बचपन के दिन, साधनों और सुविधाओं के अभावों में जितना गरीब सा होता था, आज उन दिनों के यादों के भरमार से, वे उतने ही अमीर से लगते हैं! जीवन के खेत में, बचपन के खेती करने के बाद, अनाज के अनेकों गठरियों की तरह, यादों के ढेर सारे गठरियाँ, गुजरे वक़्त के -मज़बूत गांठो से बंधा पड़ा है। जब कभी अतीत में खो जाता हूँ- ऐसा लगता है मानो उन यादों की कोई एक गठरी, स्वतः खुलता सा चला जाता है, और फिर मैं घंटों उसी में गोते लगाता रहता हूँ।
अब जब हम पीछे मुड़ कर देखते हैं, तो याद आता है हमारा बचपन और उस वक़्त की जीवनशैली, जो बहुत सरल सा होता था। बचपन के दिन, बहुत ही प्यारे दिन होते थे। पहाड़ी नदी की तरह, हर चिंता से मुक्त - उछलती, कूदती, बलखाती और निरंतर प्रवाहित - तितली की तरह, इस फूल से, उस उपवन तक का सफर! बचपन से, बड़े होने की प्रक्रिया, जीवन में जटिलता अवश्य लाई है, परन्तु उन दिनों के यादें - जब हमने सीमितताओं में भी, प्रसन्न रहने की कला, सीखी थी - आज भी स्वयं को, सहज और सरल बने रहने की प्रेरणा देता रहता है।
उन दिनों, हर नुक्क्ड़ पर पान दूकान के होने का प्रचलन था - जहाँ पान, सिगरेट, टॉफी, "लेमनचूस" के साथ-साथ, घर में तुरंत इस्तेमाल में आने वाले, जरुरत के सामान, जैसे - साबुन, छोटे से चायपत्ती का पैकेट, बिस्कुट आदि मिलते थे। पान के दूकान के साथ, सटा हुआ, एक सायकल मिस्त्री का दुकान, प्रायः अनिवार्य सा होता था। हमारे ज़माने में ज्यादातर लोग, साइकल से ही सफर किया करते थे।
लोगों को अपने पास एक अच्छी सायकल होने का गर्व सा होता था। लोग अपने साइकल को विशेष प्रकार से सजा कर रखते थे। साइकल में सामने एक टोकरी या बास्केट सा लगा होता था। लोग साइकल के चक्के में, प्लास्टिक के गोल फूलों का गुच्छा, लगाये होते थे। साइकल के हैंडिल में भी, झूलता हुआ - कुछ रंग-बिरंगे झालर सा लगा होता था। कई साइकलों के चक्के में, मैंने पायल की तरह घंटी भी लगा देखा था, जो साइकल चलते समय, "छन-छन " की आवाज़ करता हुआ - सामने हैंडल में घंटी का लगा होना, और कई साइकलों में एक हेड लाइट जैसे जुगाड़ का होना, काफी सामान्य सी प्रथा होती थी।
कुल मिलकर, उस जमाने में साइकल, शोले के "धन्नो" की तरह सजी-धजी सी होती थी। साइकल पर बैठे लोग, काले-चश्मे को लगा कर, घंटियाँ बजाते हुए, बड़े शान से, एक-दूसरे को ओवरटेक भी करते थे।
उन दिनों, मोटरसाईकिल या स्कूटर की सवारी ही बहुत बड़ी बात होती थी। कार तो सिर्फ शादी में दूल्हे के बैठने के लिए, या फिर कहीं लम्बे सफर करने के बाद, बस स्टॉप से या रेलवे-स्टेशन से, घर तक आने जैसे काम में इस्तेमाल होता था। यहाँ मैं बता दूँ, कि ऑटो या थ्री-व्हीलर का उद्भव काफी देर से हुआ है- हमारे बिलकुल बचपन के दिनों में, रेलवे स्टेशन आदि जैसे जगह पर, एम्बेसडर कार का ही प्रयोग होता था। वैसे रेलवे-स्टेशन से घर आने के दौरान, या गाँव में शादी - इत्यादि के समय, कार के सवारी में - जितने लोग एक कार में समा जाते थे, वो आज के दिनों में - एक कार में कितने लोग समा सकते हैं - इसका, विश्व कीर्तिमान बना सकने में सक्षम है।
वैसे उन दिनों भी, कुछेक बड़े लोग कार से सफर करते थे - जिन्हें "साहब" से सम्बोधित किया जाता था। हालाँकि, वैसे लोग तो बड़े बंगले वगैरह में ही रहते थे - जो हमारे मोहल्ले से कही दूर हुआ करता था। अलबत्ता उनके ड्राईवर, हमारे घर के आस-पास ही रहते थे। जब कभी दोपहर में, भोजन करने के वक़्त, ड्राइवर अपने घर आते थे, लाजमी है कि वे साहेब के कार से ही आते थे। इस कारण से, कार को करीब से देखने का अवसर मिल जाया करता था। कर के अंदर झांक कर देखना, करीब से छू कर देखना, और मौका मिलते ही कभी-कभी अंदर भी घुस कर बैठने जैसा अनुभव, अब भी मन को झंकृत कर जाता है!
आज अचानक, अपने बचपन की याद आने लगी और पहली बार "कार में बैठने" का अनुभव की यादें आाँखो के सामने आने लगी हैं। हालाँकि अब यह बिलकुल याद नही है कि बिलकुल पहली बार, मैंने कार का सफर कब किया था - पर उस से ज्यादा, यादें आनी लगी हैं - कार में बैठने के पूर्व के, उस लम्बे कार्यक्रम का, और उसके साथ जुड़े, खट्टे-मीठे अनुभवों का।
कार में बैठने का, सबसे शुरुआती अनुभव - किसी शादी के समय के अनुभव से जुड़ा है। जैसा पहले बताया था, कार में लोगों को ठूँसने का तो विशेष कार्यक्रम होता ही था पर उन सबसे पूर्व आम की टोकरी, बैग, सुटकेस आदि जैसे सामानों को ठुँसने जैसा पुनीत कार्य - जो लोग कार में नही बैठेंगे, वैसे लोग कर देते थे।
इस विशेष कार्यक्रम में काफी समय लगता था और इस प्रक्रिया में ड्राइवर अपना विशेष टिप्पणी और फेर-बदल करने या करवाने जैसे क्रिया कलाप में पूर्ण रूप से लग जाया करता था। इसके पश्चात लोगों को ठूँसने के ऊपर विशेष ध्यान दिया जाता था। इस कार्यक्रम को देखने के लिए भी लोगों के पास बहुत समय होता था और जिनको जहाँ खड़ा होने का जगह मिल जाता था - वे उधर से ही ध्यान लगाकर बहुत रूचि के साथ, इस पूरे कार्यक्रम को देखते थे।
कार के इर्द-गिर्द - बहुतायत की संख्या में - अनेक लोग होते थे, और उनमे आधे से ज्यादा, उस कार में बैठ कर हिंदी का सफर और अंग्रेज़ी का भी - सफर (suffer) - करने वाले होते थे। यदि कार का डिज़ाइन करने वाला इंजिनियर, एक बार भी उस कार में बैठने वाले - जनसैलाब - को देख लेता, तो उसके प्राण-पखेरू हो जाते! पर उस से भी ज्यादा धन्यवाद - अम्बेसडर कार के दरवाज़े बनने वाले को देना होगा, जिसे बंद कर देने के बाद - किसी मज़बूत किले के दरवाजे की तरह बिलकुल जकड कर बंद ही रहता था - हालाँकि उस दरवाज़े को बंद करना भी, अपने आप में एक काम सा ही होता था।
कार में बैठने का "संघर्ष" और "रोमांचकारी" प्रकरण - युद्ध-स्तर पर होता था। हर युद्ध में जिस तरह से दो सेना होता है उसी प्रकार से इस कार्यक्रम में भी दो दल होते थे, जो एक दुसरे के सुझावों या प्रयास के धूर-विरोधी होते थे। दोनों पक्ष से एक सेनापति से होते थे जो मुख्य रोल में होते थे और इकट्ठे लोगो में स्वतः धूर्वीकरण सा हो जाता था, और वे किसी एक के पक्ष में विश्वास रखते थे। बीच-बीच में सामान्य लोग भी अपना सलाह देने से बाज नहीं आते थे।
उस दौरान होने वाला वार्तालाप, कुछ इस तरह से होता था - कल्पना करिये कि कार में सामान को ठूंस ठूंस कर रखने के बाद. लोगों को भी ठूंस दिया गया है, और अब कार के दरवाजे को बंद करने का प्रयास किया जा रहा है :
अनेक प्रकार के प्रयोजन के पश्चात्, जब घर के "चीफ कमांडर ऑफिसर्स" का अनुमोदन हो जाता था कि - 'हाँ ,अब कार के दरवाजे को अंततः बंद किया जाये', तब कार के ड्राईवर विवश सा सिर्फ मूक दर्शक की तरह अपने लाचारी को साफ़ प्रकट करते हुए किसी कोने में खड़ा दीखता था।
ड्राइवर की भी, इस पूरे प्रक्रिया में, क्या से क्या दशा हो जाता था! कुछ अरसे में ही, हिमालय पर्वत जैसे ऊंचाइयों से बंगाल की खड़ी तक का सफर सा ! जब गाडी को लेकर घर पर आता, तो अपना रुतबा झाड़ता हुआ, जहाँ मर्ज़ी गाड़ी को पार्क करता था। उस प्रक्रिया में - सड़क के किनारे चल रहे विश्व-स्तरीय बातों को करते लोगो के झुण्ड में से, दो -चार लोग - अपने महत्वपूर्ण चर्चा से कॉमर्शियल ब्रेक लेकर - ट्रैफिक पुलिस के अंदाज़ में - आगे-पीछे, दांये- बांये का निर्देश देने जैसा - स्वैच्छिक कार्य के लिए तुरंत उपलब्ध हो जाते थे। और फिर कुछ इस तरह के निर्देशों का सिलसिला शुरू हो जाता जिसे देखने के क्रम में आस पास भीड़ के जमा होने की प्रक्रिया शुरू हो जाती थी -
अब जब हम पीछे मुड़ कर देखते हैं, तो याद आता है हमारा बचपन और उस वक़्त की जीवनशैली, जो बहुत सरल सा होता था। बचपन के दिन, बहुत ही प्यारे दिन होते थे। पहाड़ी नदी की तरह, हर चिंता से मुक्त - उछलती, कूदती, बलखाती और निरंतर प्रवाहित - तितली की तरह, इस फूल से, उस उपवन तक का सफर! बचपन से, बड़े होने की प्रक्रिया, जीवन में जटिलता अवश्य लाई है, परन्तु उन दिनों के यादें - जब हमने सीमितताओं में भी, प्रसन्न रहने की कला, सीखी थी - आज भी स्वयं को, सहज और सरल बने रहने की प्रेरणा देता रहता है।
उन दिनों, हर नुक्क्ड़ पर पान दूकान के होने का प्रचलन था - जहाँ पान, सिगरेट, टॉफी, "लेमनचूस" के साथ-साथ, घर में तुरंत इस्तेमाल में आने वाले, जरुरत के सामान, जैसे - साबुन, छोटे से चायपत्ती का पैकेट, बिस्कुट आदि मिलते थे। पान के दूकान के साथ, सटा हुआ, एक सायकल मिस्त्री का दुकान, प्रायः अनिवार्य सा होता था। हमारे ज़माने में ज्यादातर लोग, साइकल से ही सफर किया करते थे।
लोगों को अपने पास एक अच्छी सायकल होने का गर्व सा होता था। लोग अपने साइकल को विशेष प्रकार से सजा कर रखते थे। साइकल में सामने एक टोकरी या बास्केट सा लगा होता था। लोग साइकल के चक्के में, प्लास्टिक के गोल फूलों का गुच्छा, लगाये होते थे। साइकल के हैंडिल में भी, झूलता हुआ - कुछ रंग-बिरंगे झालर सा लगा होता था। कई साइकलों के चक्के में, मैंने पायल की तरह घंटी भी लगा देखा था, जो साइकल चलते समय, "छन-छन " की आवाज़ करता हुआ - सामने हैंडल में घंटी का लगा होना, और कई साइकलों में एक हेड लाइट जैसे जुगाड़ का होना, काफी सामान्य सी प्रथा होती थी।
कुल मिलकर, उस जमाने में साइकल, शोले के "धन्नो" की तरह सजी-धजी सी होती थी। साइकल पर बैठे लोग, काले-चश्मे को लगा कर, घंटियाँ बजाते हुए, बड़े शान से, एक-दूसरे को ओवरटेक भी करते थे।
उन दिनों, मोटरसाईकिल या स्कूटर की सवारी ही बहुत बड़ी बात होती थी। कार तो सिर्फ शादी में दूल्हे के बैठने के लिए, या फिर कहीं लम्बे सफर करने के बाद, बस स्टॉप से या रेलवे-स्टेशन से, घर तक आने जैसे काम में इस्तेमाल होता था। यहाँ मैं बता दूँ, कि ऑटो या थ्री-व्हीलर का उद्भव काफी देर से हुआ है- हमारे बिलकुल बचपन के दिनों में, रेलवे स्टेशन आदि जैसे जगह पर, एम्बेसडर कार का ही प्रयोग होता था। वैसे रेलवे-स्टेशन से घर आने के दौरान, या गाँव में शादी - इत्यादि के समय, कार के सवारी में - जितने लोग एक कार में समा जाते थे, वो आज के दिनों में - एक कार में कितने लोग समा सकते हैं - इसका, विश्व कीर्तिमान बना सकने में सक्षम है।
वैसे उन दिनों भी, कुछेक बड़े लोग कार से सफर करते थे - जिन्हें "साहब" से सम्बोधित किया जाता था। हालाँकि, वैसे लोग तो बड़े बंगले वगैरह में ही रहते थे - जो हमारे मोहल्ले से कही दूर हुआ करता था। अलबत्ता उनके ड्राईवर, हमारे घर के आस-पास ही रहते थे। जब कभी दोपहर में, भोजन करने के वक़्त, ड्राइवर अपने घर आते थे, लाजमी है कि वे साहेब के कार से ही आते थे। इस कारण से, कार को करीब से देखने का अवसर मिल जाया करता था। कर के अंदर झांक कर देखना, करीब से छू कर देखना, और मौका मिलते ही कभी-कभी अंदर भी घुस कर बैठने जैसा अनुभव, अब भी मन को झंकृत कर जाता है!
आज अचानक, अपने बचपन की याद आने लगी और पहली बार "कार में बैठने" का अनुभव की यादें आाँखो के सामने आने लगी हैं। हालाँकि अब यह बिलकुल याद नही है कि बिलकुल पहली बार, मैंने कार का सफर कब किया था - पर उस से ज्यादा, यादें आनी लगी हैं - कार में बैठने के पूर्व के, उस लम्बे कार्यक्रम का, और उसके साथ जुड़े, खट्टे-मीठे अनुभवों का।
कार में बैठने का, सबसे शुरुआती अनुभव - किसी शादी के समय के अनुभव से जुड़ा है। जैसा पहले बताया था, कार में लोगों को ठूँसने का तो विशेष कार्यक्रम होता ही था पर उन सबसे पूर्व आम की टोकरी, बैग, सुटकेस आदि जैसे सामानों को ठुँसने जैसा पुनीत कार्य - जो लोग कार में नही बैठेंगे, वैसे लोग कर देते थे।
| image courtesy: BBC |
कार के इर्द-गिर्द - बहुतायत की संख्या में - अनेक लोग होते थे, और उनमे आधे से ज्यादा, उस कार में बैठ कर हिंदी का सफर और अंग्रेज़ी का भी - सफर (suffer) - करने वाले होते थे। यदि कार का डिज़ाइन करने वाला इंजिनियर, एक बार भी उस कार में बैठने वाले - जनसैलाब - को देख लेता, तो उसके प्राण-पखेरू हो जाते! पर उस से भी ज्यादा धन्यवाद - अम्बेसडर कार के दरवाज़े बनने वाले को देना होगा, जिसे बंद कर देने के बाद - किसी मज़बूत किले के दरवाजे की तरह बिलकुल जकड कर बंद ही रहता था - हालाँकि उस दरवाज़े को बंद करना भी, अपने आप में एक काम सा ही होता था।
कार में बैठने का "संघर्ष" और "रोमांचकारी" प्रकरण - युद्ध-स्तर पर होता था। हर युद्ध में जिस तरह से दो सेना होता है उसी प्रकार से इस कार्यक्रम में भी दो दल होते थे, जो एक दुसरे के सुझावों या प्रयास के धूर-विरोधी होते थे। दोनों पक्ष से एक सेनापति से होते थे जो मुख्य रोल में होते थे और इकट्ठे लोगो में स्वतः धूर्वीकरण सा हो जाता था, और वे किसी एक के पक्ष में विश्वास रखते थे। बीच-बीच में सामान्य लोग भी अपना सलाह देने से बाज नहीं आते थे।
उस दौरान होने वाला वार्तालाप, कुछ इस तरह से होता था - कल्पना करिये कि कार में सामान को ठूंस ठूंस कर रखने के बाद. लोगों को भी ठूंस दिया गया है, और अब कार के दरवाजे को बंद करने का प्रयास किया जा रहा है :
सेनापति १ - "अर्रे.....लग जाएगा - अंदर कर लो बाबू.... हाथ अन्दर रख लो बाबू....."
सेनापति २- "अरे बच्चा है, थोड़ी न समझेगा, ले लो सोनू को, गोदी में ले लो न..."
सेनापति १ - "ओह हो, अरे कैसे बंद होगा? टोकरी जो है....... पकड़िये.... इस टोकरी को...हाँ हाँ वही वाला, उसको हाथ में पकड़ लीजिये तो..."
सेनापति २ - पहले ही कहे थे न, ठीक से सामान रखिये,...अब देख लीजिये सही ढंग से "संईत के" नहीं रखने का नतीज़ा देख लीजिये.. "
आम आदमी #१ - "क्या हुआ जी? नही बंद हो रहा है क्या ...."
आम आदमी #२ - "नहीं...ए तरफ का गेट तो बन्दे नहीं हो पा रहा है....."
सेनापति १ - "भांग पीये है क्या महराज? ये आपको दीखता नहीं है कि अभी एगो टांग बाहरे है, तो दरवाजा कैसे बंद हो जायेगा? एक दम्मे दिमाग से पैदल है..."
सेनापति २ - "हम पहले ही बोल रहे थे न, कल से ही बोल रहे थे कि अंदर बक्सा मत डालिए, कोई मेरा बात सुनाता ही नही है..."
ड्राइवर - "अरे सुनिए न एक काम कीजिए, उसको निकालिए न....."
आम आदमी #१ - किसको? बच्चा को?
सेनापति १ - "कह रहे थे न, ये (आम आदमी #१ की ओर इशारा करते हुए ) - अभागा, लगता है भांग पीये है.....! बौरा गए हो क्या? बच्चा को साथ जाना है.... तो, कार से उसको कैसे निकाल दोगे?"
इस डायलॉग के बाद, आम आदमी # १ दुखी हो कर, हथियार डाल सा दिया था, और ठिठक के एक किनारे जा कर खड़ा हो गया था। वह अब वापस मूक दर्शक की श्रेणी में शामिल हो गया था। किसी निर्दलीय उम्मेदवार की तरह, अधूरे मन से चुनाव लड़ने के चक्कर में, सारे जमा-पूंजी गँवा कर, अपनी जमानत भी जब्त करवा लेने के बाद वाली भावना के साथ - अब भारी और दुःखी मन से - आउट होकर, पैविलियन से, सामने हो रहे - खेल - को देख रहा था। बात को फिर से सम्हालने के हिसाब से ड्राइवर ने स्पष्टीकरण किया कि वह किसे निकालने को कह रहा था -
ड्राइवर - "अरे नही भाई, हम तो उ वाला बड़का बक्सा को निकालने को कह रहे थे...."और इस वाक्य को बोलते समय उस आम आदमी ने, अंदर व्याप्त सारे निराशा के भावना को एक सांस में निकाल दिया, और - आधे "न" फिर पूरे "न" और नहीं के "ह" के संधि करते हुए एक लंबा - "न्नह" कहा था ! मगर भीड़ में सभी इस तरह से निराशावादी नहीं थे- और तत्क्षण, तिमिर से आशा के सूरज की किरणें लिए -
आम आदमी # २ - "अच्छा ई वाला? ए बाबू जरा पैर उठाना तो...."
सेनापति २ - "कोई हमसे पहले पूछता, तब न? अरे इसको तो कार के ऊपर भी बांधा जा सकता है न..."
आम आदमी # २ - कैरियर नही है न इस कार में...
सेनापति २ - "ये सब देख के कार लेना चाहिऐ था न, आप लोग भी तो...."
आम आदमी १०६ - "अरे, कोई और कार तैयार ही नही हो रहा था न, तो क्या करते..."
सेनापति २ - "अरे विजय बाबू का सब काम ऐसा ही होता है...सब कुछ उल्टा पुल्टा.... "
आम आदमी # ९९ - "अरे आपलोग काहे के लिए इतना परेशान हैं...?"
आम आदमी # ४४ - "हटिये, आप सब हटिये न...."
आम आदमी # २- "अरे ठहरिये न, हो गया है...बस अब एकदम दरवाजा बंद हो जाएगा..."
आम आदमी # ५६ - "न्नह, अब्भियो नही होगा..."
आम आदमी # ३२ - "हो जाएगा..."
आम आदमी # १२ - "नही अभी नहीं हो रहा है ..."
सेनापति १ - "अरे हटिये न....आप सब लोग हटिये...सब अपना इंजीनियरिंग मत छाँटिए..."
यहाँ यह बताना अत्यधिक आवश्यक है कि ऐसे विशेष परिस्थिति में अगर कोई कुछ प्रयास करने में विफल हो जाता था तो तुरंत "इंजीनियरिंग" जैसे विषय को वार्तालाप में लाकर, उपहास के रूप में प्रयोग किया जाता था - मेरे भविष्य में बनने वाले इंजीनियर का, उन दिनों भी दिल बैठ जाता था!
ड्राइवर - "जरा सा जगह... दीजिए न..."
आम आदमी # ७६- "क्या बोले? क्या दीजिये? खैनी मांग रहे हैं क्या?..."
ड्राइवर - "नही भाई, कह रहे थे "जगह" दीजिए...
(जगह शब्द पर विशेष जोर देते हुए - और फिर होंठ के अंदर दबाये खैनी को थूकते हुए)
ड्राइवर - "वैसे है क्या खैनी आपके पास ?..."
सेनापति २ - "अरे रुकिए अभी, पहले गाड़ी में सबको जमा दीजिए न, फिर खैनी खावेंगे..."
सेनापति १ - "नारियल रस्सी है क्या..."
ड्राइवर- "नहीं वो तो नहीं है ..पर काहे मांगे थे रस्सी?"
सेनापति २- "लीजिये ये भी गाडी में नही रखता है? कैसा डरैवर है रे तुम....?"
ड्राइवर - "अरे था न, परसों एगो शादी में गिया था एही वाला गाडी, बस वही पर ले लिया पार्टी। क्या बताये, डरैवर लोगों को गाडी देने से यही होता है, अब सब जगह हमही गाडी नही न चला सकते हैं...!"
आम आदमी # २७ - "ओः हो, तो ये आपका गाडी है? कितना साल हो गिया इसका?...."
यहाँ एक रहस्योधघाटन यह हुआ था कि जो ड्राइवर था वह वास्तव में गाड़ी का मालिक भी था, और ध्यान देने वाली बात यह थी कि इस बात की विशेष जानकारी देने के बाद, वह अपना यथोचित सम्मान की अपेक्षा कर रहा था।
सेनापति १ - "अरे चन्दुआ...बतियाना बाद में, समान जमाओ पहले, देर हो रहा है...."फिर अचानक से उस भीड़ को चीरते हुए महामहिम राष्ट्रपति की तरह दोनों सभा को सम्बोधित करने के अंदाज़ में - घर के मुखिया विजय बाबू का आगमन, और फिर उद्घोषणा -
आम आदमी # २७ यानि चंदू - "अरे वही तो कर रहे है न, पप्पू नारियल का रस्सी खोजने गया है, अन्दर...."
सेनापति २ - "अरे हम बोल रहे हैं न, अभी भी सामान को एडजस्ट कर दो न, तो हो जाएगा..."
सेनापति १ - "तो आपको का लग रहा है? हम टराई नही मारे क्या ? सब कर के देख लिए..."
"सुरेंदर बाबू, एक काम कीजिए न, सोनू को आप अपने साथ ही बस में ले लीजियेगा?"
बहुत देर से संसद के अंदर ध्यानाकर्षण और बहस का मुद्दा सा बना सोनू अब बिलकुल विचलित सा होते हुए -
सोनू - "नही मामा, हम कार में ही जायेंगे..."
सेनापति १ - "अरे, हो जाएगा न, रहने दीजिये, सोनू को कार में ही रहने दीजिये, देखते हैं फिर से...."
और, इस पूरे प्रक्रिया के दौरान, गाडी में बैठे लोग, उसी तरह से दिख रहे होते थे - जैसे अंतरिक्ष में जाने के पूर्व, अन्तरिक्ष-यात्रियों को शटल में बैठा कर, किसी कैमरे से लाइव टेलीकास्ट के तौर पर टीवी पर दिखाया जाता है...! सभी बाबा रामदेव के, किसी विचित्र प्राणायाम के मुद्रा में बैठे, अपने अपने सांसों को लम्बा खींच कर, देर तक रोकने जैसे प्रक्रिया में लीन से बैठे होते थे।
अनेक प्रकार के प्रयोजन के पश्चात्, जब घर के "चीफ कमांडर ऑफिसर्स" का अनुमोदन हो जाता था कि - 'हाँ ,अब कार के दरवाजे को अंततः बंद किया जाये', तब कार के ड्राईवर विवश सा सिर्फ मूक दर्शक की तरह अपने लाचारी को साफ़ प्रकट करते हुए किसी कोने में खड़ा दीखता था।
ड्राइवर की भी, इस पूरे प्रक्रिया में, क्या से क्या दशा हो जाता था! कुछ अरसे में ही, हिमालय पर्वत जैसे ऊंचाइयों से बंगाल की खड़ी तक का सफर सा ! जब गाडी को लेकर घर पर आता, तो अपना रुतबा झाड़ता हुआ, जहाँ मर्ज़ी गाड़ी को पार्क करता था। उस प्रक्रिया में - सड़क के किनारे चल रहे विश्व-स्तरीय बातों को करते लोगो के झुण्ड में से, दो -चार लोग - अपने महत्वपूर्ण चर्चा से कॉमर्शियल ब्रेक लेकर - ट्रैफिक पुलिस के अंदाज़ में - आगे-पीछे, दांये- बांये का निर्देश देने जैसा - स्वैच्छिक कार्य के लिए तुरंत उपलब्ध हो जाते थे। और फिर कुछ इस तरह के निर्देशों का सिलसिला शुरू हो जाता जिसे देखने के क्रम में आस पास भीड़ के जमा होने की प्रक्रिया शुरू हो जाती थी -
"आने दो, और आन्ने दो...... , जरा सा दांया काट लो, हाँ लो.... लो और ले लो, बस, बस... बस्स"!अंतिम "बस्स" के समय, गाड़ी के किसी हिस्से पर जोर से हाथ से मारने का प्रचलन - कीर्तन के संगत में साथ देने वाले ढोलकिये के ढोलक पर बेरहमी से पीटे गए थाप - जैसा होता था। इस प्रक्रिया में, कई बार - सामने पड़े खाट या कुर्सी जैसे सामानों को हटाने - जैसे कार्य को भी - ड्राइवर के सम्मान और प्रतिष्ठा बढ़ाने जैसे - भावना से प्रेरित होकर संपन्न कर दिया जाता था।
मगर सामान और आदमी को गाड़ी में ठूंसने के पूरे "पांच-दिवसीय क्रिकेट" जैसे - प्रक्रिया में, उसी डाइवर की हेँकड़ी पूरी तरह निकल जाता था। उस के बाद, ड्राइवर एक निरीह प्राणी की तरह, अपने ही आंखों के आगे, बाकी कुछ मजबूत, मगर दिमागी हालत पर प्रश्न चिह्न लिए लोगों के द्वारा कार के दरवाजे के बंद होने की प्रक्रिया को देखने के सिवा और कुछ नही कर सकने की स्थिति में विवश -"हाँ जरा देख के, जरा धीरे से भाई, ...आ हा हा, जरा बचा के, देखियेगा .." - जैसे सिसकी लेने वाले स्वरों में डूबा, कही कोने में खड़ा हो जाता था।
दरवाजा बंद करने के पहले - "देख के बाबू ...हाथ अन्दर कर लो, पैर ऊपर रख लो..." आदि जैसे चीख-पुकार के बीच, अंततः इस जटिल कार्यक्रम का पटाक्षेप होता था।
इसके बाद, "कहाँ है ड्राईवर, स्टार्ट करो..देर हो रहा है .." जैसे चीख-चिल्लाहट के साथ, लोग यात्रा का आरोहन शुरू करने जैसी कुछ भूली हुई प्रक्रिया का स्मरण करते और अंदर बैठे "भुक्तभोगियों" को - मरुस्थल में प्यास से सूखे गले को मरूद्यान के मिलने वाली - राहत सी मिलती।
जाहिर है, कार में एयर-कंडीशन जैसे उपलब्धियों का चर्चा, बहुत कोरी-कल्पना वाली बात सी थी। गर्मी से भी ज्यादा - गाड़ी में ठूंस-ठूंस कर लाद दिए गए सामनों में से - दही या रसगुल्ले - के साथ-साथ पसीने के दुर्गन्ध से जीना मुश्किल हो जाता था। हालाँकि गाडी चलने के बाद, पसीना सूखते रहने के साथ-साथ आँखे भी लग जाती थी, जिसका एक स्वाभाविक फायदा यह होता था कि नाक स्वतः साँस लेने जैसे स्वतंत्र कार्य में, पूरी तरह से संलग्नित हो जाता था और सूंघने जैसी प्रक्रिया स्थगित हो जाता था।
गाँव में कार सड़क पर कम और खेत-खलिहान, टूटे पुल के कारण सूखी नदियों को पार करने के क्रम में, रोलर कोस्टर का मजा हमें बचपन से ही कराता आता था। इन सब "छोटे-मोटे" समस्याओं के बावजूद - हम ऐसे शादी जैसे अवसरों का इंतजार करते रहते थे। हमें ऐसे मौके पर, अनेकों प्रकार के विशेष अनुभवों का - विशेष अवसर मिलते रहते थे - जैसे कार में चढ़ना, नए कपडे मिलना, अच्छे पकवान, किराये पर लाये -रिकॉर्ड प्लेयर से लाउडस्पीकर पर बजने वाले कर्णभेदी संगीत का आनदं - और अनेकानेक ऐसे ही कुछ मूलभूत सुखद गतिविधियाँ के साथ प्रथम साक्षात्कार या उनकी पुनरावृत्ति।
अच्छे या बुरे- यह तो देखने का नजरिया भर होता था - पर आज याद करने से लगता है कि वाकई ऐसी हर घटनायें, हमारे लिए उन दिनों भी और आज भी याद करने पर बहुत ही मजेदार अनुभूतियाँ सी देती हैं!
दरवाजा बंद करने के पहले - "देख के बाबू ...हाथ अन्दर कर लो, पैर ऊपर रख लो..." आदि जैसे चीख-पुकार के बीच, अंततः इस जटिल कार्यक्रम का पटाक्षेप होता था।
इसके बाद, "कहाँ है ड्राईवर, स्टार्ट करो..देर हो रहा है .." जैसे चीख-चिल्लाहट के साथ, लोग यात्रा का आरोहन शुरू करने जैसी कुछ भूली हुई प्रक्रिया का स्मरण करते और अंदर बैठे "भुक्तभोगियों" को - मरुस्थल में प्यास से सूखे गले को मरूद्यान के मिलने वाली - राहत सी मिलती।
जाहिर है, कार में एयर-कंडीशन जैसे उपलब्धियों का चर्चा, बहुत कोरी-कल्पना वाली बात सी थी। गर्मी से भी ज्यादा - गाड़ी में ठूंस-ठूंस कर लाद दिए गए सामनों में से - दही या रसगुल्ले - के साथ-साथ पसीने के दुर्गन्ध से जीना मुश्किल हो जाता था। हालाँकि गाडी चलने के बाद, पसीना सूखते रहने के साथ-साथ आँखे भी लग जाती थी, जिसका एक स्वाभाविक फायदा यह होता था कि नाक स्वतः साँस लेने जैसे स्वतंत्र कार्य में, पूरी तरह से संलग्नित हो जाता था और सूंघने जैसी प्रक्रिया स्थगित हो जाता था।
गाँव में कार सड़क पर कम और खेत-खलिहान, टूटे पुल के कारण सूखी नदियों को पार करने के क्रम में, रोलर कोस्टर का मजा हमें बचपन से ही कराता आता था। इन सब "छोटे-मोटे" समस्याओं के बावजूद - हम ऐसे शादी जैसे अवसरों का इंतजार करते रहते थे। हमें ऐसे मौके पर, अनेकों प्रकार के विशेष अनुभवों का - विशेष अवसर मिलते रहते थे - जैसे कार में चढ़ना, नए कपडे मिलना, अच्छे पकवान, किराये पर लाये -रिकॉर्ड प्लेयर से लाउडस्पीकर पर बजने वाले कर्णभेदी संगीत का आनदं - और अनेकानेक ऐसे ही कुछ मूलभूत सुखद गतिविधियाँ के साथ प्रथम साक्षात्कार या उनकी पुनरावृत्ति।
अच्छे या बुरे- यह तो देखने का नजरिया भर होता था - पर आज याद करने से लगता है कि वाकई ऐसी हर घटनायें, हमारे लिए उन दिनों भी और आज भी याद करने पर बहुत ही मजेदार अनुभूतियाँ सी देती हैं!
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