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Dec 30, 2015

जादू के खेल का वृतांत

मदारीवाला अपने मुख्य कार्यक्रम की ओर बढ़ता था। ठीक-ठाक भीड़ जमा हो चुकी होती थी और अचानक से, मदारीवाला दर्शक-दीर्घा में से किसी एक ऐसे इंसान को बुला लेता था, जो अगले १५-२० मिनटों तक उसके हर प्रश्नों के जवाब देते हुए जादू के प्रक्रिया का हिस्सा सा बन जाता था। साथ ही साथ, मदारीवाला दर्शकों में से चुने गए अपने "सहायक" से कुछ ऐसे प्रश्न करता था, और उन प्रश्नों में उसे कुछ ऐसा उलझा देता था कि लोगों को बरबस हंसी आने लग जाती थी।
मदारी वाला बाते करते-करते, लोगो के घेरे में बीच में बिछे चादर को ठीक तरीके से फैला कर रखते हुए, साथ में डमरू को बजाता और बोलता-
मेहरबान! कदरदान!! साहेबान!!!
हिन्दू को राम राम, मुसलमान को सलाम!
अभी आपके सामने जादू का खेल होगा!
साहेबान, बहुत मेहनत का काम है भूत का सामना, एक चूक और बस जान से हाथ धो लेना पड़ता है......मगर मेहरबान, पापी पेट का सवाल है, सब कुछ करेगा!
मेरे मालिक, फिर भी कर के दिखायेगा, जान की परवाह नहीं करेगा, सभी को दिखायेगा!
ये बच्चा, जी हाँ, इस बच्चे को भेजेगा, उस नीम के पेड़ के ऊपर भेजेगा,बच्चा जायेगा, नीम के पेड़ वाले प्रेत आत्मा के पास जायेगा, अपनी जान पर खेल के जायेगा....और उधर छोड़ के आएगा भूत को...
साहेबान, आपके सामने, ये गायब हो जाएगा.....और्रर्र .. मेहरबान, कदरदान, साहेबान, ये पहुंचा देगा, उसको अपने घर, वो उद्धर्रर्र ..ये जाएगा, आपके सामने से जाएगा, जान पे खेल के जाएगा और उसको अपने घर पहुंचा के आएगा!
इस लम्बे चलने वाले प्रवचनात्मक एवं डरावनी बातों के सिलसिले के बीच, जिस बच्चे के उपर भूत आने की बात हो रही होती थी, वह छोटा बच्चा चीख-चीख कर जवाब देता हुआ, थाली पर चम्मच्च को ठोकते हुए - जादूगर के बातों और उसके डमरू के साथ ताल मिला रहा होता था।

मदारीवाला भले ही बार-बार अपने साथ के बच्चे के ऊपर भूत के प्रकोप और उस से हो रही परेशानियों के बारे बता रहा हो, पर उन बातों से बेफिक्र सा, छोटा-बच्चा पूरे विश्वास के साथ काफी सहज होकर अपनी "जान की बाज़ी" लगाने की तैयारी में लगा होता था।

इधर समां बंधता जा रहा होता था, और उधर मदारीवाला तन्मयता से बीच-बीच में डमरू को बजा कर जोर जोर से - "ड्रीम, ड्रीम" की आवाज़ निकालते हुए, और अंत में एक बार डमरू को, कंधे के ऊपर से कमर के नीचे तक के एक घुमाव में लिए झटके के साथ जोर की  "...ड्राम" की आवाज़ निकालते हुए, लगभग चीखते हुए कहता -
हा-ई-एह, वाह रे वाह, शाब्बाश मेरे शेर!
सभी साहेबन को तमाशा दिखायेगा?
सबों को जान पर लड़ कर दिखायेगा?
अपनी जान पे खेल के उस के पास जाएगा?
इन सभी प्रश्नवाचक चीखों को बिना कुछ सुने या समझे हुए- जिसकी कोई गुंजाइश भी नहीं होती थी- छोटा बच्चा भी चीख-चीख कर सकारात्मक प्रत्युत्तर देकर, अपना हिस्सा पूरा कर रहा होता था - और हर बार "करेगा", "दिखायेगा", "जाएगा" -आदि में से किसी एक को चुन कर बोल डालता था। फिर सहानुभूति प्राप्त करने के हिसाब से मदारी बोलता था-
देखिये साहब, आप सभी इत्मीनान से देखिये!
आप इस तमाशा को देखिये....
ये बच्चा जान पर खेलेगा....
ये आपका दिल बहलाएगा....
साहेबान, आपको पसंद आ जाए तो इस गरीब के चादर पर चार आना,आठ आना देते जाइयेगा....
आपके घर में भी ऐसे ही बच्चे होंगे, ऊपरवाला आपके बच्चों को सलामत रखेगा!
फिर माहौल को और रोचक बनाते हुए -
तो बेटा, खेल के लिए तैयार है?
छोटा बच्चा लगभग आग में कूदने वाले अंदाज़ में -
ज--य्य खल्ल-बली, तैयार है, करके दिखायेगा!
मदारीवाला जोश को और बढ़ाते हुए और दर्शक दीर्घा की ओर घूम कर देखते हुए -
मेहरबान, कदरदान, साहेबान, मेरे मालिक, इस्स्स बच्चे का हौसलाफज़ाई कर दीजिये, एक बार जोर से ताली बजा दीजिये..!
लोग बड़े जोश में ताली बजाते और फिर मदारीवाला वापस बच्चे से -
तो चल आ जा बेटा, इधर आ के लेट जा बेटा!
दर्शक दीर्घा के घेरे के बीच में बिछाए चादर पर बच्चा लेट जाता। उसके लेटने के बाद बहुत सारे चादर से उसे ढंकते हुए - डुगडुगी और बांसुरी के सुर-ताल के साथ, मदारीवाला एक बेंत से बने चौकोर आकार के टेंट से बने कवर से बच्चे को ढँक देता था। कुछ और वार्तालाप होता रहता था, जिसमे बच्चे के भूत के प्रकोप और भूत के द्वारा कुछ "प्रेतात्मक" बातों  का सिलसिला का जिक्र होता था।

अंततः, उस टेंट से बने कवर के ऊपर भी कई चादरों को डाल कर, उसे भी ढंकना शुरू कर दिया जाता था। फिर थोड़ी देर घूमते-फिरते उस दर्शकों में से निकाले गए "सहायक" व्यक्ति के करीब आ कर -
भाई, ये बताइये कि मरा हुआ इंसान का कपड़ा छूना अच्छा बात है, क्या?
अनजाने में मदारीवाले के जादू के सहायक के रूप में फंस चुका इंसान, कुछ झुंझलाते हुए -
हम्म...नहीं
मदारीवाला पहले उसकी बात का समर्थन पर उस से बाकी को और डराते हुए -
ये बात तो ठीक बोला है, बिलकुल सही बोला है मेरे भाई ने......
पर साहेबान, एक बात याद रखना, छूने में कोई खराबी नहीं है,
ऐ मेरे मालिक, ऐ मेरे मौला, ऐ मेरे जहाँपनाह, मुर्दा भी कभी ज़िंदा था!
ज़िंदा आदमी ही तो कपड़ा पहनता है और जिन्दा आदमी ही मरता है!
फिर मदारीवाला हँसते हुए, सबों की ओर देखते हुए, पूछता-
साहेबान, ये बताना कि जिन्दा आदमी ही मरता है न?
फिर थोड़े देर के बाद, अचानक से कुछ दार्शनिक सी बातें करता हुआ  -
कल तो गज़ब हो गया भाई, एक ज़िंदा आदमी मर गया!
लोग उसकी बातों को सुनकर हँसते भी थे और कभी-कभी कुछ ऐसे बातों में, जिनमे जीवन का कड़वा सत्य होता था, उनमें उसके व्यक्तित्व के गहराइयों को भी भांपते हुए, बिलकुल खेल में निमग्नित से हो जाते थे। इसके बाद मदारीवाला उस साथ वाले छोटे बच्चे की और इशारा करते हुए-
और मेरे दोस्तों, यह बच्चा आजकल बहुत बीमार रहता है....
क्योंकि इसने एक मुर्दे का कपडा पहन लिया था.....
मगर अभी इसका इलाज़ होगा, ये बच्चा जाएगा!
उस प्रेत के पास जाएगा, उससे माफी मांग कर आएगा....
फिर बच्चे से पूछते हुए-
बेटा, भूत के पास जाने को तैयार है?
अंदर लेटे हुए बच्चे की आवाज़ -
जय खलबली, तैयार है, उस्ताद, जाएगा!
फिर कुछ देर तक, बच्चे और उस व्यक्ति के साथ सवाल-जवाब के माध्यम से कुछ हंसी मजाक का सिलसिला चलता रहता था - बांसुरी और डुगडुगी को बजा कर मनोरंजन के अनवरत बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ। बीच-बीच में, दर्शक से बुलाये व्यक्ति के ऊपर, कुछ ऐसे सवाल-जवाब का सिलसिला सा चलता रहता था कि उस व्यक्ति का खुद का दिया जवाब ही लोगों में हंसी, खिलखिलाहट और उस व्यक्ति के अंदर - थोड़ी सी झुंझलाहट भी पैदा कर देता था। फिर मदारीवाला उस से एक बड़े से चादर के निरीक्षण करने का आग्रह करता-
अय-ये खोपड़ी, इस चादर को जरा ठीक से देख लो भाई, इसमें कही कोई सांप या जानवर या कुछ है?
व्यक्ति के कुछ कहने से पहले वह उस चादर को उस लेते हुए बच्चे के ऊपर डालने को कहता और बीच के जिससे को ऊपर उठाये पकडे रहने का आग्रह करता-
जब तक मैं न बोलूं, पकडे रहना, छोड़ना नहीं, वरना बहुत गड़बड़ हो जाएगा!
और इसके बाद फिर से बांसुरी के साथ-साथ डुगडुगी बजता रहता था और इन सब के बीच, वह बच्चा कुछ अनाप-शनाप सा बोलते हुए, वास्तव में ऐसा लगने लगता था मानो वह किसी प्रेत के आत्मा के चंगुल में हो। चीख-चिल्लाहट, डराने वाले और वीभत्स संवादों का अजब समागम सा होता था - ऐसे नाटकीय अभिनय से वहां पर जो समां बंध जाता था - उसके लिए मेरी तरफ से, हरेक मदरीवाले के सहायक बच्चों को - सर्वोत्तम बाल कलाकार के अभिनय का पुरस्कार अवश्य मिलना चाहिए! डमरू को बजाते हुए और साथ में एक हाथ से बांसुरी को बजाते हुए, अचानक से रुक जाता और फिर लगभग चीखते हुए -
ऐ-ये-ए, खड़ंगा बाबा, निकाल दे इसके भूत को..... 
और अचानक से चौकोर से बने उस टेंट से संरचना के बीचो-बीच, जिसके अंदर बच्चा लेटा होता था, वहां हाथ से पकड़ा चादर का हिस्सा छूट कर गिर जाता, जिसके कारण वहां पर बिलकुल खाली होने का एहसास होता!

मतलब अंदर लेटा बच्चा गायब!

फिर थोड़ी देर तक तो ऐसा लगता मानो वास्तव में सामने के नीम या किसी और पेड़ के ऊपर बच्चा किसी प्रेत से मिलने चला गया हो! जादू का असर सर चढ़ कर बोल रहा होता था- सभी हैरान से होते थे कि आखिर बच्चा गया तो कहाँ गया?

बहुत देर तक संशय की स्थिति बनी रहती थी। फिर मदारीवाला भीड़ से बुलाये हुए "सहायक" को अपने पास बुलाता था, और फिर उस टेंट के ऊपर के चादर के अंदर अपने और उसके सर को घुसा कर, अंदर का माज़रा दिखाता था - मुझे पता नहीं कि अंदर क्या दीखता था पर, कुछ ऐसी बात होती थी जिस से एहसास होता था कि बच्चा वापस आ गया है। फिर और भी कुछ नाटक वगैरह सा होता था, और अंत में बच्चा वापस हँसता-खेलता बाहर आ जाता था।

विश्वास और अविश्वास के झूला में डगमगाते जैसे माहौल में, कई बार मुझे लगता था कि इसे जादू मानूं या न मानूं, पर अगले ही क्षण, नाटकीय ही सही, पर ऐसा प्रतीत होता था मानो सामने सब कुछ यथार्थ में ही हो रहा हो।

इस तरह के अनेकों क्षण को मैंने अत्यधिक चाव से देखा है, जिया है और आज तक अपने अंदर संजो के रखा है! 

घर से स्कूल के बीच - जादू का खेल

बचपन में स्कूल दो शिफ्ट्स में चलते थे - एक महीना हम सुबह ७ बजे से ११:३० तक वाले शिफ्ट में आते थे और अगले महीने १२ से ४:३० शाम तक वाले में।  इस तरह से स्कूल से लौटते समय या जाते समय अक्सर बाजार के आस पास किसी न किसी तरह के गतिविधियों को देखने का मौका मिल जाया करता था।

बचपन में अनेकों बार मदारी के रस्सी पर चलने के करतब या संपेरों, और भालू-बन्दर को नचाने वाले के खेल को देख चुका था, इस कारण से इस तरह के खेल में मेरे लिए कोई नयापन नहीं बचा था। ज्यादातर समय इस तरह के खेल को बिना देखे, मैं स्कूल की ओर चला जाता था। पर इन सबों के बीच, एक मदारी वाले का - जादू का खेल होता था - जिसे मैं बचपन से अनेकों बार देख चुका था। इसके बाद भी, उसे फिर से देखने में मेरी दिलचस्पी बरकरार सी थी।

कारण अनेकों हो सकते थे - पर सबसे महत्वपूर्ण था - जादू के पीछे के राज़ को जानने की इच्छा। इतना तो पता हो ही चुका था कि जो सामने होते दीखता था, वह वास्तविक तो कतई नहीं था। फलस्वरूप, हर बार इस उम्मीद से उन मैजिक के ट्रिक्स से चकमा खाते रहते थे कि कोई सुराग तो मिले और जान पाये कि आखिर मैजिक ट्रिक का राज़ क्या था?

इस सिलसिले में याद आता है कि जरा सा बड़े हो जाने के बाद, अपने बचपन के मित्रो के साथ पैसे इकट्ठे करके हमने एक जादू के रहस्योद्घाटन करने वाली किताब खरीदी थी। अंततः, हम बहुत सारे जादू के रहस्य को समझ पाने में सफल हो गये थे। जादू के पीछे छुपे राज को जान लेने के बाद, जादू दिखाने वाले मदारी के खेल में, अब वो पहले वाली बात नहीं रह गयी थी।


अब हमारे लिए मदारीवाले का जादू का खेल, कोई इतना आकर्षक खेल नहीं रह गया था कि मैं इसके लिए रुक जाऊं - अलबत्ता कुछ अनसुलझे से रहस्य अब भी थे। पर यह भरोसा ही चुका था कि हर ऐसे खेल जिनका रहस्य अब तक नहीं जान पाये थे , उनके पीछे भी कुछ वैसा ही ट्रिक होगा जैसा बाकी के बाए में हम जानने लगे थे। और, इसीलिए अक्सर हम इनके चल रहे खेल को अनदेखा करते आगे निकल जाते थे।

इस तरह के जादू के खेल में मदारी जादूगर के साथ, कोई हमारे उम्र का ही छोटा-सा बच्चा भी हुआ करता था। खेल के शुरुआत में, मदारीवाला के सहायक के रूप में छोटा बच्चा काफी व्यस्त रहा करता था। मदारीवाला लोगों से बातों का सिलसिला बनाये गोल-गोल घूमता रहता था - जिस से लोगों के भीड़ को गोलाकार घेरे में फैला सके।

इधर उसका सहायक, भीड़ के बीचो-बीच चादर या दरी बिछाता रहता था। फिर उसके ऊपर, गंदे मटमैले ही चुके अनेको प्रकार के झोले या बोरे में से विभिन्न तरह के - जादू के दिखने लायक - हड्डियाँ और एक मानव खोपड़ी, कुछ लकड़ी के विचित्र आकृति वाले टुकड़े, बगुले के गर्दन जैसा एक टोंटी लगा लोटा, और भी इसी तरह के अन्य कई समानों को फैलाने में मदद करता दिख जाया करता था। इसके आलावा, कभी डमरू बजाने में, या जादूगर के द्वारा भीड़ को व्यस्त रखने के उद्देश्य से पूछे गए अनेक प्रकार के अनर्गल प्रश्नों के सवाल-जवाब में भी सक्रिय रहता था।

पूरे खेल के दौरान मदारीवाला और उसके साथ का बच्चा, हंसी-मजाक के माहौल बना कर लोगो का मनोरंजन भी करता रहता था। उनकी बातें जन-साधारण के लिए इतनी रोचक होती थी कि बाजार जैसे व्यस्त जगह में भी लोग रुक कर उन्हें देखने और बरबस हंसने के लिए विवश हो जाते थे! मेरे मन में यह कौतूहल होता था कि उन प्रश्नों का वैसा ही सटीक और चुभता सा उत्तर देने की कला को विकसित करने में, उन दोनों के बीच किस तरह का तालमेल और अभ्यास की आवशयकता पडी होगी?

सहायक बच्चा कम उम्र का होकर भी अपने व्यक्तित्व से वयोवृद्ध सा होता था। उस से किये बहुत सारे प्रश्न का प्रत्युत्तर, छूटते ही मिलता था - जिस से साफ़ पता चलता था कि वे सारे प्रश्न और उत्तर - काफी अच्छे ढंग से रिहर्सल किये हुए और लगभग रटे-रटाये से थे। फिर भी, "बनावटी मासूमियत" से बहुत ही सधा सा दिया हुआ जवाब, अप्राकृतिक लगने के बावजूद, रोचक सा ही लगता था। साथ ही उसके द्वारा कृत्रिम रूप से किया गया बातचीत का मकसद होता था कि वह प्रश्नो से बिलकुल अनभिज्ञ सा लगे, और जैसा दीखता था वैसा ही - मतलब, बच्चे जैसा ही लगे।

खेल के शुरुआत में, अनेकों प्रकार के छोटे-मोटे हाथ के सफाई वाले कारनामे होते रहते थे। और भीड़ को इकठ्ठा करने के प्रतीक्षा के दौरान जमा हो चुके भीेड़ का मनोरंजन कुछ ऐसे छोटे मोटे ट्रिक्स से होता जैसे - एक सिक्के को दो सिक्का बना देना या लकड़ी को झोले में डाल कर उस लकड़ी को सांप बना देना, और इसी तरह के अन्य करतबें। उस दौरान करतबों और कहकहों का सिलसिला चालू रहता था।

इस सिलसिले में जादूगर उस बच्चे से जुड़े कोई मनगढंत सी कहानी का जिक्र शुरू कर देता था - जिसमें बच्चे को भूत के आतंक से हो रही परेशानियों का जिक्र होता था। फिर, अंत में बच्चे के अंदर घुस चुके भूत से, उसे छुटकारा दिलाने का वादा होता था, जिसमें इन्द्र्जाली तिलिस्म का निहायत ही जरूरत होता था।

मदारी का खेल, इन सब के जिन्दा मिसाल पेश करने जैसा ही कुछ होता था। और, इस पूरे कार्यक्रम का पटाक्षेप होता था, ताबीज़ इत्यादि जैसे कुछ बेचने से या प्रसन्नता-पूर्वक लोगों के दिए कुछ पारिश्रमिक से। भीड़ में से आधे लोग तो यूँ ही आतंकित से होते थे, और जो नहीं होते थे, वे खेल के दौरान दिखाए द्रष्टव्य से, अपने बचे-खुचे भरोसे पर पुनर्विचार करते हुए यथोचित कर लेते थे।

सारांश में, मदारी वाले के खेल का पूरा मसौदा यही होता था। संभवतः उन दिनों के दिखाए मदारी वालों के खेल की इतनी सी पटकथा भी, आज के किसी हिंदी फिल्म से, ज्यादा हुआ करता था। आज के हिंदी फिल्म का मकसद भी लगभग यही होता है, जो उन मदारीवालों का होता था - अर्थात भीड़ जमा करके, लोगो को कुछ देर व्यस्त करने का प्रयास और अंततः पैसे इकट्ठा करना।

ये अलग बात है कि फिल्मवाले पहले ही पैसे ले लेते हैं, और फिर ३ लाइन के कहानी को समूचे ३ घंटे के सिरदर्द कहानी बनाकर खींचते हैं। परन्तु, मदारीवालों के खेलों को कई बार देखने के बाद भी, वे आज के सिरदर्द फिल्मों से ज्यादा रोचक से लगते थे। वैसे भी लोग, मदारीवालों के खेल को देखने के बाद, अपने श्रद्धा भक्ति से पैसे देते थे, न कि खेल देखने के लिए!

उन दिनों के मदारीवाले के खेल को, आज के सन्दर्भ में देखना, बहुत ही अजीब सा लगता है। अब कहाँ मदरीवाले, कहाँ लोगों में इन मदारीवाले और उसके खेल को देखने में दिलचस्पी रही, कहाँ वो फुर्सत में घूमते लोग - जो सब्जी खरीदने के लिए टहलते हुए बाजार जाते थे। अब तो इस भाग दौड़ की ज़िंदगी में - मदारीवाले और उनके सभी हैरतअंगेज खेलों का सिलसिला - वक़्त के किसी पृष्ठ में दर्ज़ होकर संग्रहालय में रखे जाने योग्य से हो गए हैं।

परन्तु आज भी जब किसी अच्छे वक्ता को किसी कॉन्फ्रेंस या सेमीनार में आकर्षक, मनोरंजक और रोचक ढंग से बोलते देखता हूँ. बरबस उन मदारीवाले की याद आ जाती है। "पब्लिक स्पीकिंग" और "कनेक्टिंग विथ पीपल" का जीता जागता और बहुत ही प्रखर प्रमाण के रूप में, वे मदारीवाले हमेशा याद आते रहेंगे!

Dec 28, 2015

घर से स्कूल के बीच की 'पढाई'

बचपन में स्कूल आने और जाने के दौरान, मुझे रास्ते के अगल-बगल, सड़क के किनारे होते गतिविधियों को करीब से देखने का बहुत शौक होता था। उन दिनों घर से स्कूल जाने के लिए, मुझे कदमा बाजार के आस-पास से गुज़रना पड़ता था। कदमा बाजार का माहौल, किसी गांव के हाट के परिष्कृत रूप में ही समझना चाहिए।

बदले दौर का कदमा बाज़ार - सिर्फ दूकान ही दुकानें!
बाज़ार के अंदर, टिन की छत वाले - स्थाई और अस्थाई के बीच झूलते से- कई सारे दुकान बिखरे पड़े थे। बाजार के अंदर, अनेको प्रकार के दूकान थे, पर बहुत कम संख्या में ही सीमेंट और ईंट के बने पक्के दुकान थे। ऐसा ज्ञात होता था कि शुरू के बने कुछ स्थाई दुकानों के इर्द गिर्द, कई सारे दूकान जुड़ते चले गए होंगे - और कुल मिला कर, बाज़ार बहुत ही घनी और भीड़ भरा, मेले के जैसा शकल ले लिया था।

उन स्थाई दूकानों के बीचो-बीच बहुत बड़ा सा सब्जी-बाजार था। बिलकुल गाँव के हाट की तरह - जमीन पर बिछे हुए, बहुत सारे दूकान, ग्रामीण सा माहौल बना देता था। मेन-रोड और बाज़ार के बीच का जगह - अमूमन खाली ही होता था। कई साल तक सड़क के दोनों ओर के फुटपाथ, वास्तव में लोगों के चलने के लिए ही हुआ करता था। इस वजह से, जैसा उम्मीद किया जाना चाहिए, वे खाली ही हुआ करते थे, बल्कि रोड के दूसरी ओर लाइन से बहुत सारे घर भी होते थे।

कालांतर में, उस रोड और बाजार के बीचे के खाली भाग में इक्का दुक्का करते हुए - बहुत सारे सब्जी बेचने वालों ने, जमीन पर सब्जियों का ढेर लगाकर सब्जी मंडी के जाल सा बनाना शुरू कर दिया। फिर जैसा भारत के किसी भी खाली जगह का हश्र होता है- बाजार के पास वाले  सड़क के दोनों ओर के फुटपाथ में भी किसी अमरबेल की तरह से, सब्जियों का टीला सा लगने लगा। जिस तरह से पंक्तिबद्ध होकर खेतों में सब्जियों के ढेर उगते थे, उसी प्रकार से वे बिकने के लिए भी कतारबद्ध से फ़ैले होते थे।

परन्तु मेरे बड़े होने तक, यानि जब तक मैं स्कूल जाता था, सड़क और बाज़ार के बीच के भाग ज्यादातर खाली सा ही रहता था। आये दिन वहां किसी ताबीज़, हकीम-जड़ी-बूटी और इसी तरह के दवा बेचने वालों का, टेंट-नुमा सा दूकान लगता रहता था। एक बार ऐसे दूकान के स्थापित होने के बाद, वे कुछ हफ्ते से लेकर महीने भर, उसी जगह पर जमे से रहते थे।

जब कभी बाजार का कोई जगह खाली रहता था, वहां मदारी के जादू -खेल के साथ-साथ, सांप-बिच्छू, बन्दर - भालू के नाच आदि जैसे खेल भी होते रहते थे - जो आई पी एल क्रिकेट के "टी -२०" के तर्ज़ पर थोड़े देर के लिए चलता और फिर कहीं और आगे के लिए निकल जाता।

मेरी स्कूल के पढाई-लिखाई में, ज्यादा दिलचस्पी नहीं होती थी। स्कूल से आने-जाने के क्रम में, इस तरह के रोचक कार्यक्रमों को देखने से मन बहल जाता था। मेरी खोजी नज़रें और सालों का अनुभव, हमेशा इस तरह के होने वाले गतिविधियों के तलाश मे रहती थीं।

इन खेलों को देखने का अद्भुत आनंद था और आज जब अपने अतीत में डुबकी लगाता हूँ,  इन सब के बिना, वे दिन अधूरे से दीखते हैं! बोनस के तौर पर, अनेकों प्रकार के नयी जानकारी भी मिलते रहते थे - जैसे नीम के पेड़ पर भूत होता है, या दोमुंहा सांप छह महीने एक तरफ के मुंह को इस्तेमाल करता है फिर बाकी समय दूसरे वाले को, या नाना प्रकार के "ताकतों" के दास्ताँ इत्यादि ।

और भी कई सारे इसी तरह के ज्ञानवर्धक बातें, जिनका स्कूल के किताबों में कभी कोई जानकारी नहीं मिल पाता था, वे सभी वहां बाजार में चल रहे किसी मदारीवाले या अन्य विजिटिंग प्रोफ़ेसर के "कक्षा" में मिल जाया करता था । अनेकों बार स्कूल जाते समय, किसी ऐसे ही मज़मे को देखने के चक्कर में, मैं लेट से स्कूल पहुंचा होऊंगा, जिसके कारण क्लास-टीचर से सजा भी भुगता होऊंगा!

आज के टीवी में जिस तरह से लोग चैनल बदलते हैं, उसी प्रकार से उन दिनों बाजार के पास के उन खाली हिस्सों में, हमेशा कुछ न कुछ पसंदीदा सा प्रोग्राम होता ही रहता था - मर्जी थी कि देखूं या कहीं आगे बढ़ता चला जाऊँ। कभी जड़ी-बूटी के बारे में, कभी जादू का खेल, तो कभी किसी दीवाल पर बनते किसी इश्तहार की पेंटिंग को देखने का सिलसिला!

हमारे उन दिनों के लाइव टेलीकास्ट के चैनल लाइनअप में समय-समय पर मनोरंजन के लिए, इस तरह के अनेक सारे गतिविधियाँ, निःशुल्क उपलब्ध होते रहते थे। आज जब कभी ठन्डे दिमाग से बैठ कर, उन अतीत के दिनों में खो जाता हूँ, तो हर वैसे अनुभव के क्षण - बिलकुल आँखों के सामने तैरने से लग जाते हैं।

आज यादों के उस जखीरे में से, कुछेक मुख्य विकर्षणों को - जो मुझे स्कूल और पढाई से दूर करने में प्रबल सक्षम से थे - उनको याद करने का प्रयास कर रहा हूँ। ये यादें ऐसी हैं जो मेरे मानस-पटल पर काफी गहरे रेखांकन कर गए हैं।

आगे मैं कभी उन सारे तमाशबीनों का ज़िक्र करूँगा - मैं काफी गहराई से उनके हर एक गतिविधियों को देखा करता था, और किसी वीडियो कैमरा के न होने के बावजूद, हरेक दृश्य आज भी मुझे उसी ताज़गी के साथ याद हैं! कई बार तो लगता है कि मैं अब भी उन सभी दृश्यों को अपने आँखों के आगे घटित होता देख रहा हूँ!

Dec 14, 2015

एल टी - संस्मरण

बचपन के दिनों के सबसे यादगार पल- हाई-स्कूल के दिन थे। यह समय का वह दौर था, जब हम ऊंची आसमानी कूद की,  तैयारी शुरू ही कर रहे थे । खुले आकाश में उन्मुक्त पंछी की तरह, जिंदगी की लम्बी उड़ान लगाने के लिए, बचपन के चोले को उतारकर, जवानी के पैराशूट को पहनने की शुरुआत कर चुके थे।

हाई-स्कूल तक आने के क्रम में, किसी पुराने योद्धा की तरह, हम कई तरह के बाधाओं को पार कर चुके थे और अनेको तरह के जटिल और नीरस विषयों को - और उनसे भी ज्यादा, कई शिक्षको के उबाऊ और मशीनी अंदाज़ में पढ़ाने के तौर-तरीके के - आदी से हो गए थे। किसी सुरंग के अंधकार में रोशनी के किरण से दिखने वाले - उन्मुक्तता का बोध कराने वाले - "कॉलेज" जाने के सुनहरे सुबह के सपने को देखते हुए - हम नौवी कक्षा को दस्तक दे चुके थे।

अगले दो साल की पढ़ाई, काफी गहन होने वाला था। वर्ल्ड कप के एलिमिनेशन राउंड की तरह, अब से पढ़ाई का, वास्तव में महत्व बहुत ज्यादा हो गया था - क्योंकि १०वीं के परीक्षाफल के आधार पर ही, भविष्य के पढ़ाई का निर्णय होने का प्रचलन था। ऐसे माहौल में, जैसा उम्मीद की जानी चाहिए - सब कुछ गंभीरता के कालिख में लिप्त से थे - अतः हमें किसी भी विषय की पढ़ाई या किसी शिक्षक के क्लास के, रोचक होने की कोई उम्मीद नहीं थी।

परन्तु, इन सब के बीच, हमारे जीवन में "एल टी" युग का प्रादुर्भाव हुआ!

एल टी अर्थात - श्री ललन तिवारी। कैसे इनके बारे में कुछ बताऊँ? संक्षेप में, एक अनुभव के रूप में ही इन्हे व्यक्त किया जा सकता है। कहने के लिए तो ये हमारे नौवी और दसवी में हिंदी और संस्कृत के शिक्षक थे। पर कई मायनों में, ये हमारे क्लास के दिल में बसे धड़कन से थे - जिनके माध्यम से पूरे दो साल तक, हमारे अंदर एक नयी ऊर्जा का संचार सा होता रहा। एल टी के बिना - स्कूल के दिनों की कल्पना - किसी चित्रकार के बनाये चेहरे में, आँखों को छोड़ देने जैसा होगा।
पहले मिडिल स्कूल और बाद में कदमा बॉयज हाई स्कूल - लगभग पूरी स्कूलिंग इसी स्कूल में 
पढ़ाई के हर तौर तरीके और मापदंड से बिलकुल बेफिक्र, अलमस्त, बेख़ौफ़, बुलंद और मस्तमौला से शिक्षक। इनसे साक्षात्कार होने के पूर्व, जितने भी शिक्षक मिले थे - उन से बिलकुल ही अलग - किसी भी पंरपरागत शिक्षक के परिभाषा से नितांत ही अलग से - बहुत ही मौलिक और पठन -पाठन के विषय-वस्तु से काफी ऊपर दर्जे के - अपने ही अनूठे ढर्रे में ढले से - बिलकुल ही अलग नस्ल के शिक्षक - एल टी सर!

कुल मिला कर, "एल-टी" के साथ बिताये सुखद क्षणों का पिटारा - पूरे १० साल के स्कूल की पढ़ाई पर - कई गुना भारी पड़ेगा!

एल टी सर के कल्पना मात्र से ही, एक काफी रोबदार सा व्यक्तित्व की छवि, उभर कर सामने आती है। लम्बी और भव्य कदकाठी, चौड़ा-तना हुआ सीना, और किसी पहलवान जैसा बुलंद शरीर। हमेशा खद्दर के धोती-कुर्ता पहने - एक बहुत ही प्रभावशाली सा व्यक्तित्व का स्मरण होता है। चौड़ी ललाट और सिर के भू-मंडल के दूर क्षितिज तक बाल उड़े होने के कारण - साफ़ सुथरा चिकना सा सिर - जिसके कारण जाज्वल्यमान सा शौर्य-मंडल और भी प्रखर होकर -चमकता सा दीखता था। धान के खेत के कटाई के बाद छोड़े हुए जड़ों की तरह, गालों पर हलके से बढे हुए कच्ची-पकी दाढ़ी - ऐसा लगता, मानो गाल को मेघाच्छादित सा किये हुए हो।

अक्सर, एल टी सर क्लास जरा देर से आते थे - बाद में पता चला कि वे पान के बेहद शौक़ीन थे, और स्कूल के बाहर से पान खा कर आने के बाद ही, क्लास में पढ़ाने का मिज़ाज़ बनता था।

धीमे-धीमे क़दमों से बढ़ते हुए, एल टी सर क्लास के अंदर आते, फिर एक बार पूरी क्लास के ऊपर गहरी-सी निगाहें डालते। सहसा ऐसा प्रतीत होता था, मानो क्लास के अंदर कोई शेर आ गया हो, और हमारे क्लास के अंदर अनायास ही स्तब्धता सी छा जाती थी। क्लास के बीच के अंतराल में, कई उछृंखल से छात्रों के उछल-कूद या किसी को तंग करने की आदत सी थी, पर क्लास के अंदर, एल टी सर के पैर पड़ते ही, सब मृदु शशक की भांति भागते हुए - दुबक कर अपने- अपने सीट पर बैठ जाते थे। इनके व्यक्तित्व का ऐसा असर था कि इनकी निशब्द उपस्थिति मात्र ही, शेर का बोध कराता और पूरा क्लास शांत और चौकन्ना सा हो जाता था।

पान के तो शौकीन थे ही, पर उसका परिचायक सा बन चुका था - उनके होठों के दोनों कोने, जहाँ लाल-लाल स्थाई से दाग बन गए थे। मुँह के अंदर पान को दबाये रखने के कारण, कोई एक तरफ का गाल और भी ज्यादा उभरा सा रहता था। हमेशा पान से सिंचित लाल-लाल हो चुके होंठ उनके आभा-मंडल को और भी सुसज्जित सा कर देता था। बीच-बीच में दाँतो से चबाते हुए - पान का बड़ी चाव से रसास्वादन करते हुए - अपने मुखारबिंदु से शब्दों का उच्चारण करते थे, और सामने बैठे किसी छात्र से हिंदी की पुस्तक - "भाषा -सरिता" मांगते और फिर किसी अध्याय को खोल कर, हम सभी को भी उस पाठ को खोलने का निर्देश मिलता। इसके बाद, हिंदी का कोई एक पाठ का अध्ययन शुरू हो जाता।

बुलंद आवाज, लयबद्ध और धाराप्रवाह हिंदी, शब्दों का शुद्धतम उच्चारण, और उस पर से, नायाब शब्दों का चयन- जादूगर सा था यह शिक्षक! क्लास में ऐसा समां बन जाता था कि हर कोई मन्त्र-मुग्ध होकर, उन्हीं की तरफ, एकाग्रचित्त होकर देखने को विवश सा हो जाता था। धाराप्रवाह और ओजपूर्ण व्याख्या का ऐसा जादुई प्रभाव होता था कि कई बार तो ऐसा प्रतीत होता था कि मूल कविता से ज्यादा रोचक और भावपूर्ण तो शायद, एल टी सर की समीक्षा थी!

लिखने के क्रम में, बरबस उनके हरेक पहलू याद आने लगे, और ऐसा लग रहा है, मानो मेरे समक्ष खड़े होकर एल टी सर कुछ धाराप्रवाह सा बोले जा रहे हैं।

शुरुआत के दिनों में, एल टी सर के व्याख्या या सामान्य बोलचाल में शब्दों के चयन - हम में से कई लोगो के, समझ के परे सा होता था। उदाहरण के तौर पर - अपने व्याख्यान के दौरान, एल टी सर इस तरह के वाक्य बोलते थे - "इस कार्य को संपादित करने के पश्चात, नृपेश, अपने कक्ष के द्वार से शनैः शनैः अग्रसारित हो गए, और आखेट करने हेतु, वन की ओर प्रस्थान कर दिए।"

परन्तु, धीरे धीरे इनके भाषा और शब्दों का नशा किसी जाम की तरह, हमारे सिर चढ़ के बोलने लगा। फिर तो थोड़े अंतराल के बाद ही, हर किसी के जुबान पर क्लिष्ट हिंदी के बोल, यूँ स्वाभाविक रूप से आने लगे, मानो हम सभी ऐसी ही भाषा बोलने के आदी से थे! आज भी, जब किसी के समक्ष शुद्ध हिंदी का प्रयोग प्रारम्भ करता हूँ, तो एल टी के दिए शब्दों के तरकश में से, शब्दों के तीर की कभी कमी नहीं होती है।

एल टी से मैं इतना प्रभावित हो गया था कि मैं इनके सान्निध्य रहने का, कोई सा भी मौका नहीं छोड़ना चाहता था। और ऐसे में, जब मुझे यह पता चला कि वे अपने घर पर ही ट्यूशन पढ़ाया करते थे, तो मैं बिना किस उद्देश्य के ही - सिर्फ एल टी सर के संसर्ग में रहने की भावना से- बरबस इनके घर जाने लगा था। ट्यूशन का माहौल, काफी लचर सा होता था। कई तरह के छात्र, घर पर यूँ ही अनमने ढंग से पड़े रहते थे। कोई एल टी सर के बेटे को स्कूटर में घुमा लाता, तो कोई इनके घर का काम कर देता - और इन सब के बीच, कभी सर का मूड हो गया तो पढ़ा भी देते थे।

परन्तु मेरे लिए इन सब से कही ज्यादा महत्वपूर्ण - एल टी सर के साथ बिताये क्षण का लुत्फ़ उठाना होता था। मैं और मेरे कुछ और साथी, जो ट्यूशन पढ़ने जाते थे - घंटो मन्त्र-मुग्ध होकर एल टी सर की बातों को ही सुनते रहते थे - घर पर, देश की राजनीति से लेकर और भी कई स्थानीय और हलके विषयों पर, उन्मुक्त भाव से बाते करते और ठहाका भी लगाते थे।

ट्यूशन तो सिर्फ मिलने जुलने का एक बहाना सा था - मुझे नहीं याद है कि उन्होंने कभी पैसे की मांग की हो या कभी स्वयं पैसे लिए भी हों, कोई पैसे देने को आता तो - कहते थे - "ऊपर वाले शेल्फ पर रख दो"- व्यावसायिक तो कतई नहीं थे - बस, उनके घर पर भी स्नेह और ज्ञान की धारा का अनवरत प्रवाह सा चलता रहता था।

एक बार, एल टी सर के घर के एक शेल्फ के ऊपर रखे कुछ पुस्तकों को निहारते हुए, मुझे सर के कवि और लेखक होने का कुछ प्रमाण सा मिल गया। कुछ पुराने से कागज़ों का पुलिंदा सा था - जिसे पढ़ने से ज्ञात हुआ कि वे एल टी सर के हस्तलिखित पाण्डुलिपि से थे। ऐसा प्रतीत होता था कि एल टी सर कोई उपन्यास या कहानी सा लिख रहे थे, पर संभवतः समयाभाव के कारण, कई अरसे से वह अधूरा सा ही पड़ा हुआ था। इस के बारे में, सर से पूछने की कभी हिम्मत तो नहीं हुई, पर मैं उन्हें चोरी-छिपे पढता रहता था।

मेरी आंतरिक इच्छा होती थी कि काश मैं भी उनकी तरह ही, मौलिक रूप से, कुछ लिख पाता। आज इतने सालों बाद, अब मुझे यह कहते बिलकुल ही झिझक नहीं होती है कि मैं उनके सानिध्य रह कर साहित्य में डूबना चाहता था, और उसी की पढ़ाई भी करना चाहता था। पर सामाजिक और पारिवारिक दबाव था कि - नौकरी को सुरक्षित करने के लिए - इंजीनियरिंग या मेडिकल की ही पढ़ाई करूँ। और मैंने वैसा ही किया - परन्तु अंदर के पनपते साहित्यकार का - कही स्वतः अवसान सा हो गया।

शुरुआत में, हमें एल टी सर के पूर्ण व्यक्तित्व का पता नहीं था। पर जैसे-जैसे समय बीतने लगा - ऐसा लगने लगा कि इनके अंदर भी एक छोटे से बच्चे का वास सा था, जो हमारे साथ मिलते ही मानो झूम-झूम कर अपनी जिंदगी जीता था। हमारे बीच एक ऐसा सम्बन्ध बन गया था, जो शिक्षक और छात्रों के बीच का उत्कृष्टतम और सर्वथा अनुकरणीय सा सम्बन्ध था।

धीरे-धीरे एल टी सर के क्लास में, कुछ छात्र, उनके "विशेष प्रसाद" के हकदार से बन गए थे। उस लिस्ट में सबसे ऊपर - मनोज सिंह हुआ करता था - जिसे हम "तैमूर-लंग" कह कर पुकारते थे। मनोज बहुत ही उत्पाती जीव था - और, ऊपर से एल टी सर उनके पिता - जो स्वयं एक शिक्षक थे, उनको जानते भी थे। फलस्वरूप, यह विशेष संवाद और उसके साथ जुड़ा कार्यक्रम, अनेको पुनरावृत्ति के बाद अब बिलकुल कंठस्थ सा हो गया है, और आँखे बंद करके सोचता हूँ, तो ऐसा लगता है कि अभी सामने ही घटित हो रहा हो!

एल टी सर, खेत से सब्जी उखाड़ने वाले अंदाज़ में मनोज के केश को मुट्ठी में पकड़ कर हंसते हुए -
अच्छे बाप का - नालायक बेटा - गेंहू के खेत में लेढा
मनोज भी धाराप्रवाह कुछ न कुछ बोल कर, एल टी सर को उकसाते ही रहता था।

किसी ने अनेको बार इस डायलॉग के सुनने के बाद, यह प्रश्न कर ही दिया कि आखिर "लेढा" क्या होता है - जिसके जवाब में हमें पता चला कि शुरुआत में गेंहू और लेढा एक साथ ही उगते हैं, और दीखते भी एक जैसे हैं, पर बाद में जाकर गेंहू तो काम का होता है पर लेढा कोई काम का नहीं - शायद लेढा एक प्रकार का weed होता होगा।

एक और छात्र होता था - मधुप पांडे, इसकी ख़ास बात यह थी कि यह भी बहुत हाजिरजवाब सा था और इसकी आवाज़ काफी ऊंची और कर्णभेदी सी थी। गाँव से अपने शुरुआती पढ़ाई करके आया था और भोजपुरी-निष्ठ हिंदी बोलता था - साथ ही, काफी निर्भीक होकर, फ़ौरन एल टी सर के प्रश्नों का प्रत्युत्तर देता रहता था।

एक हमारे मित्र हैं - बालाजी भगवती झा- अब नाम की लम्बाई के अनुरूप हो गया है, पर उन दिनों कदकाठी में बहुत छोटा हुआ करता था। और इसी वजह से, दसवीं क्लास में भी, हाफ पेंट में अाने वाले कुछेक छात्रों में से एक हुआ करता था। बालाजी बहुत ही उत्पाती छात्र था, और हमेशा किसी ने किसी प्रकार के खुराफात में लगा रहता था - जिस कारण, एल टी सर उसे अपने पास बुलाते और कुछ "प्रसाद" देते हुए कहते- "देखेन में छोटन लागे, घाव करे गंभीर"

एक दिन, एल टी सर उसके उत्पात से तंग आ गए और एक थप्पड़ रसीद करते हुए कह दिए -
चूहे की तरह बदमाशी कर के भाग जाता है
जिसके बाद, कहना नहीं होगा कि आजतक उसे किस नाम से पुकारा जाता है।

"चूहा" के किसी और उत्पात के - धारावाहिक अंक के नवीनतम संस्करण के उपलक्ष्य में - एल टी सर उसके हाथों को मोड़ते हुए पूछ बैठे -
अरे तुम किस नक्षत्र में पैदा हुआ है?
रावण नक्षत्र में सर
इसके बाद जो हुआ, वह क्लास के हर किसी के यादों में, आज भी बिलकुल हरा है!
पीठ पर दो-चार थप्पड़ के बाद एल टी सर ने पूछा -
आखिर किस खानदान के हो तुम?
जिस खानदान के आप हैं, उसी खानदान के हैं, सर!
कौन सा?
ढाबुड खानदान सर
ढा - बुड, ये कौन सा खानदान होता है?
 ये बोलते-बोलते ललन तिवारी इतने जोर से हँसे थे कि सारा क्लास भी ठहाके में गूंज गया! उन दिनों कुछेक शब्दों को उल्टा बोलने का प्रचलन सा था और सर्वथा यह "बुड्ढा" शब्द का उल्टा - "ढा -बु " का अपभ्रंश सा रहा होगा।

अक्सर क्लास में, इस तरह के मनोविनोद के क्षण होते रहते थे। और, फिर देर तक चलता था, हंसी और ठहाकों का सिलसिला। कई बार तो अगल-बगल के क्लासरूम कर शिक्षक, चिंतित होकर, हमारे क्लास में आकर झांकते - शायद, ये देखने आ जाते थे, कि क्लास में किसी शिक्षक के न होने के कारण, हम सभी अपनी मस्ती में होंगे - पर, जैसे ही देखते थे कि एल टी सर क्लास में ही हैं - वे कुछ निराश सा होकर लौट जाते थे!

एल टी सर के शब्दावली के संकलन में, हमें सम्बोधित करने के लिए अनेको शब्द थे, जैसे-
नालायक, पाखंडी, दुष्ट, पापी, भ्रष्ट, पराक्रमी, कृतघ्न, दुष्कर्मी, उछृंखल, गेंहू के खेत में लेढ़ा, अच्छे बाप का नालायक बेटा, आदि आदि।

एल टी के क्लास की बात ही कुछ अलग होती थी- अगर ये सातवी क्लास में भी आते तो - ऐसा लगता जैसे खाने में कोई तीखी चटनी का चटखारा ले रहे हों!

छात्रों में अपनी विशेष लोकप्रियता के कारण, स्कूल में होने वाले सरवती पूजा के लिए एल टी सर को, संचालन की कार्यवाही दी गयी। एल टी सर हर क्लास में घूम घूम कर अपील करते हुए चंदे की मांग करने लगे। और उस क्रम में एल टी सर ने चुटकी लेते हुए कहा कि चंदा देने से सब का भला होगा - और सभी अव्वल दर्जे में मैट्रिक की परीक्षा को पास कर लेंगे।

इस पर हमारे क्लास का सबसे हंसमुख और हाजिरजवाब साईं ने कहा -
सर, इस बात का हम सभी को लिखित में प्रमाण दीजिये, तब चन्दा मिलेगा!
छूटते ही एल टी सर ने जो ठहाका लगाया था, उसकी गूंज आज तक याद है।

एल टी सर और उनके क्लास के ऐसे कितने ही अविस्मरणीय किस्से याद आते रहते हैं। जी करता है कि वापस अतीत में चला जाऊं। जहाँ एक तरफ हंसी और ठहाके का दौर चलता था और क्लास में खुशनुमा सा माहौल रहता था, वही दूसरी तरफ उनसे प्राप्त किये ज्ञान का कोई अंत नहीं होता था।

उनसे सीखने की तो कोई सीमा ही नहीं थी - उनके पास हिंदी और संस्कृत के ज्ञान का अपरम्पार भण्डार सा था - जयशंकर प्रसाद हो या निराला, महादेवी वर्मा हो या दिनकर, मैथिली शरण गुप्त हो या हरिऔध, रामचन्द्र शुक्ल हो या रामवृक्ष बेनीपुरी, रेणु हो या पंत, कबीर हो या सूरदास, विद्यापति हो या बिहारीलाल, रहीम हो या जायसी, कालिदास हो या किसी वेद का श्लोक - हर विषय पर बहुत ही रोचकता से व्याख्यान कर सकते थे।

हमारे बहुत ही प्रिय ललन तिवारी अब नहीं रहे!

मेरी बहुत इच्छा थी कि उनसे मैं इस बार के अपने  जमशेदपुर के दौरे में मिल पाता -पर ईश्वर को शायद वह पसंद नहीं था। पता चला कि कुछ महीने पहले, उनका अपने गाँव में स्वर्गवास हो गया। मेरे सबसे प्रिय शिक्षक ललन तिवारी - मेरे अंतिम साँसों तक, मेरे अंदर जीते ही रहेंगे। मेरे अंतर्मन में, हिंदी साहित्य के प्रति उन्होंने जो रूचि पैदा की है, वह चिनगारी अब दावानल सी बन गयी है। जब कभी मैं हिंदी पढता हूँ, लिखता हूँ और बोलता हूँ- एल टी सर का ही प्रभाव दीखता है।

एल टी सर अपने हर छात्र के लिए - अभिभावक, मित्र, शिक्षक, रोल-मॉडल से थे।  वे सबों के लिए श्रद्धेय तो थे ही, पर उनके साथ सबों का ऐसा सम्बन्ध भी था कि कोई भी खुल के कुछ भी उनको व्यक्त कर सके। इस सन्दर्भ में, मुझे स्मरण होता है एक घटना, जिसमे उनके एक बिलकुल ही अलग रूप का पता चला था। 

हमारे साथ एक छात्र होता था - अरुण सिंह। किसी पारिवारिक या अन्य कारणों से वह बहुत ही उद्विग्न सा रहता था। उसका व्यवहार काफी दबंग और कर्कश सा हो गया था - आये दिन किसी से भी झगड़ा या मारपीट करना - आम बात थी। एक दिन - अरुण, स्कूल में तलवार लेकर आ गया, और उसके बाद अचानक,  हेडमास्टर से उसकी बहुत झड़प हो गयी। उसके बाद, अरुण चीखता -चिल्लाता हुआ, हेडमास्टर के ऑफिस से बाहर निकला।

चीख -चिल्लाहट के गूंज को सुन कर, सभी लोग क्लास के बाहर आ गए और सामने देखने लगे - अरुण को संभवतः स्कूल से निष्कासित करने के बाद गेट से बाहर निकाल दिया गया था। फिर क्या था, गुस्से में अरुण को जो कुछ सामने दिख रहा था - पत्थर, ढेला, ईंट, लकड़ी- उसे ही फेंकता हुआ- बिलकुल आतंकित शेर की तरह दहाड़ने लगा था और गंदी-गंदी गालियां और धमकियाँ भी दे रहा था।

किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए, फलतः सभी मूक दर्शक बने देख रहे थे। अचानक स्कूल के गेट से बाहर - एल टी सर दिखे - बिलकुल निडर उसके करीब पहुँच गए। पता नहीं क्यों, उन्हें देख कर पहले तो अरुण एकाध पत्थर फेंका पर, एल टी सर को निडर होकर, अपनी ओर आगे आते देख - अचानक से वह ठिठक सा गया और अगले कुछ क्षणों में बिलकुल टूट गया - फिर दहाड़ मार कर रोते हुए, उनके चरणों में गिर गया। एल टी सर उसे अपनी बाँहों में ले लिए और फिर उससे कुछ बाते करते हुए - उसे समझाते हुए स्कूल वापस ले आये। उस दिन के बाद - अरुण सिंह एक आदर्श छात्र सा बन गया और प्रतिदिन, एल टी के चरणो को छूकर प्रणाम करता था!

मुझे लगता था कि एल टी सर के प्रति मेरा ही इतना अगाढ़ प्रेम रहा होगा, पर मैं गलत था। हाल ही में, जमशेदपुर में अपने हाई-स्कूल के करीब १५-२० साथियों के साथ - एक मिलन समारोह का आयोजन किया गया - और, उस मिलन के दौरान - हर दो वाक्यों के बाद - सिर्फ ललन तिवारी का या उनके क्लास में हुए घटनाओं का ही जिक्र हो रहा था!

उस मिलन के बाद बने व्हाट्सप्प ग्रुप में, जब लोगों ने कुछ गंभीरता से लिखना शुरू किया - अलौकिक रूप से - सबों के लिखने के शैली में, शब्दों के चयन में, और भाषा के प्रवाह में, एल टी सर का ही प्रभाव झलकता है!

मेरे पास हिंदी में इसका सही पर्याय नहीं है पर जो मैं कहना चाहता हूँ, वह यह है कि - There is an uncanny resemblance in everyone's expression and selection of words, such is the profound impact of this teacher, that even after nearly 33 years, people are influenced by his style!

जीवन एक रेलगाड़ी की तरह, कई प्लेटफॉर्म पर बिना रुके, सरपट भागी चली सी जा रही है। कई प्लेटफार्म ऐसे हैं, जहाँ अब कभी वापस जाने का, मौका नहीं मिल पायेगा! न जाने क्यों, इस बार के भारत-भ्रमण के दौरान, एक कसक सी रह गयी और शायद अब जीवन भर इसका मलाल भी रहेगा, कि मेरे बहुत ही प्रिय ललन तिवारी सर से अब कभी मुलाकात नहीं हो पायेगा! उनका हम सभी के जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव है।

मुझे स्मरण हो रहा है, अपने अंतिम वर्ष के शिक्षक दिवस के वो पल, जब वे हमारी कक्षा में आये थे, और हमारे बारे में ये बातें कही थी, जो आज तक मेरे मानस पटल पर रेखांकित हैं-
बच्चे तो उच्छृंखल होते ही हैं - क्योंकि यह उनका बाल-स्वाभाव है, ये नदी की तरह होते हैं और इनका प्रवाह किनारो से टकरा कर यूँ ही शोर करता है, फिर जब बड़े हो जायेंगे - तो किसी सागर में समा कर शांत हो जायेंगे।