आज यकीन करना मुश्किल सा लगता है कि मेरे इस छोटे से जीवन काल में ही मैंने ऐसे समय भी देखे हैं, जब दुनिया से संपर्क के लिए रेडियो ही एकमात्र सहारा हुआ करता था। अखबार या मैगज़ीन विकल्प हुआ करता था, पर उनसे बासी खबरें ही मिलती थी। किसी लाइव इवेंट के बारे में जानने के लिए जो था - वह सिर्फ रेडियो ही था। उन दिनों, आज की तरह अनेको सारे एफ एम रेडियो स्टेशन नहीं होते थे, और घूम फिर कर सिर्फ आकाशवाणी ही एक सहारा हुआ करता था।
ऐसे दौर में सुनने वालों के लिए, रेडियो के बहुत सारे अदाकारों के साथ, एक अदृश्य सा सम्बन्ध बन जाता था। उनके पेश करने का अंदाज़, उनके शब्दों का चयन और उनके लहज़े से लोग वाकिफ से हो जाते थे। उनकी आवाज़ें ही उनकी पहचान होती थी, पर हर समय सुनते रहने से, मन में एक उत्सुकता बनी रहती थी कि कैसा दीखता होगा, क्या उम्र होगी, हक़ीक़त में किस तरह से बातें करते होंगे? अपने मन में सोचते हुए उनके व्यक्तित्व की एक कल्पना सा कर लेते थे - और जब वे बोलते, मन मैं एक वैसी ही आकृति उभर कर आती थी। अदृश्य से पर जिनकी आवाज़ से हमारा एक बहुत पहचाना सा सम्बन्ध बन चुका था - एक ऐसा अनुभव, जो संभवतः अब टीवी के जमाने में कल्पनातीत है, पर हमारे बचपन में इसके अलावा कोई चारा ही नहीं था। टीवी के आ जाने के बाद रेडियो सुनने वालों की संख्या घटने लगी। ज्यादातर लोग टीवी के माध्यम से देखने और सुनने लगे।
बदलते हालात में, अपने दौर के नामी-गिरामी रेडियो की हस्तियां में से कई ने टीवी पर अाने का भी प्रयास किया, पर जिस तरह से टेस्ट के खिलाड़ी नए दौर के टी-२० में नहीं खेल पाये, वही हाल रेडिओ के महारथियों का भी हुआ। व्यक्तिगत तौर पर, मुझे कई सारे उन रेडियो के हस्तियों को टीवी पर देख कर कुछ हद तक निराशा सी हुयी, क्योंकि सालों से उन्हें रेडियो पर सुनकर, मन में जिस तरह के व्यक्तित्व की कल्पना बसी हुई थी, वे उन से काफी अलग से और फीके से नज़र आये। साफ़-साफ़ शब्दों में कहा जाए तो उनमे वो बात नहीं थी, जैसा रेडियो में सिर्फ उनके आवाज़ से उभर कर आती थी। शायद इसका कारण उनके संवादों का "स्क्रिप्टेड" होना रहा होगा या बिना कैमरा के उनके स्वछंद भाव से बोलना रहा होगा, बहरहाल जिन लोगों ने टीवी पर प्रयास किया, उनमे से सिर्फ कुछ लोग ही अपनी शोहरत को थोड़ा बहुत भुना पाये।
पर समय के उस दौर में, जब सिर्फ रेडियो ही हुआ करता था, इसमें कोई शक नहीं कि इनकी शोहरत का डंका चारों तरफ गूंजता सा था। उन दिनों आकाशवाणी से, बारी-बारी से हर घंटे पर हिंदी और अंग्रेज़ी में समाचार सुनाया जाता था। सुबह के ८ और रात के ८:४५ पर -प्राइम टाइम- के तौर पर १५ मिनट के विस्तार में समाचार प्रसारित किया जाता था।
उन दिनों हिंदी फ़िल्मी गाने और क्रिकेट का बोलबाला था। कभी-कभार हॉकी के आँखों देखा हाल का भी सीधा प्रसारण होता था। पर पूरे साल में हॉकी के बहुत अंतराल और कभी-कभी होने के कारण, लोगों में उसका बुखार थोड़े समय के लिए आता और फिर चला भी जाता था। हॉकी के प्रति लोगों का आकर्षण क्रिकेट की तरह नहीं होता था। क्रिकेट के मैच के दौरान पूरे ५-६ दिनों के लम्बे समय के लिए लोग अपने ट्रांजिस्टर रेडियो से कान लगाये रहते थे।
जसदेव सिंह कभी भी उत्तेजित नहीं होते थे और बिना किसी भाव के सिर्फ और सिर्फ - "आँखों देखा हाल" बताते रहते थे! सुशील दोषी से लगभग बिलकुल विपरीत से, पर अपने एक ख़ास अंदाज़ में।
बीच-बीच में जसदेव सामन्य ज्ञान की जानकारियां भी देते रहते थे - ख़ास कर तब, जब कोई मैच विदेश में हो रहा हो। मैदान के आस -पास के किसी पार्क, पहाड़, नदी, झील, समुद्र आदि के जानकारी के साथ-साथ शहर की भी विस्तृत जानकारी मिल जाया करता था। कई विशेष प्रकार के तकनीकी बातों से भी हम अवगत हुआ करते थे - जैसे किस तरह से ऑस्ट्रेलिया से भारत तक के संचार की व्यवस्था होती थी-
ऐसे दौर में सुनने वालों के लिए, रेडियो के बहुत सारे अदाकारों के साथ, एक अदृश्य सा सम्बन्ध बन जाता था। उनके पेश करने का अंदाज़, उनके शब्दों का चयन और उनके लहज़े से लोग वाकिफ से हो जाते थे। उनकी आवाज़ें ही उनकी पहचान होती थी, पर हर समय सुनते रहने से, मन में एक उत्सुकता बनी रहती थी कि कैसा दीखता होगा, क्या उम्र होगी, हक़ीक़त में किस तरह से बातें करते होंगे? अपने मन में सोचते हुए उनके व्यक्तित्व की एक कल्पना सा कर लेते थे - और जब वे बोलते, मन मैं एक वैसी ही आकृति उभर कर आती थी। अदृश्य से पर जिनकी आवाज़ से हमारा एक बहुत पहचाना सा सम्बन्ध बन चुका था - एक ऐसा अनुभव, जो संभवतः अब टीवी के जमाने में कल्पनातीत है, पर हमारे बचपन में इसके अलावा कोई चारा ही नहीं था। टीवी के आ जाने के बाद रेडियो सुनने वालों की संख्या घटने लगी। ज्यादातर लोग टीवी के माध्यम से देखने और सुनने लगे।
बदलते हालात में, अपने दौर के नामी-गिरामी रेडियो की हस्तियां में से कई ने टीवी पर अाने का भी प्रयास किया, पर जिस तरह से टेस्ट के खिलाड़ी नए दौर के टी-२० में नहीं खेल पाये, वही हाल रेडिओ के महारथियों का भी हुआ। व्यक्तिगत तौर पर, मुझे कई सारे उन रेडियो के हस्तियों को टीवी पर देख कर कुछ हद तक निराशा सी हुयी, क्योंकि सालों से उन्हें रेडियो पर सुनकर, मन में जिस तरह के व्यक्तित्व की कल्पना बसी हुई थी, वे उन से काफी अलग से और फीके से नज़र आये। साफ़-साफ़ शब्दों में कहा जाए तो उनमे वो बात नहीं थी, जैसा रेडियो में सिर्फ उनके आवाज़ से उभर कर आती थी। शायद इसका कारण उनके संवादों का "स्क्रिप्टेड" होना रहा होगा या बिना कैमरा के उनके स्वछंद भाव से बोलना रहा होगा, बहरहाल जिन लोगों ने टीवी पर प्रयास किया, उनमे से सिर्फ कुछ लोग ही अपनी शोहरत को थोड़ा बहुत भुना पाये।
पर समय के उस दौर में, जब सिर्फ रेडियो ही हुआ करता था, इसमें कोई शक नहीं कि इनकी शोहरत का डंका चारों तरफ गूंजता सा था। उन दिनों आकाशवाणी से, बारी-बारी से हर घंटे पर हिंदी और अंग्रेज़ी में समाचार सुनाया जाता था। सुबह के ८ और रात के ८:४५ पर -प्राइम टाइम- के तौर पर १५ मिनट के विस्तार में समाचार प्रसारित किया जाता था।
ये आकाशवाणी है, आब आप दे-व-की नन-दन पान-डे से समाचार सुनिए..... और अंत में मुख्य समाचार एक बार फिर ..... और समाचार समाप्त हुए।इस तरह के शब्दों को तोड़ कर, उनके अक्षरशः उच्चारण के साथ समाचार को पढ़ने वालों में देवकी नंदन पाण्डे, इंदु वाही, अनादि मिश्र, और भी कई सारे प्रसिद्द नाम हुआ करते थे। हिंदी समाचार के खतम होते ही अंग्रेज़ी में समाचार शुरू हो जाता -
दिस इज़्ज़ - ओल इंडिया रेडी-ओ, द न्यूज़ - इज़्ज़ रेड बाई - बौरुन हलदर...मज़ेदार बात यह थी कि अंग्रेज़ी के न्यूज़ में आकाशवाणी न कह कर, "आल इंडिया रेडियो" कहा जाता था। अंग्रेज़ी में भी कुछ प्रसिद्ध नाम होते थे - बरुण हलदार, सुरोजीत सेन, लतिका रत्नम, और भी कई सारे हुआ करते थे, पर अब वे याद नहीं हैं। एक और बात याद आती है कि सुबह ८ बजे हिंदी समाचार के शुरू होने के पहले और रात को ९ बजे जब समाचार ख़त्म होता, रेडियो स्टेशन के घड़ी की "पुक-पुक पुक " की तीखी आवाज़ रेडियो से प्रसारित होता, जिस से लोग अपने घड़ियों को मिला लिया करते थे!
उन दिनों हिंदी फ़िल्मी गाने और क्रिकेट का बोलबाला था। कभी-कभार हॉकी के आँखों देखा हाल का भी सीधा प्रसारण होता था। पर पूरे साल में हॉकी के बहुत अंतराल और कभी-कभी होने के कारण, लोगों में उसका बुखार थोड़े समय के लिए आता और फिर चला भी जाता था। हॉकी के प्रति लोगों का आकर्षण क्रिकेट की तरह नहीं होता था। क्रिकेट के मैच के दौरान पूरे ५-६ दिनों के लम्बे समय के लिए लोग अपने ट्रांजिस्टर रेडियो से कान लगाये रहते थे।
आकाशवाणी के द्वारा प्रसारित - "विविध-भारती" से, दिन भर विभिन प्रकार के गाने तो बजते रहते थे, परन्तु लोकप्रियता के शिखर पर होता था - रेडियो सीलोन से हर बुधवार को प्रसारित होने वाला एक प्रोग्राम, जिसका नाम था - बिनाका गीतमाला। हर हफ्ते के नए गानों के लोकप्रियता के चार्ट को पेश करते थे, एक मशहूर एनाउंसर- अमीन सयानी। उस आवाज़ की ऐसी धूम थी कि आने वाले कई सालों तक किसी भी सांस्कृतिक कार्यक्रम में लोग उन्ही के अंदाज़ में बोलते थे - "बहनों और भाइयों...!" अपने अनोखे शैली में श्रोताओं को सम्बोधित करने के बाद, प्रोग्राम आगे बढ़ता और उस हफ्ते के चार्ट के हर पायदान के गाने का मुखरा बजता था। अंत में हफ्ते का सिरमौर गाने के बजने के पहले, उसके स्वागत में एक ट्रम्पेट की आवाज़ आती थी! उन दिनों रेडियो स्टेशन पर नए गाने जल्दी नहीं बजते थे, और न ही हमारे पास कोई और सुनने के उपाय थे। ऐसे में, बिनाका गीतमाला का हम बेसब्री से इंतज़ार करते थे, ताकि हम गाने का कुछ मुखरा ही सुन लें!
क्रिकेट के कमेंट्री में सबसे लोकप्रिय नाम था -सुशील दोषी का! मेरे बचपन के दिनों में रेडियो के दुनिया में - अमीन सयानी और सुशील दोषी, ये दो बहुत ही प्रसिद्द आवाजें हुआ करते थे। परन्तु उनके साथ-साथ हिंदी के और भी कई सारे अन्य प्रसिद्द कॉमेंटेटर होते थे -मनीष देव, मुरली मनोहर मंजुल, जसदेव सिंह, रवि चतुर्वेदी, जोगा राव और भी कई सारे। अंग्रेज़ी के भी कई सारे प्रसिद्द कॉमेंटेटर हुआ करते थे, पर मुझे उस वक़्त अंग्रेज़ी बिलकुल समझ में नहीं आती थी, इस लिए अब उनके बारे में बहुत कुछ तो याद नहीं है, पर सुरेश सरैया, डॉ. नरोत्तम पुरी, अनंत सेतलवाड और कुछ नाम होते थे।
क्रिकेट के कमेंट्री में सबसे लोकप्रिय नाम था -सुशील दोषी का! मेरे बचपन के दिनों में रेडियो के दुनिया में - अमीन सयानी और सुशील दोषी, ये दो बहुत ही प्रसिद्द आवाजें हुआ करते थे। परन्तु उनके साथ-साथ हिंदी के और भी कई सारे अन्य प्रसिद्द कॉमेंटेटर होते थे -मनीष देव, मुरली मनोहर मंजुल, जसदेव सिंह, रवि चतुर्वेदी, जोगा राव और भी कई सारे। अंग्रेज़ी के भी कई सारे प्रसिद्द कॉमेंटेटर हुआ करते थे, पर मुझे उस वक़्त अंग्रेज़ी बिलकुल समझ में नहीं आती थी, इस लिए अब उनके बारे में बहुत कुछ तो याद नहीं है, पर सुरेश सरैया, डॉ. नरोत्तम पुरी, अनंत सेतलवाड और कुछ नाम होते थे।
जसदेव सिंह
जसदेव सिंह के कमेंट्री की विशेषता यह थी कि वे लगभग हर तरह के खेल की कमेंट्री कर लेते थे। शायद, दिल्ली एशियाड- ८२ में भी उन्होंने हर तरह के खेल की कमेंट्री की थी। यहां तक कि स्वतंत्रता दिवस को लाल किले से दिए प्रधानमंत्री के भाषण हो या फिर गणतंत्र दिवस के परेड, इन सब तरह के कार्यक्रम का भी बखूबी से कमेंट्री कर दिया करते थे।
इतनी बहुमुखी प्रतिभा और जानकारी का होना बहुत अच्छी बात थी, पर दिक्कत यह थी कि - उनका कमेंट्री का तरीका लगभग एकसमान रहता था। यह समझ में ही नहीं आता था कि किस खेल या किसी विशेष आयोजन का कमेंट्री हो रहा था। थोड़े फेर-बदल करके, हर कमेंट्री के दौरान कुछ इस तरह के वक्तव्य सुनने को मिल ही जाया करता था -
इतनी बहुमुखी प्रतिभा और जानकारी का होना बहुत अच्छी बात थी, पर दिक्कत यह थी कि - उनका कमेंट्री का तरीका लगभग एकसमान रहता था। यह समझ में ही नहीं आता था कि किस खेल या किसी विशेष आयोजन का कमेंट्री हो रहा था। थोड़े फेर-बदल करके, हर कमेंट्री के दौरान कुछ इस तरह के वक्तव्य सुनने को मिल ही जाया करता था -
नमस्कार, मैं जस्स-देव सिंह बोल रहा हूँ.... आसमान धीरे धीरे खुलता हुआ.... आसमान का दूसरा कोना बिलकुल खुला हुआ.....बिल्कुल साफ़ नीला आसमान दीखता हुआ ... दूर कोने में एकाध बादल के टुकड़े जो अब हमसे काफी दूर जाते हुए, बादलों के बीच से सूरज आँख-मिचौनी करती हुयी... मद्धम-मद्धम से धूप छन-छन कर मैदान के हरे घासों पर पड़े ओस को सूखाने के प्रयास करते हुए, और उधर मैदान के चारों ओर दर्शक दीर्घा में काफी उत्साह! आज रविवार का दिन है और काफी बड़ी संख्या में लोग इस मैच को देखने आये हुए हैं....ख़ास बात है कि बहुत सारे स्कूली बच्चे भी इस मैच को देखने के लिए आज यहाँ स्टेडियम में उपस्थित हुए हैं......
जसदेव सिंह कभी भी उत्तेजित नहीं होते थे और बिना किसी भाव के सिर्फ और सिर्फ - "आँखों देखा हाल" बताते रहते थे! सुशील दोषी से लगभग बिलकुल विपरीत से, पर अपने एक ख़ास अंदाज़ में।
बीच-बीच में जसदेव सामन्य ज्ञान की जानकारियां भी देते रहते थे - ख़ास कर तब, जब कोई मैच विदेश में हो रहा हो। मैदान के आस -पास के किसी पार्क, पहाड़, नदी, झील, समुद्र आदि के जानकारी के साथ-साथ शहर की भी विस्तृत जानकारी मिल जाया करता था। कई विशेष प्रकार के तकनीकी बातों से भी हम अवगत हुआ करते थे - जैसे किस तरह से ऑस्ट्रेलिया से भारत तक के संचार की व्यवस्था होती थी-
यहाँ मैदान में बने कमेंट्री बॉक्स से हमारी आवाज को सिडनी स्टूडियो तक पहुँचाया जाता है, और फिर वहाँ से, जैसा मुझे बताया गया है कि समुद्र के नीचे से एक केबल बिछाया गया है जिसके द्वारा सिग्नल को भारत में आकाशवाणी के दिल्ली केंद्र तक पहुंचाया जाता है, और वहां से इसे पूरे भारत में लो सिग्नल पर सैटेलाइट के माध्यम से प्रसारित किया जाता है और इस तरह से आपके तक हमारी आवाज़ पहुँच रही है - और इस बीच में कपिल देव के एक बेहतरीन इन-स्विंग करती गेंद....
एक बार जसदेव सिंह हॉकी की कमेंट्री कर रहे थे और उन दिनों भारत के टीम में सिख खिलाडियों की संख्या बहुत थी। शायद १९७५ के विश्वकप जीतने वाली टीम में अजित पाल सिंह कप्तान थे और उनके गाँव से ही ४ और खिलाड़ी थे। मैदान में इतनी तेज़ी से चलने वाले खेल में, इतने सारे सिख खिलाडियों को पहचानने का काम जसदेव सिंह से अच्छा शायद और कोई नहीं कर सकते थे, जो शायद वे बखूबी कर भी रहे थे पर हम सुनने वालों को कुछ यूँ सुनायी दे रहा था -
वरिंदर ने मोहिन्दर को गेंद पास किया... मोहिन्दर ने सुरिंदर को और गेंद फिर से वरिंदर के पास और.... इन्दर ने इन्दर को और इन्दर ने गोल कर दिया....!
रवि चतुर्वेदी
रवि चतुर्वेदी के बारे में सबसे ज्यादा चर्चित बात यह थी कि वे पहले कॉलेज में प्रोफ़ेसर थे, फिर क्रिकेट में ज्यादा दिल आ गया और कमेंट्री करने लगे थे। इनकी ख़ास बात यह थी कि वे सामान्य ज्ञान में भी जो न मिल सके उस तरह के रोचक जानकारियों के साथ कमेंट्री करते थे। जैसे -जिम्बाब्वे के गेंदबाज जॉन ट्राइकस, जिनका जन्म मिस्त्र में हुआ है और पेशे से कब्र खोदते हैं, काफी उम्रदार होते हुए भी चुस्त, आ रहे हैं गेंद डालने!या कुछ इसी तरह की जानकारियों के बीच
और आउट हो गए श्रीलंका के बल्लेबाज अट्टापट्टू, जो नाम से ही अटपटे से हैं, एक अटपटे शॉट खेल कर आउट हो गए!
बात उन दिनों की है जब भारत में इमर्जेन्सी लगा दी गयी थी और ऑल इंडिया रेडियो - ऑल इंदिरा रेडियो बन गया था जिस कारण हर किसी को उस समय के सरकार की, ख़ास कर गांधी-नेहरू परिवार की प्रशंसा करनी पड़ती थी। ऐसे में क्रिकेट कमेंट्री का अछूता रह पाना संभव नहीं था, और १९७६ में वेस्ट इंडीज़ के खिलाफ भारत के ऐतिहासिक ४०६ रन के लक्ष्य को सफलता पूर्वक करने की कमेंट्री रवि चतुर्वेदी कर रहे थे।
उस समय का शायद यह सबसे बड़ी रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए जीत थी इसलिए खेल अत्यंत रोमांचक हो गया था और विश्वनाथ के साथ मोहिन्दर अमरनाथ ने जब जीत के रन को पूरा किया तो कमेंट्री बॉक्स में जोश अपने पराकाष्ठा पर पहुँच गयी थी। शायद अंगरेजी में डॉ. नरोत्तम पुरी कमेंट्री कर रहे थे पर उस ऐतिहासिक क्षण में रवि चतुर्वेदी ने माइक को लगभग छीनते हुए कहा था -
उस समय का शायद यह सबसे बड़ी रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए जीत थी इसलिए खेल अत्यंत रोमांचक हो गया था और विश्वनाथ के साथ मोहिन्दर अमरनाथ ने जब जीत के रन को पूरा किया तो कमेंट्री बॉक्स में जोश अपने पराकाष्ठा पर पहुँच गयी थी। शायद अंगरेजी में डॉ. नरोत्तम पुरी कमेंट्री कर रहे थे पर उस ऐतिहासिक क्षण में रवि चतुर्वेदी ने माइक को लगभग छीनते हुए कहा था -
ये नेहरू का देश, ये गांधी का देश - जहाँ पर श्री संजय गांधी और श्रीमती इंदिरा गांधी के चलाये २०-सूत्री प्रोग्राम का नतीज़ा है कि भारत को ये ऐतिहासिक जीत मिली है..... !
वैसे उन दिनों के कमेंट्री का एक नमूना पेश है:
सुशील: वेस्ट इंडीज़ के बॉलर काफी सटीक और नपी तुली गेंदबाज़ी कर रहे हैं। पिच पर जो घास हैं उसका बहुत सफल तरीके से फायदा उठा रहे हैं, इस कारण से अब भारत के ओपनर बड़े गंभीर परिस्थिति में हैं।
रवि: बिलकुल ठीक कहा आपने सुशील, वेस्ट इंडीज़ का क्षेत्ररक्षण बहुत अच्छी है, थोड़ी देर पहले जो गायकवाड़ का कैच गस लोगी ने लपका था, वे बहुत ही चुस्त और मुस्तैद फील्डर हैं।
सुशील: और ये बैट्समैन ने बल्ला घुमाया, गेंद तेज़ी से बॉउंड्री के तरफ बढ़ती हुयी....और ये चार रन्न्न्न्न!!........ फील्डर गेंद का पीछा नहीं कर पाये, और जब तक गेंद को पकड़ पाते, गेंद बाउंड्री लाइन को पार कर गयी थी। और इस तरह से भारत के खाते में ४ और रनों का इज़ाफ़ा। इस चौके के साथ, गावस्कर ५६ के निजी स्कोर पर और भारत धीरे-धीरे मजबूत स्थिति की ओर बढ़ते हुए, अब तीन विकेट खो कर २३४ रन पर।
रवि: और ये ओवर की समाप्ति, और इसके साथ ही अंपायर ने लंच-ब्रेक की घोषणा की, खिलाड़ी वापस पवेलियन लौट रहे हैं। और इसी के साथ मैं, रवि चतुर्वेदी, आपको वापस स्टूडियो लिए चलते हूँ।भोजनोपरांत के खेल के आँखों देखा हाल सुनाने के लिए हम पुनः १ बजे उपस्थित होंगे।
जोगा राव
जोगा राव अपने कमेंट्री करने के स्टाइल से काफी वृद्ध से कमेंटेटर लगते थे और उनकी कमेंट्री बहुत घटिया दर्जे का हुआ करता था। बिना किसी विवरण को दिए -
रवि शास्त्री - जो बहुत नीरस तरीके के बल्लेबाज थे और जितने नीरस थे उतनी ही धीमी गति से खेलते भी थे। एक मैच में वे ९० रन के ऊपर पहुँच कर - नर्वस नाइंटी पर - काफी देर से खेलते हुए, घंटो से शतक के इंतज़ार में क्रीज़ पर पसीने बहा रहे थे। श्रोताओं के साथ-साथ, शायद जोगा राव खुद भी कमेंट्री करते करते काफी बोर हो गए थे। ख़ास कर यह कहते-कहते कि - "इस गेंद को भी शास्त्री क्रीज़ पर दो कदम आगे बढ़ कर सम्मानपूर्ण ढंग से खेलते हुए गेंद को वापस बॉलर के पास पहुंचा दिया, और इसी के साथ एक और मेडन ओवर की समाप्ति..... " फिर कुछ देर बाद, शास्त्री बिना शतक बनाये शायद ९८ पर आउट हो गए और जोगा राव ने कहा - "इतना सम्मान दोगे तो यही होगा" - इस वाक्य में उनकी भावना, पूर्ण रूप से व्यक्त हो गयी थी - जो शायद श्रोता की भावना से मिलती जुलती सी थी।
और ये गेंद...... इसे घुमा दिया चार रन के लिए
और ये आउट
ये गेंद..... और इस गेंद पर कोई रन नहीं बना
और ये तेज़ गेंद.... गौर से देखा और जाने दिया विकेटकीपर के पास
ऐसे आधे-अधूरे वाक्यों को बोल कर, बाकी "सुनने वाले! आप स्वयं कल्पना कर लीजिये" - जैसे विचार-भावना से काम चलता था। परन्तु मुझे उनकी की गयी कमेंट्री के एक पल बहुत याद आते हैं।
रवि शास्त्री - जो बहुत नीरस तरीके के बल्लेबाज थे और जितने नीरस थे उतनी ही धीमी गति से खेलते भी थे। एक मैच में वे ९० रन के ऊपर पहुँच कर - नर्वस नाइंटी पर - काफी देर से खेलते हुए, घंटो से शतक के इंतज़ार में क्रीज़ पर पसीने बहा रहे थे। श्रोताओं के साथ-साथ, शायद जोगा राव खुद भी कमेंट्री करते करते काफी बोर हो गए थे। ख़ास कर यह कहते-कहते कि - "इस गेंद को भी शास्त्री क्रीज़ पर दो कदम आगे बढ़ कर सम्मानपूर्ण ढंग से खेलते हुए गेंद को वापस बॉलर के पास पहुंचा दिया, और इसी के साथ एक और मेडन ओवर की समाप्ति..... " फिर कुछ देर बाद, शास्त्री बिना शतक बनाये शायद ९८ पर आउट हो गए और जोगा राव ने कहा - "इतना सम्मान दोगे तो यही होगा" - इस वाक्य में उनकी भावना, पूर्ण रूप से व्यक्त हो गयी थी - जो शायद श्रोता की भावना से मिलती जुलती सी थी।
उन दिनों पूरे देश में प्रसारित होने वाले आकशवाणी का सिर्फ एक ही चैनल होता था, जहाँ से कमेंट्री आती थी। उसी चैनल पर हिंदी और अंग्रेज़ी में समाचार भी सुनाया जाता था। बड़े शहरों का अपना स्थानीय रेडियो स्टेशन भी होता था। एक बार ऐसे ही किसी न्यूज़ के प्रसारण के दौरान, कमेंट्री से हम वंचित थे। खेल कलकत्ता में हो रहा था। कुछ और करने को नहीं था तो समयकाटू प्रयोजन से, रेडियो ट्रांज़िस्टर के नॉब को घुमाते-घुमाते मैं अनजाने में कलकत्ता रेडियो-स्टेशन से बंगला भाषा में प्रसारित हो रहे कमेंट्री को सुना! यह एक अनूठा सा अनुभव था। जमशेदपुर में रहते हुए काफी कुछ बंगला समझ में आने लगी थी, इस लिए उस कमेंट्री का जो मैंने रसास्वादन लिया - वह आजतक के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव सा है। आकाशवाणी से प्रसारित हिंदी और अंग्रेज़ी में होने वाले कमेंट्री के तर्ज़ पर ही बंगला भाषा में भी पुष्पेन सरकार और अजोय दा जैसे कुछ कमेंटेटर और उनके साथ विशेषज्ञ के रूप में, पंकज रॉय भी साथ में थे, जो भारत के एक समय ओपनर बल्लेबाज रह चुके थे।
बंगला भाषा के कमेंट्री की खास बात यह थी कि उनकी क्रिकेट की शब्दावली खालिस बंगला में हुआ करती थी, इस लिए कभी-कभी तो ऐसा बोध होता था मानो कोई साहित्यिक विवेचना हो रही हो। गुड लेंग्थ बॉल को "खाटूर लेंग्थेर बाल" और अब तो याद नहीं है पर, और भी कई तरह के क्लिष्ट बंगला भाषा के शब्दों के प्रयोग करते हुए कमेंट्री जारी रहता था। ऐसा लगता था मानो कमेंट्री कम और किसी नुक्कड़ पर "दादा-युगल" किसी गहन चर्चा में ज्यादा लगे होते थे। मगर सबसे हास्यास्पद तो तब लगता था, जब कमेंटेटर अपने कमेंट्री के दौरान टीम के कप्तान या किसी खिलाड़ी को कुछ निर्देश सा देते थे और ऐसा आभास होता था, मानो वे सामने खड़े हों और उनको कॉमेंटेटर बता रहे हों कि किस तरह से उन्हें खेलना चाहिए -
वैसे उन दिनों ईडन गार्डन्स और मोहन बागान के बीच होने वाले फ़ुटबाल मैच के बंगला में होने वाले कमेंट्री से पूरा मोहल्ला गूंजता रहता था। परन्तु फ़ुटबाल में हमें कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं होती थी और इसलिए कभी बंग्ला में कमेंट्री नहीं सुना था, ऐसे में क्रिकेट के कमेंट्री को बंगला में सुनने का अनुभव बहुत मज़ेदार सा था!
ए काली चौरोन, जौदि तुमी जीतते चाओ, भालो कोरे बोलिंग टा कोरते होब्बे, एई रोकोम चोलबे ना!
वैसे उन दिनों ईडन गार्डन्स और मोहन बागान के बीच होने वाले फ़ुटबाल मैच के बंगला में होने वाले कमेंट्री से पूरा मोहल्ला गूंजता रहता था। परन्तु फ़ुटबाल में हमें कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं होती थी और इसलिए कभी बंग्ला में कमेंट्री नहीं सुना था, ऐसे में क्रिकेट के कमेंट्री को बंगला में सुनने का अनुभव बहुत मज़ेदार सा था!
आज भी पुराने दिनों को जब याद करता हूँ, तो हरेक खिलाडियों की यादें बिलकुल ताज़ी हो जाती हैं! उन दिनों, आज की तरह न उनके बारे में इंटरनेट पर जानकारी ले सकते थे या हम उन्हें खेलते हुए देख सकते नहीं थे, परन्तु किसी भी टेस्ट-श्रृंखला के शुरू होने के पूर्व, टीम और उनके हरेक खिलाड़ी के पूरे विवरण के साथ धर्मयुग का विशेष अंक प्रकाशित होता था। हम बड़े चाव से हरेक खिलाड़ी के बारे में पढ़ते थे, और फिर खेल के दौरान धृतराष्ट्र की तरह से "आँखों देखा हाल" सुन कर - कुरुक्षेत्र से महाभारत के विवरण की भांति खेल के बारे में सोचते रहते थे। आज विश्व के किसी भी कोने में मैच हो रहे हों, उनके बारे में जानने के लिए इतने तरह के सुविधा आ गए हैं, पर क्रिकेट का जो मज़ा उन दिनों था, वो बात अब नहीं रही!
अभावों में उछलते-कूदते बचपन में ज्यादा रोमांच था!
अभावों में उछलते-कूदते बचपन में ज्यादा रोमांच था!
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