बचपन में स्कूल दो शिफ्ट्स में चलते थे - एक महीना हम सुबह ७ बजे से ११:३० तक वाले शिफ्ट में आते थे और अगले महीने १२ से ४:३० शाम तक वाले में। इस तरह से स्कूल से लौटते समय या जाते समय अक्सर बाजार के आस पास किसी न किसी तरह के गतिविधियों को देखने का मौका मिल जाया करता था।
बचपन में अनेकों बार मदारी के रस्सी पर चलने के करतब या संपेरों, और भालू-बन्दर को नचाने वाले के खेल को देख चुका था, इस कारण से इस तरह के खेल में मेरे लिए कोई नयापन नहीं बचा था। ज्यादातर समय इस तरह के खेल को बिना देखे, मैं स्कूल की ओर चला जाता था। पर इन सबों के बीच, एक मदारी वाले का - जादू का खेल होता था - जिसे मैं बचपन से अनेकों बार देख चुका था। इसके बाद भी, उसे फिर से देखने में मेरी दिलचस्पी बरकरार सी थी।
कारण अनेकों हो सकते थे - पर सबसे महत्वपूर्ण था - जादू के पीछे के राज़ को जानने की इच्छा। इतना तो पता हो ही चुका था कि जो सामने होते दीखता था, वह वास्तविक तो कतई नहीं था। फलस्वरूप, हर बार इस उम्मीद से उन मैजिक के ट्रिक्स से चकमा खाते रहते थे कि कोई सुराग तो मिले और जान पाये कि आखिर मैजिक ट्रिक का राज़ क्या था?
इस सिलसिले में याद आता है कि जरा सा बड़े हो जाने के बाद, अपने बचपन के मित्रो के साथ पैसे इकट्ठे करके हमने एक जादू के रहस्योद्घाटन करने वाली किताब खरीदी थी। अंततः, हम बहुत सारे जादू के रहस्य को समझ पाने में सफल हो गये थे। जादू के पीछे छुपे राज को जान लेने के बाद, जादू दिखाने वाले मदारी के खेल में, अब वो पहले वाली बात नहीं रह गयी थी।
अब हमारे लिए मदारीवाले का जादू का खेल, कोई इतना आकर्षक खेल नहीं रह गया था कि मैं इसके लिए रुक जाऊं - अलबत्ता कुछ अनसुलझे से रहस्य अब भी थे। पर यह भरोसा ही चुका था कि हर ऐसे खेल जिनका रहस्य अब तक नहीं जान पाये थे , उनके पीछे भी कुछ वैसा ही ट्रिक होगा जैसा बाकी के बाए में हम जानने लगे थे। और, इसीलिए अक्सर हम इनके चल रहे खेल को अनदेखा करते आगे निकल जाते थे।
इस तरह के जादू के खेल में मदारी जादूगर के साथ, कोई हमारे उम्र का ही छोटा-सा बच्चा भी हुआ करता था। खेल के शुरुआत में, मदारीवाला के सहायक के रूप में छोटा बच्चा काफी व्यस्त रहा करता था। मदारीवाला लोगों से बातों का सिलसिला बनाये गोल-गोल घूमता रहता था - जिस से लोगों के भीड़ को गोलाकार घेरे में फैला सके।
इधर उसका सहायक, भीड़ के बीचो-बीच चादर या दरी बिछाता रहता था। फिर उसके ऊपर, गंदे मटमैले ही चुके अनेको प्रकार के झोले या बोरे में से विभिन्न तरह के - जादू के दिखने लायक - हड्डियाँ और एक मानव खोपड़ी, कुछ लकड़ी के विचित्र आकृति वाले टुकड़े, बगुले के गर्दन जैसा एक टोंटी लगा लोटा, और भी इसी तरह के अन्य कई समानों को फैलाने में मदद करता दिख जाया करता था। इसके आलावा, कभी डमरू बजाने में, या जादूगर के द्वारा भीड़ को व्यस्त रखने के उद्देश्य से पूछे गए अनेक प्रकार के अनर्गल प्रश्नों के सवाल-जवाब में भी सक्रिय रहता था।
पूरे खेल के दौरान मदारीवाला और उसके साथ का बच्चा, हंसी-मजाक के माहौल बना कर लोगो का मनोरंजन भी करता रहता था। उनकी बातें जन-साधारण के लिए इतनी रोचक होती थी कि बाजार जैसे व्यस्त जगह में भी लोग रुक कर उन्हें देखने और बरबस हंसने के लिए विवश हो जाते थे! मेरे मन में यह कौतूहल होता था कि उन प्रश्नों का वैसा ही सटीक और चुभता सा उत्तर देने की कला को विकसित करने में, उन दोनों के बीच किस तरह का तालमेल और अभ्यास की आवशयकता पडी होगी?
सहायक बच्चा कम उम्र का होकर भी अपने व्यक्तित्व से वयोवृद्ध सा होता था। उस से किये बहुत सारे प्रश्न का प्रत्युत्तर, छूटते ही मिलता था - जिस से साफ़ पता चलता था कि वे सारे प्रश्न और उत्तर - काफी अच्छे ढंग से रिहर्सल किये हुए और लगभग रटे-रटाये से थे। फिर भी, "बनावटी मासूमियत" से बहुत ही सधा सा दिया हुआ जवाब, अप्राकृतिक लगने के बावजूद, रोचक सा ही लगता था। साथ ही उसके द्वारा कृत्रिम रूप से किया गया बातचीत का मकसद होता था कि वह प्रश्नो से बिलकुल अनभिज्ञ सा लगे, और जैसा दीखता था वैसा ही - मतलब, बच्चे जैसा ही लगे।
खेल के शुरुआत में, अनेकों प्रकार के छोटे-मोटे हाथ के सफाई वाले कारनामे होते रहते थे। और भीड़ को इकठ्ठा करने के प्रतीक्षा के दौरान जमा हो चुके भीेड़ का मनोरंजन कुछ ऐसे छोटे मोटे ट्रिक्स से होता जैसे - एक सिक्के को दो सिक्का बना देना या लकड़ी को झोले में डाल कर उस लकड़ी को सांप बना देना, और इसी तरह के अन्य करतबें। उस दौरान करतबों और कहकहों का सिलसिला चालू रहता था।
बचपन में अनेकों बार मदारी के रस्सी पर चलने के करतब या संपेरों, और भालू-बन्दर को नचाने वाले के खेल को देख चुका था, इस कारण से इस तरह के खेल में मेरे लिए कोई नयापन नहीं बचा था। ज्यादातर समय इस तरह के खेल को बिना देखे, मैं स्कूल की ओर चला जाता था। पर इन सबों के बीच, एक मदारी वाले का - जादू का खेल होता था - जिसे मैं बचपन से अनेकों बार देख चुका था। इसके बाद भी, उसे फिर से देखने में मेरी दिलचस्पी बरकरार सी थी।
कारण अनेकों हो सकते थे - पर सबसे महत्वपूर्ण था - जादू के पीछे के राज़ को जानने की इच्छा। इतना तो पता हो ही चुका था कि जो सामने होते दीखता था, वह वास्तविक तो कतई नहीं था। फलस्वरूप, हर बार इस उम्मीद से उन मैजिक के ट्रिक्स से चकमा खाते रहते थे कि कोई सुराग तो मिले और जान पाये कि आखिर मैजिक ट्रिक का राज़ क्या था?
इस सिलसिले में याद आता है कि जरा सा बड़े हो जाने के बाद, अपने बचपन के मित्रो के साथ पैसे इकट्ठे करके हमने एक जादू के रहस्योद्घाटन करने वाली किताब खरीदी थी। अंततः, हम बहुत सारे जादू के रहस्य को समझ पाने में सफल हो गये थे। जादू के पीछे छुपे राज को जान लेने के बाद, जादू दिखाने वाले मदारी के खेल में, अब वो पहले वाली बात नहीं रह गयी थी।
अब हमारे लिए मदारीवाले का जादू का खेल, कोई इतना आकर्षक खेल नहीं रह गया था कि मैं इसके लिए रुक जाऊं - अलबत्ता कुछ अनसुलझे से रहस्य अब भी थे। पर यह भरोसा ही चुका था कि हर ऐसे खेल जिनका रहस्य अब तक नहीं जान पाये थे , उनके पीछे भी कुछ वैसा ही ट्रिक होगा जैसा बाकी के बाए में हम जानने लगे थे। और, इसीलिए अक्सर हम इनके चल रहे खेल को अनदेखा करते आगे निकल जाते थे।
इस तरह के जादू के खेल में मदारी जादूगर के साथ, कोई हमारे उम्र का ही छोटा-सा बच्चा भी हुआ करता था। खेल के शुरुआत में, मदारीवाला के सहायक के रूप में छोटा बच्चा काफी व्यस्त रहा करता था। मदारीवाला लोगों से बातों का सिलसिला बनाये गोल-गोल घूमता रहता था - जिस से लोगों के भीड़ को गोलाकार घेरे में फैला सके।
इधर उसका सहायक, भीड़ के बीचो-बीच चादर या दरी बिछाता रहता था। फिर उसके ऊपर, गंदे मटमैले ही चुके अनेको प्रकार के झोले या बोरे में से विभिन्न तरह के - जादू के दिखने लायक - हड्डियाँ और एक मानव खोपड़ी, कुछ लकड़ी के विचित्र आकृति वाले टुकड़े, बगुले के गर्दन जैसा एक टोंटी लगा लोटा, और भी इसी तरह के अन्य कई समानों को फैलाने में मदद करता दिख जाया करता था। इसके आलावा, कभी डमरू बजाने में, या जादूगर के द्वारा भीड़ को व्यस्त रखने के उद्देश्य से पूछे गए अनेक प्रकार के अनर्गल प्रश्नों के सवाल-जवाब में भी सक्रिय रहता था।
पूरे खेल के दौरान मदारीवाला और उसके साथ का बच्चा, हंसी-मजाक के माहौल बना कर लोगो का मनोरंजन भी करता रहता था। उनकी बातें जन-साधारण के लिए इतनी रोचक होती थी कि बाजार जैसे व्यस्त जगह में भी लोग रुक कर उन्हें देखने और बरबस हंसने के लिए विवश हो जाते थे! मेरे मन में यह कौतूहल होता था कि उन प्रश्नों का वैसा ही सटीक और चुभता सा उत्तर देने की कला को विकसित करने में, उन दोनों के बीच किस तरह का तालमेल और अभ्यास की आवशयकता पडी होगी?
सहायक बच्चा कम उम्र का होकर भी अपने व्यक्तित्व से वयोवृद्ध सा होता था। उस से किये बहुत सारे प्रश्न का प्रत्युत्तर, छूटते ही मिलता था - जिस से साफ़ पता चलता था कि वे सारे प्रश्न और उत्तर - काफी अच्छे ढंग से रिहर्सल किये हुए और लगभग रटे-रटाये से थे। फिर भी, "बनावटी मासूमियत" से बहुत ही सधा सा दिया हुआ जवाब, अप्राकृतिक लगने के बावजूद, रोचक सा ही लगता था। साथ ही उसके द्वारा कृत्रिम रूप से किया गया बातचीत का मकसद होता था कि वह प्रश्नो से बिलकुल अनभिज्ञ सा लगे, और जैसा दीखता था वैसा ही - मतलब, बच्चे जैसा ही लगे।
खेल के शुरुआत में, अनेकों प्रकार के छोटे-मोटे हाथ के सफाई वाले कारनामे होते रहते थे। और भीड़ को इकठ्ठा करने के प्रतीक्षा के दौरान जमा हो चुके भीेड़ का मनोरंजन कुछ ऐसे छोटे मोटे ट्रिक्स से होता जैसे - एक सिक्के को दो सिक्का बना देना या लकड़ी को झोले में डाल कर उस लकड़ी को सांप बना देना, और इसी तरह के अन्य करतबें। उस दौरान करतबों और कहकहों का सिलसिला चालू रहता था।
इस सिलसिले में जादूगर उस बच्चे से जुड़े कोई मनगढंत सी कहानी का जिक्र शुरू कर देता था - जिसमें बच्चे को भूत के आतंक से हो रही परेशानियों का जिक्र होता था। फिर, अंत में बच्चे के अंदर घुस चुके भूत से, उसे छुटकारा दिलाने का वादा होता था, जिसमें इन्द्र्जाली तिलिस्म का निहायत ही जरूरत होता था।
मदारी का खेल, इन सब के जिन्दा मिसाल पेश करने जैसा ही कुछ होता था। और, इस पूरे कार्यक्रम का पटाक्षेप होता था, ताबीज़ इत्यादि जैसे कुछ बेचने से या प्रसन्नता-पूर्वक लोगों के दिए कुछ पारिश्रमिक से। भीड़ में से आधे लोग तो यूँ ही आतंकित से होते थे, और जो नहीं होते थे, वे खेल के दौरान दिखाए द्रष्टव्य से, अपने बचे-खुचे भरोसे पर पुनर्विचार करते हुए यथोचित कर लेते थे।
सारांश में, मदारी वाले के खेल का पूरा मसौदा यही होता था। संभवतः उन दिनों के दिखाए मदारी वालों के खेल की इतनी सी पटकथा भी, आज के किसी हिंदी फिल्म से, ज्यादा हुआ करता था। आज के हिंदी फिल्म का मकसद भी लगभग यही होता है, जो उन मदारीवालों का होता था - अर्थात भीड़ जमा करके, लोगो को कुछ देर व्यस्त करने का प्रयास और अंततः पैसे इकट्ठा करना।
ये अलग बात है कि फिल्मवाले पहले ही पैसे ले लेते हैं, और फिर ३ लाइन के कहानी को समूचे ३ घंटे के सिरदर्द कहानी बनाकर खींचते हैं। परन्तु, मदारीवालों के खेलों को कई बार देखने के बाद भी, वे आज के सिरदर्द फिल्मों से ज्यादा रोचक से लगते थे। वैसे भी लोग, मदारीवालों के खेल को देखने के बाद, अपने श्रद्धा भक्ति से पैसे देते थे, न कि खेल देखने के लिए!
उन दिनों के मदारीवाले के खेल को, आज के सन्दर्भ में देखना, बहुत ही अजीब सा लगता है। अब कहाँ मदरीवाले, कहाँ लोगों में इन मदारीवाले और उसके खेल को देखने में दिलचस्पी रही, कहाँ वो फुर्सत में घूमते लोग - जो सब्जी खरीदने के लिए टहलते हुए बाजार जाते थे। अब तो इस भाग दौड़ की ज़िंदगी में - मदारीवाले और उनके सभी हैरतअंगेज खेलों का सिलसिला - वक़्त के किसी पृष्ठ में दर्ज़ होकर संग्रहालय में रखे जाने योग्य से हो गए हैं।
परन्तु आज भी जब किसी अच्छे वक्ता को किसी कॉन्फ्रेंस या सेमीनार में आकर्षक, मनोरंजक और रोचक ढंग से बोलते देखता हूँ. बरबस उन मदारीवाले की याद आ जाती है। "पब्लिक स्पीकिंग" और "कनेक्टिंग विथ पीपल" का जीता जागता और बहुत ही प्रखर प्रमाण के रूप में, वे मदारीवाले हमेशा याद आते रहेंगे!
मदारी का खेल, इन सब के जिन्दा मिसाल पेश करने जैसा ही कुछ होता था। और, इस पूरे कार्यक्रम का पटाक्षेप होता था, ताबीज़ इत्यादि जैसे कुछ बेचने से या प्रसन्नता-पूर्वक लोगों के दिए कुछ पारिश्रमिक से। भीड़ में से आधे लोग तो यूँ ही आतंकित से होते थे, और जो नहीं होते थे, वे खेल के दौरान दिखाए द्रष्टव्य से, अपने बचे-खुचे भरोसे पर पुनर्विचार करते हुए यथोचित कर लेते थे।
सारांश में, मदारी वाले के खेल का पूरा मसौदा यही होता था। संभवतः उन दिनों के दिखाए मदारी वालों के खेल की इतनी सी पटकथा भी, आज के किसी हिंदी फिल्म से, ज्यादा हुआ करता था। आज के हिंदी फिल्म का मकसद भी लगभग यही होता है, जो उन मदारीवालों का होता था - अर्थात भीड़ जमा करके, लोगो को कुछ देर व्यस्त करने का प्रयास और अंततः पैसे इकट्ठा करना।
ये अलग बात है कि फिल्मवाले पहले ही पैसे ले लेते हैं, और फिर ३ लाइन के कहानी को समूचे ३ घंटे के सिरदर्द कहानी बनाकर खींचते हैं। परन्तु, मदारीवालों के खेलों को कई बार देखने के बाद भी, वे आज के सिरदर्द फिल्मों से ज्यादा रोचक से लगते थे। वैसे भी लोग, मदारीवालों के खेल को देखने के बाद, अपने श्रद्धा भक्ति से पैसे देते थे, न कि खेल देखने के लिए!
उन दिनों के मदारीवाले के खेल को, आज के सन्दर्भ में देखना, बहुत ही अजीब सा लगता है। अब कहाँ मदरीवाले, कहाँ लोगों में इन मदारीवाले और उसके खेल को देखने में दिलचस्पी रही, कहाँ वो फुर्सत में घूमते लोग - जो सब्जी खरीदने के लिए टहलते हुए बाजार जाते थे। अब तो इस भाग दौड़ की ज़िंदगी में - मदारीवाले और उनके सभी हैरतअंगेज खेलों का सिलसिला - वक़्त के किसी पृष्ठ में दर्ज़ होकर संग्रहालय में रखे जाने योग्य से हो गए हैं।
परन्तु आज भी जब किसी अच्छे वक्ता को किसी कॉन्फ्रेंस या सेमीनार में आकर्षक, मनोरंजक और रोचक ढंग से बोलते देखता हूँ. बरबस उन मदारीवाले की याद आ जाती है। "पब्लिक स्पीकिंग" और "कनेक्टिंग विथ पीपल" का जीता जागता और बहुत ही प्रखर प्रमाण के रूप में, वे मदारीवाले हमेशा याद आते रहेंगे!
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