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Feb 18, 2016

सड़क-छाप जड़ी-बूटी वाला

आज के दौर में बाबा रामदेव के पतंजली और आयुर्वेद के व्यवसायीकरण से बहुत पहले, आयुर्वेद, जड़ी-बूटी इत्यादि जैसे  दवा-उपचार का व्यवसाय एक कुटीर उद्योग के तौर पर हुआ करता था। इस तरह के व्यवसाय का जाल बहुत सारे वैद्य-हकीमों के बीच बिखरे पड़े थे। आये दिनों शहर के किसी भीड़-भाड़ वाले खाली जगहों पर इस तरह के वैद्य या हकीम अपना टेंट लगा कर अनेकों प्रकार के असाध्य और लम्बे समय से चले आ रहे बीमारियों को ठीक करने का दावा किया जाता था।

हिमालयी जड़ी-बूटी बेचनेवालों का हिसाब किताब कुछ अलग सा होता था। उनका टेंट  होता था जिसके अंदर उनके एकाध हफ्ते से महीनो का जुगाड़ सा लगता था। टेंट के सामने बहुत ही रोचक ढंग से अनेकों प्रकार के जड़ी बूटी और अन्य औषध के डिब्बे रखे होते थे। इन औषधियों मे काफी प्रकार के सूखे जड़ों के डंठल, सूखे बीज, या इसी तरह के अन्य प्राकृतिक सामग्रियाँ रखे होते थे, जिन्हे बड़े तरीके से शीशे के बरनी या कुछ उसी तरह के दिखने वाले जुगाड़ में बहुत हिसाब से प्रदर्शन के लिए रखा जाता था।

वैसे हमारे लिए बचपन में इस तरह के टेंट में कुछ ज्यादा समझने लायक तो होता नहीं था - क्योंकि इसमें बताये जाने वाले रोग एवं उपचार को जानने में हमारी कोई ख़ास रुचि नहीं होती थी। पर फिर भी अन्य कारणों से हम इन्हें देखने के लिए रुक जाया करते थे।

एक कारण तो यह हुआ करता था कि इस तरह के टेंट में बहुत अच्छे प्रकार का लाउडस्पीकर लगा होता था, जिसमे गाना वगेरह चलता रहता था। बीच बीच में गाने को रोक कर वैद्य या हकीम साहेब माइक में कुछ उद्धघोष करते थे और फिर टेंट के अंदर नुमाइश के तौर पर रखे अनेकों प्रकार के रंगीन पत्ते, बीज, इत्यादि फैले से होते थे और कहीं कही उनका ऊँचा सा ढेर लगा होता था  - जिन्हें वह अपने हाथ में रखे माइक से बहुत ही रोचक ढंग से बताया करते थे।

उस वैद्य के साथ ही उसका एक असिस्टेंट भी होता था जिसका काम तरह तरह के सामग्रियों को लेकर कुत्ते रहने या पीसने जैसे काम में लगा होना होता था। ज्यादातर वह बिलकुल चुपचाप सा होता था और अपने काम में बहुत निष्ठापूर्वक लगा होता था। मगर उसके बगल में एक बैटरी से चलने वाला माइक्रोफोन और कुछ गाने बजाने वाला - रिकार्ड प्लेयर होता था।  इतने सारे रोचक क्रियाओं को छाव से देखना बहुत ही सुखद अनुभूति होती थी। दवा का बनते देखना और उसका साथ में बज रहे मधुर गाने, फिर बीच बीच में रनिंग कमेंट्री भी सुनाई देता था।

मुख्य वैद्य या हकीम बिलकुल विद्वान सा लुक देकर सभी समस्याओं का समाधान बताने वाले मुद्रा में बैठा होता था।  बीच बीच में वह माइक से - अनेको प्रकार के बीमारी - उसके लक्षण- और फ़ी अचूक निदान के बारे में लोगो को जानकारी देता रहता था।  हरेक दो लाइन में - हिमालय, जड़ी-बूटी,  दुर्लभ, बेशकीमती, खानदानी वैद्य या हकीम. देसी जड़ी-बूटियों वाला काढ़ा, सालों से नहीं ठीक होने वाला बीमारी, सभी प्रकार के असाध्य रोग, शर्तिया इलाज़, गारंटी, पैसे वापस - जैसे शब्दों के उच्चारण से  समां बना रहता था।

बीच-बीच में वह एक छड़ी से दीखाता हुआ, कुछ अजब-अजब प्रकार के जड़ी-बूटियों की जानकारी देता हुआ, लोगो में अपने ज्ञान की छाप और विश्वसनीयता पैदा करने जैसा कुछ कार्यक्रम करता रहता था जब आस पास भीड़ काम हो जाती तो वह फिर से किसी हिंदी फ़िल्मी गाने का सहारा लेलेता और लोगों के मनोरंजन में अपने को भी समर्पित कर देता था।

भारत में फ़िल्मी गाने का बनने का मुख्य मकसद, फिल्म के किसी कठिन परिस्थिति को सहज और काव्यात्मक ढंग से संगीतबद्ध तरीके से व्यक्त करना रहा होगा। पर कालांतर में, फिल्म के गाने का मुख्य प्रयोग, रेडियो-स्टेशन में - विविध भारती  के २४ घंटे- सेवा में युक्त हो जाना, पार्टी-त्यौहार में बजते रहना और इस तरह के दूकान या मेले जैसे माहौल में बजते रहने का बहुत बड़ा उपयोग सा था।

इस कारण गाने का फिल्म में कोई प्रयोजन हो या न हो - पर उनका उपयोग, उसके अलावा और बहुत सारे अन्य क्षेत्र में ज्यादा होता था।

Dec 30, 2015

जादू के खेल का वृतांत

मदारीवाला अपने मुख्य कार्यक्रम की ओर बढ़ता था। ठीक-ठाक भीड़ जमा हो चुकी होती थी और अचानक से, मदारीवाला दर्शक-दीर्घा में से किसी एक ऐसे इंसान को बुला लेता था, जो अगले १५-२० मिनटों तक उसके हर प्रश्नों के जवाब देते हुए जादू के प्रक्रिया का हिस्सा सा बन जाता था। साथ ही साथ, मदारीवाला दर्शकों में से चुने गए अपने "सहायक" से कुछ ऐसे प्रश्न करता था, और उन प्रश्नों में उसे कुछ ऐसा उलझा देता था कि लोगों को बरबस हंसी आने लग जाती थी।
मदारी वाला बाते करते-करते, लोगो के घेरे में बीच में बिछे चादर को ठीक तरीके से फैला कर रखते हुए, साथ में डमरू को बजाता और बोलता-
मेहरबान! कदरदान!! साहेबान!!!
हिन्दू को राम राम, मुसलमान को सलाम!
अभी आपके सामने जादू का खेल होगा!
साहेबान, बहुत मेहनत का काम है भूत का सामना, एक चूक और बस जान से हाथ धो लेना पड़ता है......मगर मेहरबान, पापी पेट का सवाल है, सब कुछ करेगा!
मेरे मालिक, फिर भी कर के दिखायेगा, जान की परवाह नहीं करेगा, सभी को दिखायेगा!
ये बच्चा, जी हाँ, इस बच्चे को भेजेगा, उस नीम के पेड़ के ऊपर भेजेगा,बच्चा जायेगा, नीम के पेड़ वाले प्रेत आत्मा के पास जायेगा, अपनी जान पर खेल के जायेगा....और उधर छोड़ के आएगा भूत को...
साहेबान, आपके सामने, ये गायब हो जाएगा.....और्रर्र .. मेहरबान, कदरदान, साहेबान, ये पहुंचा देगा, उसको अपने घर, वो उद्धर्रर्र ..ये जाएगा, आपके सामने से जाएगा, जान पे खेल के जाएगा और उसको अपने घर पहुंचा के आएगा!
इस लम्बे चलने वाले प्रवचनात्मक एवं डरावनी बातों के सिलसिले के बीच, जिस बच्चे के उपर भूत आने की बात हो रही होती थी, वह छोटा बच्चा चीख-चीख कर जवाब देता हुआ, थाली पर चम्मच्च को ठोकते हुए - जादूगर के बातों और उसके डमरू के साथ ताल मिला रहा होता था।

मदारीवाला भले ही बार-बार अपने साथ के बच्चे के ऊपर भूत के प्रकोप और उस से हो रही परेशानियों के बारे बता रहा हो, पर उन बातों से बेफिक्र सा, छोटा-बच्चा पूरे विश्वास के साथ काफी सहज होकर अपनी "जान की बाज़ी" लगाने की तैयारी में लगा होता था।

इधर समां बंधता जा रहा होता था, और उधर मदारीवाला तन्मयता से बीच-बीच में डमरू को बजा कर जोर जोर से - "ड्रीम, ड्रीम" की आवाज़ निकालते हुए, और अंत में एक बार डमरू को, कंधे के ऊपर से कमर के नीचे तक के एक घुमाव में लिए झटके के साथ जोर की  "...ड्राम" की आवाज़ निकालते हुए, लगभग चीखते हुए कहता -
हा-ई-एह, वाह रे वाह, शाब्बाश मेरे शेर!
सभी साहेबन को तमाशा दिखायेगा?
सबों को जान पर लड़ कर दिखायेगा?
अपनी जान पे खेल के उस के पास जाएगा?
इन सभी प्रश्नवाचक चीखों को बिना कुछ सुने या समझे हुए- जिसकी कोई गुंजाइश भी नहीं होती थी- छोटा बच्चा भी चीख-चीख कर सकारात्मक प्रत्युत्तर देकर, अपना हिस्सा पूरा कर रहा होता था - और हर बार "करेगा", "दिखायेगा", "जाएगा" -आदि में से किसी एक को चुन कर बोल डालता था। फिर सहानुभूति प्राप्त करने के हिसाब से मदारी बोलता था-
देखिये साहब, आप सभी इत्मीनान से देखिये!
आप इस तमाशा को देखिये....
ये बच्चा जान पर खेलेगा....
ये आपका दिल बहलाएगा....
साहेबान, आपको पसंद आ जाए तो इस गरीब के चादर पर चार आना,आठ आना देते जाइयेगा....
आपके घर में भी ऐसे ही बच्चे होंगे, ऊपरवाला आपके बच्चों को सलामत रखेगा!
फिर माहौल को और रोचक बनाते हुए -
तो बेटा, खेल के लिए तैयार है?
छोटा बच्चा लगभग आग में कूदने वाले अंदाज़ में -
ज--य्य खल्ल-बली, तैयार है, करके दिखायेगा!
मदारीवाला जोश को और बढ़ाते हुए और दर्शक दीर्घा की ओर घूम कर देखते हुए -
मेहरबान, कदरदान, साहेबान, मेरे मालिक, इस्स्स बच्चे का हौसलाफज़ाई कर दीजिये, एक बार जोर से ताली बजा दीजिये..!
लोग बड़े जोश में ताली बजाते और फिर मदारीवाला वापस बच्चे से -
तो चल आ जा बेटा, इधर आ के लेट जा बेटा!
दर्शक दीर्घा के घेरे के बीच में बिछाए चादर पर बच्चा लेट जाता। उसके लेटने के बाद बहुत सारे चादर से उसे ढंकते हुए - डुगडुगी और बांसुरी के सुर-ताल के साथ, मदारीवाला एक बेंत से बने चौकोर आकार के टेंट से बने कवर से बच्चे को ढँक देता था। कुछ और वार्तालाप होता रहता था, जिसमे बच्चे के भूत के प्रकोप और भूत के द्वारा कुछ "प्रेतात्मक" बातों  का सिलसिला का जिक्र होता था।

अंततः, उस टेंट से बने कवर के ऊपर भी कई चादरों को डाल कर, उसे भी ढंकना शुरू कर दिया जाता था। फिर थोड़ी देर घूमते-फिरते उस दर्शकों में से निकाले गए "सहायक" व्यक्ति के करीब आ कर -
भाई, ये बताइये कि मरा हुआ इंसान का कपड़ा छूना अच्छा बात है, क्या?
अनजाने में मदारीवाले के जादू के सहायक के रूप में फंस चुका इंसान, कुछ झुंझलाते हुए -
हम्म...नहीं
मदारीवाला पहले उसकी बात का समर्थन पर उस से बाकी को और डराते हुए -
ये बात तो ठीक बोला है, बिलकुल सही बोला है मेरे भाई ने......
पर साहेबान, एक बात याद रखना, छूने में कोई खराबी नहीं है,
ऐ मेरे मालिक, ऐ मेरे मौला, ऐ मेरे जहाँपनाह, मुर्दा भी कभी ज़िंदा था!
ज़िंदा आदमी ही तो कपड़ा पहनता है और जिन्दा आदमी ही मरता है!
फिर मदारीवाला हँसते हुए, सबों की ओर देखते हुए, पूछता-
साहेबान, ये बताना कि जिन्दा आदमी ही मरता है न?
फिर थोड़े देर के बाद, अचानक से कुछ दार्शनिक सी बातें करता हुआ  -
कल तो गज़ब हो गया भाई, एक ज़िंदा आदमी मर गया!
लोग उसकी बातों को सुनकर हँसते भी थे और कभी-कभी कुछ ऐसे बातों में, जिनमे जीवन का कड़वा सत्य होता था, उनमें उसके व्यक्तित्व के गहराइयों को भी भांपते हुए, बिलकुल खेल में निमग्नित से हो जाते थे। इसके बाद मदारीवाला उस साथ वाले छोटे बच्चे की और इशारा करते हुए-
और मेरे दोस्तों, यह बच्चा आजकल बहुत बीमार रहता है....
क्योंकि इसने एक मुर्दे का कपडा पहन लिया था.....
मगर अभी इसका इलाज़ होगा, ये बच्चा जाएगा!
उस प्रेत के पास जाएगा, उससे माफी मांग कर आएगा....
फिर बच्चे से पूछते हुए-
बेटा, भूत के पास जाने को तैयार है?
अंदर लेटे हुए बच्चे की आवाज़ -
जय खलबली, तैयार है, उस्ताद, जाएगा!
फिर कुछ देर तक, बच्चे और उस व्यक्ति के साथ सवाल-जवाब के माध्यम से कुछ हंसी मजाक का सिलसिला चलता रहता था - बांसुरी और डुगडुगी को बजा कर मनोरंजन के अनवरत बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ। बीच-बीच में, दर्शक से बुलाये व्यक्ति के ऊपर, कुछ ऐसे सवाल-जवाब का सिलसिला सा चलता रहता था कि उस व्यक्ति का खुद का दिया जवाब ही लोगों में हंसी, खिलखिलाहट और उस व्यक्ति के अंदर - थोड़ी सी झुंझलाहट भी पैदा कर देता था। फिर मदारीवाला उस से एक बड़े से चादर के निरीक्षण करने का आग्रह करता-
अय-ये खोपड़ी, इस चादर को जरा ठीक से देख लो भाई, इसमें कही कोई सांप या जानवर या कुछ है?
व्यक्ति के कुछ कहने से पहले वह उस चादर को उस लेते हुए बच्चे के ऊपर डालने को कहता और बीच के जिससे को ऊपर उठाये पकडे रहने का आग्रह करता-
जब तक मैं न बोलूं, पकडे रहना, छोड़ना नहीं, वरना बहुत गड़बड़ हो जाएगा!
और इसके बाद फिर से बांसुरी के साथ-साथ डुगडुगी बजता रहता था और इन सब के बीच, वह बच्चा कुछ अनाप-शनाप सा बोलते हुए, वास्तव में ऐसा लगने लगता था मानो वह किसी प्रेत के आत्मा के चंगुल में हो। चीख-चिल्लाहट, डराने वाले और वीभत्स संवादों का अजब समागम सा होता था - ऐसे नाटकीय अभिनय से वहां पर जो समां बंध जाता था - उसके लिए मेरी तरफ से, हरेक मदरीवाले के सहायक बच्चों को - सर्वोत्तम बाल कलाकार के अभिनय का पुरस्कार अवश्य मिलना चाहिए! डमरू को बजाते हुए और साथ में एक हाथ से बांसुरी को बजाते हुए, अचानक से रुक जाता और फिर लगभग चीखते हुए -
ऐ-ये-ए, खड़ंगा बाबा, निकाल दे इसके भूत को..... 
और अचानक से चौकोर से बने उस टेंट से संरचना के बीचो-बीच, जिसके अंदर बच्चा लेटा होता था, वहां हाथ से पकड़ा चादर का हिस्सा छूट कर गिर जाता, जिसके कारण वहां पर बिलकुल खाली होने का एहसास होता!

मतलब अंदर लेटा बच्चा गायब!

फिर थोड़ी देर तक तो ऐसा लगता मानो वास्तव में सामने के नीम या किसी और पेड़ के ऊपर बच्चा किसी प्रेत से मिलने चला गया हो! जादू का असर सर चढ़ कर बोल रहा होता था- सभी हैरान से होते थे कि आखिर बच्चा गया तो कहाँ गया?

बहुत देर तक संशय की स्थिति बनी रहती थी। फिर मदारीवाला भीड़ से बुलाये हुए "सहायक" को अपने पास बुलाता था, और फिर उस टेंट के ऊपर के चादर के अंदर अपने और उसके सर को घुसा कर, अंदर का माज़रा दिखाता था - मुझे पता नहीं कि अंदर क्या दीखता था पर, कुछ ऐसी बात होती थी जिस से एहसास होता था कि बच्चा वापस आ गया है। फिर और भी कुछ नाटक वगैरह सा होता था, और अंत में बच्चा वापस हँसता-खेलता बाहर आ जाता था।

विश्वास और अविश्वास के झूला में डगमगाते जैसे माहौल में, कई बार मुझे लगता था कि इसे जादू मानूं या न मानूं, पर अगले ही क्षण, नाटकीय ही सही, पर ऐसा प्रतीत होता था मानो सामने सब कुछ यथार्थ में ही हो रहा हो।

इस तरह के अनेकों क्षण को मैंने अत्यधिक चाव से देखा है, जिया है और आज तक अपने अंदर संजो के रखा है! 

घर से स्कूल के बीच - जादू का खेल

बचपन में स्कूल दो शिफ्ट्स में चलते थे - एक महीना हम सुबह ७ बजे से ११:३० तक वाले शिफ्ट में आते थे और अगले महीने १२ से ४:३० शाम तक वाले में।  इस तरह से स्कूल से लौटते समय या जाते समय अक्सर बाजार के आस पास किसी न किसी तरह के गतिविधियों को देखने का मौका मिल जाया करता था।

बचपन में अनेकों बार मदारी के रस्सी पर चलने के करतब या संपेरों, और भालू-बन्दर को नचाने वाले के खेल को देख चुका था, इस कारण से इस तरह के खेल में मेरे लिए कोई नयापन नहीं बचा था। ज्यादातर समय इस तरह के खेल को बिना देखे, मैं स्कूल की ओर चला जाता था। पर इन सबों के बीच, एक मदारी वाले का - जादू का खेल होता था - जिसे मैं बचपन से अनेकों बार देख चुका था। इसके बाद भी, उसे फिर से देखने में मेरी दिलचस्पी बरकरार सी थी।

कारण अनेकों हो सकते थे - पर सबसे महत्वपूर्ण था - जादू के पीछे के राज़ को जानने की इच्छा। इतना तो पता हो ही चुका था कि जो सामने होते दीखता था, वह वास्तविक तो कतई नहीं था। फलस्वरूप, हर बार इस उम्मीद से उन मैजिक के ट्रिक्स से चकमा खाते रहते थे कि कोई सुराग तो मिले और जान पाये कि आखिर मैजिक ट्रिक का राज़ क्या था?

इस सिलसिले में याद आता है कि जरा सा बड़े हो जाने के बाद, अपने बचपन के मित्रो के साथ पैसे इकट्ठे करके हमने एक जादू के रहस्योद्घाटन करने वाली किताब खरीदी थी। अंततः, हम बहुत सारे जादू के रहस्य को समझ पाने में सफल हो गये थे। जादू के पीछे छुपे राज को जान लेने के बाद, जादू दिखाने वाले मदारी के खेल में, अब वो पहले वाली बात नहीं रह गयी थी।


अब हमारे लिए मदारीवाले का जादू का खेल, कोई इतना आकर्षक खेल नहीं रह गया था कि मैं इसके लिए रुक जाऊं - अलबत्ता कुछ अनसुलझे से रहस्य अब भी थे। पर यह भरोसा ही चुका था कि हर ऐसे खेल जिनका रहस्य अब तक नहीं जान पाये थे , उनके पीछे भी कुछ वैसा ही ट्रिक होगा जैसा बाकी के बाए में हम जानने लगे थे। और, इसीलिए अक्सर हम इनके चल रहे खेल को अनदेखा करते आगे निकल जाते थे।

इस तरह के जादू के खेल में मदारी जादूगर के साथ, कोई हमारे उम्र का ही छोटा-सा बच्चा भी हुआ करता था। खेल के शुरुआत में, मदारीवाला के सहायक के रूप में छोटा बच्चा काफी व्यस्त रहा करता था। मदारीवाला लोगों से बातों का सिलसिला बनाये गोल-गोल घूमता रहता था - जिस से लोगों के भीड़ को गोलाकार घेरे में फैला सके।

इधर उसका सहायक, भीड़ के बीचो-बीच चादर या दरी बिछाता रहता था। फिर उसके ऊपर, गंदे मटमैले ही चुके अनेको प्रकार के झोले या बोरे में से विभिन्न तरह के - जादू के दिखने लायक - हड्डियाँ और एक मानव खोपड़ी, कुछ लकड़ी के विचित्र आकृति वाले टुकड़े, बगुले के गर्दन जैसा एक टोंटी लगा लोटा, और भी इसी तरह के अन्य कई समानों को फैलाने में मदद करता दिख जाया करता था। इसके आलावा, कभी डमरू बजाने में, या जादूगर के द्वारा भीड़ को व्यस्त रखने के उद्देश्य से पूछे गए अनेक प्रकार के अनर्गल प्रश्नों के सवाल-जवाब में भी सक्रिय रहता था।

पूरे खेल के दौरान मदारीवाला और उसके साथ का बच्चा, हंसी-मजाक के माहौल बना कर लोगो का मनोरंजन भी करता रहता था। उनकी बातें जन-साधारण के लिए इतनी रोचक होती थी कि बाजार जैसे व्यस्त जगह में भी लोग रुक कर उन्हें देखने और बरबस हंसने के लिए विवश हो जाते थे! मेरे मन में यह कौतूहल होता था कि उन प्रश्नों का वैसा ही सटीक और चुभता सा उत्तर देने की कला को विकसित करने में, उन दोनों के बीच किस तरह का तालमेल और अभ्यास की आवशयकता पडी होगी?

सहायक बच्चा कम उम्र का होकर भी अपने व्यक्तित्व से वयोवृद्ध सा होता था। उस से किये बहुत सारे प्रश्न का प्रत्युत्तर, छूटते ही मिलता था - जिस से साफ़ पता चलता था कि वे सारे प्रश्न और उत्तर - काफी अच्छे ढंग से रिहर्सल किये हुए और लगभग रटे-रटाये से थे। फिर भी, "बनावटी मासूमियत" से बहुत ही सधा सा दिया हुआ जवाब, अप्राकृतिक लगने के बावजूद, रोचक सा ही लगता था। साथ ही उसके द्वारा कृत्रिम रूप से किया गया बातचीत का मकसद होता था कि वह प्रश्नो से बिलकुल अनभिज्ञ सा लगे, और जैसा दीखता था वैसा ही - मतलब, बच्चे जैसा ही लगे।

खेल के शुरुआत में, अनेकों प्रकार के छोटे-मोटे हाथ के सफाई वाले कारनामे होते रहते थे। और भीड़ को इकठ्ठा करने के प्रतीक्षा के दौरान जमा हो चुके भीेड़ का मनोरंजन कुछ ऐसे छोटे मोटे ट्रिक्स से होता जैसे - एक सिक्के को दो सिक्का बना देना या लकड़ी को झोले में डाल कर उस लकड़ी को सांप बना देना, और इसी तरह के अन्य करतबें। उस दौरान करतबों और कहकहों का सिलसिला चालू रहता था।

इस सिलसिले में जादूगर उस बच्चे से जुड़े कोई मनगढंत सी कहानी का जिक्र शुरू कर देता था - जिसमें बच्चे को भूत के आतंक से हो रही परेशानियों का जिक्र होता था। फिर, अंत में बच्चे के अंदर घुस चुके भूत से, उसे छुटकारा दिलाने का वादा होता था, जिसमें इन्द्र्जाली तिलिस्म का निहायत ही जरूरत होता था।

मदारी का खेल, इन सब के जिन्दा मिसाल पेश करने जैसा ही कुछ होता था। और, इस पूरे कार्यक्रम का पटाक्षेप होता था, ताबीज़ इत्यादि जैसे कुछ बेचने से या प्रसन्नता-पूर्वक लोगों के दिए कुछ पारिश्रमिक से। भीड़ में से आधे लोग तो यूँ ही आतंकित से होते थे, और जो नहीं होते थे, वे खेल के दौरान दिखाए द्रष्टव्य से, अपने बचे-खुचे भरोसे पर पुनर्विचार करते हुए यथोचित कर लेते थे।

सारांश में, मदारी वाले के खेल का पूरा मसौदा यही होता था। संभवतः उन दिनों के दिखाए मदारी वालों के खेल की इतनी सी पटकथा भी, आज के किसी हिंदी फिल्म से, ज्यादा हुआ करता था। आज के हिंदी फिल्म का मकसद भी लगभग यही होता है, जो उन मदारीवालों का होता था - अर्थात भीड़ जमा करके, लोगो को कुछ देर व्यस्त करने का प्रयास और अंततः पैसे इकट्ठा करना।

ये अलग बात है कि फिल्मवाले पहले ही पैसे ले लेते हैं, और फिर ३ लाइन के कहानी को समूचे ३ घंटे के सिरदर्द कहानी बनाकर खींचते हैं। परन्तु, मदारीवालों के खेलों को कई बार देखने के बाद भी, वे आज के सिरदर्द फिल्मों से ज्यादा रोचक से लगते थे। वैसे भी लोग, मदारीवालों के खेल को देखने के बाद, अपने श्रद्धा भक्ति से पैसे देते थे, न कि खेल देखने के लिए!

उन दिनों के मदारीवाले के खेल को, आज के सन्दर्भ में देखना, बहुत ही अजीब सा लगता है। अब कहाँ मदरीवाले, कहाँ लोगों में इन मदारीवाले और उसके खेल को देखने में दिलचस्पी रही, कहाँ वो फुर्सत में घूमते लोग - जो सब्जी खरीदने के लिए टहलते हुए बाजार जाते थे। अब तो इस भाग दौड़ की ज़िंदगी में - मदारीवाले और उनके सभी हैरतअंगेज खेलों का सिलसिला - वक़्त के किसी पृष्ठ में दर्ज़ होकर संग्रहालय में रखे जाने योग्य से हो गए हैं।

परन्तु आज भी जब किसी अच्छे वक्ता को किसी कॉन्फ्रेंस या सेमीनार में आकर्षक, मनोरंजक और रोचक ढंग से बोलते देखता हूँ. बरबस उन मदारीवाले की याद आ जाती है। "पब्लिक स्पीकिंग" और "कनेक्टिंग विथ पीपल" का जीता जागता और बहुत ही प्रखर प्रमाण के रूप में, वे मदारीवाले हमेशा याद आते रहेंगे!

Dec 28, 2015

घर से स्कूल के बीच की 'पढाई'

बचपन में स्कूल आने और जाने के दौरान, मुझे रास्ते के अगल-बगल, सड़क के किनारे होते गतिविधियों को करीब से देखने का बहुत शौक होता था। उन दिनों घर से स्कूल जाने के लिए, मुझे कदमा बाजार के आस-पास से गुज़रना पड़ता था। कदमा बाजार का माहौल, किसी गांव के हाट के परिष्कृत रूप में ही समझना चाहिए।

बदले दौर का कदमा बाज़ार - सिर्फ दूकान ही दुकानें!
बाज़ार के अंदर, टिन की छत वाले - स्थाई और अस्थाई के बीच झूलते से- कई सारे दुकान बिखरे पड़े थे। बाजार के अंदर, अनेको प्रकार के दूकान थे, पर बहुत कम संख्या में ही सीमेंट और ईंट के बने पक्के दुकान थे। ऐसा ज्ञात होता था कि शुरू के बने कुछ स्थाई दुकानों के इर्द गिर्द, कई सारे दूकान जुड़ते चले गए होंगे - और कुल मिला कर, बाज़ार बहुत ही घनी और भीड़ भरा, मेले के जैसा शकल ले लिया था।

उन स्थाई दूकानों के बीचो-बीच बहुत बड़ा सा सब्जी-बाजार था। बिलकुल गाँव के हाट की तरह - जमीन पर बिछे हुए, बहुत सारे दूकान, ग्रामीण सा माहौल बना देता था। मेन-रोड और बाज़ार के बीच का जगह - अमूमन खाली ही होता था। कई साल तक सड़क के दोनों ओर के फुटपाथ, वास्तव में लोगों के चलने के लिए ही हुआ करता था। इस वजह से, जैसा उम्मीद किया जाना चाहिए, वे खाली ही हुआ करते थे, बल्कि रोड के दूसरी ओर लाइन से बहुत सारे घर भी होते थे।

कालांतर में, उस रोड और बाजार के बीचे के खाली भाग में इक्का दुक्का करते हुए - बहुत सारे सब्जी बेचने वालों ने, जमीन पर सब्जियों का ढेर लगाकर सब्जी मंडी के जाल सा बनाना शुरू कर दिया। फिर जैसा भारत के किसी भी खाली जगह का हश्र होता है- बाजार के पास वाले  सड़क के दोनों ओर के फुटपाथ में भी किसी अमरबेल की तरह से, सब्जियों का टीला सा लगने लगा। जिस तरह से पंक्तिबद्ध होकर खेतों में सब्जियों के ढेर उगते थे, उसी प्रकार से वे बिकने के लिए भी कतारबद्ध से फ़ैले होते थे।

परन्तु मेरे बड़े होने तक, यानि जब तक मैं स्कूल जाता था, सड़क और बाज़ार के बीच के भाग ज्यादातर खाली सा ही रहता था। आये दिन वहां किसी ताबीज़, हकीम-जड़ी-बूटी और इसी तरह के दवा बेचने वालों का, टेंट-नुमा सा दूकान लगता रहता था। एक बार ऐसे दूकान के स्थापित होने के बाद, वे कुछ हफ्ते से लेकर महीने भर, उसी जगह पर जमे से रहते थे।

जब कभी बाजार का कोई जगह खाली रहता था, वहां मदारी के जादू -खेल के साथ-साथ, सांप-बिच्छू, बन्दर - भालू के नाच आदि जैसे खेल भी होते रहते थे - जो आई पी एल क्रिकेट के "टी -२०" के तर्ज़ पर थोड़े देर के लिए चलता और फिर कहीं और आगे के लिए निकल जाता।

मेरी स्कूल के पढाई-लिखाई में, ज्यादा दिलचस्पी नहीं होती थी। स्कूल से आने-जाने के क्रम में, इस तरह के रोचक कार्यक्रमों को देखने से मन बहल जाता था। मेरी खोजी नज़रें और सालों का अनुभव, हमेशा इस तरह के होने वाले गतिविधियों के तलाश मे रहती थीं।

इन खेलों को देखने का अद्भुत आनंद था और आज जब अपने अतीत में डुबकी लगाता हूँ,  इन सब के बिना, वे दिन अधूरे से दीखते हैं! बोनस के तौर पर, अनेकों प्रकार के नयी जानकारी भी मिलते रहते थे - जैसे नीम के पेड़ पर भूत होता है, या दोमुंहा सांप छह महीने एक तरफ के मुंह को इस्तेमाल करता है फिर बाकी समय दूसरे वाले को, या नाना प्रकार के "ताकतों" के दास्ताँ इत्यादि ।

और भी कई सारे इसी तरह के ज्ञानवर्धक बातें, जिनका स्कूल के किताबों में कभी कोई जानकारी नहीं मिल पाता था, वे सभी वहां बाजार में चल रहे किसी मदारीवाले या अन्य विजिटिंग प्रोफ़ेसर के "कक्षा" में मिल जाया करता था । अनेकों बार स्कूल जाते समय, किसी ऐसे ही मज़मे को देखने के चक्कर में, मैं लेट से स्कूल पहुंचा होऊंगा, जिसके कारण क्लास-टीचर से सजा भी भुगता होऊंगा!

आज के टीवी में जिस तरह से लोग चैनल बदलते हैं, उसी प्रकार से उन दिनों बाजार के पास के उन खाली हिस्सों में, हमेशा कुछ न कुछ पसंदीदा सा प्रोग्राम होता ही रहता था - मर्जी थी कि देखूं या कहीं आगे बढ़ता चला जाऊँ। कभी जड़ी-बूटी के बारे में, कभी जादू का खेल, तो कभी किसी दीवाल पर बनते किसी इश्तहार की पेंटिंग को देखने का सिलसिला!

हमारे उन दिनों के लाइव टेलीकास्ट के चैनल लाइनअप में समय-समय पर मनोरंजन के लिए, इस तरह के अनेक सारे गतिविधियाँ, निःशुल्क उपलब्ध होते रहते थे। आज जब कभी ठन्डे दिमाग से बैठ कर, उन अतीत के दिनों में खो जाता हूँ, तो हर वैसे अनुभव के क्षण - बिलकुल आँखों के सामने तैरने से लग जाते हैं।

आज यादों के उस जखीरे में से, कुछेक मुख्य विकर्षणों को - जो मुझे स्कूल और पढाई से दूर करने में प्रबल सक्षम से थे - उनको याद करने का प्रयास कर रहा हूँ। ये यादें ऐसी हैं जो मेरे मानस-पटल पर काफी गहरे रेखांकन कर गए हैं।

आगे मैं कभी उन सारे तमाशबीनों का ज़िक्र करूँगा - मैं काफी गहराई से उनके हर एक गतिविधियों को देखा करता था, और किसी वीडियो कैमरा के न होने के बावजूद, हरेक दृश्य आज भी मुझे उसी ताज़गी के साथ याद हैं! कई बार तो लगता है कि मैं अब भी उन सभी दृश्यों को अपने आँखों के आगे घटित होता देख रहा हूँ!