Showing posts with label कदमा बाजार. Show all posts
Showing posts with label कदमा बाजार. Show all posts

Feb 23, 2016

कदमा बाजार

बचपन में स्कूल आने और जाने के दौरान, मुझे रास्ते के अगल-बगल, सड़क के किनारे होते गतिविधियों को करीब से देखने का बहुत शौक होता था। उन दिनों घर से स्कूल जाने के लिए, मुझे कदमा बाजार के आस-पास से गुज़रना पड़ता था।

उन दिनों के कदमा बाजार के माहौल को, किसी ग्रामीण हाट के परिष्कृत रूप में ही समझना चाहिए। बाज़ार के अंदर, टीन शेड वाले - स्थाई और अस्थाई के बीच झूलते से- कई सारे दुकान बिखरे पड़े थे। बाजार के अंदर, अनेको प्रकार के दूकान थे, पर बहुत कम संख्या में ही सीमेंट और ईंट के बने पक्के दुकान थे। ऐसा ज्ञात होता था कि शुरू के बने कुछ स्थाई दुकानों के इर्द गिर्द, कई सारे दूकान जुड़ते चले गए होंगे - और कुल मिला कर, बाज़ार बहुत ही घनी और भीड़ भरा, मेले के जैसा शकल ले लिया था।

रोजमर्रा की हर चीज़ों के लिए लोग कदमा बाज़ार आते थे जिनमें मिठाई से मछली, कपडे से लेकर कंसार के दूकान, गेंहू को पीसने वाले आटा-चक्की से लेकर शादी के कार्ड से किताब तक छापने वाले प्रेस, रेडियो से लेकर गाड़ी के मरम्मत करने वाले या फिर होमियोपैथी अथवा अंग्रेज़ी दवा-दारु करने वाले डाक्टर और दवा के दूकान - यानि जो कुछ भी एक घर को चलाने के लिए जरूरी हो सकता था, वे सभी कुछ उस बाजार में मिलते थे।

वैसे वहां कुछ "महंगे" दूकान से भी हुआ करते थे जो कदमा बाजार में भी साडी, कपडे या सोने के आभूषण बेचने जैसा दुस्साहस करते थे, क्योंकि ऐसे महंगे सौदे के लिए साकची अथवा बिष्टुपुर जाने का प्रचलन सा था।

कदमा बाजार से मेरा रिश्ता है, धुंधली सी हो गयी यादों में भी कदमा बाजार उभर कर आ जाता है।
  
मेरे नानाजी को बाजार जाने का व्यसन सा था और इस कारण वे शुबह या शाम एक चक्कर जरूर लगाते थे। मेरे जरा बड़ा हो जाने के बाद, मुझे उनके साथ सामान को ढोने का स्वतंत्र कार्य-भार के लिए चुना गया था। मेरे इस महत्वपूर्ण कार्य के चयन में मेरे घर पर उपद्रव करने से रोक, और शारीरिक क्षमता आदि जैसे अनेकों कारणों का समावेश सा रहा होगा।परन्तु अब लगता है कि संभवतः ऐसा इस लिए हुआ होगा क्योंकि अक्सर शाम के समय जब बच्चे एक-दूसरे के साथ खेलते या गप-शप करते, मैं घर पर अकेला बोर होता रहता था।

मेरे साथियों के बहिष्कार के अनेकों कारण का निचोड़ यह था कि - किसी भी खेल में लोगों को मेरी अधीनता स्वीकारनी पड़ती थी। मेरे पास क्रिकेट खेलने के लिए अपना बैट और बॉल होता था, जिस कारण लोग मेरे साथ खेलने मेरे पास आते थे, पर शर्त यह होता था कि जिनको मेरे साथ खेलना हो, वे अपने बैटिंग का क्रम निर्धारित कर लें, पर सबसे पहले बैटिंग मेरी ही होगी।

यहाँ तक के शर्त को मानने के लिए सब सहर्ष तैयार हो जाते थे, पर समस्या इसके बाद शुरू होती, जब मैं स्वयं को कभी आउट नहीं मानता, चाहे कोई भी नियम से मुझे आउट करने की कोशिश की जाए। एकाध बार मेरे आउट होने और मेरे नहीं मानने के कारण, धीरे-धीरे अपने बौद्धिक क्षमता के हिसाब से बच्चे खेल से गायब होने लग जाते थे। और अंत में जब चंद बचे हुए निरीह प्राणी, बड़े हसरत से अपने बैटिंग को पाने के लिए अधीर होकर जरा सा खीझने से लगते थे, तो मैं उनके इस तरह के विरोध को भी नहीं पचा पाता था। जल्द ही मैं बैट और बॉल को लेकर घर की ओर चल देता।

इस तरह के बहिष्कार करने के बाद, एकाध लोग दबे स्वर में विरोध प्रकट करते थे, पर चूँकि बैट और बॉल मेरा ही होता था, कोई मेरा कुछ भी नहीं कर पाते थे। मेरे घर के आस-पास ही खेलने के दौरान, घर के किसी अभिभावक के निगरानी होने के वजह से, ज्यादातर बच्चे कुछ बुदबुदाते हुए,  कुछ धीमे स्वर में गलियां देते और कुछ तो मुझसे कभी भी बात न करने की दुहाई देते हुए, बेबस, लाचार  और ठगे सा महसूस करते हुए अपने-अपने घर की ओर रुखसत कर जाते। 

इस तरह के एकाध बार के व्यवहार के बाद, बहुत कम ही धैर्यवान बचे थे, जो मेरे साथ खेलने की जुर्रत करने की हिम्मत जुटा पाते थे। जल्द ही मैं अकेला निराश होकर बाकी को खेलते हुए देखता, और फिर किसी बच्चे का मेरे तरफ कोई रूचि न दिखाने के कारण, मेरे अंतर्मन को बहुत ठेस सी लगती, और मैं अक्सर दुखी होकर अपने घर के सामने निराश खड़ा रहता था।

फिर कुछ दिनों तक घर के छत, अमरुद के पेड़ आदि पर चढ़ने, कूदने जैसे स्वततंत्र क्रिया-कलाप के बाद धीरे-धीरे यह महसूस करने लगा था कि - समाज परस्पर संबंधों पर आश्रित होता है, और मेरे इस तरह से लोगों के बहिष्कृत कर देने के कारण मैं बहुत दुखी एवं निराश रहने लगा था। अंततः एक दिन मेरे अंदर से स्वतः यह प्रस्फुटित हो गया कि -"नानाजी, मैं किसके साथ खेलूं?"

नानाजी को लगा कि मुझे अपने साथ कभी-कभार बाजार ले जाने से - एक पंथ दो काज होने लगा था। उन्हें भी रास्ते भर के लिए सामान उठाने के लिए मेरे जैसा एक सहायक मिल गया था। अनायास इस तरह के वैकल्पिक व्यवस्था के बन जाने से मुझे अनेको प्रकार के नए रोचक जानकारियां मिलने लगी थी। किसी अभिभावक के साथ बाजार जाने से मुझे सुरक्षित रूप से हर कोने के विचरण करने का अवसर मिलने लगा था।

बाजार के अनेको प्रकार के क्रिया-कलाप को करीब से देखने में बहुत दिलचस्पी आने लगी थी और इस तरह से जीवन के अनेको पहलुओं को करीब से देखने लगा था। साथ ही नानाजी कभी-कभार किसी मिठाई के दूकान में कुछ जलपान भी करा देते थे। ज्यादा समय मथुरा मिष्टान्न भंडार जाता था - काउंटर पर बैठे मिठाई दूकान के मालिक, नानाजी को देखते ही बड़े इज़्ज़त के साथ लगभग लाउडस्पीकर के फ्रीक्वेन्सी में -"आइये मिश्राजी, कहिये कैसे हैं?", कहता हुआ हमारे विशेष आवभगत करतने का निर्देश दे देता था।

रंकिनी मंदिर के तरफ से आने पर पहले मेरा स्कूल कदमा बॉयज़ स्कूल, फिर कदमा गर्ल्स सजूल और उसके बाद स्काउट सेंटर पड़ता था। तिकोने लाल रंग से बने उभरे डिज़ाइन वाले दीवार के ठीक बाद कदमा बाजार शुरू हो जाता था। सबसे कोने में दूध डिपो पड़ता था, जहाँ से मैं सुबह सुबह दूध के बोतल लेने आया करता था।  उसके ठीक बगल में टिन-शेड से ढंके दूकान होते थे जिनमे ज्यादातर टाइपिंग सीखाने वाले दुकान और एकाध प्रिंटिंग-प्रेस के दूकान होते थे, काफी दिनों तक इन दुकानों में जा कर प्रिंटिंग प्रेस के मशीन के बारीकियों को समझने की कोशेिश की थी। मेन रोड के तरफ एक राशन का दूकान होता था जिस पर जाने के लिए करीब ८-१० सीढ़ियों को चढ़ना पड़ता था।


इन दूकानों के कतार के दूसरे कोने में आटा चक्की हुआ करता था।

फ्लोर मिल के करीब आते-आते बरबस दो चीज़ों पर ध्यान चला जाता था। एक बहुत बड़ा सा तराजू जिसके बगल बचपन में देखी गयी सबसे बड़े बटखरे होते थे। और उस तराजू के ठीक सामने काफी मोटा सा इंसान बैठा होता था, जो उन भरी भरकम  बटखरे की तरह ही कभी-कभी ही उठ पाता था। तराजू के पीछे बैठा, मानो जीवन से पूरी तरह से निराश वाले भाव में वह बीच बीच में तराजू पर बटखरे रखता और, जैसे ही तराजू के धर्म-कांटा स्थिर होता, वह तुरंत वजन को लिखना शुरू कर देता।

वजन करने वाले की वेश-भूषा कुछ ऐसी होती थी कि मानो वह दूकान को बंद करते ही सीधा नहा सके, लुंगी के ऊपर एक गंजी, जिसमे वातानुकूलन के लिए अनेकों छोटे-बड़े छिद्रों की भरमार सी होती थी, उसे पहने वह पीसे हुए गेंहू के थैले की तरह बैठा होता था। सामने कुछ महिलाएं गोल बने "सूप" से फाटक फाटक कर गेंहू से कंकड़ और गंदगी निकालने वाले काम में - आटा चक्की के दूकान के परजीवी बन कर अपना पेट भी पाल रहे होते थे।

"गेंहू साफ़ करवा के फिर पीसने देने का विकल्प सामने दिख  ही रहा है, तो फिर बताने की क्या जरुरत है"- इस भावना के साथ तराजू में तौलने वाला मनुष्य इस तरह के विकल्प के बारे में बताने का कष्ट भी नहीं करता था, और अपने काम को पीछे चल रहे मशीन की तरह निशब्द भाव से करता रहता था। परिक्षा में पूछे किसी भी युद्ध के अनेको कारणों में से प्रमुख कारण - जिस के उल्लेख मात्र से परीक्षक को परीक्षार्थी के विषय पर सम्पूर्ण प्रभुत्व का बोध हो जाता हो, उसी तरह से इस शांत मनुष्य के निराकार भाव से तन्मयता पूर्वक काम करते हुए निशब्द होने का मुख्य कारण सर्वथा यह हो सकता था कि उसका मुंह खैनी के पीक से भरा हो, और जब तक जरुरत न पड़े वह थूकने के लिए उठने वाला व्यायाम नहीं करना चाहता हो।

सामने चल रहे गेंहू सफाई के प्रति अपने इस तरह भावना के जग जाने से लोग अपनी स्वेच्छा से गेंहू की सफाई के बाद पीसाई के काम का अनुमोदन करते हुए, वहां से बाजार के बाकी काम के लिए निकल जाते थे।
  
मिल में काम करने वाले लोग भी मशीन की तरह अपने अपने काम को करते रहते थे, मशीन के चीख-चीख कर शोर करने के बाद इंसानों के चीखने की इच्छा-शक्ति ख़त्म सी हो चुकी दिखती थी।मशीन अपना धर्म निभाते- अपने साथ काम करते इंसान बन चुके मशीन को भी अपने ही रंग में ही रंग चुका होता था। मिल के आसपास चारों ओर सफेद आटे की परत फैले होते थे। चौकोर चौड़े मुंह वाले शूट से गेंहू को डाला जाता था। सबसे ज्यादा शोर करते हुए मोटर से मोटे चक्की के बड़े-बड़े फ्लाईव्हील को अनवरत एक मोटा सा बेल्ट घूमाता रहता था। चलते मोटर में काफी शोर होता था, और बेल्ट के थोड़े ढीले होने और कुछ सिलाई आदि के कारण, हर बार उसके घूम कर वापस आने पर "फट्ट-फट्ट" के तमाचे मारने जैसी आवाज आती।

भूकम्प आने पर हिलते जमीन सा कांपता कंक्रीट के फ्लोर और शोर के बीच  सभी काम करने वाले कर्मचारी और तराजू के पास बैठी आदमियों के सिर और आँखों के बालों के ऊपर सफ़ेद आटे के परत लग जाने से, उनके कम उम्र के बूढ़े जैसा रूप-रेखा दिखता था। इतने शोर के बीच भी लोग बातें करते और आदमी और मशीन के बीच एक दूसरे के आवाज को शांत करने का प्रतिद्वंद सा चलता था। मेरा जी करता था कि चाहे तो वहाँ जितनी कोर से चाहे चीख लो, कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।

इतने शोर और  जलते हुए आटे के गंध के बीच भी एकाध लोग कुर्सी लगाए अखबार पढ़ने में लीन बैठे होते थे।

तराजू पर वजन करने के बाद, किसी भी तरीके से फाड़े हुए कागज़ के टुकड़े पर बेमन से उतने ही गंदे से लिखावट में गेंहू के वजन को लिख कर दे दिया जाता, और जब तक वजन लिखने का काम संपन्न होता, एक मज़दूर थैले को सामने के लम्बे कतार में लगा चुका होता था।

बारी-बारी से हर थैले को बड़े से चौकौर शूट में उड़ेल दिया जाता था। ठीक उसके नीचे के हिस्से में एक पैर के गोलाकर पजामे के शकल में लहराते कपडे के लम्बे पाइप जैसे हिस्से से सफ़ेद आटे निकलते रहते थे। मेरी समझ में आजतक यह नहीं आया कि  लगातार गेंहू के डालते रहने के कारण, मिल को ऑपरेट करने वाला मज़दूर को यह कैसे पता होता था कि किसके हिस्से का आटा कब निकल गया।

बहरहाल लगातार डाले जा रहे गेंहू और निकलते आटे का सिलसिला अनवरत चलता रहता, और जिस तरह से गेंहू के थैले के कतार किसी स्कूल में शिक्षा प्राप्त करनेवाले के पहले जैसे "कच्चे" अवस्था में होते, स्कूल से शिक्षा प्राप्त सफ़ेद महीन आटा बनकर सामने के कतार में बैठे मिलते। जिस तरह से सभी थैले के अभिभावक, अपने-अपने बच्चों को स्कूल में छोड़ कर जाते थे, कुछेक घंटों बाद वापस उन्हें लेने आ जाते थे। आटे के थैले को फिर से तौला जाता और गेंहू के बराबर वजन के बाद वहां का सिलसिला ख़त्म हो जाता।    


उन स्थाई दूकानों के बीचो-बीच बहुत बड़ा सा सब्जी-बाजार था। बिलकुल गाँव के हाट की तरह - जमीन पर बिछे हुए, बहुत सारे दूकान, ग्रामीण माहौल सा बना देता था। कतार में बैठे, अनेको सारे दूकान में - कोई मौसम के हिसाब से - सीज़नल - हरी सब्जियां बेचते हुए, तो दूसरी ओर सालों भर एकरसता के समां बनाये से - आलू-प्याज बेचने वाले भी एकाध कोने को सम्हाले रहते थे।

सब्जी-बाजार के एक कोने में, कुछ कम में ही संतोष करने वाले जैसे दूकान भी होते थे, जो सिर्फ नीम्बू, धनिया, मिर्च, अदरख और लहसुन बेच कर, अपने अस्तित्व को सम्हाले होते थे। आमतौर पर लोग सब्जियों के पूरे खरीद के बाद ही इन दूकानों के दर्शन करते हुए घर जाते थे। इस तरह के दूकान में अंत में आने का कारण यह होता था कि बचे खुचे - खुदरे से ही ऐसे दूकान का सौदा हो जाता था। साथ ही, बाकी भारी सब्जियों के खरीद के बाद, उनके थैले में जम जाने से, उनके ऊपर इस खरीद को रखने का फायदा यह था कि नाजुक से धनिया-पत्ते के झुण्ड के दब जाने का और पत्तों के टूट कर खराब हो जाने का भय नहीं होता था।

पूरे सब्जी-बाजार में बहुत शोर व्याप्त रहता था - हर कोई अपने सब्जियों के कुछ विशेष प्रकार से ज्यादा आकर्षक होने के प्रमाण स्वरुप - जैसे "हर्रा-हर्रा मटर" या "लाल-लाल टमाटर" या "ताज़ा करैला" आदि  जैसे विज्ञापन के "की-वर्ड्स" को प्रचारित करते रहते थे। साथ ही, सब्जियों के मूल्य को भी चिल्ला -चिल्लाकर सुनाते हुए, ग्राहकों को अपनी और आकर्षित करने के प्रयास में सतत लगे रहते थे। जो लोग सब्जियों को चुनने के काम में लगे होते थे, उनके पास एक डलिया होता था और जो उसी दूकान से खरीदने का मन बना लेते थे, उन्हें भी एक और डलिया दे दिया जाता था। जिसके बाद, सब्जियों को चुनने का ज्ञान होना, अपेक्षित था - अर्थात उनका ताज़ा होने का प्रमाण के लिए उपयोग में आने वाले व्यवहारिक ज्ञान या अनुभव।

वस्तुतः सब्जी के ढेर से अच्छी और ताज़ी सब्जी को चुनना - एक प्रकार से हर सब्जी के परीक्षण करके, उनको पास-फेल करने जैसी प्रक्रिया थी। हर सब्जी को परखने का एक निश्चित तरीका सा होता था, जिसमे उन सब्जियों का पास होना आवश्यक सा था - जैसे टमाटर का जरा कच्चा और सख्त होना, लौकी में नाख़ून से हल्का सा दाग लगाने से- हल्का सा रस की तरह - पानी का निकलना- या फिर भिन्डी के नीचले डंठल के तुरंत टूट जाना या बीन्स और बरबट्टी के आराम से टूट जाना आदि। ऐसे और भी सामान्य ज्ञान की शिक्षा - अपने बुजुर्गों के साथ, सब्जी बाजार में घूमने के दौरान मिल गया था। डलिया में सब्जी को छांटते या चुनते समय सिर्फ सोच का ही फेर था - अर्थात सकारात्मक भाव से सब्जी का चुना जाना और नकारात्मक भाव में उनको छांटना - अंततोगत्वा, सब्जी को उस डलिए में रखना ही लक्ष्य होता था। इस बात का भी ज्ञान होना आवश्यक था कि एक किलो में किस प्रकार के सब्जी का कितना मात्रा - "चढ़ेगा" - अन्यथा ज्यादा सब्जी को चुनने में लगाये समय व्यर्थ जाने वाला था। इस तरह से सब्जी का सौदा करना कोई बहुत "सरल-विधा" नहीं थी!

सब्जी बाजार को चारों ओर से कई और प्रकार के दूकानें कुछ इस तरह से घेरे होते थे, जैसे किसी हुड़दंगियों के झुण्ड को पुलिस घेरे हुए हों। इन दूकानों मे से कई सारे बाजार के सामने वाले रोड की ओर मुँह किये हुए होते थे। इन दूकानों में, कई सारे नाई के दूकान भी होते थे, जिनमें से एक - शर्माजी का नाई दूकान भी होता था, जो एकाध महीने में, हमारे सिर के बोझ को हल्का करने के लिए पहुँचने का एक निर्धारित सा लक्ष्य होता था। नाई दूकान और मेन-रोड के बीच के जगह - अमूमन तौर पर खाली होते थे। कई साल तक सड़क के दोनों ओर के फुटपाथ, वास्तव में लोगों के चलने के लिए ही हुआ करता था। इस वजह से, जैसा उम्मीद किया जाना चाहिए, वे खाली हुआ करते थे, बल्कि रोड के दूसरी ओर लाइन से बहुत सारे घर भी होते थे।

कालांतर में, उस रोड और बाजार के बीचे के खाली भाग में इक्का दुक्का करते हुए - बहुत सारे सब्जी बेचने वालों ने, जमीन पर सब्जियों का ढेर लगाकर सब्जी मंडी के जाल सा बनाना शुरू कर दिया, और फिर जैसा भारत के किसी खाली जगह का हश्र होता है- बाजार के पास वाले इस फुटपाथ में भी किसी अमरबेल की तरह से सड़क के दोनों ओर, सब्जियों का टीला सा लगने लगा। सब्जियों का ढेर - पंक्तिबद्ध - जिस तरह से खेतों में उगते थे, उसी प्रकार से बिकने के लिए भी कतारबद्ध से फ़ैल गए।

Feb 18, 2016

सड़क-छाप जड़ी-बूटी वाला

आज के दौर में बाबा रामदेव के पतंजली और आयुर्वेद के व्यवसायीकरण से बहुत पहले, आयुर्वेद, जड़ी-बूटी इत्यादि जैसे  दवा-उपचार का व्यवसाय एक कुटीर उद्योग के तौर पर हुआ करता था। इस तरह के व्यवसाय का जाल बहुत सारे वैद्य-हकीमों के बीच बिखरे पड़े थे। आये दिनों शहर के किसी भीड़-भाड़ वाले खाली जगहों पर इस तरह के वैद्य या हकीम अपना टेंट लगा कर अनेकों प्रकार के असाध्य और लम्बे समय से चले आ रहे बीमारियों को ठीक करने का दावा किया जाता था।

हिमालयी जड़ी-बूटी बेचनेवालों का हिसाब किताब कुछ अलग सा होता था। उनका टेंट  होता था जिसके अंदर उनके एकाध हफ्ते से महीनो का जुगाड़ सा लगता था। टेंट के सामने बहुत ही रोचक ढंग से अनेकों प्रकार के जड़ी बूटी और अन्य औषध के डिब्बे रखे होते थे। इन औषधियों मे काफी प्रकार के सूखे जड़ों के डंठल, सूखे बीज, या इसी तरह के अन्य प्राकृतिक सामग्रियाँ रखे होते थे, जिन्हे बड़े तरीके से शीशे के बरनी या कुछ उसी तरह के दिखने वाले जुगाड़ में बहुत हिसाब से प्रदर्शन के लिए रखा जाता था।

वैसे हमारे लिए बचपन में इस तरह के टेंट में कुछ ज्यादा समझने लायक तो होता नहीं था - क्योंकि इसमें बताये जाने वाले रोग एवं उपचार को जानने में हमारी कोई ख़ास रुचि नहीं होती थी। पर फिर भी अन्य कारणों से हम इन्हें देखने के लिए रुक जाया करते थे।

एक कारण तो यह हुआ करता था कि इस तरह के टेंट में बहुत अच्छे प्रकार का लाउडस्पीकर लगा होता था, जिसमे गाना वगेरह चलता रहता था। बीच बीच में गाने को रोक कर वैद्य या हकीम साहेब माइक में कुछ उद्धघोष करते थे और फिर टेंट के अंदर नुमाइश के तौर पर रखे अनेकों प्रकार के रंगीन पत्ते, बीज, इत्यादि फैले से होते थे और कहीं कही उनका ऊँचा सा ढेर लगा होता था  - जिन्हें वह अपने हाथ में रखे माइक से बहुत ही रोचक ढंग से बताया करते थे।

उस वैद्य के साथ ही उसका एक असिस्टेंट भी होता था जिसका काम तरह तरह के सामग्रियों को लेकर कुत्ते रहने या पीसने जैसे काम में लगा होना होता था। ज्यादातर वह बिलकुल चुपचाप सा होता था और अपने काम में बहुत निष्ठापूर्वक लगा होता था। मगर उसके बगल में एक बैटरी से चलने वाला माइक्रोफोन और कुछ गाने बजाने वाला - रिकार्ड प्लेयर होता था।  इतने सारे रोचक क्रियाओं को छाव से देखना बहुत ही सुखद अनुभूति होती थी। दवा का बनते देखना और उसका साथ में बज रहे मधुर गाने, फिर बीच बीच में रनिंग कमेंट्री भी सुनाई देता था।

मुख्य वैद्य या हकीम बिलकुल विद्वान सा लुक देकर सभी समस्याओं का समाधान बताने वाले मुद्रा में बैठा होता था।  बीच बीच में वह माइक से - अनेको प्रकार के बीमारी - उसके लक्षण- और फ़ी अचूक निदान के बारे में लोगो को जानकारी देता रहता था।  हरेक दो लाइन में - हिमालय, जड़ी-बूटी,  दुर्लभ, बेशकीमती, खानदानी वैद्य या हकीम. देसी जड़ी-बूटियों वाला काढ़ा, सालों से नहीं ठीक होने वाला बीमारी, सभी प्रकार के असाध्य रोग, शर्तिया इलाज़, गारंटी, पैसे वापस - जैसे शब्दों के उच्चारण से  समां बना रहता था।

बीच-बीच में वह एक छड़ी से दीखाता हुआ, कुछ अजब-अजब प्रकार के जड़ी-बूटियों की जानकारी देता हुआ, लोगो में अपने ज्ञान की छाप और विश्वसनीयता पैदा करने जैसा कुछ कार्यक्रम करता रहता था जब आस पास भीड़ काम हो जाती तो वह फिर से किसी हिंदी फ़िल्मी गाने का सहारा लेलेता और लोगों के मनोरंजन में अपने को भी समर्पित कर देता था।

भारत में फ़िल्मी गाने का बनने का मुख्य मकसद, फिल्म के किसी कठिन परिस्थिति को सहज और काव्यात्मक ढंग से संगीतबद्ध तरीके से व्यक्त करना रहा होगा। पर कालांतर में, फिल्म के गाने का मुख्य प्रयोग, रेडियो-स्टेशन में - विविध भारती  के २४ घंटे- सेवा में युक्त हो जाना, पार्टी-त्यौहार में बजते रहना और इस तरह के दूकान या मेले जैसे माहौल में बजते रहने का बहुत बड़ा उपयोग सा था।

इस कारण गाने का फिल्म में कोई प्रयोजन हो या न हो - पर उनका उपयोग, उसके अलावा और बहुत सारे अन्य क्षेत्र में ज्यादा होता था।

Dec 30, 2015

जादू के खेल का वृतांत

मदारीवाला अपने मुख्य कार्यक्रम की ओर बढ़ता था। ठीक-ठाक भीड़ जमा हो चुकी होती थी और अचानक से, मदारीवाला दर्शक-दीर्घा में से किसी एक ऐसे इंसान को बुला लेता था, जो अगले १५-२० मिनटों तक उसके हर प्रश्नों के जवाब देते हुए जादू के प्रक्रिया का हिस्सा सा बन जाता था। साथ ही साथ, मदारीवाला दर्शकों में से चुने गए अपने "सहायक" से कुछ ऐसे प्रश्न करता था, और उन प्रश्नों में उसे कुछ ऐसा उलझा देता था कि लोगों को बरबस हंसी आने लग जाती थी।
मदारी वाला बाते करते-करते, लोगो के घेरे में बीच में बिछे चादर को ठीक तरीके से फैला कर रखते हुए, साथ में डमरू को बजाता और बोलता-
मेहरबान! कदरदान!! साहेबान!!!
हिन्दू को राम राम, मुसलमान को सलाम!
अभी आपके सामने जादू का खेल होगा!
साहेबान, बहुत मेहनत का काम है भूत का सामना, एक चूक और बस जान से हाथ धो लेना पड़ता है......मगर मेहरबान, पापी पेट का सवाल है, सब कुछ करेगा!
मेरे मालिक, फिर भी कर के दिखायेगा, जान की परवाह नहीं करेगा, सभी को दिखायेगा!
ये बच्चा, जी हाँ, इस बच्चे को भेजेगा, उस नीम के पेड़ के ऊपर भेजेगा,बच्चा जायेगा, नीम के पेड़ वाले प्रेत आत्मा के पास जायेगा, अपनी जान पर खेल के जायेगा....और उधर छोड़ के आएगा भूत को...
साहेबान, आपके सामने, ये गायब हो जाएगा.....और्रर्र .. मेहरबान, कदरदान, साहेबान, ये पहुंचा देगा, उसको अपने घर, वो उद्धर्रर्र ..ये जाएगा, आपके सामने से जाएगा, जान पे खेल के जाएगा और उसको अपने घर पहुंचा के आएगा!
इस लम्बे चलने वाले प्रवचनात्मक एवं डरावनी बातों के सिलसिले के बीच, जिस बच्चे के उपर भूत आने की बात हो रही होती थी, वह छोटा बच्चा चीख-चीख कर जवाब देता हुआ, थाली पर चम्मच्च को ठोकते हुए - जादूगर के बातों और उसके डमरू के साथ ताल मिला रहा होता था।

मदारीवाला भले ही बार-बार अपने साथ के बच्चे के ऊपर भूत के प्रकोप और उस से हो रही परेशानियों के बारे बता रहा हो, पर उन बातों से बेफिक्र सा, छोटा-बच्चा पूरे विश्वास के साथ काफी सहज होकर अपनी "जान की बाज़ी" लगाने की तैयारी में लगा होता था।

इधर समां बंधता जा रहा होता था, और उधर मदारीवाला तन्मयता से बीच-बीच में डमरू को बजा कर जोर जोर से - "ड्रीम, ड्रीम" की आवाज़ निकालते हुए, और अंत में एक बार डमरू को, कंधे के ऊपर से कमर के नीचे तक के एक घुमाव में लिए झटके के साथ जोर की  "...ड्राम" की आवाज़ निकालते हुए, लगभग चीखते हुए कहता -
हा-ई-एह, वाह रे वाह, शाब्बाश मेरे शेर!
सभी साहेबन को तमाशा दिखायेगा?
सबों को जान पर लड़ कर दिखायेगा?
अपनी जान पे खेल के उस के पास जाएगा?
इन सभी प्रश्नवाचक चीखों को बिना कुछ सुने या समझे हुए- जिसकी कोई गुंजाइश भी नहीं होती थी- छोटा बच्चा भी चीख-चीख कर सकारात्मक प्रत्युत्तर देकर, अपना हिस्सा पूरा कर रहा होता था - और हर बार "करेगा", "दिखायेगा", "जाएगा" -आदि में से किसी एक को चुन कर बोल डालता था। फिर सहानुभूति प्राप्त करने के हिसाब से मदारी बोलता था-
देखिये साहब, आप सभी इत्मीनान से देखिये!
आप इस तमाशा को देखिये....
ये बच्चा जान पर खेलेगा....
ये आपका दिल बहलाएगा....
साहेबान, आपको पसंद आ जाए तो इस गरीब के चादर पर चार आना,आठ आना देते जाइयेगा....
आपके घर में भी ऐसे ही बच्चे होंगे, ऊपरवाला आपके बच्चों को सलामत रखेगा!
फिर माहौल को और रोचक बनाते हुए -
तो बेटा, खेल के लिए तैयार है?
छोटा बच्चा लगभग आग में कूदने वाले अंदाज़ में -
ज--य्य खल्ल-बली, तैयार है, करके दिखायेगा!
मदारीवाला जोश को और बढ़ाते हुए और दर्शक दीर्घा की ओर घूम कर देखते हुए -
मेहरबान, कदरदान, साहेबान, मेरे मालिक, इस्स्स बच्चे का हौसलाफज़ाई कर दीजिये, एक बार जोर से ताली बजा दीजिये..!
लोग बड़े जोश में ताली बजाते और फिर मदारीवाला वापस बच्चे से -
तो चल आ जा बेटा, इधर आ के लेट जा बेटा!
दर्शक दीर्घा के घेरे के बीच में बिछाए चादर पर बच्चा लेट जाता। उसके लेटने के बाद बहुत सारे चादर से उसे ढंकते हुए - डुगडुगी और बांसुरी के सुर-ताल के साथ, मदारीवाला एक बेंत से बने चौकोर आकार के टेंट से बने कवर से बच्चे को ढँक देता था। कुछ और वार्तालाप होता रहता था, जिसमे बच्चे के भूत के प्रकोप और भूत के द्वारा कुछ "प्रेतात्मक" बातों  का सिलसिला का जिक्र होता था।

अंततः, उस टेंट से बने कवर के ऊपर भी कई चादरों को डाल कर, उसे भी ढंकना शुरू कर दिया जाता था। फिर थोड़ी देर घूमते-फिरते उस दर्शकों में से निकाले गए "सहायक" व्यक्ति के करीब आ कर -
भाई, ये बताइये कि मरा हुआ इंसान का कपड़ा छूना अच्छा बात है, क्या?
अनजाने में मदारीवाले के जादू के सहायक के रूप में फंस चुका इंसान, कुछ झुंझलाते हुए -
हम्म...नहीं
मदारीवाला पहले उसकी बात का समर्थन पर उस से बाकी को और डराते हुए -
ये बात तो ठीक बोला है, बिलकुल सही बोला है मेरे भाई ने......
पर साहेबान, एक बात याद रखना, छूने में कोई खराबी नहीं है,
ऐ मेरे मालिक, ऐ मेरे मौला, ऐ मेरे जहाँपनाह, मुर्दा भी कभी ज़िंदा था!
ज़िंदा आदमी ही तो कपड़ा पहनता है और जिन्दा आदमी ही मरता है!
फिर मदारीवाला हँसते हुए, सबों की ओर देखते हुए, पूछता-
साहेबान, ये बताना कि जिन्दा आदमी ही मरता है न?
फिर थोड़े देर के बाद, अचानक से कुछ दार्शनिक सी बातें करता हुआ  -
कल तो गज़ब हो गया भाई, एक ज़िंदा आदमी मर गया!
लोग उसकी बातों को सुनकर हँसते भी थे और कभी-कभी कुछ ऐसे बातों में, जिनमे जीवन का कड़वा सत्य होता था, उनमें उसके व्यक्तित्व के गहराइयों को भी भांपते हुए, बिलकुल खेल में निमग्नित से हो जाते थे। इसके बाद मदारीवाला उस साथ वाले छोटे बच्चे की और इशारा करते हुए-
और मेरे दोस्तों, यह बच्चा आजकल बहुत बीमार रहता है....
क्योंकि इसने एक मुर्दे का कपडा पहन लिया था.....
मगर अभी इसका इलाज़ होगा, ये बच्चा जाएगा!
उस प्रेत के पास जाएगा, उससे माफी मांग कर आएगा....
फिर बच्चे से पूछते हुए-
बेटा, भूत के पास जाने को तैयार है?
अंदर लेटे हुए बच्चे की आवाज़ -
जय खलबली, तैयार है, उस्ताद, जाएगा!
फिर कुछ देर तक, बच्चे और उस व्यक्ति के साथ सवाल-जवाब के माध्यम से कुछ हंसी मजाक का सिलसिला चलता रहता था - बांसुरी और डुगडुगी को बजा कर मनोरंजन के अनवरत बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ। बीच-बीच में, दर्शक से बुलाये व्यक्ति के ऊपर, कुछ ऐसे सवाल-जवाब का सिलसिला सा चलता रहता था कि उस व्यक्ति का खुद का दिया जवाब ही लोगों में हंसी, खिलखिलाहट और उस व्यक्ति के अंदर - थोड़ी सी झुंझलाहट भी पैदा कर देता था। फिर मदारीवाला उस से एक बड़े से चादर के निरीक्षण करने का आग्रह करता-
अय-ये खोपड़ी, इस चादर को जरा ठीक से देख लो भाई, इसमें कही कोई सांप या जानवर या कुछ है?
व्यक्ति के कुछ कहने से पहले वह उस चादर को उस लेते हुए बच्चे के ऊपर डालने को कहता और बीच के जिससे को ऊपर उठाये पकडे रहने का आग्रह करता-
जब तक मैं न बोलूं, पकडे रहना, छोड़ना नहीं, वरना बहुत गड़बड़ हो जाएगा!
और इसके बाद फिर से बांसुरी के साथ-साथ डुगडुगी बजता रहता था और इन सब के बीच, वह बच्चा कुछ अनाप-शनाप सा बोलते हुए, वास्तव में ऐसा लगने लगता था मानो वह किसी प्रेत के आत्मा के चंगुल में हो। चीख-चिल्लाहट, डराने वाले और वीभत्स संवादों का अजब समागम सा होता था - ऐसे नाटकीय अभिनय से वहां पर जो समां बंध जाता था - उसके लिए मेरी तरफ से, हरेक मदरीवाले के सहायक बच्चों को - सर्वोत्तम बाल कलाकार के अभिनय का पुरस्कार अवश्य मिलना चाहिए! डमरू को बजाते हुए और साथ में एक हाथ से बांसुरी को बजाते हुए, अचानक से रुक जाता और फिर लगभग चीखते हुए -
ऐ-ये-ए, खड़ंगा बाबा, निकाल दे इसके भूत को..... 
और अचानक से चौकोर से बने उस टेंट से संरचना के बीचो-बीच, जिसके अंदर बच्चा लेटा होता था, वहां हाथ से पकड़ा चादर का हिस्सा छूट कर गिर जाता, जिसके कारण वहां पर बिलकुल खाली होने का एहसास होता!

मतलब अंदर लेटा बच्चा गायब!

फिर थोड़ी देर तक तो ऐसा लगता मानो वास्तव में सामने के नीम या किसी और पेड़ के ऊपर बच्चा किसी प्रेत से मिलने चला गया हो! जादू का असर सर चढ़ कर बोल रहा होता था- सभी हैरान से होते थे कि आखिर बच्चा गया तो कहाँ गया?

बहुत देर तक संशय की स्थिति बनी रहती थी। फिर मदारीवाला भीड़ से बुलाये हुए "सहायक" को अपने पास बुलाता था, और फिर उस टेंट के ऊपर के चादर के अंदर अपने और उसके सर को घुसा कर, अंदर का माज़रा दिखाता था - मुझे पता नहीं कि अंदर क्या दीखता था पर, कुछ ऐसी बात होती थी जिस से एहसास होता था कि बच्चा वापस आ गया है। फिर और भी कुछ नाटक वगैरह सा होता था, और अंत में बच्चा वापस हँसता-खेलता बाहर आ जाता था।

विश्वास और अविश्वास के झूला में डगमगाते जैसे माहौल में, कई बार मुझे लगता था कि इसे जादू मानूं या न मानूं, पर अगले ही क्षण, नाटकीय ही सही, पर ऐसा प्रतीत होता था मानो सामने सब कुछ यथार्थ में ही हो रहा हो।

इस तरह के अनेकों क्षण को मैंने अत्यधिक चाव से देखा है, जिया है और आज तक अपने अंदर संजो के रखा है! 

घर से स्कूल के बीच - जादू का खेल

बचपन में स्कूल दो शिफ्ट्स में चलते थे - एक महीना हम सुबह ७ बजे से ११:३० तक वाले शिफ्ट में आते थे और अगले महीने १२ से ४:३० शाम तक वाले में।  इस तरह से स्कूल से लौटते समय या जाते समय अक्सर बाजार के आस पास किसी न किसी तरह के गतिविधियों को देखने का मौका मिल जाया करता था।

बचपन में अनेकों बार मदारी के रस्सी पर चलने के करतब या संपेरों, और भालू-बन्दर को नचाने वाले के खेल को देख चुका था, इस कारण से इस तरह के खेल में मेरे लिए कोई नयापन नहीं बचा था। ज्यादातर समय इस तरह के खेल को बिना देखे, मैं स्कूल की ओर चला जाता था। पर इन सबों के बीच, एक मदारी वाले का - जादू का खेल होता था - जिसे मैं बचपन से अनेकों बार देख चुका था। इसके बाद भी, उसे फिर से देखने में मेरी दिलचस्पी बरकरार सी थी।

कारण अनेकों हो सकते थे - पर सबसे महत्वपूर्ण था - जादू के पीछे के राज़ को जानने की इच्छा। इतना तो पता हो ही चुका था कि जो सामने होते दीखता था, वह वास्तविक तो कतई नहीं था। फलस्वरूप, हर बार इस उम्मीद से उन मैजिक के ट्रिक्स से चकमा खाते रहते थे कि कोई सुराग तो मिले और जान पाये कि आखिर मैजिक ट्रिक का राज़ क्या था?

इस सिलसिले में याद आता है कि जरा सा बड़े हो जाने के बाद, अपने बचपन के मित्रो के साथ पैसे इकट्ठे करके हमने एक जादू के रहस्योद्घाटन करने वाली किताब खरीदी थी। अंततः, हम बहुत सारे जादू के रहस्य को समझ पाने में सफल हो गये थे। जादू के पीछे छुपे राज को जान लेने के बाद, जादू दिखाने वाले मदारी के खेल में, अब वो पहले वाली बात नहीं रह गयी थी।


अब हमारे लिए मदारीवाले का जादू का खेल, कोई इतना आकर्षक खेल नहीं रह गया था कि मैं इसके लिए रुक जाऊं - अलबत्ता कुछ अनसुलझे से रहस्य अब भी थे। पर यह भरोसा ही चुका था कि हर ऐसे खेल जिनका रहस्य अब तक नहीं जान पाये थे , उनके पीछे भी कुछ वैसा ही ट्रिक होगा जैसा बाकी के बाए में हम जानने लगे थे। और, इसीलिए अक्सर हम इनके चल रहे खेल को अनदेखा करते आगे निकल जाते थे।

इस तरह के जादू के खेल में मदारी जादूगर के साथ, कोई हमारे उम्र का ही छोटा-सा बच्चा भी हुआ करता था। खेल के शुरुआत में, मदारीवाला के सहायक के रूप में छोटा बच्चा काफी व्यस्त रहा करता था। मदारीवाला लोगों से बातों का सिलसिला बनाये गोल-गोल घूमता रहता था - जिस से लोगों के भीड़ को गोलाकार घेरे में फैला सके।

इधर उसका सहायक, भीड़ के बीचो-बीच चादर या दरी बिछाता रहता था। फिर उसके ऊपर, गंदे मटमैले ही चुके अनेको प्रकार के झोले या बोरे में से विभिन्न तरह के - जादू के दिखने लायक - हड्डियाँ और एक मानव खोपड़ी, कुछ लकड़ी के विचित्र आकृति वाले टुकड़े, बगुले के गर्दन जैसा एक टोंटी लगा लोटा, और भी इसी तरह के अन्य कई समानों को फैलाने में मदद करता दिख जाया करता था। इसके आलावा, कभी डमरू बजाने में, या जादूगर के द्वारा भीड़ को व्यस्त रखने के उद्देश्य से पूछे गए अनेक प्रकार के अनर्गल प्रश्नों के सवाल-जवाब में भी सक्रिय रहता था।

पूरे खेल के दौरान मदारीवाला और उसके साथ का बच्चा, हंसी-मजाक के माहौल बना कर लोगो का मनोरंजन भी करता रहता था। उनकी बातें जन-साधारण के लिए इतनी रोचक होती थी कि बाजार जैसे व्यस्त जगह में भी लोग रुक कर उन्हें देखने और बरबस हंसने के लिए विवश हो जाते थे! मेरे मन में यह कौतूहल होता था कि उन प्रश्नों का वैसा ही सटीक और चुभता सा उत्तर देने की कला को विकसित करने में, उन दोनों के बीच किस तरह का तालमेल और अभ्यास की आवशयकता पडी होगी?

सहायक बच्चा कम उम्र का होकर भी अपने व्यक्तित्व से वयोवृद्ध सा होता था। उस से किये बहुत सारे प्रश्न का प्रत्युत्तर, छूटते ही मिलता था - जिस से साफ़ पता चलता था कि वे सारे प्रश्न और उत्तर - काफी अच्छे ढंग से रिहर्सल किये हुए और लगभग रटे-रटाये से थे। फिर भी, "बनावटी मासूमियत" से बहुत ही सधा सा दिया हुआ जवाब, अप्राकृतिक लगने के बावजूद, रोचक सा ही लगता था। साथ ही उसके द्वारा कृत्रिम रूप से किया गया बातचीत का मकसद होता था कि वह प्रश्नो से बिलकुल अनभिज्ञ सा लगे, और जैसा दीखता था वैसा ही - मतलब, बच्चे जैसा ही लगे।

खेल के शुरुआत में, अनेकों प्रकार के छोटे-मोटे हाथ के सफाई वाले कारनामे होते रहते थे। और भीड़ को इकठ्ठा करने के प्रतीक्षा के दौरान जमा हो चुके भीेड़ का मनोरंजन कुछ ऐसे छोटे मोटे ट्रिक्स से होता जैसे - एक सिक्के को दो सिक्का बना देना या लकड़ी को झोले में डाल कर उस लकड़ी को सांप बना देना, और इसी तरह के अन्य करतबें। उस दौरान करतबों और कहकहों का सिलसिला चालू रहता था।

इस सिलसिले में जादूगर उस बच्चे से जुड़े कोई मनगढंत सी कहानी का जिक्र शुरू कर देता था - जिसमें बच्चे को भूत के आतंक से हो रही परेशानियों का जिक्र होता था। फिर, अंत में बच्चे के अंदर घुस चुके भूत से, उसे छुटकारा दिलाने का वादा होता था, जिसमें इन्द्र्जाली तिलिस्म का निहायत ही जरूरत होता था।

मदारी का खेल, इन सब के जिन्दा मिसाल पेश करने जैसा ही कुछ होता था। और, इस पूरे कार्यक्रम का पटाक्षेप होता था, ताबीज़ इत्यादि जैसे कुछ बेचने से या प्रसन्नता-पूर्वक लोगों के दिए कुछ पारिश्रमिक से। भीड़ में से आधे लोग तो यूँ ही आतंकित से होते थे, और जो नहीं होते थे, वे खेल के दौरान दिखाए द्रष्टव्य से, अपने बचे-खुचे भरोसे पर पुनर्विचार करते हुए यथोचित कर लेते थे।

सारांश में, मदारी वाले के खेल का पूरा मसौदा यही होता था। संभवतः उन दिनों के दिखाए मदारी वालों के खेल की इतनी सी पटकथा भी, आज के किसी हिंदी फिल्म से, ज्यादा हुआ करता था। आज के हिंदी फिल्म का मकसद भी लगभग यही होता है, जो उन मदारीवालों का होता था - अर्थात भीड़ जमा करके, लोगो को कुछ देर व्यस्त करने का प्रयास और अंततः पैसे इकट्ठा करना।

ये अलग बात है कि फिल्मवाले पहले ही पैसे ले लेते हैं, और फिर ३ लाइन के कहानी को समूचे ३ घंटे के सिरदर्द कहानी बनाकर खींचते हैं। परन्तु, मदारीवालों के खेलों को कई बार देखने के बाद भी, वे आज के सिरदर्द फिल्मों से ज्यादा रोचक से लगते थे। वैसे भी लोग, मदारीवालों के खेल को देखने के बाद, अपने श्रद्धा भक्ति से पैसे देते थे, न कि खेल देखने के लिए!

उन दिनों के मदारीवाले के खेल को, आज के सन्दर्भ में देखना, बहुत ही अजीब सा लगता है। अब कहाँ मदरीवाले, कहाँ लोगों में इन मदारीवाले और उसके खेल को देखने में दिलचस्पी रही, कहाँ वो फुर्सत में घूमते लोग - जो सब्जी खरीदने के लिए टहलते हुए बाजार जाते थे। अब तो इस भाग दौड़ की ज़िंदगी में - मदारीवाले और उनके सभी हैरतअंगेज खेलों का सिलसिला - वक़्त के किसी पृष्ठ में दर्ज़ होकर संग्रहालय में रखे जाने योग्य से हो गए हैं।

परन्तु आज भी जब किसी अच्छे वक्ता को किसी कॉन्फ्रेंस या सेमीनार में आकर्षक, मनोरंजक और रोचक ढंग से बोलते देखता हूँ. बरबस उन मदारीवाले की याद आ जाती है। "पब्लिक स्पीकिंग" और "कनेक्टिंग विथ पीपल" का जीता जागता और बहुत ही प्रखर प्रमाण के रूप में, वे मदारीवाले हमेशा याद आते रहेंगे!

Dec 28, 2015

घर से स्कूल के बीच की 'पढाई'

बचपन में स्कूल आने और जाने के दौरान, मुझे रास्ते के अगल-बगल, सड़क के किनारे होते गतिविधियों को करीब से देखने का बहुत शौक होता था। उन दिनों घर से स्कूल जाने के लिए, मुझे कदमा बाजार के आस-पास से गुज़रना पड़ता था। कदमा बाजार का माहौल, किसी गांव के हाट के परिष्कृत रूप में ही समझना चाहिए।

बदले दौर का कदमा बाज़ार - सिर्फ दूकान ही दुकानें!
बाज़ार के अंदर, टिन की छत वाले - स्थाई और अस्थाई के बीच झूलते से- कई सारे दुकान बिखरे पड़े थे। बाजार के अंदर, अनेको प्रकार के दूकान थे, पर बहुत कम संख्या में ही सीमेंट और ईंट के बने पक्के दुकान थे। ऐसा ज्ञात होता था कि शुरू के बने कुछ स्थाई दुकानों के इर्द गिर्द, कई सारे दूकान जुड़ते चले गए होंगे - और कुल मिला कर, बाज़ार बहुत ही घनी और भीड़ भरा, मेले के जैसा शकल ले लिया था।

उन स्थाई दूकानों के बीचो-बीच बहुत बड़ा सा सब्जी-बाजार था। बिलकुल गाँव के हाट की तरह - जमीन पर बिछे हुए, बहुत सारे दूकान, ग्रामीण सा माहौल बना देता था। मेन-रोड और बाज़ार के बीच का जगह - अमूमन खाली ही होता था। कई साल तक सड़क के दोनों ओर के फुटपाथ, वास्तव में लोगों के चलने के लिए ही हुआ करता था। इस वजह से, जैसा उम्मीद किया जाना चाहिए, वे खाली ही हुआ करते थे, बल्कि रोड के दूसरी ओर लाइन से बहुत सारे घर भी होते थे।

कालांतर में, उस रोड और बाजार के बीचे के खाली भाग में इक्का दुक्का करते हुए - बहुत सारे सब्जी बेचने वालों ने, जमीन पर सब्जियों का ढेर लगाकर सब्जी मंडी के जाल सा बनाना शुरू कर दिया। फिर जैसा भारत के किसी भी खाली जगह का हश्र होता है- बाजार के पास वाले  सड़क के दोनों ओर के फुटपाथ में भी किसी अमरबेल की तरह से, सब्जियों का टीला सा लगने लगा। जिस तरह से पंक्तिबद्ध होकर खेतों में सब्जियों के ढेर उगते थे, उसी प्रकार से वे बिकने के लिए भी कतारबद्ध से फ़ैले होते थे।

परन्तु मेरे बड़े होने तक, यानि जब तक मैं स्कूल जाता था, सड़क और बाज़ार के बीच के भाग ज्यादातर खाली सा ही रहता था। आये दिन वहां किसी ताबीज़, हकीम-जड़ी-बूटी और इसी तरह के दवा बेचने वालों का, टेंट-नुमा सा दूकान लगता रहता था। एक बार ऐसे दूकान के स्थापित होने के बाद, वे कुछ हफ्ते से लेकर महीने भर, उसी जगह पर जमे से रहते थे।

जब कभी बाजार का कोई जगह खाली रहता था, वहां मदारी के जादू -खेल के साथ-साथ, सांप-बिच्छू, बन्दर - भालू के नाच आदि जैसे खेल भी होते रहते थे - जो आई पी एल क्रिकेट के "टी -२०" के तर्ज़ पर थोड़े देर के लिए चलता और फिर कहीं और आगे के लिए निकल जाता।

मेरी स्कूल के पढाई-लिखाई में, ज्यादा दिलचस्पी नहीं होती थी। स्कूल से आने-जाने के क्रम में, इस तरह के रोचक कार्यक्रमों को देखने से मन बहल जाता था। मेरी खोजी नज़रें और सालों का अनुभव, हमेशा इस तरह के होने वाले गतिविधियों के तलाश मे रहती थीं।

इन खेलों को देखने का अद्भुत आनंद था और आज जब अपने अतीत में डुबकी लगाता हूँ,  इन सब के बिना, वे दिन अधूरे से दीखते हैं! बोनस के तौर पर, अनेकों प्रकार के नयी जानकारी भी मिलते रहते थे - जैसे नीम के पेड़ पर भूत होता है, या दोमुंहा सांप छह महीने एक तरफ के मुंह को इस्तेमाल करता है फिर बाकी समय दूसरे वाले को, या नाना प्रकार के "ताकतों" के दास्ताँ इत्यादि ।

और भी कई सारे इसी तरह के ज्ञानवर्धक बातें, जिनका स्कूल के किताबों में कभी कोई जानकारी नहीं मिल पाता था, वे सभी वहां बाजार में चल रहे किसी मदारीवाले या अन्य विजिटिंग प्रोफ़ेसर के "कक्षा" में मिल जाया करता था । अनेकों बार स्कूल जाते समय, किसी ऐसे ही मज़मे को देखने के चक्कर में, मैं लेट से स्कूल पहुंचा होऊंगा, जिसके कारण क्लास-टीचर से सजा भी भुगता होऊंगा!

आज के टीवी में जिस तरह से लोग चैनल बदलते हैं, उसी प्रकार से उन दिनों बाजार के पास के उन खाली हिस्सों में, हमेशा कुछ न कुछ पसंदीदा सा प्रोग्राम होता ही रहता था - मर्जी थी कि देखूं या कहीं आगे बढ़ता चला जाऊँ। कभी जड़ी-बूटी के बारे में, कभी जादू का खेल, तो कभी किसी दीवाल पर बनते किसी इश्तहार की पेंटिंग को देखने का सिलसिला!

हमारे उन दिनों के लाइव टेलीकास्ट के चैनल लाइनअप में समय-समय पर मनोरंजन के लिए, इस तरह के अनेक सारे गतिविधियाँ, निःशुल्क उपलब्ध होते रहते थे। आज जब कभी ठन्डे दिमाग से बैठ कर, उन अतीत के दिनों में खो जाता हूँ, तो हर वैसे अनुभव के क्षण - बिलकुल आँखों के सामने तैरने से लग जाते हैं।

आज यादों के उस जखीरे में से, कुछेक मुख्य विकर्षणों को - जो मुझे स्कूल और पढाई से दूर करने में प्रबल सक्षम से थे - उनको याद करने का प्रयास कर रहा हूँ। ये यादें ऐसी हैं जो मेरे मानस-पटल पर काफी गहरे रेखांकन कर गए हैं।

आगे मैं कभी उन सारे तमाशबीनों का ज़िक्र करूँगा - मैं काफी गहराई से उनके हर एक गतिविधियों को देखा करता था, और किसी वीडियो कैमरा के न होने के बावजूद, हरेक दृश्य आज भी मुझे उसी ताज़गी के साथ याद हैं! कई बार तो लगता है कि मैं अब भी उन सभी दृश्यों को अपने आँखों के आगे घटित होता देख रहा हूँ!

Nov 5, 2015

नेता जी

बचपन में मुझे बाजार जाना बहुत अच्छा लगता था। बाजार का सबसे प्रिय स्थान एक मिठाई का दूकान हुआ करता था जहाँ बिलकुल ताज़ा गरमा-गरम समोसा और मिठाइयां मिलती थी। उस मिठाई के दूकान के मालिक का एक बेटा भी हमारे ही स्कूल जाया करता था। जैसा उम्मीद की जानी चाहिए थी, उसकी पढाई लिखाई में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी ।

समाज शास्त्र में पढ़ाये जाने वाले - भारत की जनसंख्या के कुप्रभाव- का असर, साक्षात उसे अपने घर में ही दीखता था। अपने घर के टीम के बल्लेबाजी के क्रम में काफी नीचले नंबर पर होने के कारण, न ही उसे अपने पैतृक व्यवसाय से कोई खासी उम्मीद थी,  न ही पारिवारिक व्यवसाय में उसकी कोई आवश्यकता ही थी।

इस प्रकार, वह शीघ्र ही घर के सभी बंधनों से मुक्त होकर, पढाई से भी स्वैच्छिक अवकाश प्राप्ति ले ली थी। फलतः अपने बालावस्था में ही वह सभी प्रकार के सांसारिक बंधनों से निवृत्त होकर सम्पूर्ण रूप से बेरोजगारी के धर्म को अपना लिया था। पढाई छोड़ने जैसे निर्णय के कारण, वह स्वयं को समाज के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया था।

बाजार के सामने ही उसका घर था, जिस से थोड़ी दूर पर एक बहुत बड़ा बरगद का वृक्ष था। घने बरगद-तरु के तले गहन छाया होती थी। उस बरगद के नीचे एक बस-स्टॉप भी हुआ करता था। धीरे धीरे बस बूढ़ा होता चला गया और आये दिन उसकी तबियत ख़राब रहने लगी थी- अतः बस की सेवा अनियमित सी रहने लगी थी। परन्तु फिर भी पारम्परिक तौर पर, लोग अब भी उसी स्थान पर सवारी का इंतज़ार करते थे।

बस के पूरक के तौर पर ऑटो रिक्शा ने तेज़ी से उभरना शुरू कर दिया था। जाहिर है, बरगद वृक्ष के साये में बसा छायादार स्थान, ऑटो रिक्शा वालों के लिए भी सवारी के उतारने और चढाने का, एक स्वाभाविक विकल्प बन गया था। फिर धीरे धीरे  - 'एक से भले दो, दो से भले तीन' - करते करते वहाँ एक अस्थायी ऑटो स्टैंड भी बन गया था।

अब, जब सवारी मिलेगी तब ही ऑटो चलेगा,  इस लिए इंतज़ार के उबाऊ क्षणों को काटने के उद्देश्य से,  भारत के सामूहिक क्रिया के तौर पर जो भी किया जाता है,  वे सभी क्रिया कलाप वहां पर शुरू हो गए थे अर्थात - ताश, जुआ, गांजा एवं दारू का सेवन।

कालांतर में इस पूरे व्यवस्था को एक अमली जामा पहनाने के क्रम में उसका बड़ा ही स्वाभाविक सा नाम दे दिया गया था - "शिक्षित बेरोजगार ऑटो यूनियन"। इस मौलिक नाम में, समाज के यथार्थ और उसके हर तात्कालीन समस्याओं को भी परिलक्षित किया गया था।

ऑटो रिक्शा चलाने वाले नवयुवकों के द्वारा अपने हिस्से का काम कर चुके होने का प्रमाण - "शिक्षित", समाज के द्वारा बदले की भावना से किया काम - "बेरोजगारी का तोहफा", और अगले कदम के तौर पर शिक्षित बेरोजगारों के द्वारा विकल्प की जमीन तलाशती - ऑटो चलाने का निर्णय। इन सब के बदले में वे सिर्फ एक अदद स्टैंड की मांग भर तो कर रहे थे - और उसे आधुनिक युग में हासिल करने का मार्क्स के द्वारा बताया रास्ता था - यूनियन! अतः इस चमत्कारी शब्द - यूनियन - को जोड़ते ही - जिस तरह बिजली के तार में करेंट दौड़ उठती है -  इस पूरे उपक्रम को अब एक दिशा और स्थायित्व मिल गया था।

घर के सामने ही इस तरह के "शिक्षित बेरोजगार ऑटो यूनियन" के स्टैंड के रूप में बने - 'आश्रम', के स्थापित हो जाने के बाद, मिठाई वाले का बेटा- जो अब फुल टाइम बेरोजगार था -  कौतूहलता वश वहां आने जाने लगा।यथाशीघ्र वह भी वहाँ का एक स्थाई सदस्य बन गया। घर में उसे खाने का भरपेट तो मिलता ही था, उस पर से -माँ बाप को भी अभी इसे क्रीज़ पर बैटिंग करने के लिए भेजने की कोई आवश्यकता नहीं दिखती थी।

इस लिए वह सिर्फ और सिर्फ समय काटने के प्रयोजन से ही  वहां आया करता था। चूँकि ऑटो रिक्शा यूनियन का हर कोई उसके बाप को जानता था- इस लिए सबों ने, उसे सुग्रीव की तरह गले से लगा लिया और तदनुसार राम के भक्त वानर सेना में, सहर्ष उसे भी शामिल कर लिया गया।

दिन भर ऑटो रिक्शा चालकों के साथ ही उसका उठना बैठना शुरू हो गया था। इसलिए वह उनके -'जमीन' को ढूंढती- समस्याओं को काफी नज़दीक से समझने लगा था।

उन्ही दिनों शहर में अवैध अतिक्रमण को हटाने का एक दौर आया। फलस्वरूप, ऑटो रिक्शा स्टैंड को स्थाई बनाने के मांग को लेकर अब वह धरना पर बैठ गया था। उसका धरना में बैठने का चुनाव, वास्तव में एक स्वाभाविक सा प्रक्रिया रहा होगा - क्योंकि बाकी को तो ऑटो भी चलाना होता था, पर वह तो नितांत खाली और उच्च कोटि का 'फालतू' था। वैसे भी सुबह से शाम तक, वह वहीँ जमीन पर ही बैठा रहता था। बस उसके इसी स्वाभाविक कार्यक्रम में बिना किसी बदलाव के, पीछे बरगद के तने पर एक -हाथ से लिखे पोस्टर - को लगा दिया गया था - जिसमें उस ऑटो स्टैंड को स्थाई बनाए जाने की मांग की गयी थी।


धरने को हटाने के लिए हो रही पुलिस के कार्यवाही के दौरान, डंडे और धक्कम धुक्की के बीच, किसी ने जीप में बैठ कर डकार लेते इंस्पेक्टर को सूचित किया कि धरने पर बैठा जो अकेला निकम्मा था, वह ऑटो वगैरह नहीं चलाता था बल्कि फुल टाइम बेरोजगार था, और बाजार के प्रसिद्ध मिठाई दुकान वाले का - अनगिनत में से एक - सुपुत्र था।

रोज़ के दौरे पर निकले पुलिस की जीप का पहला ठिकाना, बाजार का वही मिठाई दुकान होता था, जहाँ पर छक कर मुफ्त के समोसे और चाय का सेवन के बाद ही गाड़ी आगे मुआयना के लिए निकलती थी।

पुलिस की जीप के सामने वाले सीट पर बैठे इंस्पेक्टर के कमर के नीचे का आधा हिस्सा गाड़ी से बाहर निकला हुआ था। स्थायित्व को प्राप्त कर चुके इस आसन से निकलने के लिए उसे गाड़ी के ऊपर के किसी हिस्से को पकड़ कर, बड़ी मुश्किल से अपने लाश जैसे शरीर को खीचना पड़ा था और तब कही जाकर वह गाड़ी से खुद को सशरीर उतार पाया था। इसके बाद एक लम्बी हुंकार लगाते हुए - "आ--क  थू --क" - का उच्चारण करते हुए वह अपने मुंह में रखे खैनी को थूका।

खाली हो चुके मुंह से एक गर्जना हुयी जो सिर्फ सम्बोधन के लिए प्रयोग में लाये गए उच्चारण मात्र था और सुनने वाले को सिर्फ "अर्रे ऐ" जैसा बोध हुआ था। तत्पश्चात वह अपने अंदर विद्यमान जानवर के होने का पूर्ण परिचय देने के क्रम में, अपने पसंदीदा गालियों का तड़का लगाते हुए - भोजपुरी, हिंदी और अंग्रेज़ी के मिले जुले संवाद - को व्यक्त किया, जो जनहित के चेतावनी और गलत काम के होने वाले परिणाम के द्योतक थे। इसके बाद पुलिस के जनसेवक होने के प्रमाण स्वरुप - धरने में बैठे नागरिक के गाल पर - एक जोर के थप्पड़ को रसीद कर दिया गया था।

जैसा आम तौर पर होता है- इस तरह के कार्यक्रम के दौरान - बाज़ार से अनेको आने और जाने वाले 'व्यस्त' लोगों का झुण्ड, सामने चल रहे मुफ्त के मनोरंजन को बड़ी संजीदगी से देख रहे थे। अनेक लोगो से स्वयं को घिरे देख, इंस्पेक्टर काफी प्रोत्साहित हो गया था। और इसके बाद, अपने अंदर पल रहे - फ़िल्मी दुनिया के इंस्पेक्टर- के रोल को अदा करने के भावना को फलित करने जैसे प्रक्रिया में, इंस्पेक्टर ने उसके कालर को पकड़ कर उसे खींचते हुए, बाजार के मिठाई दुकान की और लेकर चल पड़ा।

इंस्पेक्टर का इस तरह के पद-यात्रा के पीछे,  संभवतः समाज के सामने -"फिल्मों से उद्धृत इंस्पेक्टर के एक अनुकरणीय कार्यवाही" - का उदाहरण प्रस्तुत करने जैसा कोई नेक विचार रहा होगा। परन्तु सर्वथा उस से कहीं ज्यादा - एक अभिभावक के रूप में - मिठाई के दुकान के मालिक के पास तक, उसके "बिगड़े" बच्चे को लाकर, अपने समोसे और चाय का क़र्ज़ अदा करने जैसी निहित भावना भी रही होगी।

भारतीय क्रिकेट में किसी एक मैच में ही मिले मौके का फायदा उठाते हुए - जबरदस्त इनिंग खेल कर - कइयों ने अपने किस्मत को हमेशा के लिए बदल डाला है। उसी तर्ज़ पर, अपनी कौशलता का परिचय देता, करीबन २०० कदम के उस पद-यात्रा के दौरान रास्ते में हर देखने वाले को ऑटो वाले के साथ हो रहे अत्याचार के बारे में दो चार बातें बोलते हुए वह अपने भविष्य के जीने का एक सहारा बनाता चला गया था।

आगे दुकान तक पहुँचने पर क्या हुआ, वह महत्वपूर्ण नहीं है, पर इसके बाद उसके नाम के आगे "नेता" शब्द चिपचिपी च्युंगम की तरह चिपक गया था। कालांतर में वह अपने नाम के आगे चिपक चुके "नेता" को सार्थक करने के चक्कर में पड़ गया, और देखते ही देखते वह स्थानीय से होते होते शहरी और बाद में राज्य स्तर का नेता बन गया।

दो-चार पार्टियां बदल बदल कर वह विधानसभा का चुनाव लड़ता रहा और अंततः जीतने में सफल भी हो गया। एक समय राज्य की राजनीति ऐसी हो गयी कि सरकार को बचाने के क्रम में एक छोटे दल का समर्थन इस शर्त पर ली गयी थी कि उसके सभी MLA को मंत्री बनाया जाएगा-  और इस तरह से अब उसके नाम के आगे "भूतपूर्व मंत्री" भी लग गया था।

शुरुआत के दिनों में -ब्रजवासियों के सरीखे - ऑटो रिक्शा चलाने वालों को इस बात का बिलकुल ही ज्ञान नहीं था कि ऑटो स्टैंड पर उनके साथ बैठने वालो के बीच - "कृष्ण" सरीखा एक महापुरुष भी पल रहा था। पर आज वे सभी उनके बारे में अनेकों किवदंतियों के फुल-टाइम थोक विक्रेता बन गए हैं और 'नेता जी' की कहानियां सुना कर अपना समय काटते रहते हैं।

अब नेता जी बहुत व्यस्त हो गए हैं।  शुरुआत में जिन समस्याओं के लिए वे जूझ रहे थे - ऑटो स्टैंड की वह समस्या - हिंदी फिल्मों के माँ की तरह - विधवा का चोला पहने, वैसे ही खांसते, कुढ़ते और रोती-बिलखती बैठी रह गयी! पर नेताजी अब बदलते दौर में - राज्य के हित, समाज के उत्थान और कभी कभी विश्व स्तरीय मुद्दों पर भी हाथ आजमाते रहते हैं।