Nov 25, 2018

अतीत के आँगन से दुर्गा पूजा की एक झांकी

आज का दिन मुझे विशेष कर याद रहता है क्योंकि आज हमें कुछ विशेष करने को मिलता था....

आज हम सभी बच्चे नानी के साथ दशमी के अवसर पर माँ दुर्गा के अंतिम दर्शन करने जाते! मेरी नानी को पूजा पाठ में असीम आस्था थी और हर दूसरे-तीसरे दिन कोई ना कोई व्रत होता और वह कालिन्दी रोड के पास के रंकिनी मंदिर का एक चक्कर ज़रूर लगाती  जिसमें हम बच्चों का सम्मिलित होना सब्ज़ी में आलू की तरह एक सामान्य और औपचारिकता सी थी!

परंतु दशमी के दिन जाना एक विशेष महत्व रखता था!

हालाँकि आज के दिन प्रथा थी कि किसी भी विषय के किताब को हम साथ ले कर जाते थे और सरस्वती देवी के चरणों से छुआ कर हम अच्छे अंक लाने की प्रार्थना करते थे! इसमें कोई ज़्यादा सोचने की आवश्यकता नहीं है कि हम सभी सबसे कठिन विषयों के किताब ले कर जाते थे, पर मेरी समस्या बढ़ जाती क्यूँकि कौन सा विषय के किताब को घर पर छोड़ूँ!

पर मेरे जाने के विशेष कारण इस सरस्वती देवी के "विद्या-रीचार्ज" से कहीं अलग होते थे!  दशमी के दिन पिछले ७-८ दिनों से आकर्षण का केंद्र बने दुर्गा माता की प्रतिमा के बिलकुल समीप जाने का मौक़ा मिलता था! इतने दिनों से दूर से दिखने वाले महिषासुर राक्षस को, ख़ूँख़ार दाँत दिखाते सिंह को, महिषासुर के आधे पेट चीरे वाले भैंसा को, कार्तिक के मोर को, सरस्वती के वीणा को और इसी तरह के अन्य मूर्तियों को छू कर देख सकते थे! 

हर दुर्गा जी के प्रतिमा में बच्चों के ऊँचाई पर महिषासुर होता था, मेरे लिए सबसे मधुर क्षण होता जब महिषासुर को क़रीब से छू कर देख सकते थे। महिषासुर अक्सर नीले या हरे रंग का होता, जिसके बाल या तो घुंघराले होते अथवा बेतरतीब बिखरे से, खुला मांसल और गठीला बदन ( वैसे शरीर को आज तक जिम में बना पाना सम्भव नहीं दिखता), भैंसे से निकलता और अक्सर उसके बाँए सीने पर त्रिशूल के नुकीली हिस्सा घुसा हुआ! ज़ाहिर है ऐसे में जब वह मरने वाला हो तो उसका मुँह खुला होता था - मैं अक्सर उसके खुले मुँह में कलाकंद मिठाई का एक टुकड़ा डाल देता! फिर कार्तिक के मोर के एकाध पंख को नोच लेता था और साथ लाए किताब के बीच देवी के चरणों को छूये फूलों के साथ रख लेता! 

इन सब से भी ज़्यादा मज़ेदार होता था आसपास के लकड़ी झूला वाले या छिटपुट मिठाई या खिलौना के दुकान वाले - सभी बिलकुल सस्ते दर पर अंतिम दिन पैसे वसूलने के प्रयास में लगे होते थे - और हम नानी से ख़ूब जिद्द करते! नानी मुस्कुराते हुए मान जाती और अपने साड़ी के आँचल के कोर में बँधे रुपयों के गाँठ को खोलने में व्यस्त हो जाती! 

इन सब के बीच बंगाली औरतें जिन्हें देवी के विसर्जन होने से अधिक पिछले हफ़्ते भर से दुर्गा पूजा पंडाल जैसे स्थापित साम्राज्य के विघटित होते देखने का दुःख होता था और इस वजह से ख़ूब करुणा के भाव से - आबार फेर आसो माँ ... जैसे दिल से निकले संवादों के बीच वे अपने चीर परिचित "लू लू" की उल्लू ध्वनि को निकालती- हालाँकि उस ध्वनि से लक्ष्मी जी के मस्त बैठे उल्लू को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था क्योंकि उसके पास तो माँ होती थी - और वो भी लक्ष्मी!!

उधर बंगाली पुरुषों का दर्द कौन समझे! साल भर के प्रतीक्षा के बाद उन्हें कुछ विशेष काम मिला था! अब सब कुछ ख़त्म होता सा !! माहौल ऐसा होता कि - चल री सजनी गाने की पंक्ति - "कोई यहाँ कोई वहाँ कोई कहाँ रे" वास्तव में परिलक्षित होती दिख रहा हो !

अक्सर महीने भर पहले से पंडाल बनना शुरू होता और वैसे आम तौर पर घर में घुस कर बैठे दब्बू क़िस्म के बंगालियों का अचानक से सतह पर आना शुरू हो जाता और नवरात्रि के तीसरे या चौथे दिन से ही - जबकि अभी पंडाल के तिरपाल लगना बाक़ी ही हो - सबसे पहले पंडाल के मुख्य द्वार के बग़ल एक पूजा कमिटी के बने बूथ की व्यवस्था ज़रूर हो जाती जहाँ के प्रवेश को रोकने की ऐसी चौकस व्यवस्था होती मानो वाघा बॉर्डर हो! हर वक़्त उधर दो चार बंगालियों का बैठा होना अनिवार्य सा था! आम आदमी के पास फटकते ही वे एकदम से चौकन्ने हो जाते और हम बच्चों को बांगला में दो चार फ़ालतू के निर्देश दे देते! एक म्यूज़िक सिस्टम ज़रूर लग जाता जिसमें एक PA सिस्टम वाला माइक भी होता! सभी BFN - Busy For Nothing जैसे कार्यकर्ता इधर से उधर चलते फिरते से नज़र आते थे... सबों के माँड़ के स्टार्च से इस्तरी कर पहने कुर्ता में फ़लाँ फ़लाँ "सरबोजोनिन दुर्गा पूजा कमिटी मेंबर" जैसे शौर्य मेडल के बैज लगे होते थे. ये व्यवस्था उनके अन्यथा बेरोज़गार ज़िंदगी के सूखे पड़े बंजर में सावन के बरसात सा फ़ील देता और बस उसी के और रात को पूजा कमिटी के फ़ंड से मिलने वाले सोमरस के बल पर अगले हफ़्ते भर उन सभी कार्यकर्ताओं का पूरी बैटरी चार्ज रहता! 

उधर पंडाल के हर कोने पर बाँस के स्तम्भों पर लगे लाउड स्पीकर के चोंगे से अजब अजब तरीके के बांगला गान बजता रहता जिसमें ज़्यादातर हमारे पल्ले नहीं पड़ता! पूछने पर पता चलता कि " ऐ आमादेर रौबिंदरो शोंगित है" या नोजरुल या आधुनिक गान है! उन गाने को रोक कर हर दो चार मिनट पर कुछ न कुछ अनर्गल अनाउन्स्मेंट होता रहता जो बांगला में ही होना अनिवार्य होता! 

कार्यकर्ता पंडाल के परिधि के चारों ओर बिखेर होते और किसी न किसी बकवास काम में लगे रहते थे या अत्यधिक बिज़ी दिखने का प्रयास में ज़रूर होते थे! उन निकम्मों को जिन्हें साल भर उसके घर पर भी किसी ने उतना महत्व नहीं दिया होगा, अचानक से उनके शेयर मार्केट में भूचाल सा आ गया होता था! "बाप्पी तुमि ज़ेथाई थाक़ो, ताड़ा ताड़ी बूथेर शौमीप चौल्ले आशो" या इसी तरह के अर्जेंट सूचना किसी "खोखा" या "बीसवोजीत दा" और अन्य कलाकारों के लिए होता रहता! ऐसा लगता जैसे बॉर्डर पर सेना को तुरंत हाज़िर होने का आदेश सा था! इस तरह से इनके दिन भर इसी तरह के अनर्गल काम में लगे रहने का परिणाम यह होता कि सारा पंडाल और उसके इर्द गिर्द बौंग समाज बन चुका होता था! मुझे तो दुर्गा पूजा के समय ऐसा प्रतीत होता कि कौवे भी बांगला में कांव कांव बोल रहे हों!

एक और विशेष आकर्षण होता था - जातरा! शाम के समय पंडाल के अंदर एक स्टेज सा बना होता जिसके इर्द गिर्द बैठने की व्यवस्था होती और सब कोलकाता से आए किसी विशेष नाटक मंडली का कोई ड्रामा होता! शुरू में सिर्फ़ टिकट वाले को ही अंदर जाने दिया जाता और चारों तरफ़ से पंडाल को किसी दुल्हन की तरह घूँघट में ढँक के रखा जाता! हम सभी पंडाल के बाहर कौतुहलता से खड़े रहते और जैसे जैसे नाटक शुरू होता - सभी ओर से पंडाल को खोल दिया जाता और हम स्टेज मे चल रहे "जातरा"-नाटक को देखते! पंडाल  बाहर खड़े फ़्री में देखने वाले आधी जनता को कुछ पल्ले ही नहीं पड़ता क्योंकि संवाद बांगला में होता और सीधी सादी बातों को भी बहुत ही काव्यात्मक और हास्यास्पद तरीक़े से बोला जाता - कुछ तो भाषा का प्रभाव और कुछ बंगालियों की अपनी विशेषता, जैसे एक सीन याद आता है की हीरो के हाथ में एक तलवार लिए एक डाइयलोग था - "ऐ व्यभाचारी, अशिष्टो, ...,..,..,.,, (और भी बहुत सारे और विश्लेषण).... आमि तोमा के खौंडो खौंडो कोरी दिबो..." 

दो बात समझ में नहीं आती - एक तो जब मारना ही है तो इतने सारे विश्लेषण देकर विलेन के चरित्र को क्यों इतना उजागर करना और दूसरा कि सामने वाला को जब पता है कि उसे वह मारने वाला है और उसके पहले उसके इतने सारे चरित्र का उल्लेख हो रहा है तो मौक़ा देख के वार करे या भाग ले - पर वह ढीठ की तरह वही स्टेज पर मरने के लिए खड़ा रहता! जब कभी ऐसा सीन आता पीछे live orchestra वाले ड्रम में लगे मेटल वाले झाल को बजाते रहते और जब फ़ाइनल assault होता, पूरा ड्रम प्ले होता!! और पीछे से तालियाँ और तल्लीन दर्शकों में से कुछ विलेन के मारे जाने के महीन समर्थन के स्वर भी !!
हमें थोड़ी देर में नींद आने लगती और हम वापस घर आ जाते!!



दुर्गा पूजा वैसे तो विशेष कर बंगाल के लोग ज़्यादा जोश से मानते हैं - या यूँ कहें कि जमशेदपुर में जब हम बड़े हो रहे थे तो बंगाली तरीक़े से मनाए जाने वाले दुर्गा पूजा के परिपाटी में ही बड़े हुए और आज तक उसका असर हमारे ख़ून में समा गया है। मुझे तो अब भी दुर्गा जी बंगाली सी लगती हैं ऐसा लगता है कि उनका mother tongue शायद बांगला ही होगा - क्योंकि पूजा के आयोजक से लेकर पूजारी तक सभी बंगाल के होते थे! दुर्गा पूजा के दौरान जितने भी announcement होते वे भी बंगला में और हर वाक्य में 'ओ' और 'श' का विशेष प्रयोग होते हुए शोंधि पूजो, भूलबेन ना बोंधुगौण आज के शोंधया काले शात घोटिकाय कोलकातार बिख्यात कोलाकार ... जातरा अपुरबो शानशार... और इन सबके बीच "पुष्पंजोलो" का भी announcement होता!

वहाँ के ढाक के साथ धूप बत्ती की ख़ुशबू और पूजा वाले स्थान पर बाँस से बने barricade के अंदर दो-चार लाल बॉर्डर वाले सफ़ेद सिल्क की साड़ी पहने बचेंद्रीपाल जैसे अदम्य आत्मविश्वास से भरी महिलाओं के बीच बैठे पंडितजी- पुष्पांजलि के फूल को लेने के समय पूरा बंगालियों के भेदभाव के बाद जब पुष्पांजलि शुरू होता तो वहाँ भी संस्कृत का उच्चारण ऐसा होता कि लगता कि बंगला में श्लोक पढ़ा जा रहा है - 
नौमो ... गाउड़ी...त्रांबोके... शारोन्ये...सरबोमोंगोल... नमो-स्तु-ते... 
बहुत सालों तक बड़े होने पर समझ में आया था कि बचपन में किए पुष्पांजलि के श्लोक दुर्गा-सप्तशती में संस्कृत के हैं!!
ख़ैर, आज भी जहाँ भी हैं hats off to Bengali community... they have kept my childhood memories alive- they still do similar announcements  और उनका जोश वैसा ही आज भी दिखता है!!

Thanks मामी - आप तो बंगालियों को ख़ास miss नहीं करती होंगी क्योंकि श्यामली और south officepada में तो बंगालियों का काफ़ी बोलबाला है और साल भर इन विशेष प्रजाति का प्रकोप रहता होगा - मसलन श्यामली में अभी से बच्चे monkey cap लगा के घूमते होंगे और सभी उसके बाद भी कांपते होंगे! क्योंकि बाक़ी राँची का temperature अगर ३५ डिग्री है तो श्यामली के बंगालियों को -२० डिग्री लगता होगा!

वैसे जमशेदपुर में जब बंगाली के बच्चे मफ़लर और monkey cap में आते थे तो बिहारी बच्चों के घर आलमारी या संदूक से ऊनी कपड़ों को धूप में सुखाने का कार्यक्रम शुरू होता था क्योंकि वह आह्वान होता था कि एकाध महीने में बाक़ियों के लिए ठंड शुरू होने वाला है....


चलते चलते साक्षात्कार

पिछले पतझड़ में ही तो मैं एक ठूंठ पेड़ बन गया था..

सारे सपनों के पत्ते लाल पीले और रंगीन हो के autumn के सुनहरे रंगीनयों को दिखाते हुए झर गए थे....

और मैं अपनी हकीकत को लिए वही जमीन से जुड़ा और खुद को सिमेटे खड़ा रहा..

समय बदला, फिर बहारें आयी, और मेरे सारे सपने फिर से हरे हो उठे.

अब तो ऐसे कई मौसम देख चुका हूँ....

और इस तरह के रोलर कोस्टर की सवारी से अब इस बदलाव की आदत हो गयी है....

पर, "दिल है कि मानता नहीं, मुश्किल बड़ी है रस्म-ए-मुहब्बत, ये जानता ही नहीं है...."

जीवन के यथार्थ से वाकिफ हूँ, पर हमेशा अपने इस सोच पर किसी के मुहर लगाने की प्रतीक्षा में बैठा हूँ.

अपने घर के एक कमरे को ऑफिस बनाया हुआ हूँ और वहीँ  से काम करता रहता हूँ......

सुबह से वही कैलेंडर, मीटिंग्स, नए मीटिंग्स को arrange  करना, कुछ mails भेजना या जवाब देना...

इन सब के बीच कमरे के एक हिस्से में खिड़की से दिन के आरम्भ से ढलने तक का सिलसिला किसी चलचित्र सा लगता है...

सुबह की ताज़गी और तेज़ शाम होते होते बस कमज़ोर और मंद होता सा रोज़ देखता हूँ...वही लचर सा तिमिर के चादर ओढ़े कहीं दूर और फिर वही अँधेरा...

ये सिलसिला जीवन का समानांतर सा लगता है, रोज घटते देखता हूँ,  कई लोगों के जीवन में इसी के प्रतिरूप को झांकता हूँ, मनन करता हूँ और फिर संतोष कर लेता हूँ...

अंततोगत्वा सभी को इस इह लीला से गुजरना है - हर किसी का सूरज अस्त होता है - कभी किसी का शौर्य स्थायी नहीं रह पता है - फिर ये कैसी प्यास है जो इस realization के घूंट पी पी कर भी नहीं बुझ रही है?

जी चाहता है उन्मुक्त हो के स्वछंद जीवन को जीयूं

कहीं कोई बंधन न हो

न ही कोई अपेक्षा और न ही अब तक के जीए जीवन की उपेक्षा...

संभव है....

पर खुद पर implement करने में बहुत दिक्कतें हैं...

अब तक जो भी कर पाया और जो कुछ भी पाया हूँ, बस है

हाँ और बहुत कुछ हो सकता था पर ये भी क्या कम है? संतुष्टि है पर आंकाक्षा और पाने की है....

आकांक्षाएं जीवन को गति देता है और अपने क्षमताओं को टटोलने को विवश भी करता है...

कई प्रयास आवश्यकता से ज़्यादा आंकाक्षाओं के उड़ान को realize कराने के लिए होता है...

पर ये अनवरत संघर्ष चलता रहता है...

एक सपना देखा था कभी...

क्यों देखा था पता नहीं?

आँखें मेरी देखी थीं पर उन सपनों को पर पूरा करने की हिम्मत मुझमें नहीं थी...

प्रयास करता रहा और देखो कहाँ तक पहुँच गया!

कभी अपने मन में ये पंक्तियाँ कही या किसी की लिखी को ही पढ़ा होऊंगा,

हमेशा बुदबुदाता रहता हूँ...

"सपने देखने में कोताही मत करो - उतने ही बड़े बनोगे जीतने बड़े सपने देखोगे..."

बस, इसी प्लॉट पर मेरे जीवन की स्टोरी चल रहा है, कई मोड़ आये और कई अनवरत थकाने वाले अनवरत दौड़

पर सपने कहीं आसमान में Wycliffe मॉर्निंग स्टार की तरह - वहीँ के वहीँ ..

फिर सूरज उगता है और वो तारा कहीं विलुप्त और फिर कहीं से दिखने लगता है

और इन सब के बीच मैं चलता रहता हूँ....    

पर एक और वाक्य - सपनों की रफ़्तार ज़िंदगी से तेज़ है - काफी हद तक ब्रेक लगा देती है और रुकते चलते ज़िंदगी चल रही है....

कल और आज का मैं-

मिल के समझौता कराएँगे अपने सपने और जिंदगी का -

यही नया फार्मूला है मेरे जीवन के इस पड़ाव का....

स्वयं से

कोई तो मेरे अंदर है जो सब कुछ जब ठीक चलता दिखे तो कहीं मेरे अपने अस्तित्व का बोध करने से नहीं चुकता है.
निशब्द होता है वह, पर बहुत चीखती सी एहसास कराने में बिलकुल सधा हुआ सा...
मैं अकेला कहीं अपनी धुन में मगन ज़िन्दगी का मज़ा लिए जा रहा था कि तुम मिल गए - एक गीत मेरे जेहन में कहीं हमेशा गुनगुनाता सा.
फिल्म का नाम भी था मनपसंद और जीवन हमेशा जीना चाहा उसी ढर्रे से.
पर मौलिकता का जब सामना पैमाने से होता है तो फिर शुरुआत होती है आंकने का और वहीँ से प्रारम्भ होता है प्रतिस्पर्धा, विफलता और न जाने कितने प्रकार के अक्षमता का भी- फिर शुरू होता है हरके पहलुओं पर ऊँगली उठाने का और अंत में रुकता है खुद पर... 
मैं क्यों?
मैं तो अलमस्त अल्हड सा ज़िंदगी के स्वछंद भाव को स्वीकार कर लिया था फिर ये सारे नए सिरे से जीवन के आंकलन और नए लक्ष्य क्यों?
जवाब मेरे ही अंदर से आता है - दुनिया का बस यही तौर तरीका है - अगर तुमने फलां फलां नहीं हासिल की या "उसके" तरह नहीं कुछ कर पाए तो असफल कहलाओगे...
या फिर "ये तुमने क्या हासिल किया, तुमसे कम आंके जाने वाले  या तुमसे काम योग्यता वाले या तुमसे बाद सब कुछ आरम्भ करने वाले कहाँ से कहाँ और तुम बस यहाँ?"
इतने सारे प्रश्न मेरे पास जवाब में बस मेरा अपना वर्तमान. बस यही जमा पूंजी है - और एक बेबस सा मैं जो स्वयं के बनाये मापदंड में बहुत असफल सा निकम्मा सा और न जाने कहीं अपराध बोध से ग्रसित होता सा दिन पर दिन संकुचित हो के बौना बनता सा.... 
आखिर क्यों इतने सारे जंग लड़ने के बाद मैं फिर से नए जंग लड़ने लगता हूँ?
कौन है मेरे अंदर जो मेरे साथ सामंजस्य नहीं करता?
कौन है वो जो मेरे यथार्थ से ज़्यादा उसके परिकल्पना में मेरे भविष्य के होने वाले व्यक्तित्व को देखना ही पसंद करता है? 
हाँ, मैं गौरान्वित होना चाहता हूँ, अपनी आजतक के जमापूंजी से ही...
मैं बहुत खुश रहना चाहता हूँ अपने सीमितता में ही... 
मैं सबसे बड़ा और सबसे सुखी हूँ अपनी दुनिया में....
मैं क्यों बहक जाता हूँ?
अंतर्द्वंद बहुत प्रगाढ़ है - प्रयास सिमित है और आकांक्षाएं असीमित. 
सम्राट अशोक ने कलिंग जीतने के बाद क्या जीता? अपने अहंकार के ऊपर उसकी हार हुयी और वह जीत के भी स्वयं से हार गया था....
इस के बाद और क्या कहना है?
स्वयं से कलिंग के युद्ध में हार कर लूँ?
संधि कर लूँ ?
या चलने दूँ इस युग युगांतर से चले आ रहे अन्तर्युद्ध को?

Jul 4, 2018

जन्मदिन - एक मील का पत्थर


यायावर सी ज़िंदगी  आगे बढ़ती जा रही है,
तय किये रास्तों की यादें आँखों में तैरती सी,

करता हूँ जब अपने सारे जिए हुए क्षणों का आंकलन,
अपने हिस्से का कम, ज़्यादा थे रस्मे-दुनियां के खातिर,

गौर से देखता हूँ तो मैं वही हूँ, जो था सदियों पहले भी,
पर गुज़रे सालों ने मुझमें मेरे कई नए आयाम जोड़ दिए,


चला तो मैं ही हूँ सालों साल ज़िंदगी की तमाम राहें,
भटके कदम ज़्यादा, रास्तों का पता कम ही था सफर में,

हर बार मेरे ज़िन्दगी ने दे दिया, नाम उसे एक मंज़िल का,
इस सफर में जब कभी थक के रुक गया मैं सुस्ताने को,

कभी अकेला, कभी कतार, कभी भीड़, कभी साथ कारवां के,
समाज के बनाये रास्तों पर चलने की आदत सी लगा ली है मैंने,

याद आते हैं अल्हड बचपन के वे उन्मुक्त से दिन,
जब रास्ते बन जाते थे जिधर कदमें निशान छोड़ती थी,

यथार्थ और स्वप्न अब बहुत नज़दीक से लगते हैं,
यकीं न आता है उड़ने की ख्वाहिश अब कूदने तक सीमित है। 


स्वप्न की नगरी अब छोटी होती जा रही है, ये सालों के अनुभव का तकाज़ा है,
ख़ुशी मनाता हूँ, आज मेरे उम्र के गिनती में हुआ एक और साल का इज़ाफ़ा है!








अधूरा करार



एक करार है मेरा स्वयं से कुछ अनकही सी,
वापसी का, जहाँ से हुई शुरुआत सफर की,
मचलते मेरे अरमान उसी उन्माद से आज भी,
याद आते हैं सुनहरे से वे किस्से जब कभी,
अल्हड सी बचपन की जब अपने होते थे सभी,
न कोई मंजिल होता था, बस यात्रा अंतहीन,
कई मोड़ और पड़ाव, नज़्ज़ारे थे सारे रंगीन,
सपने लेते थे अंगड़ाइयां, चाहतें थीं इठलाती,
जब इंद्रधनुष अपना सा और नभ थे मेरे करीब,
उन्मुक्त पंछी सा स्वच्छंद उड़ान लेता दूर कहीं,
सपने बड़े होते जिसमें मैं अपने हिस्से का अमीर,
खोया अल्हड बचपन मानो बन के कोई फ़कीर, 
भटकता मिलता है कहीं, करता है बातें अजीब,
पूछता है, हुआ क्या जो भूल गए मुझे छोड़ वहीँ,
जहाँ कभी साथ खीचते थे हम ख्वाबों के लकीर,
आज जैसे पास हो के भी दूर हैं आसमान से जमीन,
भटकती सी ज़िंदगी जो अक्सर कर देती है ग़मगीन,
शायद कभी साथ उसके जिंदगी हो फिर से हसीन!





केक पर एक और कैंडल का इज़ाफ़ा


आज इक्यावन का हो गया, सरकारी दस्तावेज के हिसाब से भी अर्ध शतक पूरा कर लिया हूँ. जब आँखें बंद करके एक बार पूरे फिल्म को रिवाइंड करता हूँ तो जिस बच्चे को तितलियाँ पकड़ते बगीचे में बाकी बच्चो के साथ देखता हूँ, वो आज भी रोज मेरे अंदर उसी उमंग और जोश के साथ खेलना चाहता है पर शायद अब मैं उस से काफी बड़ा हो गया हूँ, और उम्र के चादर को ओढ़ के उस बच्चे को शांत कर देता हूँ. पर वह है बहुत चंचल और जोशीला, कभी कभी इस दुसरे "मैं" पर भारी पड़ जाता है और फिर अंदर बहुत कश्मकश सी होती है।

कभी कभी दिल को कड़ा करना पड़ता है - अक्सर ये शिकन होती है कि आखिर इतने बरसों से अंदर के जिस बच्चे को इतने सारे नियम और शिष्टाचार सिखाया, वह आज भी वैसा ही रह गया है - जिद्दी, मनमौजी, और निश्छल - वो चाहता है कहीं दूर शांत किसी ऐसे जगह चलने को जहाँ कोई शोर न हो, जहाँ सिर्फ दरिया के बहते पानी की कलकल ध्वनि हो, चिड़ियों की चहचहाट हो, जहाँ बहते हवाओं से पेड़ के पत्तो के सरसराहट को सुन पाऊं, जहाँ जो मिले वे बस मेरे जैसे ही हों, प्रकृति के गोद में बैठ के बस अंतहीन आनंद में डूबे हों....जहाँ क्षितिज से उगते सूरज के लाल गोले को देखने से पहले नभ में फैले सिंदूरी ललक के बीच जोश से उड़ते चिड़ियों के झुण्ड को देख सकूँ, जहाँ पत्तों से टपकते ओस को देख पाऊं, जहाँ हरे घास पर चलूँ और ओस से पूरे तलवे भींग जाए, जहाँ किसी दरिया या झील में मछलियों के उच्छृंखलता से गूंजते छपाक को सुन पाऊं...

पर फिर ये ख्याल आता है कि इतनी मुश्किल से स्वयं को बाहरी दुनिया के काबिल बनाया है - फिर कैसे अपने अंदर के उस असल मैं को बाहर निकल जाने दूँ? यही कश्मकश की वजह है - जीने के कुछ उसूल होते हैं, ज़माने के हिसाब से चलने का प्रचलन है - उम्रदाज हो गया हूँ - वैसा ही करना होता है जैसा होना चाहिए, ढलते उम्र के साथ समाज के बनाये उसूलों में ढलने की आदत सी हो गयी है! कभी कभी ये अनतर्द्वंद, अंतरकलह और फिर अन्तरध्यान में परिवर्तित हो जाता है.. शांति और सुलह की प्रक्रिया शुरू होती है और मैं वही करता हूँ जो अपेक्षित होता है.

पर, जब कभी एकांत में स्वयं से बात करता हूँ - अपने ही जिए जीवन के ऊँचे टीले पर बैठ के नीचे देखने से डर लगता है! कितना कुछ बीत गया - वो मैं, जो एक नर्सरी स्कूल के आँगन में पेड़ के नीचे कौए से बचा के टिफिन खाने के कौशलता में पारंगत होते होते उन लालची कौओं से दूर किसी और घने जंगल में आ गया है जहाँ जीने के अंदाज़ का हिसाब कुछ अलग सा है...यहाँ मुझे माँ के बना के दिए टिफिन को कौओं से बचाना नहीं है....पर अपनी जीविका को लूट के लाना है - हर पल एक संघर्ष है- निष्ठुरता और स्वार्थ मेरे शस्त्र हैं... समय कम है - असीमित जिम्मेदारियां हैं और प्रयास के मौके सीमित हैं... बस अंदर एक जिद्दी बच्चा है जो इस दिलासे पर चुप बैठा है कि एक दिन फिर से वैसे दिन आएंगे जब सब कुछ वैसा ही होगा जैसा मन को भाता था.....