Nov 5, 2015

नेता जी

बचपन में मुझे बाजार जाना बहुत अच्छा लगता था। बाजार का सबसे प्रिय स्थान एक मिठाई का दूकान हुआ करता था जहाँ बिलकुल ताज़ा गरमा-गरम समोसा और मिठाइयां मिलती थी। उस मिठाई के दूकान के मालिक का एक बेटा भी हमारे ही स्कूल जाया करता था। जैसा उम्मीद की जानी चाहिए थी, उसकी पढाई लिखाई में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी ।

समाज शास्त्र में पढ़ाये जाने वाले - भारत की जनसंख्या के कुप्रभाव- का असर, साक्षात उसे अपने घर में ही दीखता था। अपने घर के टीम के बल्लेबाजी के क्रम में काफी नीचले नंबर पर होने के कारण, न ही उसे अपने पैतृक व्यवसाय से कोई खासी उम्मीद थी,  न ही पारिवारिक व्यवसाय में उसकी कोई आवश्यकता ही थी।

इस प्रकार, वह शीघ्र ही घर के सभी बंधनों से मुक्त होकर, पढाई से भी स्वैच्छिक अवकाश प्राप्ति ले ली थी। फलतः अपने बालावस्था में ही वह सभी प्रकार के सांसारिक बंधनों से निवृत्त होकर सम्पूर्ण रूप से बेरोजगारी के धर्म को अपना लिया था। पढाई छोड़ने जैसे निर्णय के कारण, वह स्वयं को समाज के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया था।

बाजार के सामने ही उसका घर था, जिस से थोड़ी दूर पर एक बहुत बड़ा बरगद का वृक्ष था। घने बरगद-तरु के तले गहन छाया होती थी। उस बरगद के नीचे एक बस-स्टॉप भी हुआ करता था। धीरे धीरे बस बूढ़ा होता चला गया और आये दिन उसकी तबियत ख़राब रहने लगी थी- अतः बस की सेवा अनियमित सी रहने लगी थी। परन्तु फिर भी पारम्परिक तौर पर, लोग अब भी उसी स्थान पर सवारी का इंतज़ार करते थे।

बस के पूरक के तौर पर ऑटो रिक्शा ने तेज़ी से उभरना शुरू कर दिया था। जाहिर है, बरगद वृक्ष के साये में बसा छायादार स्थान, ऑटो रिक्शा वालों के लिए भी सवारी के उतारने और चढाने का, एक स्वाभाविक विकल्प बन गया था। फिर धीरे धीरे  - 'एक से भले दो, दो से भले तीन' - करते करते वहाँ एक अस्थायी ऑटो स्टैंड भी बन गया था।

अब, जब सवारी मिलेगी तब ही ऑटो चलेगा,  इस लिए इंतज़ार के उबाऊ क्षणों को काटने के उद्देश्य से,  भारत के सामूहिक क्रिया के तौर पर जो भी किया जाता है,  वे सभी क्रिया कलाप वहां पर शुरू हो गए थे अर्थात - ताश, जुआ, गांजा एवं दारू का सेवन।

कालांतर में इस पूरे व्यवस्था को एक अमली जामा पहनाने के क्रम में उसका बड़ा ही स्वाभाविक सा नाम दे दिया गया था - "शिक्षित बेरोजगार ऑटो यूनियन"। इस मौलिक नाम में, समाज के यथार्थ और उसके हर तात्कालीन समस्याओं को भी परिलक्षित किया गया था।

ऑटो रिक्शा चलाने वाले नवयुवकों के द्वारा अपने हिस्से का काम कर चुके होने का प्रमाण - "शिक्षित", समाज के द्वारा बदले की भावना से किया काम - "बेरोजगारी का तोहफा", और अगले कदम के तौर पर शिक्षित बेरोजगारों के द्वारा विकल्प की जमीन तलाशती - ऑटो चलाने का निर्णय। इन सब के बदले में वे सिर्फ एक अदद स्टैंड की मांग भर तो कर रहे थे - और उसे आधुनिक युग में हासिल करने का मार्क्स के द्वारा बताया रास्ता था - यूनियन! अतः इस चमत्कारी शब्द - यूनियन - को जोड़ते ही - जिस तरह बिजली के तार में करेंट दौड़ उठती है -  इस पूरे उपक्रम को अब एक दिशा और स्थायित्व मिल गया था।

घर के सामने ही इस तरह के "शिक्षित बेरोजगार ऑटो यूनियन" के स्टैंड के रूप में बने - 'आश्रम', के स्थापित हो जाने के बाद, मिठाई वाले का बेटा- जो अब फुल टाइम बेरोजगार था -  कौतूहलता वश वहां आने जाने लगा।यथाशीघ्र वह भी वहाँ का एक स्थाई सदस्य बन गया। घर में उसे खाने का भरपेट तो मिलता ही था, उस पर से -माँ बाप को भी अभी इसे क्रीज़ पर बैटिंग करने के लिए भेजने की कोई आवश्यकता नहीं दिखती थी।

इस लिए वह सिर्फ और सिर्फ समय काटने के प्रयोजन से ही  वहां आया करता था। चूँकि ऑटो रिक्शा यूनियन का हर कोई उसके बाप को जानता था- इस लिए सबों ने, उसे सुग्रीव की तरह गले से लगा लिया और तदनुसार राम के भक्त वानर सेना में, सहर्ष उसे भी शामिल कर लिया गया।

दिन भर ऑटो रिक्शा चालकों के साथ ही उसका उठना बैठना शुरू हो गया था। इसलिए वह उनके -'जमीन' को ढूंढती- समस्याओं को काफी नज़दीक से समझने लगा था।

उन्ही दिनों शहर में अवैध अतिक्रमण को हटाने का एक दौर आया। फलस्वरूप, ऑटो रिक्शा स्टैंड को स्थाई बनाने के मांग को लेकर अब वह धरना पर बैठ गया था। उसका धरना में बैठने का चुनाव, वास्तव में एक स्वाभाविक सा प्रक्रिया रहा होगा - क्योंकि बाकी को तो ऑटो भी चलाना होता था, पर वह तो नितांत खाली और उच्च कोटि का 'फालतू' था। वैसे भी सुबह से शाम तक, वह वहीँ जमीन पर ही बैठा रहता था। बस उसके इसी स्वाभाविक कार्यक्रम में बिना किसी बदलाव के, पीछे बरगद के तने पर एक -हाथ से लिखे पोस्टर - को लगा दिया गया था - जिसमें उस ऑटो स्टैंड को स्थाई बनाए जाने की मांग की गयी थी।


धरने को हटाने के लिए हो रही पुलिस के कार्यवाही के दौरान, डंडे और धक्कम धुक्की के बीच, किसी ने जीप में बैठ कर डकार लेते इंस्पेक्टर को सूचित किया कि धरने पर बैठा जो अकेला निकम्मा था, वह ऑटो वगैरह नहीं चलाता था बल्कि फुल टाइम बेरोजगार था, और बाजार के प्रसिद्ध मिठाई दुकान वाले का - अनगिनत में से एक - सुपुत्र था।

रोज़ के दौरे पर निकले पुलिस की जीप का पहला ठिकाना, बाजार का वही मिठाई दुकान होता था, जहाँ पर छक कर मुफ्त के समोसे और चाय का सेवन के बाद ही गाड़ी आगे मुआयना के लिए निकलती थी।

पुलिस की जीप के सामने वाले सीट पर बैठे इंस्पेक्टर के कमर के नीचे का आधा हिस्सा गाड़ी से बाहर निकला हुआ था। स्थायित्व को प्राप्त कर चुके इस आसन से निकलने के लिए उसे गाड़ी के ऊपर के किसी हिस्से को पकड़ कर, बड़ी मुश्किल से अपने लाश जैसे शरीर को खीचना पड़ा था और तब कही जाकर वह गाड़ी से खुद को सशरीर उतार पाया था। इसके बाद एक लम्बी हुंकार लगाते हुए - "आ--क  थू --क" - का उच्चारण करते हुए वह अपने मुंह में रखे खैनी को थूका।

खाली हो चुके मुंह से एक गर्जना हुयी जो सिर्फ सम्बोधन के लिए प्रयोग में लाये गए उच्चारण मात्र था और सुनने वाले को सिर्फ "अर्रे ऐ" जैसा बोध हुआ था। तत्पश्चात वह अपने अंदर विद्यमान जानवर के होने का पूर्ण परिचय देने के क्रम में, अपने पसंदीदा गालियों का तड़का लगाते हुए - भोजपुरी, हिंदी और अंग्रेज़ी के मिले जुले संवाद - को व्यक्त किया, जो जनहित के चेतावनी और गलत काम के होने वाले परिणाम के द्योतक थे। इसके बाद पुलिस के जनसेवक होने के प्रमाण स्वरुप - धरने में बैठे नागरिक के गाल पर - एक जोर के थप्पड़ को रसीद कर दिया गया था।

जैसा आम तौर पर होता है- इस तरह के कार्यक्रम के दौरान - बाज़ार से अनेको आने और जाने वाले 'व्यस्त' लोगों का झुण्ड, सामने चल रहे मुफ्त के मनोरंजन को बड़ी संजीदगी से देख रहे थे। अनेक लोगो से स्वयं को घिरे देख, इंस्पेक्टर काफी प्रोत्साहित हो गया था। और इसके बाद, अपने अंदर पल रहे - फ़िल्मी दुनिया के इंस्पेक्टर- के रोल को अदा करने के भावना को फलित करने जैसे प्रक्रिया में, इंस्पेक्टर ने उसके कालर को पकड़ कर उसे खींचते हुए, बाजार के मिठाई दुकान की और लेकर चल पड़ा।

इंस्पेक्टर का इस तरह के पद-यात्रा के पीछे,  संभवतः समाज के सामने -"फिल्मों से उद्धृत इंस्पेक्टर के एक अनुकरणीय कार्यवाही" - का उदाहरण प्रस्तुत करने जैसा कोई नेक विचार रहा होगा। परन्तु सर्वथा उस से कहीं ज्यादा - एक अभिभावक के रूप में - मिठाई के दुकान के मालिक के पास तक, उसके "बिगड़े" बच्चे को लाकर, अपने समोसे और चाय का क़र्ज़ अदा करने जैसी निहित भावना भी रही होगी।

भारतीय क्रिकेट में किसी एक मैच में ही मिले मौके का फायदा उठाते हुए - जबरदस्त इनिंग खेल कर - कइयों ने अपने किस्मत को हमेशा के लिए बदल डाला है। उसी तर्ज़ पर, अपनी कौशलता का परिचय देता, करीबन २०० कदम के उस पद-यात्रा के दौरान रास्ते में हर देखने वाले को ऑटो वाले के साथ हो रहे अत्याचार के बारे में दो चार बातें बोलते हुए वह अपने भविष्य के जीने का एक सहारा बनाता चला गया था।

आगे दुकान तक पहुँचने पर क्या हुआ, वह महत्वपूर्ण नहीं है, पर इसके बाद उसके नाम के आगे "नेता" शब्द चिपचिपी च्युंगम की तरह चिपक गया था। कालांतर में वह अपने नाम के आगे चिपक चुके "नेता" को सार्थक करने के चक्कर में पड़ गया, और देखते ही देखते वह स्थानीय से होते होते शहरी और बाद में राज्य स्तर का नेता बन गया।

दो-चार पार्टियां बदल बदल कर वह विधानसभा का चुनाव लड़ता रहा और अंततः जीतने में सफल भी हो गया। एक समय राज्य की राजनीति ऐसी हो गयी कि सरकार को बचाने के क्रम में एक छोटे दल का समर्थन इस शर्त पर ली गयी थी कि उसके सभी MLA को मंत्री बनाया जाएगा-  और इस तरह से अब उसके नाम के आगे "भूतपूर्व मंत्री" भी लग गया था।

शुरुआत के दिनों में -ब्रजवासियों के सरीखे - ऑटो रिक्शा चलाने वालों को इस बात का बिलकुल ही ज्ञान नहीं था कि ऑटो स्टैंड पर उनके साथ बैठने वालो के बीच - "कृष्ण" सरीखा एक महापुरुष भी पल रहा था। पर आज वे सभी उनके बारे में अनेकों किवदंतियों के फुल-टाइम थोक विक्रेता बन गए हैं और 'नेता जी' की कहानियां सुना कर अपना समय काटते रहते हैं।

अब नेता जी बहुत व्यस्त हो गए हैं।  शुरुआत में जिन समस्याओं के लिए वे जूझ रहे थे - ऑटो स्टैंड की वह समस्या - हिंदी फिल्मों के माँ की तरह - विधवा का चोला पहने, वैसे ही खांसते, कुढ़ते और रोती-बिलखती बैठी रह गयी! पर नेताजी अब बदलते दौर में - राज्य के हित, समाज के उत्थान और कभी कभी विश्व स्तरीय मुद्दों पर भी हाथ आजमाते रहते हैं।    

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