बचपन के दिनों के सबसे यादगार पल- हाई-स्कूल के दिन थे। यह समय का वह दौर था, जब हम ऊंची आसमानी कूद की, तैयारी शुरू ही कर रहे थे । खुले आकाश में उन्मुक्त पंछी की तरह, जिंदगी की लम्बी उड़ान लगाने के लिए, बचपन के चोले को उतारकर, जवानी के पैराशूट को पहनने की शुरुआत कर चुके थे।
हाई-स्कूल तक आने के क्रम में, किसी पुराने योद्धा की तरह, हम कई तरह के बाधाओं को पार कर चुके थे और अनेको तरह के जटिल और नीरस विषयों को - और उनसे भी ज्यादा, कई शिक्षको के उबाऊ और मशीनी अंदाज़ में पढ़ाने के तौर-तरीके के - आदी से हो गए थे। किसी सुरंग के अंधकार में रोशनी के किरण से दिखने वाले - उन्मुक्तता का बोध कराने वाले - "कॉलेज" जाने के सुनहरे सुबह के सपने को देखते हुए - हम नौवी कक्षा को दस्तक दे चुके थे।
अगले दो साल की पढ़ाई, काफी गहन होने वाला था। वर्ल्ड कप के एलिमिनेशन राउंड की तरह, अब से पढ़ाई का, वास्तव में महत्व बहुत ज्यादा हो गया था - क्योंकि १०वीं के परीक्षाफल के आधार पर ही, भविष्य के पढ़ाई का निर्णय होने का प्रचलन था। ऐसे माहौल में, जैसा उम्मीद की जानी चाहिए - सब कुछ गंभीरता के कालिख में लिप्त से थे - अतः हमें किसी भी विषय की पढ़ाई या किसी शिक्षक के क्लास के, रोचक होने की कोई उम्मीद नहीं थी।
परन्तु, इन सब के बीच, हमारे जीवन में "एल टी" युग का प्रादुर्भाव हुआ!
एल टी अर्थात - श्री ललन तिवारी। कैसे इनके बारे में कुछ बताऊँ? संक्षेप में, एक अनुभव के रूप में ही इन्हे व्यक्त किया जा सकता है। कहने के लिए तो ये हमारे नौवी और दसवी में हिंदी और संस्कृत के शिक्षक थे। पर कई मायनों में, ये हमारे क्लास के दिल में बसे धड़कन से थे - जिनके माध्यम से पूरे दो साल तक, हमारे अंदर एक नयी ऊर्जा का संचार सा होता रहा। एल टी के बिना - स्कूल के दिनों की कल्पना - किसी चित्रकार के बनाये चेहरे में, आँखों को छोड़ देने जैसा होगा।
पढ़ाई के हर तौर तरीके और मापदंड से बिलकुल बेफिक्र, अलमस्त, बेख़ौफ़, बुलंद और मस्तमौला से शिक्षक। इनसे साक्षात्कार होने के पूर्व, जितने भी शिक्षक मिले थे - उन से बिलकुल ही अलग - किसी भी पंरपरागत शिक्षक के परिभाषा से नितांत ही अलग से - बहुत ही मौलिक और पठन -पाठन के विषय-वस्तु से काफी ऊपर दर्जे के - अपने ही अनूठे ढर्रे में ढले से - बिलकुल ही अलग नस्ल के शिक्षक - एल टी सर!
कुल मिला कर, "एल-टी" के साथ बिताये सुखद क्षणों का पिटारा - पूरे १० साल के स्कूल की पढ़ाई पर - कई गुना भारी पड़ेगा!
एल टी सर के कल्पना मात्र से ही, एक काफी रोबदार सा व्यक्तित्व की छवि, उभर कर सामने आती है। लम्बी और भव्य कदकाठी, चौड़ा-तना हुआ सीना, और किसी पहलवान जैसा बुलंद शरीर। हमेशा खद्दर के धोती-कुर्ता पहने - एक बहुत ही प्रभावशाली सा व्यक्तित्व का स्मरण होता है। चौड़ी ललाट और सिर के भू-मंडल के दूर क्षितिज तक बाल उड़े होने के कारण - साफ़ सुथरा चिकना सा सिर - जिसके कारण जाज्वल्यमान सा शौर्य-मंडल और भी प्रखर होकर -चमकता सा दीखता था। धान के खेत के कटाई के बाद छोड़े हुए जड़ों की तरह, गालों पर हलके से बढे हुए कच्ची-पकी दाढ़ी - ऐसा लगता, मानो गाल को मेघाच्छादित सा किये हुए हो।
अक्सर, एल टी सर क्लास जरा देर से आते थे - बाद में पता चला कि वे पान के बेहद शौक़ीन थे, और स्कूल के बाहर से पान खा कर आने के बाद ही, क्लास में पढ़ाने का मिज़ाज़ बनता था।
धीमे-धीमे क़दमों से बढ़ते हुए, एल टी सर क्लास के अंदर आते, फिर एक बार पूरी क्लास के ऊपर गहरी-सी निगाहें डालते। सहसा ऐसा प्रतीत होता था, मानो क्लास के अंदर कोई शेर आ गया हो, और हमारे क्लास के अंदर अनायास ही स्तब्धता सी छा जाती थी। क्लास के बीच के अंतराल में, कई उछृंखल से छात्रों के उछल-कूद या किसी को तंग करने की आदत सी थी, पर क्लास के अंदर, एल टी सर के पैर पड़ते ही, सब मृदु शशक की भांति भागते हुए - दुबक कर अपने- अपने सीट पर बैठ जाते थे। इनके व्यक्तित्व का ऐसा असर था कि इनकी निशब्द उपस्थिति मात्र ही, शेर का बोध कराता और पूरा क्लास शांत और चौकन्ना सा हो जाता था।
हाई-स्कूल तक आने के क्रम में, किसी पुराने योद्धा की तरह, हम कई तरह के बाधाओं को पार कर चुके थे और अनेको तरह के जटिल और नीरस विषयों को - और उनसे भी ज्यादा, कई शिक्षको के उबाऊ और मशीनी अंदाज़ में पढ़ाने के तौर-तरीके के - आदी से हो गए थे। किसी सुरंग के अंधकार में रोशनी के किरण से दिखने वाले - उन्मुक्तता का बोध कराने वाले - "कॉलेज" जाने के सुनहरे सुबह के सपने को देखते हुए - हम नौवी कक्षा को दस्तक दे चुके थे।
अगले दो साल की पढ़ाई, काफी गहन होने वाला था। वर्ल्ड कप के एलिमिनेशन राउंड की तरह, अब से पढ़ाई का, वास्तव में महत्व बहुत ज्यादा हो गया था - क्योंकि १०वीं के परीक्षाफल के आधार पर ही, भविष्य के पढ़ाई का निर्णय होने का प्रचलन था। ऐसे माहौल में, जैसा उम्मीद की जानी चाहिए - सब कुछ गंभीरता के कालिख में लिप्त से थे - अतः हमें किसी भी विषय की पढ़ाई या किसी शिक्षक के क्लास के, रोचक होने की कोई उम्मीद नहीं थी।
परन्तु, इन सब के बीच, हमारे जीवन में "एल टी" युग का प्रादुर्भाव हुआ!
एल टी अर्थात - श्री ललन तिवारी। कैसे इनके बारे में कुछ बताऊँ? संक्षेप में, एक अनुभव के रूप में ही इन्हे व्यक्त किया जा सकता है। कहने के लिए तो ये हमारे नौवी और दसवी में हिंदी और संस्कृत के शिक्षक थे। पर कई मायनों में, ये हमारे क्लास के दिल में बसे धड़कन से थे - जिनके माध्यम से पूरे दो साल तक, हमारे अंदर एक नयी ऊर्जा का संचार सा होता रहा। एल टी के बिना - स्कूल के दिनों की कल्पना - किसी चित्रकार के बनाये चेहरे में, आँखों को छोड़ देने जैसा होगा।
| पहले मिडिल स्कूल और बाद में कदमा बॉयज हाई स्कूल - लगभग पूरी स्कूलिंग इसी स्कूल में |
कुल मिला कर, "एल-टी" के साथ बिताये सुखद क्षणों का पिटारा - पूरे १० साल के स्कूल की पढ़ाई पर - कई गुना भारी पड़ेगा!
एल टी सर के कल्पना मात्र से ही, एक काफी रोबदार सा व्यक्तित्व की छवि, उभर कर सामने आती है। लम्बी और भव्य कदकाठी, चौड़ा-तना हुआ सीना, और किसी पहलवान जैसा बुलंद शरीर। हमेशा खद्दर के धोती-कुर्ता पहने - एक बहुत ही प्रभावशाली सा व्यक्तित्व का स्मरण होता है। चौड़ी ललाट और सिर के भू-मंडल के दूर क्षितिज तक बाल उड़े होने के कारण - साफ़ सुथरा चिकना सा सिर - जिसके कारण जाज्वल्यमान सा शौर्य-मंडल और भी प्रखर होकर -चमकता सा दीखता था। धान के खेत के कटाई के बाद छोड़े हुए जड़ों की तरह, गालों पर हलके से बढे हुए कच्ची-पकी दाढ़ी - ऐसा लगता, मानो गाल को मेघाच्छादित सा किये हुए हो।
अक्सर, एल टी सर क्लास जरा देर से आते थे - बाद में पता चला कि वे पान के बेहद शौक़ीन थे, और स्कूल के बाहर से पान खा कर आने के बाद ही, क्लास में पढ़ाने का मिज़ाज़ बनता था।
धीमे-धीमे क़दमों से बढ़ते हुए, एल टी सर क्लास के अंदर आते, फिर एक बार पूरी क्लास के ऊपर गहरी-सी निगाहें डालते। सहसा ऐसा प्रतीत होता था, मानो क्लास के अंदर कोई शेर आ गया हो, और हमारे क्लास के अंदर अनायास ही स्तब्धता सी छा जाती थी। क्लास के बीच के अंतराल में, कई उछृंखल से छात्रों के उछल-कूद या किसी को तंग करने की आदत सी थी, पर क्लास के अंदर, एल टी सर के पैर पड़ते ही, सब मृदु शशक की भांति भागते हुए - दुबक कर अपने- अपने सीट पर बैठ जाते थे। इनके व्यक्तित्व का ऐसा असर था कि इनकी निशब्द उपस्थिति मात्र ही, शेर का बोध कराता और पूरा क्लास शांत और चौकन्ना सा हो जाता था।
पान के तो शौकीन थे ही, पर उसका परिचायक सा बन चुका था - उनके होठों के दोनों कोने, जहाँ लाल-लाल स्थाई से दाग बन गए थे। मुँह के अंदर पान को दबाये रखने के कारण, कोई एक तरफ का गाल और भी ज्यादा उभरा सा रहता था। हमेशा पान से सिंचित लाल-लाल हो चुके होंठ उनके आभा-मंडल को और भी सुसज्जित सा कर देता था। बीच-बीच में दाँतो से चबाते हुए - पान का बड़ी चाव से रसास्वादन करते हुए - अपने मुखारबिंदु से शब्दों का उच्चारण करते थे, और सामने बैठे किसी छात्र से हिंदी की पुस्तक - "भाषा -सरिता" मांगते और फिर किसी अध्याय को खोल कर, हम सभी को भी उस पाठ को खोलने का निर्देश मिलता। इसके बाद, हिंदी का कोई एक पाठ का अध्ययन शुरू हो जाता।
बुलंद आवाज, लयबद्ध और धाराप्रवाह हिंदी, शब्दों का शुद्धतम उच्चारण, और उस पर से, नायाब शब्दों का चयन- जादूगर सा था यह शिक्षक! क्लास में ऐसा समां बन जाता था कि हर कोई मन्त्र-मुग्ध होकर, उन्हीं की तरफ, एकाग्रचित्त होकर देखने को विवश सा हो जाता था। धाराप्रवाह और ओजपूर्ण व्याख्या का ऐसा जादुई प्रभाव होता था कि कई बार तो ऐसा प्रतीत होता था कि मूल कविता से ज्यादा रोचक और भावपूर्ण तो शायद, एल टी सर की समीक्षा थी!
लिखने के क्रम में, बरबस उनके हरेक पहलू याद आने लगे, और ऐसा लग रहा है, मानो मेरे समक्ष खड़े होकर एल टी सर कुछ धाराप्रवाह सा बोले जा रहे हैं।
शुरुआत के दिनों में, एल टी सर के व्याख्या या सामान्य बोलचाल में शब्दों के चयन - हम में से कई लोगो के, समझ के परे सा होता था। उदाहरण के तौर पर - अपने व्याख्यान के दौरान, एल टी सर इस तरह के वाक्य बोलते थे - "इस कार्य को संपादित करने के पश्चात, नृपेश, अपने कक्ष के द्वार से शनैः शनैः अग्रसारित हो गए, और आखेट करने हेतु, वन की ओर प्रस्थान कर दिए।"
परन्तु, धीरे धीरे इनके भाषा और शब्दों का नशा किसी जाम की तरह, हमारे सिर चढ़ के बोलने लगा। फिर तो थोड़े अंतराल के बाद ही, हर किसी के जुबान पर क्लिष्ट हिंदी के बोल, यूँ स्वाभाविक रूप से आने लगे, मानो हम सभी ऐसी ही भाषा बोलने के आदी से थे! आज भी, जब किसी के समक्ष शुद्ध हिंदी का प्रयोग प्रारम्भ करता हूँ, तो एल टी के दिए शब्दों के तरकश में से, शब्दों के तीर की कभी कमी नहीं होती है।
एल टी से मैं इतना प्रभावित हो गया था कि मैं इनके सान्निध्य रहने का, कोई सा भी मौका नहीं छोड़ना चाहता था। और ऐसे में, जब मुझे यह पता चला कि वे अपने घर पर ही ट्यूशन पढ़ाया करते थे, तो मैं बिना किस उद्देश्य के ही - सिर्फ एल टी सर के संसर्ग में रहने की भावना से- बरबस इनके घर जाने लगा था। ट्यूशन का माहौल, काफी लचर सा होता था। कई तरह के छात्र, घर पर यूँ ही अनमने ढंग से पड़े रहते थे। कोई एल टी सर के बेटे को स्कूटर में घुमा लाता, तो कोई इनके घर का काम कर देता - और इन सब के बीच, कभी सर का मूड हो गया तो पढ़ा भी देते थे।
परन्तु मेरे लिए इन सब से कही ज्यादा महत्वपूर्ण - एल टी सर के साथ बिताये क्षण का लुत्फ़ उठाना होता था। मैं और मेरे कुछ और साथी, जो ट्यूशन पढ़ने जाते थे - घंटो मन्त्र-मुग्ध होकर एल टी सर की बातों को ही सुनते रहते थे - घर पर, देश की राजनीति से लेकर और भी कई स्थानीय और हलके विषयों पर, उन्मुक्त भाव से बाते करते और ठहाका भी लगाते थे।
ट्यूशन तो सिर्फ मिलने जुलने का एक बहाना सा था - मुझे नहीं याद है कि उन्होंने कभी पैसे की मांग की हो या कभी स्वयं पैसे लिए भी हों, कोई पैसे देने को आता तो - कहते थे - "ऊपर वाले शेल्फ पर रख दो"- व्यावसायिक तो कतई नहीं थे - बस, उनके घर पर भी स्नेह और ज्ञान की धारा का अनवरत प्रवाह सा चलता रहता था।
एक बार, एल टी सर के घर के एक शेल्फ के ऊपर रखे कुछ पुस्तकों को निहारते हुए, मुझे सर के कवि और लेखक होने का कुछ प्रमाण सा मिल गया। कुछ पुराने से कागज़ों का पुलिंदा सा था - जिसे पढ़ने से ज्ञात हुआ कि वे एल टी सर के हस्तलिखित पाण्डुलिपि से थे। ऐसा प्रतीत होता था कि एल टी सर कोई उपन्यास या कहानी सा लिख रहे थे, पर संभवतः समयाभाव के कारण, कई अरसे से वह अधूरा सा ही पड़ा हुआ था। इस के बारे में, सर से पूछने की कभी हिम्मत तो नहीं हुई, पर मैं उन्हें चोरी-छिपे पढता रहता था।
मेरी आंतरिक इच्छा होती थी कि काश मैं भी उनकी तरह ही, मौलिक रूप से, कुछ लिख पाता। आज इतने सालों बाद, अब मुझे यह कहते बिलकुल ही झिझक नहीं होती है कि मैं उनके सानिध्य रह कर साहित्य में डूबना चाहता था, और उसी की पढ़ाई भी करना चाहता था। पर सामाजिक और पारिवारिक दबाव था कि - नौकरी को सुरक्षित करने के लिए - इंजीनियरिंग या मेडिकल की ही पढ़ाई करूँ। और मैंने वैसा ही किया - परन्तु अंदर के पनपते साहित्यकार का - कही स्वतः अवसान सा हो गया।
शुरुआत में, हमें एल टी सर के पूर्ण व्यक्तित्व का पता नहीं था। पर जैसे-जैसे समय बीतने लगा - ऐसा लगने लगा कि इनके अंदर भी एक छोटे से बच्चे का वास सा था, जो हमारे साथ मिलते ही मानो झूम-झूम कर अपनी जिंदगी जीता था। हमारे बीच एक ऐसा सम्बन्ध बन गया था, जो शिक्षक और छात्रों के बीच का उत्कृष्टतम और सर्वथा अनुकरणीय सा सम्बन्ध था।
बुलंद आवाज, लयबद्ध और धाराप्रवाह हिंदी, शब्दों का शुद्धतम उच्चारण, और उस पर से, नायाब शब्दों का चयन- जादूगर सा था यह शिक्षक! क्लास में ऐसा समां बन जाता था कि हर कोई मन्त्र-मुग्ध होकर, उन्हीं की तरफ, एकाग्रचित्त होकर देखने को विवश सा हो जाता था। धाराप्रवाह और ओजपूर्ण व्याख्या का ऐसा जादुई प्रभाव होता था कि कई बार तो ऐसा प्रतीत होता था कि मूल कविता से ज्यादा रोचक और भावपूर्ण तो शायद, एल टी सर की समीक्षा थी!
लिखने के क्रम में, बरबस उनके हरेक पहलू याद आने लगे, और ऐसा लग रहा है, मानो मेरे समक्ष खड़े होकर एल टी सर कुछ धाराप्रवाह सा बोले जा रहे हैं।
शुरुआत के दिनों में, एल टी सर के व्याख्या या सामान्य बोलचाल में शब्दों के चयन - हम में से कई लोगो के, समझ के परे सा होता था। उदाहरण के तौर पर - अपने व्याख्यान के दौरान, एल टी सर इस तरह के वाक्य बोलते थे - "इस कार्य को संपादित करने के पश्चात, नृपेश, अपने कक्ष के द्वार से शनैः शनैः अग्रसारित हो गए, और आखेट करने हेतु, वन की ओर प्रस्थान कर दिए।"
परन्तु, धीरे धीरे इनके भाषा और शब्दों का नशा किसी जाम की तरह, हमारे सिर चढ़ के बोलने लगा। फिर तो थोड़े अंतराल के बाद ही, हर किसी के जुबान पर क्लिष्ट हिंदी के बोल, यूँ स्वाभाविक रूप से आने लगे, मानो हम सभी ऐसी ही भाषा बोलने के आदी से थे! आज भी, जब किसी के समक्ष शुद्ध हिंदी का प्रयोग प्रारम्भ करता हूँ, तो एल टी के दिए शब्दों के तरकश में से, शब्दों के तीर की कभी कमी नहीं होती है।
एल टी से मैं इतना प्रभावित हो गया था कि मैं इनके सान्निध्य रहने का, कोई सा भी मौका नहीं छोड़ना चाहता था। और ऐसे में, जब मुझे यह पता चला कि वे अपने घर पर ही ट्यूशन पढ़ाया करते थे, तो मैं बिना किस उद्देश्य के ही - सिर्फ एल टी सर के संसर्ग में रहने की भावना से- बरबस इनके घर जाने लगा था। ट्यूशन का माहौल, काफी लचर सा होता था। कई तरह के छात्र, घर पर यूँ ही अनमने ढंग से पड़े रहते थे। कोई एल टी सर के बेटे को स्कूटर में घुमा लाता, तो कोई इनके घर का काम कर देता - और इन सब के बीच, कभी सर का मूड हो गया तो पढ़ा भी देते थे।
परन्तु मेरे लिए इन सब से कही ज्यादा महत्वपूर्ण - एल टी सर के साथ बिताये क्षण का लुत्फ़ उठाना होता था। मैं और मेरे कुछ और साथी, जो ट्यूशन पढ़ने जाते थे - घंटो मन्त्र-मुग्ध होकर एल टी सर की बातों को ही सुनते रहते थे - घर पर, देश की राजनीति से लेकर और भी कई स्थानीय और हलके विषयों पर, उन्मुक्त भाव से बाते करते और ठहाका भी लगाते थे।
ट्यूशन तो सिर्फ मिलने जुलने का एक बहाना सा था - मुझे नहीं याद है कि उन्होंने कभी पैसे की मांग की हो या कभी स्वयं पैसे लिए भी हों, कोई पैसे देने को आता तो - कहते थे - "ऊपर वाले शेल्फ पर रख दो"- व्यावसायिक तो कतई नहीं थे - बस, उनके घर पर भी स्नेह और ज्ञान की धारा का अनवरत प्रवाह सा चलता रहता था।
एक बार, एल टी सर के घर के एक शेल्फ के ऊपर रखे कुछ पुस्तकों को निहारते हुए, मुझे सर के कवि और लेखक होने का कुछ प्रमाण सा मिल गया। कुछ पुराने से कागज़ों का पुलिंदा सा था - जिसे पढ़ने से ज्ञात हुआ कि वे एल टी सर के हस्तलिखित पाण्डुलिपि से थे। ऐसा प्रतीत होता था कि एल टी सर कोई उपन्यास या कहानी सा लिख रहे थे, पर संभवतः समयाभाव के कारण, कई अरसे से वह अधूरा सा ही पड़ा हुआ था। इस के बारे में, सर से पूछने की कभी हिम्मत तो नहीं हुई, पर मैं उन्हें चोरी-छिपे पढता रहता था।
मेरी आंतरिक इच्छा होती थी कि काश मैं भी उनकी तरह ही, मौलिक रूप से, कुछ लिख पाता। आज इतने सालों बाद, अब मुझे यह कहते बिलकुल ही झिझक नहीं होती है कि मैं उनके सानिध्य रह कर साहित्य में डूबना चाहता था, और उसी की पढ़ाई भी करना चाहता था। पर सामाजिक और पारिवारिक दबाव था कि - नौकरी को सुरक्षित करने के लिए - इंजीनियरिंग या मेडिकल की ही पढ़ाई करूँ। और मैंने वैसा ही किया - परन्तु अंदर के पनपते साहित्यकार का - कही स्वतः अवसान सा हो गया।
शुरुआत में, हमें एल टी सर के पूर्ण व्यक्तित्व का पता नहीं था। पर जैसे-जैसे समय बीतने लगा - ऐसा लगने लगा कि इनके अंदर भी एक छोटे से बच्चे का वास सा था, जो हमारे साथ मिलते ही मानो झूम-झूम कर अपनी जिंदगी जीता था। हमारे बीच एक ऐसा सम्बन्ध बन गया था, जो शिक्षक और छात्रों के बीच का उत्कृष्टतम और सर्वथा अनुकरणीय सा सम्बन्ध था।
धीरे-धीरे एल टी सर के क्लास में, कुछ छात्र, उनके "विशेष प्रसाद" के हकदार से बन गए थे। उस लिस्ट में सबसे ऊपर - मनोज सिंह हुआ करता था - जिसे हम "तैमूर-लंग" कह कर पुकारते थे। मनोज बहुत ही उत्पाती जीव था - और, ऊपर से एल टी सर उनके पिता - जो स्वयं एक शिक्षक थे, उनको जानते भी थे। फलस्वरूप, यह विशेष संवाद और उसके साथ जुड़ा कार्यक्रम, अनेको पुनरावृत्ति के बाद अब बिलकुल कंठस्थ सा हो गया है, और आँखे बंद करके सोचता हूँ, तो ऐसा लगता है कि अभी सामने ही घटित हो रहा हो!
एल टी सर, खेत से सब्जी उखाड़ने वाले अंदाज़ में मनोज के केश को मुट्ठी में पकड़ कर हंसते हुए -
किसी ने अनेको बार इस डायलॉग के सुनने के बाद, यह प्रश्न कर ही दिया कि आखिर "लेढा" क्या होता है - जिसके जवाब में हमें पता चला कि शुरुआत में गेंहू और लेढा एक साथ ही उगते हैं, और दीखते भी एक जैसे हैं, पर बाद में जाकर गेंहू तो काम का होता है पर लेढा कोई काम का नहीं - शायद लेढा एक प्रकार का weed होता होगा।
एक और छात्र होता था - मधुप पांडे, इसकी ख़ास बात यह थी कि यह भी बहुत हाजिरजवाब सा था और इसकी आवाज़ काफी ऊंची और कर्णभेदी सी थी। गाँव से अपने शुरुआती पढ़ाई करके आया था और भोजपुरी-निष्ठ हिंदी बोलता था - साथ ही, काफी निर्भीक होकर, फ़ौरन एल टी सर के प्रश्नों का प्रत्युत्तर देता रहता था।
एक हमारे मित्र हैं - बालाजी भगवती झा- अब नाम की लम्बाई के अनुरूप हो गया है, पर उन दिनों कदकाठी में बहुत छोटा हुआ करता था। और इसी वजह से, दसवीं क्लास में भी, हाफ पेंट में अाने वाले कुछेक छात्रों में से एक हुआ करता था। बालाजी बहुत ही उत्पाती छात्र था, और हमेशा किसी ने किसी प्रकार के खुराफात में लगा रहता था - जिस कारण, एल टी सर उसे अपने पास बुलाते और कुछ "प्रसाद" देते हुए कहते- "देखेन में छोटन लागे, घाव करे गंभीर"
एक दिन, एल टी सर उसके उत्पात से तंग आ गए और एक थप्पड़ रसीद करते हुए कह दिए -
"चूहा" के किसी और उत्पात के - धारावाहिक अंक के नवीनतम संस्करण के उपलक्ष्य में - एल टी सर उसके हाथों को मोड़ते हुए पूछ बैठे -
पीठ पर दो-चार थप्पड़ के बाद एल टी सर ने पूछा -
अक्सर क्लास में, इस तरह के मनोविनोद के क्षण होते रहते थे। और, फिर देर तक चलता था, हंसी और ठहाकों का सिलसिला। कई बार तो अगल-बगल के क्लासरूम कर शिक्षक, चिंतित होकर, हमारे क्लास में आकर झांकते - शायद, ये देखने आ जाते थे, कि क्लास में किसी शिक्षक के न होने के कारण, हम सभी अपनी मस्ती में होंगे - पर, जैसे ही देखते थे कि एल टी सर क्लास में ही हैं - वे कुछ निराश सा होकर लौट जाते थे!
एल टी सर के शब्दावली के संकलन में, हमें सम्बोधित करने के लिए अनेको शब्द थे, जैसे-
नालायक, पाखंडी, दुष्ट, पापी, भ्रष्ट, पराक्रमी, कृतघ्न, दुष्कर्मी, उछृंखल, गेंहू के खेत में लेढ़ा, अच्छे बाप का नालायक बेटा, आदि आदि।
एल टी के क्लास की बात ही कुछ अलग होती थी- अगर ये सातवी क्लास में भी आते तो - ऐसा लगता जैसे खाने में कोई तीखी चटनी का चटखारा ले रहे हों!
छात्रों में अपनी विशेष लोकप्रियता के कारण, स्कूल में होने वाले सरवती पूजा के लिए एल टी सर को, संचालन की कार्यवाही दी गयी। एल टी सर हर क्लास में घूम घूम कर अपील करते हुए चंदे की मांग करने लगे। और उस क्रम में एल टी सर ने चुटकी लेते हुए कहा कि चंदा देने से सब का भला होगा - और सभी अव्वल दर्जे में मैट्रिक की परीक्षा को पास कर लेंगे।
इस पर हमारे क्लास का सबसे हंसमुख और हाजिरजवाब साईं ने कहा -
एल टी सर और उनके क्लास के ऐसे कितने ही अविस्मरणीय किस्से याद आते रहते हैं। जी करता है कि वापस अतीत में चला जाऊं। जहाँ एक तरफ हंसी और ठहाके का दौर चलता था और क्लास में खुशनुमा सा माहौल रहता था, वही दूसरी तरफ उनसे प्राप्त किये ज्ञान का कोई अंत नहीं होता था।
उनसे सीखने की तो कोई सीमा ही नहीं थी - उनके पास हिंदी और संस्कृत के ज्ञान का अपरम्पार भण्डार सा था - जयशंकर प्रसाद हो या निराला, महादेवी वर्मा हो या दिनकर, मैथिली शरण गुप्त हो या हरिऔध, रामचन्द्र शुक्ल हो या रामवृक्ष बेनीपुरी, रेणु हो या पंत, कबीर हो या सूरदास, विद्यापति हो या बिहारीलाल, रहीम हो या जायसी, कालिदास हो या किसी वेद का श्लोक - हर विषय पर बहुत ही रोचकता से व्याख्यान कर सकते थे।
हमारे बहुत ही प्रिय ललन तिवारी अब नहीं रहे!
मेरी बहुत इच्छा थी कि उनसे मैं इस बार के अपने जमशेदपुर के दौरे में मिल पाता -पर ईश्वर को शायद वह पसंद नहीं था। पता चला कि कुछ महीने पहले, उनका अपने गाँव में स्वर्गवास हो गया। मेरे सबसे प्रिय शिक्षक ललन तिवारी - मेरे अंतिम साँसों तक, मेरे अंदर जीते ही रहेंगे। मेरे अंतर्मन में, हिंदी साहित्य के प्रति उन्होंने जो रूचि पैदा की है, वह चिनगारी अब दावानल सी बन गयी है। जब कभी मैं हिंदी पढता हूँ, लिखता हूँ और बोलता हूँ- एल टी सर का ही प्रभाव दीखता है।
एल टी सर अपने हर छात्र के लिए - अभिभावक, मित्र, शिक्षक, रोल-मॉडल से थे। वे सबों के लिए श्रद्धेय तो थे ही, पर उनके साथ सबों का ऐसा सम्बन्ध भी था कि कोई भी खुल के कुछ भी उनको व्यक्त कर सके। इस सन्दर्भ में, मुझे स्मरण होता है एक घटना, जिसमे उनके एक बिलकुल ही अलग रूप का पता चला था।
हमारे साथ एक छात्र होता था - अरुण सिंह। किसी पारिवारिक या अन्य कारणों से वह बहुत ही उद्विग्न सा रहता था। उसका व्यवहार काफी दबंग और कर्कश सा हो गया था - आये दिन किसी से भी झगड़ा या मारपीट करना - आम बात थी। एक दिन - अरुण, स्कूल में तलवार लेकर आ गया, और उसके बाद अचानक, हेडमास्टर से उसकी बहुत झड़प हो गयी। उसके बाद, अरुण चीखता -चिल्लाता हुआ, हेडमास्टर के ऑफिस से बाहर निकला।
एल टी सर, खेत से सब्जी उखाड़ने वाले अंदाज़ में मनोज के केश को मुट्ठी में पकड़ कर हंसते हुए -
अच्छे बाप का - नालायक बेटा - गेंहू के खेत में लेढामनोज भी धाराप्रवाह कुछ न कुछ बोल कर, एल टी सर को उकसाते ही रहता था।
किसी ने अनेको बार इस डायलॉग के सुनने के बाद, यह प्रश्न कर ही दिया कि आखिर "लेढा" क्या होता है - जिसके जवाब में हमें पता चला कि शुरुआत में गेंहू और लेढा एक साथ ही उगते हैं, और दीखते भी एक जैसे हैं, पर बाद में जाकर गेंहू तो काम का होता है पर लेढा कोई काम का नहीं - शायद लेढा एक प्रकार का weed होता होगा।
एक और छात्र होता था - मधुप पांडे, इसकी ख़ास बात यह थी कि यह भी बहुत हाजिरजवाब सा था और इसकी आवाज़ काफी ऊंची और कर्णभेदी सी थी। गाँव से अपने शुरुआती पढ़ाई करके आया था और भोजपुरी-निष्ठ हिंदी बोलता था - साथ ही, काफी निर्भीक होकर, फ़ौरन एल टी सर के प्रश्नों का प्रत्युत्तर देता रहता था।
एक हमारे मित्र हैं - बालाजी भगवती झा- अब नाम की लम्बाई के अनुरूप हो गया है, पर उन दिनों कदकाठी में बहुत छोटा हुआ करता था। और इसी वजह से, दसवीं क्लास में भी, हाफ पेंट में अाने वाले कुछेक छात्रों में से एक हुआ करता था। बालाजी बहुत ही उत्पाती छात्र था, और हमेशा किसी ने किसी प्रकार के खुराफात में लगा रहता था - जिस कारण, एल टी सर उसे अपने पास बुलाते और कुछ "प्रसाद" देते हुए कहते- "देखेन में छोटन लागे, घाव करे गंभीर"
एक दिन, एल टी सर उसके उत्पात से तंग आ गए और एक थप्पड़ रसीद करते हुए कह दिए -
चूहे की तरह बदमाशी कर के भाग जाता हैजिसके बाद, कहना नहीं होगा कि आजतक उसे किस नाम से पुकारा जाता है।
"चूहा" के किसी और उत्पात के - धारावाहिक अंक के नवीनतम संस्करण के उपलक्ष्य में - एल टी सर उसके हाथों को मोड़ते हुए पूछ बैठे -
अरे तुम किस नक्षत्र में पैदा हुआ है?इसके बाद जो हुआ, वह क्लास के हर किसी के यादों में, आज भी बिलकुल हरा है!
रावण नक्षत्र में सर
पीठ पर दो-चार थप्पड़ के बाद एल टी सर ने पूछा -
आखिर किस खानदान के हो तुम?ये बोलते-बोलते ललन तिवारी इतने जोर से हँसे थे कि सारा क्लास भी ठहाके में गूंज गया! उन दिनों कुछेक शब्दों को उल्टा बोलने का प्रचलन सा था और सर्वथा यह "बुड्ढा" शब्द का उल्टा - "ढा -बु " का अपभ्रंश सा रहा होगा।
जिस खानदान के आप हैं, उसी खानदान के हैं, सर!
कौन सा?
ढाबुड खानदान सर
ढा - बुड, ये कौन सा खानदान होता है?
अक्सर क्लास में, इस तरह के मनोविनोद के क्षण होते रहते थे। और, फिर देर तक चलता था, हंसी और ठहाकों का सिलसिला। कई बार तो अगल-बगल के क्लासरूम कर शिक्षक, चिंतित होकर, हमारे क्लास में आकर झांकते - शायद, ये देखने आ जाते थे, कि क्लास में किसी शिक्षक के न होने के कारण, हम सभी अपनी मस्ती में होंगे - पर, जैसे ही देखते थे कि एल टी सर क्लास में ही हैं - वे कुछ निराश सा होकर लौट जाते थे!
एल टी सर के शब्दावली के संकलन में, हमें सम्बोधित करने के लिए अनेको शब्द थे, जैसे-
नालायक, पाखंडी, दुष्ट, पापी, भ्रष्ट, पराक्रमी, कृतघ्न, दुष्कर्मी, उछृंखल, गेंहू के खेत में लेढ़ा, अच्छे बाप का नालायक बेटा, आदि आदि।
एल टी के क्लास की बात ही कुछ अलग होती थी- अगर ये सातवी क्लास में भी आते तो - ऐसा लगता जैसे खाने में कोई तीखी चटनी का चटखारा ले रहे हों!
छात्रों में अपनी विशेष लोकप्रियता के कारण, स्कूल में होने वाले सरवती पूजा के लिए एल टी सर को, संचालन की कार्यवाही दी गयी। एल टी सर हर क्लास में घूम घूम कर अपील करते हुए चंदे की मांग करने लगे। और उस क्रम में एल टी सर ने चुटकी लेते हुए कहा कि चंदा देने से सब का भला होगा - और सभी अव्वल दर्जे में मैट्रिक की परीक्षा को पास कर लेंगे।
इस पर हमारे क्लास का सबसे हंसमुख और हाजिरजवाब साईं ने कहा -
सर, इस बात का हम सभी को लिखित में प्रमाण दीजिये, तब चन्दा मिलेगा!छूटते ही एल टी सर ने जो ठहाका लगाया था, उसकी गूंज आज तक याद है।
एल टी सर और उनके क्लास के ऐसे कितने ही अविस्मरणीय किस्से याद आते रहते हैं। जी करता है कि वापस अतीत में चला जाऊं। जहाँ एक तरफ हंसी और ठहाके का दौर चलता था और क्लास में खुशनुमा सा माहौल रहता था, वही दूसरी तरफ उनसे प्राप्त किये ज्ञान का कोई अंत नहीं होता था।
उनसे सीखने की तो कोई सीमा ही नहीं थी - उनके पास हिंदी और संस्कृत के ज्ञान का अपरम्पार भण्डार सा था - जयशंकर प्रसाद हो या निराला, महादेवी वर्मा हो या दिनकर, मैथिली शरण गुप्त हो या हरिऔध, रामचन्द्र शुक्ल हो या रामवृक्ष बेनीपुरी, रेणु हो या पंत, कबीर हो या सूरदास, विद्यापति हो या बिहारीलाल, रहीम हो या जायसी, कालिदास हो या किसी वेद का श्लोक - हर विषय पर बहुत ही रोचकता से व्याख्यान कर सकते थे।
हमारे बहुत ही प्रिय ललन तिवारी अब नहीं रहे!
मेरी बहुत इच्छा थी कि उनसे मैं इस बार के अपने जमशेदपुर के दौरे में मिल पाता -पर ईश्वर को शायद वह पसंद नहीं था। पता चला कि कुछ महीने पहले, उनका अपने गाँव में स्वर्गवास हो गया। मेरे सबसे प्रिय शिक्षक ललन तिवारी - मेरे अंतिम साँसों तक, मेरे अंदर जीते ही रहेंगे। मेरे अंतर्मन में, हिंदी साहित्य के प्रति उन्होंने जो रूचि पैदा की है, वह चिनगारी अब दावानल सी बन गयी है। जब कभी मैं हिंदी पढता हूँ, लिखता हूँ और बोलता हूँ- एल टी सर का ही प्रभाव दीखता है।
एल टी सर अपने हर छात्र के लिए - अभिभावक, मित्र, शिक्षक, रोल-मॉडल से थे। वे सबों के लिए श्रद्धेय तो थे ही, पर उनके साथ सबों का ऐसा सम्बन्ध भी था कि कोई भी खुल के कुछ भी उनको व्यक्त कर सके। इस सन्दर्भ में, मुझे स्मरण होता है एक घटना, जिसमे उनके एक बिलकुल ही अलग रूप का पता चला था।
हमारे साथ एक छात्र होता था - अरुण सिंह। किसी पारिवारिक या अन्य कारणों से वह बहुत ही उद्विग्न सा रहता था। उसका व्यवहार काफी दबंग और कर्कश सा हो गया था - आये दिन किसी से भी झगड़ा या मारपीट करना - आम बात थी। एक दिन - अरुण, स्कूल में तलवार लेकर आ गया, और उसके बाद अचानक, हेडमास्टर से उसकी बहुत झड़प हो गयी। उसके बाद, अरुण चीखता -चिल्लाता हुआ, हेडमास्टर के ऑफिस से बाहर निकला।
चीख -चिल्लाहट के गूंज को सुन कर, सभी लोग क्लास के बाहर आ गए और सामने देखने लगे - अरुण को संभवतः स्कूल से निष्कासित करने के बाद गेट से बाहर निकाल दिया गया था। फिर क्या था, गुस्से में अरुण को जो कुछ सामने दिख रहा था - पत्थर, ढेला, ईंट, लकड़ी- उसे ही फेंकता हुआ- बिलकुल आतंकित शेर की तरह दहाड़ने लगा था और गंदी-गंदी गालियां और धमकियाँ भी दे रहा था।
किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए, फलतः सभी मूक दर्शक बने देख रहे थे। अचानक स्कूल के गेट से बाहर - एल टी सर दिखे - बिलकुल निडर उसके करीब पहुँच गए। पता नहीं क्यों, उन्हें देख कर पहले तो अरुण एकाध पत्थर फेंका पर, एल टी सर को निडर होकर, अपनी ओर आगे आते देख - अचानक से वह ठिठक सा गया और अगले कुछ क्षणों में बिलकुल टूट गया - फिर दहाड़ मार कर रोते हुए, उनके चरणों में गिर गया। एल टी सर उसे अपनी बाँहों में ले लिए और फिर उससे कुछ बाते करते हुए - उसे समझाते हुए स्कूल वापस ले आये। उस दिन के बाद - अरुण सिंह एक आदर्श छात्र सा बन गया और प्रतिदिन, एल टी के चरणो को छूकर प्रणाम करता था!
मुझे लगता था कि एल टी सर के प्रति मेरा ही इतना अगाढ़ प्रेम रहा होगा, पर मैं गलत था। हाल ही में, जमशेदपुर में अपने हाई-स्कूल के करीब १५-२० साथियों के साथ - एक मिलन समारोह का आयोजन किया गया - और, उस मिलन के दौरान - हर दो वाक्यों के बाद - सिर्फ ललन तिवारी का या उनके क्लास में हुए घटनाओं का ही जिक्र हो रहा था!
उस मिलन के बाद बने व्हाट्सप्प ग्रुप में, जब लोगों ने कुछ गंभीरता से लिखना शुरू किया - अलौकिक रूप से - सबों के लिखने के शैली में, शब्दों के चयन में, और भाषा के प्रवाह में, एल टी सर का ही प्रभाव झलकता है!
मेरे पास हिंदी में इसका सही पर्याय नहीं है पर जो मैं कहना चाहता हूँ, वह यह है कि - There is an uncanny resemblance in everyone's expression and selection of words, such is the profound impact of this teacher, that even after nearly 33 years, people are influenced by his style!
जीवन एक रेलगाड़ी की तरह, कई प्लेटफॉर्म पर बिना रुके, सरपट भागी चली सी जा रही है। कई प्लेटफार्म ऐसे हैं, जहाँ अब कभी वापस जाने का, मौका नहीं मिल पायेगा! न जाने क्यों, इस बार के भारत-भ्रमण के दौरान, एक कसक सी रह गयी और शायद अब जीवन भर इसका मलाल भी रहेगा, कि मेरे बहुत ही प्रिय ललन तिवारी सर से अब कभी मुलाकात नहीं हो पायेगा! उनका हम सभी के जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव है।
मुझे स्मरण हो रहा है, अपने अंतिम वर्ष के शिक्षक दिवस के वो पल, जब वे हमारी कक्षा में आये थे, और हमारे बारे में ये बातें कही थी, जो आज तक मेरे मानस पटल पर रेखांकित हैं-
किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए, फलतः सभी मूक दर्शक बने देख रहे थे। अचानक स्कूल के गेट से बाहर - एल टी सर दिखे - बिलकुल निडर उसके करीब पहुँच गए। पता नहीं क्यों, उन्हें देख कर पहले तो अरुण एकाध पत्थर फेंका पर, एल टी सर को निडर होकर, अपनी ओर आगे आते देख - अचानक से वह ठिठक सा गया और अगले कुछ क्षणों में बिलकुल टूट गया - फिर दहाड़ मार कर रोते हुए, उनके चरणों में गिर गया। एल टी सर उसे अपनी बाँहों में ले लिए और फिर उससे कुछ बाते करते हुए - उसे समझाते हुए स्कूल वापस ले आये। उस दिन के बाद - अरुण सिंह एक आदर्श छात्र सा बन गया और प्रतिदिन, एल टी के चरणो को छूकर प्रणाम करता था!
मुझे लगता था कि एल टी सर के प्रति मेरा ही इतना अगाढ़ प्रेम रहा होगा, पर मैं गलत था। हाल ही में, जमशेदपुर में अपने हाई-स्कूल के करीब १५-२० साथियों के साथ - एक मिलन समारोह का आयोजन किया गया - और, उस मिलन के दौरान - हर दो वाक्यों के बाद - सिर्फ ललन तिवारी का या उनके क्लास में हुए घटनाओं का ही जिक्र हो रहा था!
उस मिलन के बाद बने व्हाट्सप्प ग्रुप में, जब लोगों ने कुछ गंभीरता से लिखना शुरू किया - अलौकिक रूप से - सबों के लिखने के शैली में, शब्दों के चयन में, और भाषा के प्रवाह में, एल टी सर का ही प्रभाव झलकता है!
मेरे पास हिंदी में इसका सही पर्याय नहीं है पर जो मैं कहना चाहता हूँ, वह यह है कि - There is an uncanny resemblance in everyone's expression and selection of words, such is the profound impact of this teacher, that even after nearly 33 years, people are influenced by his style!
जीवन एक रेलगाड़ी की तरह, कई प्लेटफॉर्म पर बिना रुके, सरपट भागी चली सी जा रही है। कई प्लेटफार्म ऐसे हैं, जहाँ अब कभी वापस जाने का, मौका नहीं मिल पायेगा! न जाने क्यों, इस बार के भारत-भ्रमण के दौरान, एक कसक सी रह गयी और शायद अब जीवन भर इसका मलाल भी रहेगा, कि मेरे बहुत ही प्रिय ललन तिवारी सर से अब कभी मुलाकात नहीं हो पायेगा! उनका हम सभी के जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव है।
मुझे स्मरण हो रहा है, अपने अंतिम वर्ष के शिक्षक दिवस के वो पल, जब वे हमारी कक्षा में आये थे, और हमारे बारे में ये बातें कही थी, जो आज तक मेरे मानस पटल पर रेखांकित हैं-
बच्चे तो उच्छृंखल होते ही हैं - क्योंकि यह उनका बाल-स्वाभाव है, ये नदी की तरह होते हैं और इनका प्रवाह किनारो से टकरा कर यूँ ही शोर करता है, फिर जब बड़े हो जायेंगे - तो किसी सागर में समा कर शांत हो जायेंगे।
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