Dec 28, 2015

घर से स्कूल के बीच की 'पढाई'

बचपन में स्कूल आने और जाने के दौरान, मुझे रास्ते के अगल-बगल, सड़क के किनारे होते गतिविधियों को करीब से देखने का बहुत शौक होता था। उन दिनों घर से स्कूल जाने के लिए, मुझे कदमा बाजार के आस-पास से गुज़रना पड़ता था। कदमा बाजार का माहौल, किसी गांव के हाट के परिष्कृत रूप में ही समझना चाहिए।

बदले दौर का कदमा बाज़ार - सिर्फ दूकान ही दुकानें!
बाज़ार के अंदर, टिन की छत वाले - स्थाई और अस्थाई के बीच झूलते से- कई सारे दुकान बिखरे पड़े थे। बाजार के अंदर, अनेको प्रकार के दूकान थे, पर बहुत कम संख्या में ही सीमेंट और ईंट के बने पक्के दुकान थे। ऐसा ज्ञात होता था कि शुरू के बने कुछ स्थाई दुकानों के इर्द गिर्द, कई सारे दूकान जुड़ते चले गए होंगे - और कुल मिला कर, बाज़ार बहुत ही घनी और भीड़ भरा, मेले के जैसा शकल ले लिया था।

उन स्थाई दूकानों के बीचो-बीच बहुत बड़ा सा सब्जी-बाजार था। बिलकुल गाँव के हाट की तरह - जमीन पर बिछे हुए, बहुत सारे दूकान, ग्रामीण सा माहौल बना देता था। मेन-रोड और बाज़ार के बीच का जगह - अमूमन खाली ही होता था। कई साल तक सड़क के दोनों ओर के फुटपाथ, वास्तव में लोगों के चलने के लिए ही हुआ करता था। इस वजह से, जैसा उम्मीद किया जाना चाहिए, वे खाली ही हुआ करते थे, बल्कि रोड के दूसरी ओर लाइन से बहुत सारे घर भी होते थे।

कालांतर में, उस रोड और बाजार के बीचे के खाली भाग में इक्का दुक्का करते हुए - बहुत सारे सब्जी बेचने वालों ने, जमीन पर सब्जियों का ढेर लगाकर सब्जी मंडी के जाल सा बनाना शुरू कर दिया। फिर जैसा भारत के किसी भी खाली जगह का हश्र होता है- बाजार के पास वाले  सड़क के दोनों ओर के फुटपाथ में भी किसी अमरबेल की तरह से, सब्जियों का टीला सा लगने लगा। जिस तरह से पंक्तिबद्ध होकर खेतों में सब्जियों के ढेर उगते थे, उसी प्रकार से वे बिकने के लिए भी कतारबद्ध से फ़ैले होते थे।

परन्तु मेरे बड़े होने तक, यानि जब तक मैं स्कूल जाता था, सड़क और बाज़ार के बीच के भाग ज्यादातर खाली सा ही रहता था। आये दिन वहां किसी ताबीज़, हकीम-जड़ी-बूटी और इसी तरह के दवा बेचने वालों का, टेंट-नुमा सा दूकान लगता रहता था। एक बार ऐसे दूकान के स्थापित होने के बाद, वे कुछ हफ्ते से लेकर महीने भर, उसी जगह पर जमे से रहते थे।

जब कभी बाजार का कोई जगह खाली रहता था, वहां मदारी के जादू -खेल के साथ-साथ, सांप-बिच्छू, बन्दर - भालू के नाच आदि जैसे खेल भी होते रहते थे - जो आई पी एल क्रिकेट के "टी -२०" के तर्ज़ पर थोड़े देर के लिए चलता और फिर कहीं और आगे के लिए निकल जाता।

मेरी स्कूल के पढाई-लिखाई में, ज्यादा दिलचस्पी नहीं होती थी। स्कूल से आने-जाने के क्रम में, इस तरह के रोचक कार्यक्रमों को देखने से मन बहल जाता था। मेरी खोजी नज़रें और सालों का अनुभव, हमेशा इस तरह के होने वाले गतिविधियों के तलाश मे रहती थीं।

इन खेलों को देखने का अद्भुत आनंद था और आज जब अपने अतीत में डुबकी लगाता हूँ,  इन सब के बिना, वे दिन अधूरे से दीखते हैं! बोनस के तौर पर, अनेकों प्रकार के नयी जानकारी भी मिलते रहते थे - जैसे नीम के पेड़ पर भूत होता है, या दोमुंहा सांप छह महीने एक तरफ के मुंह को इस्तेमाल करता है फिर बाकी समय दूसरे वाले को, या नाना प्रकार के "ताकतों" के दास्ताँ इत्यादि ।

और भी कई सारे इसी तरह के ज्ञानवर्धक बातें, जिनका स्कूल के किताबों में कभी कोई जानकारी नहीं मिल पाता था, वे सभी वहां बाजार में चल रहे किसी मदारीवाले या अन्य विजिटिंग प्रोफ़ेसर के "कक्षा" में मिल जाया करता था । अनेकों बार स्कूल जाते समय, किसी ऐसे ही मज़मे को देखने के चक्कर में, मैं लेट से स्कूल पहुंचा होऊंगा, जिसके कारण क्लास-टीचर से सजा भी भुगता होऊंगा!

आज के टीवी में जिस तरह से लोग चैनल बदलते हैं, उसी प्रकार से उन दिनों बाजार के पास के उन खाली हिस्सों में, हमेशा कुछ न कुछ पसंदीदा सा प्रोग्राम होता ही रहता था - मर्जी थी कि देखूं या कहीं आगे बढ़ता चला जाऊँ। कभी जड़ी-बूटी के बारे में, कभी जादू का खेल, तो कभी किसी दीवाल पर बनते किसी इश्तहार की पेंटिंग को देखने का सिलसिला!

हमारे उन दिनों के लाइव टेलीकास्ट के चैनल लाइनअप में समय-समय पर मनोरंजन के लिए, इस तरह के अनेक सारे गतिविधियाँ, निःशुल्क उपलब्ध होते रहते थे। आज जब कभी ठन्डे दिमाग से बैठ कर, उन अतीत के दिनों में खो जाता हूँ, तो हर वैसे अनुभव के क्षण - बिलकुल आँखों के सामने तैरने से लग जाते हैं।

आज यादों के उस जखीरे में से, कुछेक मुख्य विकर्षणों को - जो मुझे स्कूल और पढाई से दूर करने में प्रबल सक्षम से थे - उनको याद करने का प्रयास कर रहा हूँ। ये यादें ऐसी हैं जो मेरे मानस-पटल पर काफी गहरे रेखांकन कर गए हैं।

आगे मैं कभी उन सारे तमाशबीनों का ज़िक्र करूँगा - मैं काफी गहराई से उनके हर एक गतिविधियों को देखा करता था, और किसी वीडियो कैमरा के न होने के बावजूद, हरेक दृश्य आज भी मुझे उसी ताज़गी के साथ याद हैं! कई बार तो लगता है कि मैं अब भी उन सभी दृश्यों को अपने आँखों के आगे घटित होता देख रहा हूँ!

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