आज का दिन मुझे विशेष कर याद रहता है क्योंकि आज हमें कुछ विशेष करने को मिलता था....
आज हम सभी बच्चे नानी के साथ दशमी के अवसर पर माँ दुर्गा के अंतिम दर्शन करने जाते! मेरी नानी को पूजा पाठ में असीम आस्था थी और हर दूसरे-तीसरे दिन कोई ना कोई व्रत होता और वह कालिन्दी रोड के पास के रंकिनी मंदिर का एक चक्कर ज़रूर लगाती जिसमें हम बच्चों का सम्मिलित होना सब्ज़ी में आलू की तरह एक सामान्य और औपचारिकता सी थी!
परंतु दशमी के दिन जाना एक विशेष महत्व रखता था!
हालाँकि आज के दिन प्रथा थी कि किसी भी विषय के किताब को हम साथ ले कर जाते थे और सरस्वती देवी के चरणों से छुआ कर हम अच्छे अंक लाने की प्रार्थना करते थे! इसमें कोई ज़्यादा सोचने की आवश्यकता नहीं है कि हम सभी सबसे कठिन विषयों के किताब ले कर जाते थे, पर मेरी समस्या बढ़ जाती क्यूँकि कौन सा विषय के किताब को घर पर छोड़ूँ!
पर मेरे जाने के विशेष कारण इस सरस्वती देवी के "विद्या-रीचार्ज" से कहीं अलग होते थे! दशमी के दिन पिछले ७-८ दिनों से आकर्षण का केंद्र बने दुर्गा माता की प्रतिमा के बिलकुल समीप जाने का मौक़ा मिलता था! इतने दिनों से दूर से दिखने वाले महिषासुर राक्षस को, ख़ूँख़ार दाँत दिखाते सिंह को, महिषासुर के आधे पेट चीरे वाले भैंसा को, कार्तिक के मोर को, सरस्वती के वीणा को और इसी तरह के अन्य मूर्तियों को छू कर देख सकते थे!
हर दुर्गा जी के प्रतिमा में बच्चों के ऊँचाई पर महिषासुर होता था, मेरे लिए सबसे मधुर क्षण होता जब महिषासुर को क़रीब से छू कर देख सकते थे। महिषासुर अक्सर नीले या हरे रंग का होता, जिसके बाल या तो घुंघराले होते अथवा बेतरतीब बिखरे से, खुला मांसल और गठीला बदन ( वैसे शरीर को आज तक जिम में बना पाना सम्भव नहीं दिखता), भैंसे से निकलता और अक्सर उसके बाँए सीने पर त्रिशूल के नुकीली हिस्सा घुसा हुआ! ज़ाहिर है ऐसे में जब वह मरने वाला हो तो उसका मुँह खुला होता था - मैं अक्सर उसके खुले मुँह में कलाकंद मिठाई का एक टुकड़ा डाल देता! फिर कार्तिक के मोर के एकाध पंख को नोच लेता था और साथ लाए किताब के बीच देवी के चरणों को छूये फूलों के साथ रख लेता!
इन सब से भी ज़्यादा मज़ेदार होता था आसपास के लकड़ी झूला वाले या छिटपुट मिठाई या खिलौना के दुकान वाले - सभी बिलकुल सस्ते दर पर अंतिम दिन पैसे वसूलने के प्रयास में लगे होते थे - और हम नानी से ख़ूब जिद्द करते! नानी मुस्कुराते हुए मान जाती और अपने साड़ी के आँचल के कोर में बँधे रुपयों के गाँठ को खोलने में व्यस्त हो जाती!
इन सब के बीच बंगाली औरतें जिन्हें देवी के विसर्जन होने से अधिक पिछले हफ़्ते भर से दुर्गा पूजा पंडाल जैसे स्थापित साम्राज्य के विघटित होते देखने का दुःख होता था और इस वजह से ख़ूब करुणा के भाव से - आबार फेर आसो माँ ... जैसे दिल से निकले संवादों के बीच वे अपने चीर परिचित "लू लू" की उल्लू ध्वनि को निकालती- हालाँकि उस ध्वनि से लक्ष्मी जी के मस्त बैठे उल्लू को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था क्योंकि उसके पास तो माँ होती थी - और वो भी लक्ष्मी!!
उधर बंगाली पुरुषों का दर्द कौन समझे! साल भर के प्रतीक्षा के बाद उन्हें कुछ विशेष काम मिला था! अब सब कुछ ख़त्म होता सा !! माहौल ऐसा होता कि - चल री सजनी गाने की पंक्ति - "कोई यहाँ कोई वहाँ कोई कहाँ रे" वास्तव में परिलक्षित होती दिख रहा हो !
अक्सर महीने भर पहले से पंडाल बनना शुरू होता और वैसे आम तौर पर घर में घुस कर बैठे दब्बू क़िस्म के बंगालियों का अचानक से सतह पर आना शुरू हो जाता और नवरात्रि के तीसरे या चौथे दिन से ही - जबकि अभी पंडाल के तिरपाल लगना बाक़ी ही हो - सबसे पहले पंडाल के मुख्य द्वार के बग़ल एक पूजा कमिटी के बने बूथ की व्यवस्था ज़रूर हो जाती जहाँ के प्रवेश को रोकने की ऐसी चौकस व्यवस्था होती मानो वाघा बॉर्डर हो! हर वक़्त उधर दो चार बंगालियों का बैठा होना अनिवार्य सा था! आम आदमी के पास फटकते ही वे एकदम से चौकन्ने हो जाते और हम बच्चों को बांगला में दो चार फ़ालतू के निर्देश दे देते! एक म्यूज़िक सिस्टम ज़रूर लग जाता जिसमें एक PA सिस्टम वाला माइक भी होता! सभी BFN - Busy For Nothing जैसे कार्यकर्ता इधर से उधर चलते फिरते से नज़र आते थे... सबों के माँड़ के स्टार्च से इस्तरी कर पहने कुर्ता में फ़लाँ फ़लाँ "सरबोजोनिन दुर्गा पूजा कमिटी मेंबर" जैसे शौर्य मेडल के बैज लगे होते थे. ये व्यवस्था उनके अन्यथा बेरोज़गार ज़िंदगी के सूखे पड़े बंजर में सावन के बरसात सा फ़ील देता और बस उसी के और रात को पूजा कमिटी के फ़ंड से मिलने वाले सोमरस के बल पर अगले हफ़्ते भर उन सभी कार्यकर्ताओं का पूरी बैटरी चार्ज रहता!
उधर पंडाल के हर कोने पर बाँस के स्तम्भों पर लगे लाउड स्पीकर के चोंगे से अजब अजब तरीके के बांगला गान बजता रहता जिसमें ज़्यादातर हमारे पल्ले नहीं पड़ता! पूछने पर पता चलता कि " ऐ आमादेर रौबिंदरो शोंगित है" या नोजरुल या आधुनिक गान है! उन गाने को रोक कर हर दो चार मिनट पर कुछ न कुछ अनर्गल अनाउन्स्मेंट होता रहता जो बांगला में ही होना अनिवार्य होता!
कार्यकर्ता पंडाल के परिधि के चारों ओर बिखेर होते और किसी न किसी बकवास काम में लगे रहते थे या अत्यधिक बिज़ी दिखने का प्रयास में ज़रूर होते थे! उन निकम्मों को जिन्हें साल भर उसके घर पर भी किसी ने उतना महत्व नहीं दिया होगा, अचानक से उनके शेयर मार्केट में भूचाल सा आ गया होता था! "बाप्पी तुमि ज़ेथाई थाक़ो, ताड़ा ताड़ी बूथेर शौमीप चौल्ले आशो" या इसी तरह के अर्जेंट सूचना किसी "खोखा" या "बीसवोजीत दा" और अन्य कलाकारों के लिए होता रहता! ऐसा लगता जैसे बॉर्डर पर सेना को तुरंत हाज़िर होने का आदेश सा था! इस तरह से इनके दिन भर इसी तरह के अनर्गल काम में लगे रहने का परिणाम यह होता कि सारा पंडाल और उसके इर्द गिर्द बौंग समाज बन चुका होता था! मुझे तो दुर्गा पूजा के समय ऐसा प्रतीत होता कि कौवे भी बांगला में कांव कांव बोल रहे हों!
एक और विशेष आकर्षण होता था - जातरा! शाम के समय पंडाल के अंदर एक स्टेज सा बना होता जिसके इर्द गिर्द बैठने की व्यवस्था होती और सब कोलकाता से आए किसी विशेष नाटक मंडली का कोई ड्रामा होता! शुरू में सिर्फ़ टिकट वाले को ही अंदर जाने दिया जाता और चारों तरफ़ से पंडाल को किसी दुल्हन की तरह घूँघट में ढँक के रखा जाता! हम सभी पंडाल के बाहर कौतुहलता से खड़े रहते और जैसे जैसे नाटक शुरू होता - सभी ओर से पंडाल को खोल दिया जाता और हम स्टेज मे चल रहे "जातरा"-नाटक को देखते! पंडाल बाहर खड़े फ़्री में देखने वाले आधी जनता को कुछ पल्ले ही नहीं पड़ता क्योंकि संवाद बांगला में होता और सीधी सादी बातों को भी बहुत ही काव्यात्मक और हास्यास्पद तरीक़े से बोला जाता - कुछ तो भाषा का प्रभाव और कुछ बंगालियों की अपनी विशेषता, जैसे एक सीन याद आता है की हीरो के हाथ में एक तलवार लिए एक डाइयलोग था - "ऐ व्यभाचारी, अशिष्टो, ...,..,..,.,, (और भी बहुत सारे और विश्लेषण).... आमि तोमा के खौंडो खौंडो कोरी दिबो..."
दो बात समझ में नहीं आती - एक तो जब मारना ही है तो इतने सारे विश्लेषण देकर विलेन के चरित्र को क्यों इतना उजागर करना और दूसरा कि सामने वाला को जब पता है कि उसे वह मारने वाला है और उसके पहले उसके इतने सारे चरित्र का उल्लेख हो रहा है तो मौक़ा देख के वार करे या भाग ले - पर वह ढीठ की तरह वही स्टेज पर मरने के लिए खड़ा रहता! जब कभी ऐसा सीन आता पीछे live orchestra वाले ड्रम में लगे मेटल वाले झाल को बजाते रहते और जब फ़ाइनल assault होता, पूरा ड्रम प्ले होता!! और पीछे से तालियाँ और तल्लीन दर्शकों में से कुछ विलेन के मारे जाने के महीन समर्थन के स्वर भी !!
हमें थोड़ी देर में नींद आने लगती और हम वापस घर आ जाते!!
दुर्गा पूजा वैसे तो विशेष कर बंगाल के लोग ज़्यादा जोश से मानते हैं - या यूँ कहें कि जमशेदपुर में जब हम बड़े हो रहे थे तो बंगाली तरीक़े से मनाए जाने वाले दुर्गा पूजा के परिपाटी में ही बड़े हुए और आज तक उसका असर हमारे ख़ून में समा गया है। मुझे तो अब भी दुर्गा जी बंगाली सी लगती हैं ऐसा लगता है कि उनका mother tongue शायद बांगला ही होगा - क्योंकि पूजा के आयोजक से लेकर पूजारी तक सभी बंगाल के होते थे! दुर्गा पूजा के दौरान जितने भी announcement होते वे भी बंगला में और हर वाक्य में 'ओ' और 'श' का विशेष प्रयोग होते हुए शोंधि पूजो, भूलबेन ना बोंधुगौण आज के शोंधया काले शात घोटिकाय कोलकातार बिख्यात कोलाकार ... जातरा अपुरबो शानशार... और इन सबके बीच "पुष्पंजोलो" का भी announcement होता!
वहाँ के ढाक के साथ धूप बत्ती की ख़ुशबू और पूजा वाले स्थान पर बाँस से बने barricade के अंदर दो-चार लाल बॉर्डर वाले सफ़ेद सिल्क की साड़ी पहने बचेंद्रीपाल जैसे अदम्य आत्मविश्वास से भरी महिलाओं के बीच बैठे पंडितजी- पुष्पांजलि के फूल को लेने के समय पूरा बंगालियों के भेदभाव के बाद जब पुष्पांजलि शुरू होता तो वहाँ भी संस्कृत का उच्चारण ऐसा होता कि लगता कि बंगला में श्लोक पढ़ा जा रहा है -
नौमो ... गाउड़ी...त्रांबोके... शारोन्ये...सरबोमोंगोल... नमो-स्तु-ते...
बहुत सालों तक बड़े होने पर समझ में आया था कि बचपन में किए पुष्पांजलि के श्लोक दुर्गा-सप्तशती में संस्कृत के हैं!!
ख़ैर, आज भी जहाँ भी हैं hats off to Bengali community... they have kept my childhood memories alive- they still do similar announcements और उनका जोश वैसा ही आज भी दिखता है!!
Thanks मामी - आप तो बंगालियों को ख़ास miss नहीं करती होंगी क्योंकि श्यामली और south officepada में तो बंगालियों का काफ़ी बोलबाला है और साल भर इन विशेष प्रजाति का प्रकोप रहता होगा - मसलन श्यामली में अभी से बच्चे monkey cap लगा के घूमते होंगे और सभी उसके बाद भी कांपते होंगे! क्योंकि बाक़ी राँची का temperature अगर ३५ डिग्री है तो श्यामली के बंगालियों को -२० डिग्री लगता होगा!
वैसे जमशेदपुर में जब बंगाली के बच्चे मफ़लर और monkey cap में आते थे तो बिहारी बच्चों के घर आलमारी या संदूक से ऊनी कपड़ों को धूप में सुखाने का कार्यक्रम शुरू होता था क्योंकि वह आह्वान होता था कि एकाध महीने में बाक़ियों के लिए ठंड शुरू होने वाला है....