Dec 30, 2015

जादू के खेल का वृतांत

मदारीवाला अपने मुख्य कार्यक्रम की ओर बढ़ता था। ठीक-ठाक भीड़ जमा हो चुकी होती थी और अचानक से, मदारीवाला दर्शक-दीर्घा में से किसी एक ऐसे इंसान को बुला लेता था, जो अगले १५-२० मिनटों तक उसके हर प्रश्नों के जवाब देते हुए जादू के प्रक्रिया का हिस्सा सा बन जाता था। साथ ही साथ, मदारीवाला दर्शकों में से चुने गए अपने "सहायक" से कुछ ऐसे प्रश्न करता था, और उन प्रश्नों में उसे कुछ ऐसा उलझा देता था कि लोगों को बरबस हंसी आने लग जाती थी।
मदारी वाला बाते करते-करते, लोगो के घेरे में बीच में बिछे चादर को ठीक तरीके से फैला कर रखते हुए, साथ में डमरू को बजाता और बोलता-
मेहरबान! कदरदान!! साहेबान!!!
हिन्दू को राम राम, मुसलमान को सलाम!
अभी आपके सामने जादू का खेल होगा!
साहेबान, बहुत मेहनत का काम है भूत का सामना, एक चूक और बस जान से हाथ धो लेना पड़ता है......मगर मेहरबान, पापी पेट का सवाल है, सब कुछ करेगा!
मेरे मालिक, फिर भी कर के दिखायेगा, जान की परवाह नहीं करेगा, सभी को दिखायेगा!
ये बच्चा, जी हाँ, इस बच्चे को भेजेगा, उस नीम के पेड़ के ऊपर भेजेगा,बच्चा जायेगा, नीम के पेड़ वाले प्रेत आत्मा के पास जायेगा, अपनी जान पर खेल के जायेगा....और उधर छोड़ के आएगा भूत को...
साहेबान, आपके सामने, ये गायब हो जाएगा.....और्रर्र .. मेहरबान, कदरदान, साहेबान, ये पहुंचा देगा, उसको अपने घर, वो उद्धर्रर्र ..ये जाएगा, आपके सामने से जाएगा, जान पे खेल के जाएगा और उसको अपने घर पहुंचा के आएगा!
इस लम्बे चलने वाले प्रवचनात्मक एवं डरावनी बातों के सिलसिले के बीच, जिस बच्चे के उपर भूत आने की बात हो रही होती थी, वह छोटा बच्चा चीख-चीख कर जवाब देता हुआ, थाली पर चम्मच्च को ठोकते हुए - जादूगर के बातों और उसके डमरू के साथ ताल मिला रहा होता था।

मदारीवाला भले ही बार-बार अपने साथ के बच्चे के ऊपर भूत के प्रकोप और उस से हो रही परेशानियों के बारे बता रहा हो, पर उन बातों से बेफिक्र सा, छोटा-बच्चा पूरे विश्वास के साथ काफी सहज होकर अपनी "जान की बाज़ी" लगाने की तैयारी में लगा होता था।

इधर समां बंधता जा रहा होता था, और उधर मदारीवाला तन्मयता से बीच-बीच में डमरू को बजा कर जोर जोर से - "ड्रीम, ड्रीम" की आवाज़ निकालते हुए, और अंत में एक बार डमरू को, कंधे के ऊपर से कमर के नीचे तक के एक घुमाव में लिए झटके के साथ जोर की  "...ड्राम" की आवाज़ निकालते हुए, लगभग चीखते हुए कहता -
हा-ई-एह, वाह रे वाह, शाब्बाश मेरे शेर!
सभी साहेबन को तमाशा दिखायेगा?
सबों को जान पर लड़ कर दिखायेगा?
अपनी जान पे खेल के उस के पास जाएगा?
इन सभी प्रश्नवाचक चीखों को बिना कुछ सुने या समझे हुए- जिसकी कोई गुंजाइश भी नहीं होती थी- छोटा बच्चा भी चीख-चीख कर सकारात्मक प्रत्युत्तर देकर, अपना हिस्सा पूरा कर रहा होता था - और हर बार "करेगा", "दिखायेगा", "जाएगा" -आदि में से किसी एक को चुन कर बोल डालता था। फिर सहानुभूति प्राप्त करने के हिसाब से मदारी बोलता था-
देखिये साहब, आप सभी इत्मीनान से देखिये!
आप इस तमाशा को देखिये....
ये बच्चा जान पर खेलेगा....
ये आपका दिल बहलाएगा....
साहेबान, आपको पसंद आ जाए तो इस गरीब के चादर पर चार आना,आठ आना देते जाइयेगा....
आपके घर में भी ऐसे ही बच्चे होंगे, ऊपरवाला आपके बच्चों को सलामत रखेगा!
फिर माहौल को और रोचक बनाते हुए -
तो बेटा, खेल के लिए तैयार है?
छोटा बच्चा लगभग आग में कूदने वाले अंदाज़ में -
ज--य्य खल्ल-बली, तैयार है, करके दिखायेगा!
मदारीवाला जोश को और बढ़ाते हुए और दर्शक दीर्घा की ओर घूम कर देखते हुए -
मेहरबान, कदरदान, साहेबान, मेरे मालिक, इस्स्स बच्चे का हौसलाफज़ाई कर दीजिये, एक बार जोर से ताली बजा दीजिये..!
लोग बड़े जोश में ताली बजाते और फिर मदारीवाला वापस बच्चे से -
तो चल आ जा बेटा, इधर आ के लेट जा बेटा!
दर्शक दीर्घा के घेरे के बीच में बिछाए चादर पर बच्चा लेट जाता। उसके लेटने के बाद बहुत सारे चादर से उसे ढंकते हुए - डुगडुगी और बांसुरी के सुर-ताल के साथ, मदारीवाला एक बेंत से बने चौकोर आकार के टेंट से बने कवर से बच्चे को ढँक देता था। कुछ और वार्तालाप होता रहता था, जिसमे बच्चे के भूत के प्रकोप और भूत के द्वारा कुछ "प्रेतात्मक" बातों  का सिलसिला का जिक्र होता था।

अंततः, उस टेंट से बने कवर के ऊपर भी कई चादरों को डाल कर, उसे भी ढंकना शुरू कर दिया जाता था। फिर थोड़ी देर घूमते-फिरते उस दर्शकों में से निकाले गए "सहायक" व्यक्ति के करीब आ कर -
भाई, ये बताइये कि मरा हुआ इंसान का कपड़ा छूना अच्छा बात है, क्या?
अनजाने में मदारीवाले के जादू के सहायक के रूप में फंस चुका इंसान, कुछ झुंझलाते हुए -
हम्म...नहीं
मदारीवाला पहले उसकी बात का समर्थन पर उस से बाकी को और डराते हुए -
ये बात तो ठीक बोला है, बिलकुल सही बोला है मेरे भाई ने......
पर साहेबान, एक बात याद रखना, छूने में कोई खराबी नहीं है,
ऐ मेरे मालिक, ऐ मेरे मौला, ऐ मेरे जहाँपनाह, मुर्दा भी कभी ज़िंदा था!
ज़िंदा आदमी ही तो कपड़ा पहनता है और जिन्दा आदमी ही मरता है!
फिर मदारीवाला हँसते हुए, सबों की ओर देखते हुए, पूछता-
साहेबान, ये बताना कि जिन्दा आदमी ही मरता है न?
फिर थोड़े देर के बाद, अचानक से कुछ दार्शनिक सी बातें करता हुआ  -
कल तो गज़ब हो गया भाई, एक ज़िंदा आदमी मर गया!
लोग उसकी बातों को सुनकर हँसते भी थे और कभी-कभी कुछ ऐसे बातों में, जिनमे जीवन का कड़वा सत्य होता था, उनमें उसके व्यक्तित्व के गहराइयों को भी भांपते हुए, बिलकुल खेल में निमग्नित से हो जाते थे। इसके बाद मदारीवाला उस साथ वाले छोटे बच्चे की और इशारा करते हुए-
और मेरे दोस्तों, यह बच्चा आजकल बहुत बीमार रहता है....
क्योंकि इसने एक मुर्दे का कपडा पहन लिया था.....
मगर अभी इसका इलाज़ होगा, ये बच्चा जाएगा!
उस प्रेत के पास जाएगा, उससे माफी मांग कर आएगा....
फिर बच्चे से पूछते हुए-
बेटा, भूत के पास जाने को तैयार है?
अंदर लेटे हुए बच्चे की आवाज़ -
जय खलबली, तैयार है, उस्ताद, जाएगा!
फिर कुछ देर तक, बच्चे और उस व्यक्ति के साथ सवाल-जवाब के माध्यम से कुछ हंसी मजाक का सिलसिला चलता रहता था - बांसुरी और डुगडुगी को बजा कर मनोरंजन के अनवरत बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ। बीच-बीच में, दर्शक से बुलाये व्यक्ति के ऊपर, कुछ ऐसे सवाल-जवाब का सिलसिला सा चलता रहता था कि उस व्यक्ति का खुद का दिया जवाब ही लोगों में हंसी, खिलखिलाहट और उस व्यक्ति के अंदर - थोड़ी सी झुंझलाहट भी पैदा कर देता था। फिर मदारीवाला उस से एक बड़े से चादर के निरीक्षण करने का आग्रह करता-
अय-ये खोपड़ी, इस चादर को जरा ठीक से देख लो भाई, इसमें कही कोई सांप या जानवर या कुछ है?
व्यक्ति के कुछ कहने से पहले वह उस चादर को उस लेते हुए बच्चे के ऊपर डालने को कहता और बीच के जिससे को ऊपर उठाये पकडे रहने का आग्रह करता-
जब तक मैं न बोलूं, पकडे रहना, छोड़ना नहीं, वरना बहुत गड़बड़ हो जाएगा!
और इसके बाद फिर से बांसुरी के साथ-साथ डुगडुगी बजता रहता था और इन सब के बीच, वह बच्चा कुछ अनाप-शनाप सा बोलते हुए, वास्तव में ऐसा लगने लगता था मानो वह किसी प्रेत के आत्मा के चंगुल में हो। चीख-चिल्लाहट, डराने वाले और वीभत्स संवादों का अजब समागम सा होता था - ऐसे नाटकीय अभिनय से वहां पर जो समां बंध जाता था - उसके लिए मेरी तरफ से, हरेक मदरीवाले के सहायक बच्चों को - सर्वोत्तम बाल कलाकार के अभिनय का पुरस्कार अवश्य मिलना चाहिए! डमरू को बजाते हुए और साथ में एक हाथ से बांसुरी को बजाते हुए, अचानक से रुक जाता और फिर लगभग चीखते हुए -
ऐ-ये-ए, खड़ंगा बाबा, निकाल दे इसके भूत को..... 
और अचानक से चौकोर से बने उस टेंट से संरचना के बीचो-बीच, जिसके अंदर बच्चा लेटा होता था, वहां हाथ से पकड़ा चादर का हिस्सा छूट कर गिर जाता, जिसके कारण वहां पर बिलकुल खाली होने का एहसास होता!

मतलब अंदर लेटा बच्चा गायब!

फिर थोड़ी देर तक तो ऐसा लगता मानो वास्तव में सामने के नीम या किसी और पेड़ के ऊपर बच्चा किसी प्रेत से मिलने चला गया हो! जादू का असर सर चढ़ कर बोल रहा होता था- सभी हैरान से होते थे कि आखिर बच्चा गया तो कहाँ गया?

बहुत देर तक संशय की स्थिति बनी रहती थी। फिर मदारीवाला भीड़ से बुलाये हुए "सहायक" को अपने पास बुलाता था, और फिर उस टेंट के ऊपर के चादर के अंदर अपने और उसके सर को घुसा कर, अंदर का माज़रा दिखाता था - मुझे पता नहीं कि अंदर क्या दीखता था पर, कुछ ऐसी बात होती थी जिस से एहसास होता था कि बच्चा वापस आ गया है। फिर और भी कुछ नाटक वगैरह सा होता था, और अंत में बच्चा वापस हँसता-खेलता बाहर आ जाता था।

विश्वास और अविश्वास के झूला में डगमगाते जैसे माहौल में, कई बार मुझे लगता था कि इसे जादू मानूं या न मानूं, पर अगले ही क्षण, नाटकीय ही सही, पर ऐसा प्रतीत होता था मानो सामने सब कुछ यथार्थ में ही हो रहा हो।

इस तरह के अनेकों क्षण को मैंने अत्यधिक चाव से देखा है, जिया है और आज तक अपने अंदर संजो के रखा है! 

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