इतिहास बताता है कि मनुष्य सबसे पहले खानाबदोश था। जब भी भूख जैसा कुछ लगता, शिकार कर लेता और फिर "चल मुसाफिर दूर कहीं, तेरा यहां नहीं बसेरा" करते हुए आगे निकल पड़ता। आदम जात कई सालों या सदियों तक इस तरह से अपना जीवन-यापन करता रहा।
आदमी शुरू से आलसी जीव है, इसका प्रमाण था कि धीरे-धीरे वे ऐसे जगह में सेटल करने लगे जहाँ रहने खाने की सुविधा आसानी से मिलने लगे। इधर इंसान अपना ठिकाना बनाना शुरू किया, और उधर जंगल के जानवर भी कुछ सोचने को विवश हो गए। जंगल के जानवरों को अपने पुरखों के अनवरत ज्ञान-प्रवाह से एक बात स्पष्ट हो गया था कि उनके अच्छे संगत के लिस्ट में, इंसान नामक जीव नहीं आता था। इंसान के ज्यादा हिंसक होने का असर था कि जानवरों के भेजे में यह बात घुस गयी थी कि इंसान से दूरी बनाये रखना, उनके स्वास्थ्य के लिए ज्यादा अच्छा था।
इंसानों की तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या और जानवरों के जंगल के अंदर ही अंदर खिसकते चले जाने जैसी समस्या का तत्क्षण परिणाम यह हुआ कि अब इंसानों के लिए शिकार करना, पहले जैसा आसान सा काम नहीं रह गया था। आदमी का शिकार पर ही आश्रित रहना अब एक विकल्प नहीं था।
फिर इंसानों के अंदर का ट्यूब-लाइट जल उठा, और वे परिवार बना कर संगठित होकर खेती करने लगे। लाजमी है कि जब खेती शुरू हो गयी, तो फसल के तैयार होने तक काफी समय रहता होगा। मतलब अब जीवन-काल एक व्यवस्थित सा हो गया था। अब इंसान को सब कुछ आराम से मिलने लगा था, पर शिकारी रह चुके इंसान के अंदर के स्वाभाविक प्रतिस्पर्धा की भावना वाले कीड़े का शांत होना आसान नहीं था।
जानवरों को मार कर उनका विनाश करने से फसल को उगाने के- विध्वंस से सृजन का सफर - आसान नहीं रहा होगा! नए-नए शिकारी से किसान बने इंसान का जी मचलता रहता होगा कि कैसे किसी का पीछा करें, दौड़े - दौड़ाएं, हरा दें, जीत जाएँ, और भी न जाने कितने सारे ऐसे ही भावनाएं - जो उसके अंदर सदियों से हैं, और शायद हमेशा रहेगा।
इंसान के अंदर का शिकारी कभी न मरा हैं न मरेगा। अलबत्ता, इस भावना के तुष्टि करने के लिए इंसान ने सांकेतिक रूप से "सभ्य-लड़ाई" करने की आदत डाली, जिसे "क्रीड़ा" अथवा "खेल" कहा जाता है।
मानव के इस तरह से विकास के क्रम में और कई प्रकार के क्रिया कलाप हुआ- जिसे इतिहास में पढ़ा जा सकता है।
फ़ास्ट फॉरवर्ड अब हम आते हैं कोई दो-तीन सौ साल पहले के समय-काल में। शायद अंग्रेज़ों को अपने घर में मन-वन नहीं लगता था, और इसलिए ज्यादा समय वे इंग्लैंड से बाहर ही रहते थे। अंग्रेज़ों के पुरखे बहुत सोच समझ कर इंग्लैंड में सेटल किये होंगे। वे बहुत समझदार नस्ल थे, इस कारण से मैं आश्वस्त हूँ कि उनके रहने, खाने-पीने का कोई ख़ास कष्ट नहीं रहा होगा। मेरे हाल के इंग्लैंड के दौरे से यह और भी स्पष्ट हो गया कि अभी भी वहां पर्याप्त खाली जगह हैं। ऐसे में उनके अपने घर को छोड़ कर विश्व के हर कोने में फैलने का कारण खाने पीने की कमी या जगह की कमी तो नहीं रही होगी। फिर तो कारण रहा होगा, वही इंसान के अंदर का पुराना कीड़ा - शिकार, खानाबदोशी, जीतना, हरा देना, आदि आदि। बस उसी क्रम में अंग्रेज़ निकल पड़े होंगे अपने घर को छोड़, इधर-उधर अपनी हुकूमत की डुगडुगी बजाने के लिए।
वाज़िब बात है, अच्छे खासे घर -परिवार को छोड़ कर कोई जब वीरान से जगह में आ जाए तो उसके पास कोई ख़ास काम-वाम तो रहता नहीं होगा। ऐसे में अंग्रेज़ जहाँ कहीं भी गए होंगे, वहाँ पर इनके पास पर्याप्त फालतू समय रहता होगा। अब पेट भरा हो, पर्याप्त से काफी ज्यादा समय हो और कोई जान-पहचान का जगह न हो तो समय काटने के लिए और जीवन कोउलझाये रखने के लिए कुछ तो करना होगा।
आदमी शुरू से आलसी जीव है, इसका प्रमाण था कि धीरे-धीरे वे ऐसे जगह में सेटल करने लगे जहाँ रहने खाने की सुविधा आसानी से मिलने लगे। इधर इंसान अपना ठिकाना बनाना शुरू किया, और उधर जंगल के जानवर भी कुछ सोचने को विवश हो गए। जंगल के जानवरों को अपने पुरखों के अनवरत ज्ञान-प्रवाह से एक बात स्पष्ट हो गया था कि उनके अच्छे संगत के लिस्ट में, इंसान नामक जीव नहीं आता था। इंसान के ज्यादा हिंसक होने का असर था कि जानवरों के भेजे में यह बात घुस गयी थी कि इंसान से दूरी बनाये रखना, उनके स्वास्थ्य के लिए ज्यादा अच्छा था।
इंसानों की तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या और जानवरों के जंगल के अंदर ही अंदर खिसकते चले जाने जैसी समस्या का तत्क्षण परिणाम यह हुआ कि अब इंसानों के लिए शिकार करना, पहले जैसा आसान सा काम नहीं रह गया था। आदमी का शिकार पर ही आश्रित रहना अब एक विकल्प नहीं था।
फिर इंसानों के अंदर का ट्यूब-लाइट जल उठा, और वे परिवार बना कर संगठित होकर खेती करने लगे। लाजमी है कि जब खेती शुरू हो गयी, तो फसल के तैयार होने तक काफी समय रहता होगा। मतलब अब जीवन-काल एक व्यवस्थित सा हो गया था। अब इंसान को सब कुछ आराम से मिलने लगा था, पर शिकारी रह चुके इंसान के अंदर के स्वाभाविक प्रतिस्पर्धा की भावना वाले कीड़े का शांत होना आसान नहीं था।
जानवरों को मार कर उनका विनाश करने से फसल को उगाने के- विध्वंस से सृजन का सफर - आसान नहीं रहा होगा! नए-नए शिकारी से किसान बने इंसान का जी मचलता रहता होगा कि कैसे किसी का पीछा करें, दौड़े - दौड़ाएं, हरा दें, जीत जाएँ, और भी न जाने कितने सारे ऐसे ही भावनाएं - जो उसके अंदर सदियों से हैं, और शायद हमेशा रहेगा।
इंसान के अंदर का शिकारी कभी न मरा हैं न मरेगा। अलबत्ता, इस भावना के तुष्टि करने के लिए इंसान ने सांकेतिक रूप से "सभ्य-लड़ाई" करने की आदत डाली, जिसे "क्रीड़ा" अथवा "खेल" कहा जाता है।
मानव के इस तरह से विकास के क्रम में और कई प्रकार के क्रिया कलाप हुआ- जिसे इतिहास में पढ़ा जा सकता है।
फ़ास्ट फॉरवर्ड अब हम आते हैं कोई दो-तीन सौ साल पहले के समय-काल में। शायद अंग्रेज़ों को अपने घर में मन-वन नहीं लगता था, और इसलिए ज्यादा समय वे इंग्लैंड से बाहर ही रहते थे। अंग्रेज़ों के पुरखे बहुत सोच समझ कर इंग्लैंड में सेटल किये होंगे। वे बहुत समझदार नस्ल थे, इस कारण से मैं आश्वस्त हूँ कि उनके रहने, खाने-पीने का कोई ख़ास कष्ट नहीं रहा होगा। मेरे हाल के इंग्लैंड के दौरे से यह और भी स्पष्ट हो गया कि अभी भी वहां पर्याप्त खाली जगह हैं। ऐसे में उनके अपने घर को छोड़ कर विश्व के हर कोने में फैलने का कारण खाने पीने की कमी या जगह की कमी तो नहीं रही होगी। फिर तो कारण रहा होगा, वही इंसान के अंदर का पुराना कीड़ा - शिकार, खानाबदोशी, जीतना, हरा देना, आदि आदि। बस उसी क्रम में अंग्रेज़ निकल पड़े होंगे अपने घर को छोड़, इधर-उधर अपनी हुकूमत की डुगडुगी बजाने के लिए।
![]() |
| Add caption |
वाज़िब बात है, अच्छे खासे घर -परिवार को छोड़ कर कोई जब वीरान से जगह में आ जाए तो उसके पास कोई ख़ास काम-वाम तो रहता नहीं होगा। ऐसे में अंग्रेज़ जहाँ कहीं भी गए होंगे, वहाँ पर इनके पास पर्याप्त फालतू समय रहता होगा। अब पेट भरा हो, पर्याप्त से काफी ज्यादा समय हो और कोई जान-पहचान का जगह न हो तो समय काटने के लिए और जीवन कोउलझाये रखने के लिए कुछ तो करना होगा।
तो ऐसे में ईजाद हुआ अनेको ऐसे खेल, जिन्हें अगर गौर से देखा जाए, तो वे खेलने वालों के साथ-साथ देखने वाले, दोनों के लिए रोचक है। अंग्रेजों ने इस बात पर जरूर ध्यान रखा होगा कि जिस किसी खेल की वो उत्पत्ति करें, वे एकरस न हो और सबसे महत्वपूर्ण रहा होगा कि वे काफी लम्बे समय तक सबों को सामूहिक रूप से व्यस्त रख सकने में सक्षम हों। खेल को खेलने से भी ज्यादा देखने में रोचक लगे, इसकी अहमियत इसलिए रहे होगी क्योंकि कई अंग्रेज़ अपने परिवार के साथ रहते थे, और फिर कई बिलकुल ही निकम्मे क़िस्म के आलसी से अंग्रेज़ भी रहे होंगे जो खेलना नहीं चाहते होंगे।
इस तरह से बड़ी जुगत लगा के इन सभी खेलो का नियम-वगैरह बनाया गया होगा जो आज तक कायम है- अंग्रेज़ों के जितने खेल होते हैं वे बहुत लम्बे समय तक चलते रहने वाला कार्यक्रम सा था। अंग्रेज़ों के साथ-साथ उनके घोड़े भी बोर न हो जाए इस लिए घुड़सवारी करते हुए पोलो नामक खेल का भी अविष्कार का वजह स्पष्ट सा है। क्रिकेट, गोल्फ, लॉन टेनिस, बैडमिंटन और भी कई तरह के खेल का इज़ाद हुआ।
इन में से ज्यादातर खेल ऐसे हैं जो कुछ घंटो से लेकर कई दिनों तक लगातार खेला जा सकता था। इन खेलों में जितने तरह के नियम कानून बनाये गए हैं, उन सभी को किसी किताब में लिखा जाना और फिर उसे पढ़ कर इन खेलों को खेलना और देखना- दोनों लगभग असंभव सा काम है। अतः जैसा ब्रिटेन का अलिखित संविधान है, उसी तरीके से अंग्रेज़ों के हर खेल के नियम कानून लोगों को लगभग कंठस्थ सा होता है - आप समझ गए तो ठीक पर अगर किसी को समझाना हो तो वह बहुत मुश्किल सा काम है।
सीधी सी बात है कि अगर कोई इन खेलों को देखते और समझते हुए नहीं बड़ा हुआ है, तो नए सिरे से उनको समझा पाना जरा सा टेढ़ी खीर है। यकीन न आये तो कभी किसी क्रिकेट के अनाड़ी को खेल के नियम बताने की कोशिश करें, आपको स्वयं के जीनियस होने जैसा कुछ फील होने लगेगा!
अगर क्रिकेट के इतिहास के पेज को पलटा जाए, तो पाया जाता है कि पुराने दिनों में क्रिकेट १०-१२ दिनों तक चलता ही रहता था। मतलब लोग जिस तरह से काम करने निकलते हैं, उसी प्रकार से क्रिकेट का मैच खेलने निकलते होंगे। लोग किसान की तरह, कंधे पर हल की जगह बैट को रखे हुए घर से निकलते होंगे! अगर रास्ते में कोई मिल जाए तो बताते होंगे, क्रिकेट का महासंग्राम के अनुष्ठान में निकल पड़े हैं। समय के आभाव में शायद उनकी दैनिक दिनचर्या भी बिगड़ गया होगा, कम से कम शुरुआती दौर के - W G Grace सरीखे, बल्लेबाजों के लम्बी बड़ी हुई मूंछ -दाढ़ी को देख कर तो ऐसा ही एहसास होता है! दिन भर मैदान में रहने के कारण ऐसा लगता है कि वे बहुत ही उबाऊ किस्म के लोग होते होंगे।
चूँकि क्रिकेट का खेल अनेकों दिन तक चलने वाला कार्यक्रम सा था- इसलिए हर तरह की सुविधाएं - जो इंसान के लिए आवश्यक से हैं, उन सब को खेल का एक अभिन्न हिस्सा सा बना दिया गया है। हरेक घंटे पर ड्रिंक्स, लंच और शाम को टी के ब्रेक। सूर्योदय के आस-पास से शुरू होने वाला ऐसा कार्यक्रम सूर्यास्त के पहले ख़त्म हो जाने का जुगाड़ लगाया गया है। खिलाड़ी अगर थक जाए तो उनके बदले कोई आकर फील्डिंग कर सकते हैं। अगर बैट्समैन थक गया या चोटिल हो जाए तो उसके बदले में कोई और दौड़ने आ सकता है! जो खेल से ऊब गए हों या उतना फिट नहीं रह गए हों की सक्रिय रूप से खिलाड़ी के तौर पर खेलें, उन्हें अंपायर बनाके समय काटने का जुगाड़ दे दिया गया।
कुल मिला कर क्रिकेट में कई परिवर्तन आये और अब खेल को निर्धारित समय के लिए खेल जाने लगा है और साथ ही खेल के अंत में कोई जरूर जीतता है- ५ दिनों के बाद ड्रा जैसा कुछ नही होता है! पर अब भी टेस्ट मैच चल रहा है जो बहुत ही नीरस और उबाऊ होता है, पर कई लोगों को क्रिकेट में सिर्फ "टेस्ट-मैच" ही पसंद आता है! लेकिन अब मैं पूरे पांच दिनों तक खेल को नहीं देख सकता, धन्य हैं वे सभी लोग जो अब भी मैदान में जाकर खेल की बारीकियों को परखते हैं और तारीफ करते हैं!
इस तरह से बड़ी जुगत लगा के इन सभी खेलो का नियम-वगैरह बनाया गया होगा जो आज तक कायम है- अंग्रेज़ों के जितने खेल होते हैं वे बहुत लम्बे समय तक चलते रहने वाला कार्यक्रम सा था। अंग्रेज़ों के साथ-साथ उनके घोड़े भी बोर न हो जाए इस लिए घुड़सवारी करते हुए पोलो नामक खेल का भी अविष्कार का वजह स्पष्ट सा है। क्रिकेट, गोल्फ, लॉन टेनिस, बैडमिंटन और भी कई तरह के खेल का इज़ाद हुआ।
इन में से ज्यादातर खेल ऐसे हैं जो कुछ घंटो से लेकर कई दिनों तक लगातार खेला जा सकता था। इन खेलों में जितने तरह के नियम कानून बनाये गए हैं, उन सभी को किसी किताब में लिखा जाना और फिर उसे पढ़ कर इन खेलों को खेलना और देखना- दोनों लगभग असंभव सा काम है। अतः जैसा ब्रिटेन का अलिखित संविधान है, उसी तरीके से अंग्रेज़ों के हर खेल के नियम कानून लोगों को लगभग कंठस्थ सा होता है - आप समझ गए तो ठीक पर अगर किसी को समझाना हो तो वह बहुत मुश्किल सा काम है।
सीधी सी बात है कि अगर कोई इन खेलों को देखते और समझते हुए नहीं बड़ा हुआ है, तो नए सिरे से उनको समझा पाना जरा सा टेढ़ी खीर है। यकीन न आये तो कभी किसी क्रिकेट के अनाड़ी को खेल के नियम बताने की कोशिश करें, आपको स्वयं के जीनियस होने जैसा कुछ फील होने लगेगा!
अगर क्रिकेट के इतिहास के पेज को पलटा जाए, तो पाया जाता है कि पुराने दिनों में क्रिकेट १०-१२ दिनों तक चलता ही रहता था। मतलब लोग जिस तरह से काम करने निकलते हैं, उसी प्रकार से क्रिकेट का मैच खेलने निकलते होंगे। लोग किसान की तरह, कंधे पर हल की जगह बैट को रखे हुए घर से निकलते होंगे! अगर रास्ते में कोई मिल जाए तो बताते होंगे, क्रिकेट का महासंग्राम के अनुष्ठान में निकल पड़े हैं। समय के आभाव में शायद उनकी दैनिक दिनचर्या भी बिगड़ गया होगा, कम से कम शुरुआती दौर के - W G Grace सरीखे, बल्लेबाजों के लम्बी बड़ी हुई मूंछ -दाढ़ी को देख कर तो ऐसा ही एहसास होता है! दिन भर मैदान में रहने के कारण ऐसा लगता है कि वे बहुत ही उबाऊ किस्म के लोग होते होंगे।
चूँकि क्रिकेट का खेल अनेकों दिन तक चलने वाला कार्यक्रम सा था- इसलिए हर तरह की सुविधाएं - जो इंसान के लिए आवश्यक से हैं, उन सब को खेल का एक अभिन्न हिस्सा सा बना दिया गया है। हरेक घंटे पर ड्रिंक्स, लंच और शाम को टी के ब्रेक। सूर्योदय के आस-पास से शुरू होने वाला ऐसा कार्यक्रम सूर्यास्त के पहले ख़त्म हो जाने का जुगाड़ लगाया गया है। खिलाड़ी अगर थक जाए तो उनके बदले कोई आकर फील्डिंग कर सकते हैं। अगर बैट्समैन थक गया या चोटिल हो जाए तो उसके बदले में कोई और दौड़ने आ सकता है! जो खेल से ऊब गए हों या उतना फिट नहीं रह गए हों की सक्रिय रूप से खिलाड़ी के तौर पर खेलें, उन्हें अंपायर बनाके समय काटने का जुगाड़ दे दिया गया।
कुल मिला कर क्रिकेट में कई परिवर्तन आये और अब खेल को निर्धारित समय के लिए खेल जाने लगा है और साथ ही खेल के अंत में कोई जरूर जीतता है- ५ दिनों के बाद ड्रा जैसा कुछ नही होता है! पर अब भी टेस्ट मैच चल रहा है जो बहुत ही नीरस और उबाऊ होता है, पर कई लोगों को क्रिकेट में सिर्फ "टेस्ट-मैच" ही पसंद आता है! लेकिन अब मैं पूरे पांच दिनों तक खेल को नहीं देख सकता, धन्य हैं वे सभी लोग जो अब भी मैदान में जाकर खेल की बारीकियों को परखते हैं और तारीफ करते हैं!

No comments:
Post a Comment