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Feb 18, 2016
Jan 7, 2016
क्रिकेट के झरोखे से बचपन
बचपन और क्रिकेट का साथ रेल के दो पटरियों की तरह हैं - बिलकुल साथ -साथ चलते आये हैं। क्रिकेट की यादें मेरे बचपन के परछाई की तरह हैं - बिलकुल एक दूसरे से जुड़े हुए से हैं। क्रिकेट का जीवन में ऐसा प्रभाव पड़ा है कि सारे जीवन का सारांश क्रिकेट में ही मिल जाता है। जीवन के इतने वसंत को देख लेने के बाद, अब जब इस खेल के बारे में सोचता हूँ, तो मन में एक प्रश्न उठता है कि वास्तव में क्रिकेट एक मानसिक खेल है या शारीरिक? इस खेल में इतने तरह के विविधतायें हैं कि कोई एक मैच किसी दूसरे के जैसा नहीं हो सकता है, क्योंकि किसी भी क्षण खेल का सारा रुख बदल सकता है - जीवन का भी बस यही हाल होता है।
बचपन से क्रिकेट देखते हुए बड़ा हुआ हूँ और इसका परिणाम यह है कि जीवन के किसी भी परिस्थिति को क्रिकेट के लहजे में सोचने लगता हूँ। क्रिकेट में कभी भी कुछ भी हो सकता है, और जीवन में भी लगभग ऐसा ही होता है।
बचपन से क्रिकेट देखते हुए बड़ा हुआ हूँ और इसका परिणाम यह है कि जीवन के किसी भी परिस्थिति को क्रिकेट के लहजे में सोचने लगता हूँ। क्रिकेट में कभी भी कुछ भी हो सकता है, और जीवन में भी लगभग ऐसा ही होता है।
गौर से देखने पर जीवन की शुरुआत एक टॉस सा है, कभी हम क्षेत्ररक्षण के रूप में खुद को बिखेर देते हैं तो कभी ज़िंदगी के पिच पर बैटिंग करते हुए अनेकों सारे समस्याओं के गेंद को झेलते रहते हैं। लाज़मी है कि कभी गेंद के रूप में कोई परिस्थिति पर हम हावी होकर सफलता का छक्का लगा देते हैं तो कभी मात खा कर अपना विकेट गँवा देते हैं। और फिर एक दिन, ज़िंदगी की इन्निंग्स ख़त्म हो जाता है,पर दुनिया एक स्टेडियम सा है, खिलाड़ी आते जाते रहते से हैं पर लोग बैठे रहते हैं अगले खिलाडी के खेल को देखने के लिए - the show must go on !
खिलाडियों को याद करूँ, तो सबसे पुराने कप्तानों में से - अजीत वाडेकर की हल्की सी यादें अब भी कही दिमाग के किसी कोने में है। उन दिनों - शायद १९७४ के आसपास, जब साप्ताहिक पत्रिका - "धर्मयुग" में, उनके अचानक से कप्तानी को छोड़ने और फिर क्रिकेट से हठात संन्यास लेने की खबर छपी थी, तो हमारे घर में काफी मायूसी सा छा गया था - शायद अजीत उन दिनों के चहेते खिलाड़ी थे, और उनके साथ कुछ अन्याय सा हुआ था।
खिलाडियों को याद करूँ, तो सबसे पुराने कप्तानों में से - अजीत वाडेकर की हल्की सी यादें अब भी कही दिमाग के किसी कोने में है। उन दिनों - शायद १९७४ के आसपास, जब साप्ताहिक पत्रिका - "धर्मयुग" में, उनके अचानक से कप्तानी को छोड़ने और फिर क्रिकेट से हठात संन्यास लेने की खबर छपी थी, तो हमारे घर में काफी मायूसी सा छा गया था - शायद अजीत उन दिनों के चहेते खिलाड़ी थे, और उनके साथ कुछ अन्याय सा हुआ था।
उसके बाद के सभी कप्तान - वेंकटराघवन, बेदी और हाल के बाकी सबों की यादें बिलकुल ताजी सी हैं। पुराने गेंदबाजों में - मदनलाल, करसन घावरी, भागवत चंद्रशेखर, इरापल्ली प्रसन्ना, बिशन सिंह बेदी, और भी कई नाम याद आते हैं। उनके फेंके गेंदों को, विकेट के पीछे पकड़ने के काम में व्यस्त, फारुख इंजीनियर और बाद में किरमानी के जिम्मेदारी सम्हालने की यादें अब भी ताज़ा हैं।
गावस्कर के प्रति लोगों के श्रद्धा का एक कारण - खिलाड़ी के तौर पर, उनकी अपनी व्यक्तिगत प्रतिभा तो थी ही। पर उस से भी कहीं ज्यादा- उन दिनों के भारतीय टीम की व्यथा भी जिम्मेदार सी थी, जिस कारण वे टीम के प्राणरक्षक से थे। उन दिनों, भारत के किसी भी पारी की शुरुआत कुछ ऐसा होता था कि हम ईश्वर से मनाते थे कि - "प्रभु अब इस संकट से मुक्ति दिलाओ और किसी तरह से मैच ड्रा हो जाए।" वैसे टॉस के हारने के साथ ही, भारत के मैच हारने का पूरा जुगाड़ तो लग ही चुका होता था।
जैसे ही बैटिंग शुरू होती, भारतीय टीम के लगभग पर्यावाची से बने, गावस्कर का साथ - अंशुमन गायकवाड़ - और बाद के सालों में - चेतन चौहान देते थे। भारत के ये सभी शुरुआत के बल्लेबाज, बहुत जल्दी में होते थे। इसलिए अपना मैदान में रस्म पूरा करने ने बाद किसी - "बाहर जाती गेंद के साथ छेड़-छाड़" करने जैसा कुछ कार्यक्रम कर देते थे। और इसके बाद - "आया राम, गया राम" की तर्ज़ पर, एक-एक कर सभी पैवेलियन चल जाते थे। जल्द ही, टीम के आल आउट होने के संकट से बचाने का सारा भार, भारतीय क्रिकेट के एक unsung hero- गुंडप्पा विश्वनाथ के कंधे पर आ जाता।
भारतीय टीम के कर्णधार - सुनील मनोहर गावस्कर
बल्लेबाज के नाम आते ही, बस सिर्फ एक नाम याद आता है, जो बचपन से लगभग होश सम्हालने के उम्र तक, भारत के हार और ड्रा के बीच - भारतीय टीम के रीढ़ की हड्डी की तरह होता था। वो नाम था - सुनील मनोहर गावस्कर! शायद अब यह नाम लोगों के यादों में जरा धुंधला गया हो, पर मैं आपको बता दूँ - मेरे बचपन में यह नाम, एक भगवान की तरह से ही था। हर मैच के दौरान, इनके नाम का जाप सा होता था। अब कोई यकीन करे न करे, पर मैंने बचपन में देखा है कि लोग किस तरह से गावस्कर के शतक के इंतज़ार में, काम काज को छोड़ कर, बेसब्री से अपने खुशी को इज़हार करने के लिए, बेताब से बैठे होते थे!गावस्कर के प्रति लोगों के श्रद्धा का एक कारण - खिलाड़ी के तौर पर, उनकी अपनी व्यक्तिगत प्रतिभा तो थी ही। पर उस से भी कहीं ज्यादा- उन दिनों के भारतीय टीम की व्यथा भी जिम्मेदार सी थी, जिस कारण वे टीम के प्राणरक्षक से थे। उन दिनों, भारत के किसी भी पारी की शुरुआत कुछ ऐसा होता था कि हम ईश्वर से मनाते थे कि - "प्रभु अब इस संकट से मुक्ति दिलाओ और किसी तरह से मैच ड्रा हो जाए।" वैसे टॉस के हारने के साथ ही, भारत के मैच हारने का पूरा जुगाड़ तो लग ही चुका होता था।
जैसे ही बैटिंग शुरू होती, भारतीय टीम के लगभग पर्यावाची से बने, गावस्कर का साथ - अंशुमन गायकवाड़ - और बाद के सालों में - चेतन चौहान देते थे। भारत के ये सभी शुरुआत के बल्लेबाज, बहुत जल्दी में होते थे। इसलिए अपना मैदान में रस्म पूरा करने ने बाद किसी - "बाहर जाती गेंद के साथ छेड़-छाड़" करने जैसा कुछ कार्यक्रम कर देते थे। और इसके बाद - "आया राम, गया राम" की तर्ज़ पर, एक-एक कर सभी पैवेलियन चल जाते थे। जल्द ही, टीम के आल आउट होने के संकट से बचाने का सारा भार, भारतीय क्रिकेट के एक unsung hero- गुंडप्पा विश्वनाथ के कंधे पर आ जाता।
अगर विश्वनाथ कामयाब हुए, तो कुछ समय के लिए भारत की हार टल जाती, वरना जल्द ही - "क्रिकेट की जीत" हो जाती थी। गावस्कर के साथ, विश्वनाथ का नाम नहीं लेना बहुत अनुचित होगा। अनगिनत मैच में, भारत को हार के संकट से निकालने में, या उसे देर तक टाल कर टीम के आत्मसम्मान को बचाने में - विश्वानाथ का बहुत बड़ा योगदान होता था।
शायद आज की पीढ़ी इनको बिलकुल भूल गए होंगे, पर मुझे विश्वनाथ के प्रति लोगों की श्रद्धा-भाव आज भी याद है !
Dec 13, 2015
तिमिर और परसाई के टॉर्च
आज अनायास ही हरिशंकर परसाई जी का कथा-संग्रह - "प्रेमचंद के फटे जूते" पढ़ने लगा।
आज आपसे एक मज़ेदार बात भी शेयर करता हूँ, मैं कभी भी उपन्यास को, सिल-सिलेबार ढंग से नहीं पढता हूँ। बल्कि मैं, रैंडम-आर्डर में, कही से भी पढ़ने लगता हूँ- "राग-दरबारी" को पिछले १० सालों से पढ़ ही रहा हूँ- और लगता है कि आगे भी पढता ही रहूँगा!
उसी क्रम में, आज परसाई के इस पुस्तक के एक कथा - "टॉर्च बेचने वाला" को पढ़ा। उसके पढ़ते ही, कथा के पात्र, उनके चित्रण और दिए सन्देश - सभी के मनन करने का दिल करने लगा। फिर क्या था, इस पुस्तक को छोड़, मैं खूब सोचने लगा। हर दिशा से, मानस पटल पर, उमड़-घुमड़ कर बादलों की तरह, अनेको तरह के विचार के बरसात से होने लगे।
परसाई के इस कथा - "टॉर्च बेचनेवाला" में, दो मित्र- विपन्नता से ग्रसित हैं। दोनों अपने जीविकोपार्जन के लिए, किसी भी तरह के "धंधा" करके के सोचते हैं। "3 Idiots" - की तरह, पांच साल बाद, दोनों वापस मिल कर, अपने अपने चुने रास्ते का स्वावलोकन और सफलता का आंकलन करने की सोचते हैं। कहानी में जैसा विदित है, वे पुनः मिलते हैं। संयोगवश, दोनों "अंधकार और प्रकाश" के ही धंधे में होते हैं। लोगो को "अन्धकार" से डराने, और फिर उसके निदान के रूप में - प्रकाश - का सौदा।
जहाँ एक मित्र, लोगो को सामान्य जीवन में अन्धकार के नुक्सान और उससे बचने के लिए उजाले देने वाले टॉर्च के फायदे बता कर, "सूरज छाप" टॉर्च बेचता है। तो वही दूसरा मित्र, मनुष्य के जीवन की सूक्ष्मता और फिर आत्मा के अन्धकार में होने के बारे में उन्हें अवगत कराता है। निदान स्वरुप, लोगों को - "साधना -मंदिर" में आने का हल बताता है। यहाँ, वह भी सबों को प्रकाश की ओर ले जाने में मदद करने वाले, "अदृश्य-टॉर्च" को ही बेच कर, "सनातन" व्यवसायी के रूप में, सफल होकर एक फलता-फूलता व्यवसाय को चला रहा है ।
परसाई जी के लेखनी का कमाल है, कि पाठक को यह समझने में देर नहीं लगता कि दोनों के वक्तव्यों में बहुत समानतायें हैं। पर - सन्दर्भ और परिपेक्ष्य के अंतर ने - उन्ही वक्तव्यों के गूढ़ता और गहराई में, मीलों का फासला ला दिया हैं। फलस्वरूप, जहाँ पहले को टॉर्च बेचकर लोगों से पैसे की मांग करनी पड़ती है, वहीं दूसरी ओर - उसके मित्र के द्वारा, जीवन के परिपेक्ष्य में दिए वैसे ही वक्तव्यों पर - बड़ी संख्या में श्रद्धालु समर्पण के भाव से, नत-मस्तक होकर - स्वतः धन को उन्मुक्त भाव से "अर्पित" कर रहे होते हैं। कहना नहीं होगा कि "बाबा" बन चुके मित्र का "धंधा" फल-फूल रहा है। कहानी, समाज में व्याप्त धर्मांधों और धर्म-गुरुओं के ढकोसले पर सटीक कटाक्ष है।
कथा पढ़ते समय, मेरे मन में एक और विचार आया - अन्धकार क्या है? वस्तुतः अन्धकार कुछ होता नहीं है, अपितु, प्रकाश का अभाव ही अन्धकार है। प्रकाश के अभाव में बने, अंधकार को ही दूर करने के लिए - प्रकाश के पूरक के रूप में, टॉर्च की आवश्यकता होती है।
मुझे स्मरण हुआ कि कुछ साल पहले, मैं अपने घर में, एक मीडिया रूम बना रहा था। उस क्रम में, प्रोजेक्टर लगाते समय अनुभव किया कि - परदे पर पड़ रहे सिनेमा के सजीवता को, और प्रखर बनाने के लिए, मुझे - ब्लैक के लेवेल - को, और बढ़ाने की आवश्यकता थी। ब्लैक के लेवल बढाने का अर्थ था कि अन्धकार को और बढ़ाना! प्रोजेक्टर से अन्धकार को नहीं लाया जा सकता था। बल्कि अन्धकार को बढ़ाने के लिए, कमरे के इर्द-गिर्द के रोशनी को ही बंद करना पड़ा था।
जीवन में भी, जब हम प्रकाश के सभी स्त्रोत को बंद करते जाते हैं तो - प्रकाश के कमी से - अंधकार बढ़ता जाता है। फिर, हमें भय सा होने लगता है - या फिर, कोई बाहर से भय को और उजागर करने के लिए - टॉर्च जैसे अस्थायी और सीमित ज्योति -पुंज से हमारा परिचय करा देता है, जिस पर हम आश्रित से होने लगते हैं - क्योकि अन्धकार से हमें अब भय होने लगता है।अंततः, जब तक हम अपने अन्तः ज्योति को जागृत न करें - जीवन अन्धकारमय ही रह जाता है - टॉर्च जैसे प्रकाश के स्त्रोत से आगे, हमें किसी स्थाई प्रकाश के ओर अग्रसारित होने की प्रबल इच्छा होने लगता है।
करना तो हमें स्वयं ही होता है, पर विकल्पों के तलाश में हम बाहर की ओर झांकते फिरते हैं - कबीर के दोहे में व्यक्त कस्तूरी मृग की भाँति -
आज आपसे एक मज़ेदार बात भी शेयर करता हूँ, मैं कभी भी उपन्यास को, सिल-सिलेबार ढंग से नहीं पढता हूँ। बल्कि मैं, रैंडम-आर्डर में, कही से भी पढ़ने लगता हूँ- "राग-दरबारी" को पिछले १० सालों से पढ़ ही रहा हूँ- और लगता है कि आगे भी पढता ही रहूँगा!
उसी क्रम में, आज परसाई के इस पुस्तक के एक कथा - "टॉर्च बेचने वाला" को पढ़ा। उसके पढ़ते ही, कथा के पात्र, उनके चित्रण और दिए सन्देश - सभी के मनन करने का दिल करने लगा। फिर क्या था, इस पुस्तक को छोड़, मैं खूब सोचने लगा। हर दिशा से, मानस पटल पर, उमड़-घुमड़ कर बादलों की तरह, अनेको तरह के विचार के बरसात से होने लगे।
इस कहानी में - मानव धर्म और समाज में व्याप्त धारणाओं का - बड़ा ही सटीक चित्रण किया गया है। एक जैसे विचारों का, सिर्फ माध्यम और उपयोगिता का परिपेक्ष्य बदल दिया जाए, तो उस विचार और "विचारक" के प्रति समाज की अवधारणा को, बदलते देर नहीं लगता। कई मिलते जुलते विचार, मन में आने लगे।
तुरंत, पीटर सेलर्स अभिनीत - "Being There" - का स्मरण हो गया। इस सिनेमा मे बहुत ही रोचक ढंग से, सांसारिकता से अनभिज्ञ - एक गार्डनर यानी माली का चित्रण है, जो पूरी जिंदगी, कभी भी अपने घर के बाहर कदम तक नहीं रखा होता है। अपने पूरे जीवन-काल में उसे, सिर्फ और सिर्फ पेड़-पौधे और बागवानी का ही जानकारी हो पाता है। पर, अब बदले माहौल में, उसे उस चहारदीवारी से बाहर निकलना पड़ता है। अब वह संसार के दुसरे हिस्से में भी - जहाँ पहले कभी नहीं गया होता है - वहां भी जाता है।
घर से बाहर निकलते ही, उस गार्डनर को, अनेकों ऐसे प्रश्नो का सामना करना पड़ता है, जिनके बारे में उसे कोई अनुभव ही नहीं होता है। परन्तु पूरी तरह से अनभिज्ञ होकर भी, वह अपने मौलिक - बागवानी - के अनुभव और ज्ञान पर आधारित, उत्तर देता रहता है। जैसा सिनेमा में चित्रण है, प्रश्नकर्ता और बाकी लोग ये पाते हैं कि - गार्डनर का दिया हर एक बागवानी से जुड़ा मौलिक सा उत्तर - उन सभी समस्या, माहौल या प्रश्न के लिए, बिलकुल सटीक बैठता है। इस फिल्म को देखते समय, बार-बार इस बात का स्मरण होता है कि - महात्मा बनते नही हैं, बल्कि स्वतः बन जाते हैं - या बना दिए जाते हैं ।
प्रसिद्द हिंदी फिल्म - गाइड - में भी कुछ ऐसा ही चित्रण है। जब राजू-गाइड के आडंबर और वेश भूषा को देख कर, अकाल-पीड़ित गाँव के भूखे और मरणासन्न निवासी - उसमे ही आखरी उम्मीद के किरण के रूप में, ईश्वर का प्रभाव देखने लगते हैं। विवशता-वश, सारे गाँव वाले उनके चरणो में लेट कर, उससे ही बारिश करवाने के लिए, ईश्वर की प्रार्थना और उपवास करने की मांग कर बैठते हैं।
तुरंत, पीटर सेलर्स अभिनीत - "Being There" - का स्मरण हो गया। इस सिनेमा मे बहुत ही रोचक ढंग से, सांसारिकता से अनभिज्ञ - एक गार्डनर यानी माली का चित्रण है, जो पूरी जिंदगी, कभी भी अपने घर के बाहर कदम तक नहीं रखा होता है। अपने पूरे जीवन-काल में उसे, सिर्फ और सिर्फ पेड़-पौधे और बागवानी का ही जानकारी हो पाता है। पर, अब बदले माहौल में, उसे उस चहारदीवारी से बाहर निकलना पड़ता है। अब वह संसार के दुसरे हिस्से में भी - जहाँ पहले कभी नहीं गया होता है - वहां भी जाता है।
घर से बाहर निकलते ही, उस गार्डनर को, अनेकों ऐसे प्रश्नो का सामना करना पड़ता है, जिनके बारे में उसे कोई अनुभव ही नहीं होता है। परन्तु पूरी तरह से अनभिज्ञ होकर भी, वह अपने मौलिक - बागवानी - के अनुभव और ज्ञान पर आधारित, उत्तर देता रहता है। जैसा सिनेमा में चित्रण है, प्रश्नकर्ता और बाकी लोग ये पाते हैं कि - गार्डनर का दिया हर एक बागवानी से जुड़ा मौलिक सा उत्तर - उन सभी समस्या, माहौल या प्रश्न के लिए, बिलकुल सटीक बैठता है। इस फिल्म को देखते समय, बार-बार इस बात का स्मरण होता है कि - महात्मा बनते नही हैं, बल्कि स्वतः बन जाते हैं - या बना दिए जाते हैं ।
प्रसिद्द हिंदी फिल्म - गाइड - में भी कुछ ऐसा ही चित्रण है। जब राजू-गाइड के आडंबर और वेश भूषा को देख कर, अकाल-पीड़ित गाँव के भूखे और मरणासन्न निवासी - उसमे ही आखरी उम्मीद के किरण के रूप में, ईश्वर का प्रभाव देखने लगते हैं। विवशता-वश, सारे गाँव वाले उनके चरणो में लेट कर, उससे ही बारिश करवाने के लिए, ईश्वर की प्रार्थना और उपवास करने की मांग कर बैठते हैं।
आस्था का जन्म - विवशता के शव से हो के गुजरती है। और यह प्रक्रिया अति संक्रामक होता है - विश्वास - आस्था का ही जुड़वा होता है, एक का अनुभव, दुसरे के लिए विश्वसनीयता और तत्पश्चात आस्था का स्त्रोत - और फिर, लोग स्वयं ही प्रश्न करते हैं, और किसी - महापुरुष - के वाणी में, स्वतः ही उत्तर भी ढूंढ लेते हैं।
परसाई के इस कथा - "टॉर्च बेचनेवाला" में, दो मित्र- विपन्नता से ग्रसित हैं। दोनों अपने जीविकोपार्जन के लिए, किसी भी तरह के "धंधा" करके के सोचते हैं। "3 Idiots" - की तरह, पांच साल बाद, दोनों वापस मिल कर, अपने अपने चुने रास्ते का स्वावलोकन और सफलता का आंकलन करने की सोचते हैं। कहानी में जैसा विदित है, वे पुनः मिलते हैं। संयोगवश, दोनों "अंधकार और प्रकाश" के ही धंधे में होते हैं। लोगो को "अन्धकार" से डराने, और फिर उसके निदान के रूप में - प्रकाश - का सौदा।
जहाँ एक मित्र, लोगो को सामान्य जीवन में अन्धकार के नुक्सान और उससे बचने के लिए उजाले देने वाले टॉर्च के फायदे बता कर, "सूरज छाप" टॉर्च बेचता है। तो वही दूसरा मित्र, मनुष्य के जीवन की सूक्ष्मता और फिर आत्मा के अन्धकार में होने के बारे में उन्हें अवगत कराता है। निदान स्वरुप, लोगों को - "साधना -मंदिर" में आने का हल बताता है। यहाँ, वह भी सबों को प्रकाश की ओर ले जाने में मदद करने वाले, "अदृश्य-टॉर्च" को ही बेच कर, "सनातन" व्यवसायी के रूप में, सफल होकर एक फलता-फूलता व्यवसाय को चला रहा है ।
परसाई जी के लेखनी का कमाल है, कि पाठक को यह समझने में देर नहीं लगता कि दोनों के वक्तव्यों में बहुत समानतायें हैं। पर - सन्दर्भ और परिपेक्ष्य के अंतर ने - उन्ही वक्तव्यों के गूढ़ता और गहराई में, मीलों का फासला ला दिया हैं। फलस्वरूप, जहाँ पहले को टॉर्च बेचकर लोगों से पैसे की मांग करनी पड़ती है, वहीं दूसरी ओर - उसके मित्र के द्वारा, जीवन के परिपेक्ष्य में दिए वैसे ही वक्तव्यों पर - बड़ी संख्या में श्रद्धालु समर्पण के भाव से, नत-मस्तक होकर - स्वतः धन को उन्मुक्त भाव से "अर्पित" कर रहे होते हैं। कहना नहीं होगा कि "बाबा" बन चुके मित्र का "धंधा" फल-फूल रहा है। कहानी, समाज में व्याप्त धर्मांधों और धर्म-गुरुओं के ढकोसले पर सटीक कटाक्ष है।
कथा पढ़ते समय, मेरे मन में एक और विचार आया - अन्धकार क्या है? वस्तुतः अन्धकार कुछ होता नहीं है, अपितु, प्रकाश का अभाव ही अन्धकार है। प्रकाश के अभाव में बने, अंधकार को ही दूर करने के लिए - प्रकाश के पूरक के रूप में, टॉर्च की आवश्यकता होती है।
मुझे स्मरण हुआ कि कुछ साल पहले, मैं अपने घर में, एक मीडिया रूम बना रहा था। उस क्रम में, प्रोजेक्टर लगाते समय अनुभव किया कि - परदे पर पड़ रहे सिनेमा के सजीवता को, और प्रखर बनाने के लिए, मुझे - ब्लैक के लेवेल - को, और बढ़ाने की आवश्यकता थी। ब्लैक के लेवल बढाने का अर्थ था कि अन्धकार को और बढ़ाना! प्रोजेक्टर से अन्धकार को नहीं लाया जा सकता था। बल्कि अन्धकार को बढ़ाने के लिए, कमरे के इर्द-गिर्द के रोशनी को ही बंद करना पड़ा था।
जीवन में भी, जब हम प्रकाश के सभी स्त्रोत को बंद करते जाते हैं तो - प्रकाश के कमी से - अंधकार बढ़ता जाता है। फिर, हमें भय सा होने लगता है - या फिर, कोई बाहर से भय को और उजागर करने के लिए - टॉर्च जैसे अस्थायी और सीमित ज्योति -पुंज से हमारा परिचय करा देता है, जिस पर हम आश्रित से होने लगते हैं - क्योकि अन्धकार से हमें अब भय होने लगता है।अंततः, जब तक हम अपने अन्तः ज्योति को जागृत न करें - जीवन अन्धकारमय ही रह जाता है - टॉर्च जैसे प्रकाश के स्त्रोत से आगे, हमें किसी स्थाई प्रकाश के ओर अग्रसारित होने की प्रबल इच्छा होने लगता है।
करना तो हमें स्वयं ही होता है, पर विकल्पों के तलाश में हम बाहर की ओर झांकते फिरते हैं - कबीर के दोहे में व्यक्त कस्तूरी मृग की भाँति -
कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढत बन माहि | ज्यो घट घट राम है, दुनिया देखे नाही |जैसा कि कहीं पढ़ा या सुना था -
उम्र भर यही भूल करता रहा, धूल था चेहरे पर और आईना साफ़ करता रहा।
Dec 7, 2015
किंकर्तव्यविमूढ़
यह चित्र मुझे इंटरनेट पर मिल गया। मैं नहीं जानता कि यह चित्र कैसे, कहाँ से और किस प्रयोजन से लिया गया है - बहरहाल, मुझे यह बहुत पसंद आया, और मुझे इस पर, कुछ लिखने का मन कर गया, इस लिए, इसे यहाँ प्रस्तुत किया हूँ।

इस चित्र में, एक गधे को मझधार में पड़े एक नाव पर, बिना किसी सहारे के दिखाया गया है। गौर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि गधे को, इस बात का कोई इल्म भी नही है, कि वह किस मुसीबत में फंस चुका है! ऐसा उसका गधा होने के कारण है या स्थिति ने उसे गधा बना दिया है - गधा एक संज्ञा के रूप में लेना चाहिए या विशेषण? गधा - तो गधा होता ही है, पर क्या स्थिति भी किसी को "गधा" बना देता है?
मुझे इस गधे को देख कर, अपने देश की शिक्षा पद्धत्ति के परिणाम के तौर पर, कॉलेज से डिग्री ले कर निकले छात्रों का बोध होता है। कुछ विचार-बिंदु :
मैं बचपन में, विनोबा भावे का लिखा एक निबंध - "जीवन और शिक्षण" - पढ़ा था, जिसमे विद्यार्थी जीवन से यथार्थ के यात्रा को - "हनुमान -कूद" - की उपमा दी गयी है! ये एक विसंगति नहीं है तो क्या है कि - शिक्षण पद्धति को यथार्थ जीवन के लिए व्यवहारिक बनाने हेतु, उनके बताये सुझावों और अन्य सन्देशों का, हमारे शिक्षा-विदों पर यह असर हुआ कि - व्यवहारिकता के समावेश या ज्यादा महत्व देने वाले इस निबंध को ही पाठ्य-कर्म में डाल कर उनके विचारों की तिलांजलि दे दी गयी। हम सभी ने इस निबंध के रट्टे लगा कर, अच्छे अंक प्राप्त कर लिए, और विनोबा के ज्ञानों को रद्दी के टोकरी में डाल कर, लगभग उनका उपहास ही कर बैठे, और उस निबंध के ५० साल बाद भी समस्या यथावत है और आज भी छात्र जीवन से यथार्थ की कूद - "हनुमान -कूद" ही है! लेख की कुछ पंक्तियों बरबस याद आ जाते हैं। इतने साल के अनुभव के साथ आज वे ज्यादा तर्कसंगत लगते हैं-

मुझे इस गधे को देख कर, अपने देश की शिक्षा पद्धत्ति के परिणाम के तौर पर, कॉलेज से डिग्री ले कर निकले छात्रों का बोध होता है। कुछ विचार-बिंदु :
१. चारों तरफ पानी काफी गहरा है- इस से साबित होता है कि मामला काफी गंभीर है।
२. इस स्थिति में वह स्वयं नहीं आया है, बल्कि किसी ने लाकर छोड़ दिया है।
३. इतनी दूर तक वह हठात् नहीं आ गया है, बल्कि आने में काफी considerable समय लगा होगा।
४. यथास्थित में बने रहना कोई option नहीं है।
५. "What got you here will not take you there" - स्पष्ट रूप से यहाँ तक आने का जो भी तरीका था, अब वह इसके लिए नहीं उपलब्ध है, अतः किनारे तक वापस जाने के लिए, इसे तैरना होगा या फिर कोई और जुगत लगानी पड़ेगी।
६. यह परिस्थिति, इस गधे के लिए एक "टर्निंग पॉइंट" हो सकता है - क्योंकि इसके बाद वह काफी जागरूक रहेगा और इस तरह के स्थिति में स्वयं को कभी नही देखना चाहेगा।
मैं बचपन में, विनोबा भावे का लिखा एक निबंध - "जीवन और शिक्षण" - पढ़ा था, जिसमे विद्यार्थी जीवन से यथार्थ के यात्रा को - "हनुमान -कूद" - की उपमा दी गयी है! ये एक विसंगति नहीं है तो क्या है कि - शिक्षण पद्धति को यथार्थ जीवन के लिए व्यवहारिक बनाने हेतु, उनके बताये सुझावों और अन्य सन्देशों का, हमारे शिक्षा-विदों पर यह असर हुआ कि - व्यवहारिकता के समावेश या ज्यादा महत्व देने वाले इस निबंध को ही पाठ्य-कर्म में डाल कर उनके विचारों की तिलांजलि दे दी गयी। हम सभी ने इस निबंध के रट्टे लगा कर, अच्छे अंक प्राप्त कर लिए, और विनोबा के ज्ञानों को रद्दी के टोकरी में डाल कर, लगभग उनका उपहास ही कर बैठे, और उस निबंध के ५० साल बाद भी समस्या यथावत है और आज भी छात्र जीवन से यथार्थ की कूद - "हनुमान -कूद" ही है! लेख की कुछ पंक्तियों बरबस याद आ जाते हैं। इतने साल के अनुभव के साथ आज वे ज्यादा तर्कसंगत लगते हैं-
संम्पूर्ण गैरजिम्मेदारी से संम्पूर्ण जिम्मेदारी में कूदना तो एक हनुमान-कूद ही हुई । ऐसी हनुमान-कूद की कोशिश में हाथ-पैर टूट जाय तो क्या अचरज? - विनोबा भावे
आज भी, हमारे देश की शिक्षा-पद्धति, व्यवहारिक से इतनी दूर है, कि जब छात्र पढ़ाई पूरी कर के वास्तविक जीवन में प्रवेश करता है - तो स्कूल में पढ़ाये गए सभी ज्ञान - धरे के धरे रह जाते हैं, और हर किसी के लिए, हकीकत की दुनिया, एक बिलकुल नयी सी - जहाँ पूरी की पूरी पढाई निरर्थक, और कोई मतलब की नहीं नज़र आती है! हर कोई स्वयं को एक बिलकुल अजीबोगरीब सी स्थिति में पाता है - "किंकर्तव्यविमूढ़"!
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