यायावर सी ज़िंदगी आगे बढ़ती जा रही है,
तय किये रास्तों की यादें आँखों में तैरती सी,
करता हूँ जब अपने सारे जिए हुए क्षणों का आंकलन,
अपने हिस्से का कम, ज़्यादा थे रस्मे-दुनियां के खातिर,
गौर से देखता हूँ तो मैं वही हूँ, जो था सदियों पहले भी,
पर गुज़रे सालों ने मुझमें मेरे कई नए आयाम जोड़ दिए,
चला तो मैं ही हूँ सालों साल ज़िंदगी की तमाम राहें,
भटके कदम ज़्यादा, रास्तों का पता कम ही था सफर में,
हर बार मेरे ज़िन्दगी ने दे दिया, नाम उसे एक मंज़िल का,
इस सफर में जब कभी थक के रुक गया मैं सुस्ताने को,
कभी अकेला, कभी कतार, कभी भीड़, कभी साथ कारवां के,
समाज के बनाये रास्तों पर चलने की आदत सी लगा ली है मैंने,
याद आते हैं अल्हड बचपन के वे उन्मुक्त से दिन,
जब रास्ते बन जाते थे जिधर कदमें निशान छोड़ती थी,
यथार्थ और स्वप्न अब बहुत नज़दीक से लगते हैं,
यकीं न आता है उड़ने की ख्वाहिश अब कूदने तक सीमित है।
स्वप्न की नगरी अब छोटी होती जा रही है, ये सालों के अनुभव का तकाज़ा है,
ख़ुशी मनाता हूँ, आज मेरे उम्र के गिनती में हुआ एक और साल का इज़ाफ़ा है!
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