हमारे जीवन के कितने रंग हैं - कितने सारी कड़ियाँ और कितने सारे अनसुलझे सी गुत्थियां- पर इन सब के बीच, समय अपना चक्र चलाता रहता है - हर घड़ी एक नयी चुनौती, नया अवसर, नया अनुभव।
जब बीते सालों का अवलोकन करता हूँ, तो पाता हूँ कि हर नए साल की शुरुआत - एक मील के पत्थर के सामान होता है - जब बीते साल और साथ में कई बार पूरे अतीत के बारे में सोच कर, मन में अपने भूले-बिसरे क्षणों के साथ-साथ उनसे जुड़े कई सारे यादों के विचार आते हैं।
बचपन में दीवार पर कैलेंडर टंगे होते थे, और हर महीने के पेज को बदलते हुए, साल के अंत में कैलेंडर को ही बदल दिया जाता था। अब समय का दौर बदल गया, और अब बदलाव के तरीके भी बदल गए - अब तो कैलेंडर होता ही नहीं है, बल्कि उसके जगह सब कुछ डिजिटल हो गया है। जीवन का एक झंझट तो कम हो गया है, पर साथ ही साथ, हमारे समक्ष सदैव कुछ नयी चुनौतियाँ, अपने नए रूप में आ जाते हैं। जीवन की ऐसी ही उलझनें, हमें अपने जमीन, अपने वजूद और अपने वास्तविकता से जोड़े रखते हैं। कल्पना और यथार्थ के बीच, प्रयास के तार जुड़े हुए हैं, और उपलब्धियाँ, उनका प्रतिफल है।
कई बार वांछित फल न पाकर मन बहुत दुखी हो जाता है या जीवन में कुछ कटुता सी आ जाती हैं। मैंने कहीं पढ़ा या किसी से सुना था -"Life is unfair" - इस वाक्य को दो रूप से समझना चाहिए - Life is unfair अथवा Life is not fair? दोनों में अंतर है, काफी अंतर है। और, अगर इस कथन में, समय के दौर और अंतराल को भी जोड़ दिया जाए, तो सर्वथा ज्यादा स्पष्टता आ जाएगी। पहला का अभिप्राय है कि जीवन छली है, तो दूसरा का अर्थ यह निकलता है कि जीवन यथोचित नहीं करता। मेरा मानना है की प्रतिबिम्ब को देख कर आकृति का अनुमान लगाना गलत है। जीवन हमेशा सबके मूल तत्व सा है, इसके बिना हमारा कोई अस्तित्व ही नहीं है - तो फिर यह कभी भी किसी के लिए अन्यायी नहीं हो सकता है। समय के दौर में अच्छे और बुरे परिणाम का न्याय सा हो जाता है और समय आने पर ही पता चलता है कि अनेकों अथक प्रयास के बाद भी जिस वांछित फल की मनोकामना की गयी थी, उसके नहीं मिलने का अंततः परिणाम स्वरुप क्या हुआ? कई बार असफलता के जड़ से ही भविष्य के सफलता के वृक्ष का सृजन होता है!
जीवन सबों के लिए एकसमान नहीं होता - एक जैसे प्रयास के फलस्वरूप, कभी किसी को अधिकतम तो किसी को न्यूनतम देता है। पर साथ ही अनुभव कहता है कि समय के लम्बे दौर में कई बार जीवन के खोये -पाये का योग सब कुछ बराबर कर देता है। और निष्ठापूर्वक किये प्रयास के बाद जो हासिल होता है, उसे जब दूसरों के साथ तुलना कर के देखते हैं, तब ही अच्छे और खराब का बोध होता है। इसलिए जीवन में काफी कटु अनुभवों, और उनसे उपजे मानसिक क्लेश के बाद, मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि जीवन को अपने दृष्टिकोण से ही देखना चाहिए,न कि तुलनात्मक रूप से।
सर्वप्रथम, यह समझ में आया कि जीवन को जितना सरल बनाया जाए, और अपने प्रयास को सिर्फ यथोचित प्राप्ति के लिए ही सीमित किया जाए, तो काफी कुछ यूँ ही सरल हो जाते हैं। अपने अतीत का पुनरावलोकन करने से, इस बात का भी बोध हुआ कि कई सारे वांछित फल सरलता पूर्वक मिल गए, तो कई के लिए अथक प्रयास करनी पड़ी। और, कई ऐसे भी हैं, जिसके पास तक भी नहीं पहुँच पाया- पर प्रयास जारी है। परन्तु अपने जीवन में अनेक सारे अपूरित वांछित फलों में से - कई ऐसे हैं जो एक समय बहुत ही आवश्यक से लगते थे या जिनकी बहुत चाहत सी थी - परन्तु, अचानक समय के दौर में वे सूक्ष्म से सूक्ष्मतर और कई तो दृष्टिगोचर होते चले गए। अर्थात, प्रबल इच्छा होना - उसके आवश्यक होने का द्योतक कतई नहीं है!
मुझे यह बात समझाने वाला कोई नहीं था कि - जीवन के सुख और सर्वांगीण प्रसन्नता के लिए किन उपलब्धियों की और कब किन सुविधाओं की आवश्यकता है? इस बात को काफी देर से समझ पाया कि जीवन की असली खुशी उसके अपने ही रूप में है। स्वतः रूप से जीवन की आवश्यकताओं को अपने प्रयास से प्राप्त कर के प्रसन्न रहना - एक कला है, जिसकी प्रशिक्षण दी जानी चाहिए - इस से जीवन के हर पहलू के साथ बराबर का न्याय हो पता है, न कि एक संकीर्ण अंधाधुंध दौड़!
हर कथित उपलब्धियों के लिए प्रयासरत हो जाने के अंधाधुंध दौड़ में कई मानसिक दुःख और क्लेश को अनुभव करने के बाद यह समझ पाया कि - मैंने कभी स्वावलोकन किया ही नहीं था कि - "आखिर, मुझे क्या चाहिए था?" प्रयास की अपनी प्रतिबंधतायें हैं - और सब कुछ हासिल नहीं किया जा सकता - और गौर से देखने और समझने पर, यह भी समझ में आया कि शायद उनकी आवश्यकता भी नहीं हैं।
आज कई सालों बाद, साल के अंतिम दिन, कुछ एकांत के क्षण मिले हैं। मैंने सोचा कि अपने मन के उदगार को व्यक्त कर दूँ। जीवन अपने पूरी मस्ती में है - खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ काफी संतुष्ट सा हूँ। गुजरे साल भी बहुत अच्छे और समृद्ध अनुभवों को अपने दामन में सिमटे से हैं, और आने वाले नये साल से भी ऐसी ही उम्मीद है कि संतोषप्रद रहेगा। अच्छा और ख़राब, तो मन के भाव ही हैं- अस्तित्व का उल्लास मानना चाहिए!
इन्हीं शब्दों के साथ, सबों को नूतन वर्ष २०१६ के अनेकानेक शुभकामनाये!
जब बीते सालों का अवलोकन करता हूँ, तो पाता हूँ कि हर नए साल की शुरुआत - एक मील के पत्थर के सामान होता है - जब बीते साल और साथ में कई बार पूरे अतीत के बारे में सोच कर, मन में अपने भूले-बिसरे क्षणों के साथ-साथ उनसे जुड़े कई सारे यादों के विचार आते हैं।
बचपन में दीवार पर कैलेंडर टंगे होते थे, और हर महीने के पेज को बदलते हुए, साल के अंत में कैलेंडर को ही बदल दिया जाता था। अब समय का दौर बदल गया, और अब बदलाव के तरीके भी बदल गए - अब तो कैलेंडर होता ही नहीं है, बल्कि उसके जगह सब कुछ डिजिटल हो गया है। जीवन का एक झंझट तो कम हो गया है, पर साथ ही साथ, हमारे समक्ष सदैव कुछ नयी चुनौतियाँ, अपने नए रूप में आ जाते हैं। जीवन की ऐसी ही उलझनें, हमें अपने जमीन, अपने वजूद और अपने वास्तविकता से जोड़े रखते हैं। कल्पना और यथार्थ के बीच, प्रयास के तार जुड़े हुए हैं, और उपलब्धियाँ, उनका प्रतिफल है।
कई बार वांछित फल न पाकर मन बहुत दुखी हो जाता है या जीवन में कुछ कटुता सी आ जाती हैं। मैंने कहीं पढ़ा या किसी से सुना था -"Life is unfair" - इस वाक्य को दो रूप से समझना चाहिए - Life is unfair अथवा Life is not fair? दोनों में अंतर है, काफी अंतर है। और, अगर इस कथन में, समय के दौर और अंतराल को भी जोड़ दिया जाए, तो सर्वथा ज्यादा स्पष्टता आ जाएगी। पहला का अभिप्राय है कि जीवन छली है, तो दूसरा का अर्थ यह निकलता है कि जीवन यथोचित नहीं करता। मेरा मानना है की प्रतिबिम्ब को देख कर आकृति का अनुमान लगाना गलत है। जीवन हमेशा सबके मूल तत्व सा है, इसके बिना हमारा कोई अस्तित्व ही नहीं है - तो फिर यह कभी भी किसी के लिए अन्यायी नहीं हो सकता है। समय के दौर में अच्छे और बुरे परिणाम का न्याय सा हो जाता है और समय आने पर ही पता चलता है कि अनेकों अथक प्रयास के बाद भी जिस वांछित फल की मनोकामना की गयी थी, उसके नहीं मिलने का अंततः परिणाम स्वरुप क्या हुआ? कई बार असफलता के जड़ से ही भविष्य के सफलता के वृक्ष का सृजन होता है!
जीवन सबों के लिए एकसमान नहीं होता - एक जैसे प्रयास के फलस्वरूप, कभी किसी को अधिकतम तो किसी को न्यूनतम देता है। पर साथ ही अनुभव कहता है कि समय के लम्बे दौर में कई बार जीवन के खोये -पाये का योग सब कुछ बराबर कर देता है। और निष्ठापूर्वक किये प्रयास के बाद जो हासिल होता है, उसे जब दूसरों के साथ तुलना कर के देखते हैं, तब ही अच्छे और खराब का बोध होता है। इसलिए जीवन में काफी कटु अनुभवों, और उनसे उपजे मानसिक क्लेश के बाद, मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि जीवन को अपने दृष्टिकोण से ही देखना चाहिए,न कि तुलनात्मक रूप से।
सर्वप्रथम, यह समझ में आया कि जीवन को जितना सरल बनाया जाए, और अपने प्रयास को सिर्फ यथोचित प्राप्ति के लिए ही सीमित किया जाए, तो काफी कुछ यूँ ही सरल हो जाते हैं। अपने अतीत का पुनरावलोकन करने से, इस बात का भी बोध हुआ कि कई सारे वांछित फल सरलता पूर्वक मिल गए, तो कई के लिए अथक प्रयास करनी पड़ी। और, कई ऐसे भी हैं, जिसके पास तक भी नहीं पहुँच पाया- पर प्रयास जारी है। परन्तु अपने जीवन में अनेक सारे अपूरित वांछित फलों में से - कई ऐसे हैं जो एक समय बहुत ही आवश्यक से लगते थे या जिनकी बहुत चाहत सी थी - परन्तु, अचानक समय के दौर में वे सूक्ष्म से सूक्ष्मतर और कई तो दृष्टिगोचर होते चले गए। अर्थात, प्रबल इच्छा होना - उसके आवश्यक होने का द्योतक कतई नहीं है!
मुझे यह बात समझाने वाला कोई नहीं था कि - जीवन के सुख और सर्वांगीण प्रसन्नता के लिए किन उपलब्धियों की और कब किन सुविधाओं की आवश्यकता है? इस बात को काफी देर से समझ पाया कि जीवन की असली खुशी उसके अपने ही रूप में है। स्वतः रूप से जीवन की आवश्यकताओं को अपने प्रयास से प्राप्त कर के प्रसन्न रहना - एक कला है, जिसकी प्रशिक्षण दी जानी चाहिए - इस से जीवन के हर पहलू के साथ बराबर का न्याय हो पता है, न कि एक संकीर्ण अंधाधुंध दौड़!
हर कथित उपलब्धियों के लिए प्रयासरत हो जाने के अंधाधुंध दौड़ में कई मानसिक दुःख और क्लेश को अनुभव करने के बाद यह समझ पाया कि - मैंने कभी स्वावलोकन किया ही नहीं था कि - "आखिर, मुझे क्या चाहिए था?" प्रयास की अपनी प्रतिबंधतायें हैं - और सब कुछ हासिल नहीं किया जा सकता - और गौर से देखने और समझने पर, यह भी समझ में आया कि शायद उनकी आवश्यकता भी नहीं हैं।
आज कई सालों बाद, साल के अंतिम दिन, कुछ एकांत के क्षण मिले हैं। मैंने सोचा कि अपने मन के उदगार को व्यक्त कर दूँ। जीवन अपने पूरी मस्ती में है - खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ काफी संतुष्ट सा हूँ। गुजरे साल भी बहुत अच्छे और समृद्ध अनुभवों को अपने दामन में सिमटे से हैं, और आने वाले नये साल से भी ऐसी ही उम्मीद है कि संतोषप्रद रहेगा। अच्छा और ख़राब, तो मन के भाव ही हैं- अस्तित्व का उल्लास मानना चाहिए!
इन्हीं शब्दों के साथ, सबों को नूतन वर्ष २०१६ के अनेकानेक शुभकामनाये!




