Feb 23, 2016

कदमा बाजार

बचपन में स्कूल आने और जाने के दौरान, मुझे रास्ते के अगल-बगल, सड़क के किनारे होते गतिविधियों को करीब से देखने का बहुत शौक होता था। उन दिनों घर से स्कूल जाने के लिए, मुझे कदमा बाजार के आस-पास से गुज़रना पड़ता था।

उन दिनों के कदमा बाजार के माहौल को, किसी ग्रामीण हाट के परिष्कृत रूप में ही समझना चाहिए। बाज़ार के अंदर, टीन शेड वाले - स्थाई और अस्थाई के बीच झूलते से- कई सारे दुकान बिखरे पड़े थे। बाजार के अंदर, अनेको प्रकार के दूकान थे, पर बहुत कम संख्या में ही सीमेंट और ईंट के बने पक्के दुकान थे। ऐसा ज्ञात होता था कि शुरू के बने कुछ स्थाई दुकानों के इर्द गिर्द, कई सारे दूकान जुड़ते चले गए होंगे - और कुल मिला कर, बाज़ार बहुत ही घनी और भीड़ भरा, मेले के जैसा शकल ले लिया था।

रोजमर्रा की हर चीज़ों के लिए लोग कदमा बाज़ार आते थे जिनमें मिठाई से मछली, कपडे से लेकर कंसार के दूकान, गेंहू को पीसने वाले आटा-चक्की से लेकर शादी के कार्ड से किताब तक छापने वाले प्रेस, रेडियो से लेकर गाड़ी के मरम्मत करने वाले या फिर होमियोपैथी अथवा अंग्रेज़ी दवा-दारु करने वाले डाक्टर और दवा के दूकान - यानि जो कुछ भी एक घर को चलाने के लिए जरूरी हो सकता था, वे सभी कुछ उस बाजार में मिलते थे।

वैसे वहां कुछ "महंगे" दूकान से भी हुआ करते थे जो कदमा बाजार में भी साडी, कपडे या सोने के आभूषण बेचने जैसा दुस्साहस करते थे, क्योंकि ऐसे महंगे सौदे के लिए साकची अथवा बिष्टुपुर जाने का प्रचलन सा था।

कदमा बाजार से मेरा रिश्ता है, धुंधली सी हो गयी यादों में भी कदमा बाजार उभर कर आ जाता है।
  
मेरे नानाजी को बाजार जाने का व्यसन सा था और इस कारण वे शुबह या शाम एक चक्कर जरूर लगाते थे। मेरे जरा बड़ा हो जाने के बाद, मुझे उनके साथ सामान को ढोने का स्वतंत्र कार्य-भार के लिए चुना गया था। मेरे इस महत्वपूर्ण कार्य के चयन में मेरे घर पर उपद्रव करने से रोक, और शारीरिक क्षमता आदि जैसे अनेकों कारणों का समावेश सा रहा होगा।परन्तु अब लगता है कि संभवतः ऐसा इस लिए हुआ होगा क्योंकि अक्सर शाम के समय जब बच्चे एक-दूसरे के साथ खेलते या गप-शप करते, मैं घर पर अकेला बोर होता रहता था।

मेरे साथियों के बहिष्कार के अनेकों कारण का निचोड़ यह था कि - किसी भी खेल में लोगों को मेरी अधीनता स्वीकारनी पड़ती थी। मेरे पास क्रिकेट खेलने के लिए अपना बैट और बॉल होता था, जिस कारण लोग मेरे साथ खेलने मेरे पास आते थे, पर शर्त यह होता था कि जिनको मेरे साथ खेलना हो, वे अपने बैटिंग का क्रम निर्धारित कर लें, पर सबसे पहले बैटिंग मेरी ही होगी।

यहाँ तक के शर्त को मानने के लिए सब सहर्ष तैयार हो जाते थे, पर समस्या इसके बाद शुरू होती, जब मैं स्वयं को कभी आउट नहीं मानता, चाहे कोई भी नियम से मुझे आउट करने की कोशिश की जाए। एकाध बार मेरे आउट होने और मेरे नहीं मानने के कारण, धीरे-धीरे अपने बौद्धिक क्षमता के हिसाब से बच्चे खेल से गायब होने लग जाते थे। और अंत में जब चंद बचे हुए निरीह प्राणी, बड़े हसरत से अपने बैटिंग को पाने के लिए अधीर होकर जरा सा खीझने से लगते थे, तो मैं उनके इस तरह के विरोध को भी नहीं पचा पाता था। जल्द ही मैं बैट और बॉल को लेकर घर की ओर चल देता।

इस तरह के बहिष्कार करने के बाद, एकाध लोग दबे स्वर में विरोध प्रकट करते थे, पर चूँकि बैट और बॉल मेरा ही होता था, कोई मेरा कुछ भी नहीं कर पाते थे। मेरे घर के आस-पास ही खेलने के दौरान, घर के किसी अभिभावक के निगरानी होने के वजह से, ज्यादातर बच्चे कुछ बुदबुदाते हुए,  कुछ धीमे स्वर में गलियां देते और कुछ तो मुझसे कभी भी बात न करने की दुहाई देते हुए, बेबस, लाचार  और ठगे सा महसूस करते हुए अपने-अपने घर की ओर रुखसत कर जाते। 

इस तरह के एकाध बार के व्यवहार के बाद, बहुत कम ही धैर्यवान बचे थे, जो मेरे साथ खेलने की जुर्रत करने की हिम्मत जुटा पाते थे। जल्द ही मैं अकेला निराश होकर बाकी को खेलते हुए देखता, और फिर किसी बच्चे का मेरे तरफ कोई रूचि न दिखाने के कारण, मेरे अंतर्मन को बहुत ठेस सी लगती, और मैं अक्सर दुखी होकर अपने घर के सामने निराश खड़ा रहता था।

फिर कुछ दिनों तक घर के छत, अमरुद के पेड़ आदि पर चढ़ने, कूदने जैसे स्वततंत्र क्रिया-कलाप के बाद धीरे-धीरे यह महसूस करने लगा था कि - समाज परस्पर संबंधों पर आश्रित होता है, और मेरे इस तरह से लोगों के बहिष्कृत कर देने के कारण मैं बहुत दुखी एवं निराश रहने लगा था। अंततः एक दिन मेरे अंदर से स्वतः यह प्रस्फुटित हो गया कि -"नानाजी, मैं किसके साथ खेलूं?"

नानाजी को लगा कि मुझे अपने साथ कभी-कभार बाजार ले जाने से - एक पंथ दो काज होने लगा था। उन्हें भी रास्ते भर के लिए सामान उठाने के लिए मेरे जैसा एक सहायक मिल गया था। अनायास इस तरह के वैकल्पिक व्यवस्था के बन जाने से मुझे अनेको प्रकार के नए रोचक जानकारियां मिलने लगी थी। किसी अभिभावक के साथ बाजार जाने से मुझे सुरक्षित रूप से हर कोने के विचरण करने का अवसर मिलने लगा था।

बाजार के अनेको प्रकार के क्रिया-कलाप को करीब से देखने में बहुत दिलचस्पी आने लगी थी और इस तरह से जीवन के अनेको पहलुओं को करीब से देखने लगा था। साथ ही नानाजी कभी-कभार किसी मिठाई के दूकान में कुछ जलपान भी करा देते थे। ज्यादा समय मथुरा मिष्टान्न भंडार जाता था - काउंटर पर बैठे मिठाई दूकान के मालिक, नानाजी को देखते ही बड़े इज़्ज़त के साथ लगभग लाउडस्पीकर के फ्रीक्वेन्सी में -"आइये मिश्राजी, कहिये कैसे हैं?", कहता हुआ हमारे विशेष आवभगत करतने का निर्देश दे देता था।

रंकिनी मंदिर के तरफ से आने पर पहले मेरा स्कूल कदमा बॉयज़ स्कूल, फिर कदमा गर्ल्स सजूल और उसके बाद स्काउट सेंटर पड़ता था। तिकोने लाल रंग से बने उभरे डिज़ाइन वाले दीवार के ठीक बाद कदमा बाजार शुरू हो जाता था। सबसे कोने में दूध डिपो पड़ता था, जहाँ से मैं सुबह सुबह दूध के बोतल लेने आया करता था।  उसके ठीक बगल में टिन-शेड से ढंके दूकान होते थे जिनमे ज्यादातर टाइपिंग सीखाने वाले दुकान और एकाध प्रिंटिंग-प्रेस के दूकान होते थे, काफी दिनों तक इन दुकानों में जा कर प्रिंटिंग प्रेस के मशीन के बारीकियों को समझने की कोशेिश की थी। मेन रोड के तरफ एक राशन का दूकान होता था जिस पर जाने के लिए करीब ८-१० सीढ़ियों को चढ़ना पड़ता था।


इन दूकानों के कतार के दूसरे कोने में आटा चक्की हुआ करता था।

फ्लोर मिल के करीब आते-आते बरबस दो चीज़ों पर ध्यान चला जाता था। एक बहुत बड़ा सा तराजू जिसके बगल बचपन में देखी गयी सबसे बड़े बटखरे होते थे। और उस तराजू के ठीक सामने काफी मोटा सा इंसान बैठा होता था, जो उन भरी भरकम  बटखरे की तरह ही कभी-कभी ही उठ पाता था। तराजू के पीछे बैठा, मानो जीवन से पूरी तरह से निराश वाले भाव में वह बीच बीच में तराजू पर बटखरे रखता और, जैसे ही तराजू के धर्म-कांटा स्थिर होता, वह तुरंत वजन को लिखना शुरू कर देता।

वजन करने वाले की वेश-भूषा कुछ ऐसी होती थी कि मानो वह दूकान को बंद करते ही सीधा नहा सके, लुंगी के ऊपर एक गंजी, जिसमे वातानुकूलन के लिए अनेकों छोटे-बड़े छिद्रों की भरमार सी होती थी, उसे पहने वह पीसे हुए गेंहू के थैले की तरह बैठा होता था। सामने कुछ महिलाएं गोल बने "सूप" से फाटक फाटक कर गेंहू से कंकड़ और गंदगी निकालने वाले काम में - आटा चक्की के दूकान के परजीवी बन कर अपना पेट भी पाल रहे होते थे।

"गेंहू साफ़ करवा के फिर पीसने देने का विकल्प सामने दिख  ही रहा है, तो फिर बताने की क्या जरुरत है"- इस भावना के साथ तराजू में तौलने वाला मनुष्य इस तरह के विकल्प के बारे में बताने का कष्ट भी नहीं करता था, और अपने काम को पीछे चल रहे मशीन की तरह निशब्द भाव से करता रहता था। परिक्षा में पूछे किसी भी युद्ध के अनेको कारणों में से प्रमुख कारण - जिस के उल्लेख मात्र से परीक्षक को परीक्षार्थी के विषय पर सम्पूर्ण प्रभुत्व का बोध हो जाता हो, उसी तरह से इस शांत मनुष्य के निराकार भाव से तन्मयता पूर्वक काम करते हुए निशब्द होने का मुख्य कारण सर्वथा यह हो सकता था कि उसका मुंह खैनी के पीक से भरा हो, और जब तक जरुरत न पड़े वह थूकने के लिए उठने वाला व्यायाम नहीं करना चाहता हो।

सामने चल रहे गेंहू सफाई के प्रति अपने इस तरह भावना के जग जाने से लोग अपनी स्वेच्छा से गेंहू की सफाई के बाद पीसाई के काम का अनुमोदन करते हुए, वहां से बाजार के बाकी काम के लिए निकल जाते थे।
  
मिल में काम करने वाले लोग भी मशीन की तरह अपने अपने काम को करते रहते थे, मशीन के चीख-चीख कर शोर करने के बाद इंसानों के चीखने की इच्छा-शक्ति ख़त्म सी हो चुकी दिखती थी।मशीन अपना धर्म निभाते- अपने साथ काम करते इंसान बन चुके मशीन को भी अपने ही रंग में ही रंग चुका होता था। मिल के आसपास चारों ओर सफेद आटे की परत फैले होते थे। चौकोर चौड़े मुंह वाले शूट से गेंहू को डाला जाता था। सबसे ज्यादा शोर करते हुए मोटर से मोटे चक्की के बड़े-बड़े फ्लाईव्हील को अनवरत एक मोटा सा बेल्ट घूमाता रहता था। चलते मोटर में काफी शोर होता था, और बेल्ट के थोड़े ढीले होने और कुछ सिलाई आदि के कारण, हर बार उसके घूम कर वापस आने पर "फट्ट-फट्ट" के तमाचे मारने जैसी आवाज आती।

भूकम्प आने पर हिलते जमीन सा कांपता कंक्रीट के फ्लोर और शोर के बीच  सभी काम करने वाले कर्मचारी और तराजू के पास बैठी आदमियों के सिर और आँखों के बालों के ऊपर सफ़ेद आटे के परत लग जाने से, उनके कम उम्र के बूढ़े जैसा रूप-रेखा दिखता था। इतने शोर के बीच भी लोग बातें करते और आदमी और मशीन के बीच एक दूसरे के आवाज को शांत करने का प्रतिद्वंद सा चलता था। मेरा जी करता था कि चाहे तो वहाँ जितनी कोर से चाहे चीख लो, कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।

इतने शोर और  जलते हुए आटे के गंध के बीच भी एकाध लोग कुर्सी लगाए अखबार पढ़ने में लीन बैठे होते थे।

तराजू पर वजन करने के बाद, किसी भी तरीके से फाड़े हुए कागज़ के टुकड़े पर बेमन से उतने ही गंदे से लिखावट में गेंहू के वजन को लिख कर दे दिया जाता, और जब तक वजन लिखने का काम संपन्न होता, एक मज़दूर थैले को सामने के लम्बे कतार में लगा चुका होता था।

बारी-बारी से हर थैले को बड़े से चौकौर शूट में उड़ेल दिया जाता था। ठीक उसके नीचे के हिस्से में एक पैर के गोलाकर पजामे के शकल में लहराते कपडे के लम्बे पाइप जैसे हिस्से से सफ़ेद आटे निकलते रहते थे। मेरी समझ में आजतक यह नहीं आया कि  लगातार गेंहू के डालते रहने के कारण, मिल को ऑपरेट करने वाला मज़दूर को यह कैसे पता होता था कि किसके हिस्से का आटा कब निकल गया।

बहरहाल लगातार डाले जा रहे गेंहू और निकलते आटे का सिलसिला अनवरत चलता रहता, और जिस तरह से गेंहू के थैले के कतार किसी स्कूल में शिक्षा प्राप्त करनेवाले के पहले जैसे "कच्चे" अवस्था में होते, स्कूल से शिक्षा प्राप्त सफ़ेद महीन आटा बनकर सामने के कतार में बैठे मिलते। जिस तरह से सभी थैले के अभिभावक, अपने-अपने बच्चों को स्कूल में छोड़ कर जाते थे, कुछेक घंटों बाद वापस उन्हें लेने आ जाते थे। आटे के थैले को फिर से तौला जाता और गेंहू के बराबर वजन के बाद वहां का सिलसिला ख़त्म हो जाता।    


उन स्थाई दूकानों के बीचो-बीच बहुत बड़ा सा सब्जी-बाजार था। बिलकुल गाँव के हाट की तरह - जमीन पर बिछे हुए, बहुत सारे दूकान, ग्रामीण माहौल सा बना देता था। कतार में बैठे, अनेको सारे दूकान में - कोई मौसम के हिसाब से - सीज़नल - हरी सब्जियां बेचते हुए, तो दूसरी ओर सालों भर एकरसता के समां बनाये से - आलू-प्याज बेचने वाले भी एकाध कोने को सम्हाले रहते थे।

सब्जी-बाजार के एक कोने में, कुछ कम में ही संतोष करने वाले जैसे दूकान भी होते थे, जो सिर्फ नीम्बू, धनिया, मिर्च, अदरख और लहसुन बेच कर, अपने अस्तित्व को सम्हाले होते थे। आमतौर पर लोग सब्जियों के पूरे खरीद के बाद ही इन दूकानों के दर्शन करते हुए घर जाते थे। इस तरह के दूकान में अंत में आने का कारण यह होता था कि बचे खुचे - खुदरे से ही ऐसे दूकान का सौदा हो जाता था। साथ ही, बाकी भारी सब्जियों के खरीद के बाद, उनके थैले में जम जाने से, उनके ऊपर इस खरीद को रखने का फायदा यह था कि नाजुक से धनिया-पत्ते के झुण्ड के दब जाने का और पत्तों के टूट कर खराब हो जाने का भय नहीं होता था।

पूरे सब्जी-बाजार में बहुत शोर व्याप्त रहता था - हर कोई अपने सब्जियों के कुछ विशेष प्रकार से ज्यादा आकर्षक होने के प्रमाण स्वरुप - जैसे "हर्रा-हर्रा मटर" या "लाल-लाल टमाटर" या "ताज़ा करैला" आदि  जैसे विज्ञापन के "की-वर्ड्स" को प्रचारित करते रहते थे। साथ ही, सब्जियों के मूल्य को भी चिल्ला -चिल्लाकर सुनाते हुए, ग्राहकों को अपनी और आकर्षित करने के प्रयास में सतत लगे रहते थे। जो लोग सब्जियों को चुनने के काम में लगे होते थे, उनके पास एक डलिया होता था और जो उसी दूकान से खरीदने का मन बना लेते थे, उन्हें भी एक और डलिया दे दिया जाता था। जिसके बाद, सब्जियों को चुनने का ज्ञान होना, अपेक्षित था - अर्थात उनका ताज़ा होने का प्रमाण के लिए उपयोग में आने वाले व्यवहारिक ज्ञान या अनुभव।

वस्तुतः सब्जी के ढेर से अच्छी और ताज़ी सब्जी को चुनना - एक प्रकार से हर सब्जी के परीक्षण करके, उनको पास-फेल करने जैसी प्रक्रिया थी। हर सब्जी को परखने का एक निश्चित तरीका सा होता था, जिसमे उन सब्जियों का पास होना आवश्यक सा था - जैसे टमाटर का जरा कच्चा और सख्त होना, लौकी में नाख़ून से हल्का सा दाग लगाने से- हल्का सा रस की तरह - पानी का निकलना- या फिर भिन्डी के नीचले डंठल के तुरंत टूट जाना या बीन्स और बरबट्टी के आराम से टूट जाना आदि। ऐसे और भी सामान्य ज्ञान की शिक्षा - अपने बुजुर्गों के साथ, सब्जी बाजार में घूमने के दौरान मिल गया था। डलिया में सब्जी को छांटते या चुनते समय सिर्फ सोच का ही फेर था - अर्थात सकारात्मक भाव से सब्जी का चुना जाना और नकारात्मक भाव में उनको छांटना - अंततोगत्वा, सब्जी को उस डलिए में रखना ही लक्ष्य होता था। इस बात का भी ज्ञान होना आवश्यक था कि एक किलो में किस प्रकार के सब्जी का कितना मात्रा - "चढ़ेगा" - अन्यथा ज्यादा सब्जी को चुनने में लगाये समय व्यर्थ जाने वाला था। इस तरह से सब्जी का सौदा करना कोई बहुत "सरल-विधा" नहीं थी!

सब्जी बाजार को चारों ओर से कई और प्रकार के दूकानें कुछ इस तरह से घेरे होते थे, जैसे किसी हुड़दंगियों के झुण्ड को पुलिस घेरे हुए हों। इन दूकानों मे से कई सारे बाजार के सामने वाले रोड की ओर मुँह किये हुए होते थे। इन दूकानों में, कई सारे नाई के दूकान भी होते थे, जिनमें से एक - शर्माजी का नाई दूकान भी होता था, जो एकाध महीने में, हमारे सिर के बोझ को हल्का करने के लिए पहुँचने का एक निर्धारित सा लक्ष्य होता था। नाई दूकान और मेन-रोड के बीच के जगह - अमूमन तौर पर खाली होते थे। कई साल तक सड़क के दोनों ओर के फुटपाथ, वास्तव में लोगों के चलने के लिए ही हुआ करता था। इस वजह से, जैसा उम्मीद किया जाना चाहिए, वे खाली हुआ करते थे, बल्कि रोड के दूसरी ओर लाइन से बहुत सारे घर भी होते थे।

कालांतर में, उस रोड और बाजार के बीचे के खाली भाग में इक्का दुक्का करते हुए - बहुत सारे सब्जी बेचने वालों ने, जमीन पर सब्जियों का ढेर लगाकर सब्जी मंडी के जाल सा बनाना शुरू कर दिया, और फिर जैसा भारत के किसी खाली जगह का हश्र होता है- बाजार के पास वाले इस फुटपाथ में भी किसी अमरबेल की तरह से सड़क के दोनों ओर, सब्जियों का टीला सा लगने लगा। सब्जियों का ढेर - पंक्तिबद्ध - जिस तरह से खेतों में उगते थे, उसी प्रकार से बिकने के लिए भी कतारबद्ध से फ़ैल गए।

Feb 18, 2016

सड़क-छाप जड़ी-बूटी वाला

आज के दौर में बाबा रामदेव के पतंजली और आयुर्वेद के व्यवसायीकरण से बहुत पहले, आयुर्वेद, जड़ी-बूटी इत्यादि जैसे  दवा-उपचार का व्यवसाय एक कुटीर उद्योग के तौर पर हुआ करता था। इस तरह के व्यवसाय का जाल बहुत सारे वैद्य-हकीमों के बीच बिखरे पड़े थे। आये दिनों शहर के किसी भीड़-भाड़ वाले खाली जगहों पर इस तरह के वैद्य या हकीम अपना टेंट लगा कर अनेकों प्रकार के असाध्य और लम्बे समय से चले आ रहे बीमारियों को ठीक करने का दावा किया जाता था।

हिमालयी जड़ी-बूटी बेचनेवालों का हिसाब किताब कुछ अलग सा होता था। उनका टेंट  होता था जिसके अंदर उनके एकाध हफ्ते से महीनो का जुगाड़ सा लगता था। टेंट के सामने बहुत ही रोचक ढंग से अनेकों प्रकार के जड़ी बूटी और अन्य औषध के डिब्बे रखे होते थे। इन औषधियों मे काफी प्रकार के सूखे जड़ों के डंठल, सूखे बीज, या इसी तरह के अन्य प्राकृतिक सामग्रियाँ रखे होते थे, जिन्हे बड़े तरीके से शीशे के बरनी या कुछ उसी तरह के दिखने वाले जुगाड़ में बहुत हिसाब से प्रदर्शन के लिए रखा जाता था।

वैसे हमारे लिए बचपन में इस तरह के टेंट में कुछ ज्यादा समझने लायक तो होता नहीं था - क्योंकि इसमें बताये जाने वाले रोग एवं उपचार को जानने में हमारी कोई ख़ास रुचि नहीं होती थी। पर फिर भी अन्य कारणों से हम इन्हें देखने के लिए रुक जाया करते थे।

एक कारण तो यह हुआ करता था कि इस तरह के टेंट में बहुत अच्छे प्रकार का लाउडस्पीकर लगा होता था, जिसमे गाना वगेरह चलता रहता था। बीच बीच में गाने को रोक कर वैद्य या हकीम साहेब माइक में कुछ उद्धघोष करते थे और फिर टेंट के अंदर नुमाइश के तौर पर रखे अनेकों प्रकार के रंगीन पत्ते, बीज, इत्यादि फैले से होते थे और कहीं कही उनका ऊँचा सा ढेर लगा होता था  - जिन्हें वह अपने हाथ में रखे माइक से बहुत ही रोचक ढंग से बताया करते थे।

उस वैद्य के साथ ही उसका एक असिस्टेंट भी होता था जिसका काम तरह तरह के सामग्रियों को लेकर कुत्ते रहने या पीसने जैसे काम में लगा होना होता था। ज्यादातर वह बिलकुल चुपचाप सा होता था और अपने काम में बहुत निष्ठापूर्वक लगा होता था। मगर उसके बगल में एक बैटरी से चलने वाला माइक्रोफोन और कुछ गाने बजाने वाला - रिकार्ड प्लेयर होता था।  इतने सारे रोचक क्रियाओं को छाव से देखना बहुत ही सुखद अनुभूति होती थी। दवा का बनते देखना और उसका साथ में बज रहे मधुर गाने, फिर बीच बीच में रनिंग कमेंट्री भी सुनाई देता था।

मुख्य वैद्य या हकीम बिलकुल विद्वान सा लुक देकर सभी समस्याओं का समाधान बताने वाले मुद्रा में बैठा होता था।  बीच बीच में वह माइक से - अनेको प्रकार के बीमारी - उसके लक्षण- और फ़ी अचूक निदान के बारे में लोगो को जानकारी देता रहता था।  हरेक दो लाइन में - हिमालय, जड़ी-बूटी,  दुर्लभ, बेशकीमती, खानदानी वैद्य या हकीम. देसी जड़ी-बूटियों वाला काढ़ा, सालों से नहीं ठीक होने वाला बीमारी, सभी प्रकार के असाध्य रोग, शर्तिया इलाज़, गारंटी, पैसे वापस - जैसे शब्दों के उच्चारण से  समां बना रहता था।

बीच-बीच में वह एक छड़ी से दीखाता हुआ, कुछ अजब-अजब प्रकार के जड़ी-बूटियों की जानकारी देता हुआ, लोगो में अपने ज्ञान की छाप और विश्वसनीयता पैदा करने जैसा कुछ कार्यक्रम करता रहता था जब आस पास भीड़ काम हो जाती तो वह फिर से किसी हिंदी फ़िल्मी गाने का सहारा लेलेता और लोगों के मनोरंजन में अपने को भी समर्पित कर देता था।

भारत में फ़िल्मी गाने का बनने का मुख्य मकसद, फिल्म के किसी कठिन परिस्थिति को सहज और काव्यात्मक ढंग से संगीतबद्ध तरीके से व्यक्त करना रहा होगा। पर कालांतर में, फिल्म के गाने का मुख्य प्रयोग, रेडियो-स्टेशन में - विविध भारती  के २४ घंटे- सेवा में युक्त हो जाना, पार्टी-त्यौहार में बजते रहना और इस तरह के दूकान या मेले जैसे माहौल में बजते रहने का बहुत बड़ा उपयोग सा था।

इस कारण गाने का फिल्म में कोई प्रयोजन हो या न हो - पर उनका उपयोग, उसके अलावा और बहुत सारे अन्य क्षेत्र में ज्यादा होता था।

ये मैं हूँ!



क्रिकेट के झरोखे से बचपन - १९८३ वर्ल्ड कप

हर देश में कुछ ऐसी घटना होती हैं जो उस देश के इतिहास को काफी हद तक बदल सा देता है।  मैं जब गुज़रे सालों को देखता हूँ, तो भारत में अनेक सारे महत्वपूर्ण उपलब्धियों को या घटनाओं को - जिनको मैंने काफी करीब से देखा है - उनमे से कुछ प्रमुख हैं - भारत में इमर्जेन्सी का लगना फिर जे.पी. मूवमेंट और उसके बाद जनता पार्टी का बनना, सत्ता में आना और बिखरना, रोहणी के सफल प्रक्षेपण से लेकर कैप्टन रमेश शर्मा के अंतरिक्ष यात्रा और फिर पोखरण का परमाणु परीक्षण, ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गांधी की हत्या, और फिर दिल्ली का नरसंहार, और फिर न जाने कितने सारे इसी तरह के दुखद घटनाएं!
खेल जगत में भास्करन के टीम के द्वारा मास्को ओलम्पिक में हॉकी का गोल्ड मेडल, प्रकाश पादुकोणे का आल इंग्लैंड बैडमिंटन में विजय और अन्य।

पर इन सभी घटनाओं को एक तरफ रख दिया जाए और कपिलदेव के टीम का वर्ल्ड कप में विजय को दुसरे पलड़े पर, फिर भी १९८३ का विश्वकप के जीत जैसा अभूतपूर्व उल्लास मैंने अपने जीवन में नहीं देखा है!

ऐसा नहीं है कि इसके बाद कोई और उपलब्धियां नही हैं, पर मेरा मानना है कि इस जीत ने पूरे देश में एकनई संचार ला दी थी! 
The finest moment: Indian supporters invade the Lords cricket ground after India beat the West Indies to lift the World Cup in 1983. 

Feb 15, 2016

क्लास IV H2

ये लो मेरी याददाश्त के हिसाब से सभी के नाम : क्लास IV H 2 

Top Row (L-R) : Hemant Kumar,  Dheeraj Lal Patel, Vinay Kumar, Ram Kumar Jha, Akshaywar Nath Mishra, Binod Lal, Parmjeet Singh, Vijay Mahato, V. Anant, Babulal, ? (name nahee yaad aa raha hai, par, ye kadma ke ek biscuit bechne waale dukanwale ka beta tha), Ganesh Mahato

2nd Row (L- R) : Nitya Nand Choudhary (son of Tilak sirjee), Mani, Vijay Singh, Ghanshyam Kumar, Satpal Singh, Uday Narayan Singh, K, Shrinivas, Vinay Kumar, N. Srinivas, Girish Dubey, S. Ganesh, D. Sudhakar

3rd Row (L-R): Mahabir Bagh, N. Chandrashekhar, Chandrashekhar Mahato, Mohan Singh, Parmeshwar Sahoo, Sagar, Rajnish (?), Sandeep Gosain, Sanjay Jham Chandrashekhar Shukla

4th Row (L-R): Upendra Dubey, Jeetendra Kumar, Prasenjit Sinha, Abhijit Sinha, S. Jaiswal, R.C.Singh (Headmaster), Giri sir, Ram Kumar Singh, Bahadur Thapa, Rakesh Singh, Sajjan Singh

Last row on ground (L-R): Ravindra Kumar, Gocharan, Pratap Narayan Jha, Umesh Singh, Prem Swarup, V. Nagesh