एक अनूठी पहचान सी बन गयी थी  

युवावस्था की चहलकदमी और सुख से दुःख में डूबा देने वाला घर - KD फ्लैट 

आज तक ईश्वर के नाम को याद करते ही इसी रंकणी मंदिर और ख़ास कर माँ काली का स्मरण हो जाता है   

मेरा यह प्रयास है कि इस ब्लॉग के माध्यम से अपने उन सभी सुनहरे पलों को फिर से पुनर्जीवित कर पाऊँ, संभवतः इस प्रयास में मेरे अन्य साथी भी जल्द ही योगदान करेंगे।