Jul 4, 2018

केक पर एक और कैंडल का इज़ाफ़ा


आज इक्यावन का हो गया, सरकारी दस्तावेज के हिसाब से भी अर्ध शतक पूरा कर लिया हूँ. जब आँखें बंद करके एक बार पूरे फिल्म को रिवाइंड करता हूँ तो जिस बच्चे को तितलियाँ पकड़ते बगीचे में बाकी बच्चो के साथ देखता हूँ, वो आज भी रोज मेरे अंदर उसी उमंग और जोश के साथ खेलना चाहता है पर शायद अब मैं उस से काफी बड़ा हो गया हूँ, और उम्र के चादर को ओढ़ के उस बच्चे को शांत कर देता हूँ. पर वह है बहुत चंचल और जोशीला, कभी कभी इस दुसरे "मैं" पर भारी पड़ जाता है और फिर अंदर बहुत कश्मकश सी होती है।

कभी कभी दिल को कड़ा करना पड़ता है - अक्सर ये शिकन होती है कि आखिर इतने बरसों से अंदर के जिस बच्चे को इतने सारे नियम और शिष्टाचार सिखाया, वह आज भी वैसा ही रह गया है - जिद्दी, मनमौजी, और निश्छल - वो चाहता है कहीं दूर शांत किसी ऐसे जगह चलने को जहाँ कोई शोर न हो, जहाँ सिर्फ दरिया के बहते पानी की कलकल ध्वनि हो, चिड़ियों की चहचहाट हो, जहाँ बहते हवाओं से पेड़ के पत्तो के सरसराहट को सुन पाऊं, जहाँ जो मिले वे बस मेरे जैसे ही हों, प्रकृति के गोद में बैठ के बस अंतहीन आनंद में डूबे हों....जहाँ क्षितिज से उगते सूरज के लाल गोले को देखने से पहले नभ में फैले सिंदूरी ललक के बीच जोश से उड़ते चिड़ियों के झुण्ड को देख सकूँ, जहाँ पत्तों से टपकते ओस को देख पाऊं, जहाँ हरे घास पर चलूँ और ओस से पूरे तलवे भींग जाए, जहाँ किसी दरिया या झील में मछलियों के उच्छृंखलता से गूंजते छपाक को सुन पाऊं...

पर फिर ये ख्याल आता है कि इतनी मुश्किल से स्वयं को बाहरी दुनिया के काबिल बनाया है - फिर कैसे अपने अंदर के उस असल मैं को बाहर निकल जाने दूँ? यही कश्मकश की वजह है - जीने के कुछ उसूल होते हैं, ज़माने के हिसाब से चलने का प्रचलन है - उम्रदाज हो गया हूँ - वैसा ही करना होता है जैसा होना चाहिए, ढलते उम्र के साथ समाज के बनाये उसूलों में ढलने की आदत सी हो गयी है! कभी कभी ये अनतर्द्वंद, अंतरकलह और फिर अन्तरध्यान में परिवर्तित हो जाता है.. शांति और सुलह की प्रक्रिया शुरू होती है और मैं वही करता हूँ जो अपेक्षित होता है.

पर, जब कभी एकांत में स्वयं से बात करता हूँ - अपने ही जिए जीवन के ऊँचे टीले पर बैठ के नीचे देखने से डर लगता है! कितना कुछ बीत गया - वो मैं, जो एक नर्सरी स्कूल के आँगन में पेड़ के नीचे कौए से बचा के टिफिन खाने के कौशलता में पारंगत होते होते उन लालची कौओं से दूर किसी और घने जंगल में आ गया है जहाँ जीने के अंदाज़ का हिसाब कुछ अलग सा है...यहाँ मुझे माँ के बना के दिए टिफिन को कौओं से बचाना नहीं है....पर अपनी जीविका को लूट के लाना है - हर पल एक संघर्ष है- निष्ठुरता और स्वार्थ मेरे शस्त्र हैं... समय कम है - असीमित जिम्मेदारियां हैं और प्रयास के मौके सीमित हैं... बस अंदर एक जिद्दी बच्चा है जो इस दिलासे पर चुप बैठा है कि एक दिन फिर से वैसे दिन आएंगे जब सब कुछ वैसा ही होगा जैसा मन को भाता था.....     
    

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