उन दिनों क्रिकेट के खेल का आँखों देखा हाल - रेडियो कमेंट्री के माध्यम से आया करता था। लोगों के घर के ड्राइंग रूम के किसी एक कोने में बिजली से चलने वाला काफी बड़ा सा रेडियो, स्थापित सा हुआ करता था। उस ज़माने में मर्फी के रेडियो को किसी क्रोशिये से बने जालीदार कवर से बड़ी इज़्ज़त के साथ ढँक कर रखा जाता था। उन दिनों काफी हद तक रेडियो को वही गौरव प्राप्त था, जो आज के दौर में टीवी को प्राप्त है।
मेरे बड़े होने के दौर में ही बैटरी से चलने वाला ट्रांज़िस्टर रेडियो का प्रचलन हो गया था, और इस तरह से रेडियो से ट्रांज़िस्टर बनकर इसके छोटे संस्करण का ड्राइंग रूम से बाहर तक का सफर शुरू हो चुका था। अब लोग बड़े शान से अपने हाथ में एक ट्रांज़िस्टर को टाँगे हुए, किसी भी जगह निकल पड़ते थे। इस क्रम में मुझे याद आती है एक पिकनिक का, जब हम अपने साथ ट्रांज़िस्टर ले कर निकले थे और पिकनिक के दौरान घर से काफी दूर वीरान से जगह पर पूरे कमेंट्री को सुने थे!
आम तौर पर भारत में होने वाले खेल जाड़े के समय हुआ करता था और उन दिनों स्कूल बंद हुआ करता था। जिंदगी ज़रा आराम करके सुस्ताती सी होती थी। माहौल कुछ इस तरह का होता था-
लोग ठण्ड में घर के बाहर, जाड़े के कच्ची और नरम धूप को सेकने के लिए खाट, कुर्सियां, मचिया (बेंत का बना हुआ मोढ़ा) आदि पर बैठे अपने साथ रेडियो ट्रांज़िस्टर में कमेंट्री का इंतज़ार करते रहते थे। औरते साथ में ऊन के गुच्छे ले कर स्वेटर बुनने में लगे हुए, बड़े-बूढ़े अखबारों को पढ़ते हुए, हम बच्चे सामने के खुले रोड या मैदान में गिल्ली डंडा या क्रिकेट खेलते हुए, बीच-बीच में हर कोई रेडियो पर ध्यान देकर सुनते थे। कभी बारिश का खबर या कभी-कभार मैदान में ओस या कुहासे होने जैसे कारणों से कुछ देर से खेल के शुरू होने का समाचार मिलता, और फिर जैसे ही टॉस का खबर मिलता, हम उत्साहित होकर अपना सब काम छोड़ कर रेडियो के पास बैठ जाते थे।
कई तरह के अनुमान लगा कर लोग बातें करते थे। अनेकों प्रकार के अनुमान पर टिके हुए विवेचना चलती रहती थी - कि कहीं भारत टॉस न हार जाए, और वैसे में अगर पहले बैटिंग के लिए बुला दिया जाए, और अगर शुरुआत में ही कोई ऐसी भयानक गेंद आ जाए जिस से गावस्कर आउट हो जाए, फिर भारत क्या उस मुसीबत से उबर पायेगा आदि आदि। कुछ ज्यादा जानकार से लोग विपक्षी टीम के किसी घातक बॉलर के बारे में बता कर हमें और भयभीत से कर देते थे। एक तो गावसकर ओपनिंग क्यों करता था, यह भी बहुत कष्टप्रद सा विषय था - भारत के टीम में एक ही तो अच्छा बैट्समैन और वो भी शुरू में ही आ जाता था - बचपन में हमारे लिए यह एक बहुत विकट समस्या हुआ करता था!
एक और समस्या यह होती थी कि उन दिनों १५ मिनट के अंतराल पर बारी-बारी से हिंदी और अंग्रेजी में कमेंट्री होती थी। ऐसे में कोई अंग्रेज़ी जानने वाले का आस पास होना बहुत लाभकारी सा होता था, पर ऐसे लोग कम ही पाये जाते थे। और हम "आउट", "फोर रन्स", "एंड ऑफ़ थे ओवर" आदि जैसे शब्दावली से काम चला लिया करते थे।
मैच शुरू होता और हर थोड़ी देर में पूरे मैदान के फील्ड सेटिंग का जिक्र बड़े रोचक ढंग से होता था -
गावस्कर या भारत के किसी भी बैट्समैन के हर सकारात्मक इनिंग के लिए - आम तौर पर अगर अर्ध-शतक या शतक लग जाये तो ह्रदय से ईश्वर को धन्यवाद देते थे। पर क्रिकेट की वजह से, ज्यादातर समय, मैं भगवान से "कट्टीस" ही रहता था - अर्थात मेरी बातचीत बंद रहती थी। भारत के हारने के कगार पर पहुँच जाने के स्थिति में और कुछ न कर पाने के विविशता में, ईश्वर को ही जी भर के कोसते थे और गालियां तक दे डालते थे!
पता नहीं गावस्कर के आउट होते ही भारत के हार का बोध होने लगता था। कारण भी काफी वास्तविक सा था - भारत के गेंदबाजी और फील्डिंग दोनों भगवान भरोसे थे। कपिल के आने के पहले तक तो नयी गेंद के चमक को मैदान के हरे घास पर रगड़-रगड़ कर ख़त्म किया जाता था और इस तरह से गेंद को पुराना बनाया जाता था, क्योंकि पुरानी गेंद से ही स्पिन गेंदबाज़ी अच्छी हुयी करती थी।
और उधर इस बात से बेखबर कि कितने लोग अपने नाखून को काट कर खाए जा रहे हैं, ऐसा लगता था मानो गावस्कर अपना मालिकाना हक़ समझते हुए ९९ के स्कोर पर, जितनी मर्ज़ी उतनी देर तक अपनी सुरक्षात्मक खेल खेलते ही रहते थे ।
कभी- कभी लंच या टी ब्रेक के आधे घंटे पहले भी ९९ के स्कोर पर होने के बाद भी गावस्कर हरेक गेंद को "सम्मान पूर्वक" खेलते रहते थे। जिसके कारण जब हम डकार ले कर, अगले भोजन या चाय पीने की तैयारी में होते थे, तभी सुशील दोषी के शब्दों में, गावस्कर "बाहर जाती गेंद के साथ छेड़ छाड़" जैसा कुछ कर देते थे!
ऐसे माहौल में, जब हम सभी भयानक तनाव से भरे होते थे, और काफी देर से मैदान में रक्षात्मक, सम्मानपूर्वक आदि जैसे विशेषताओं के साथ "निष्क्रिय" भाव से खेल चल रहा होता था, और ऐसे में अंततः गावस्कर ने जब "कुछ" किया हो, ठीक तभी, ऐसा लगता था मानो Murphy's Law के तर्ज़ पर, हमारे घर के सामने के सड़क पर कोई मोटरसाइकिल वाला आ जाता था।
बाकी समय मोटरसाइकल वाले आये जाए हमें कोई फरक नहीं पड़ता था, पर जब हम ट्रांज़िस्टर पर कमेंट्री सुन रहें हों तब आ जाए तो बड़ी मुश्किल हो जाती थी, क्योंकि हमारे ट्रांजिस्टर में मोटरसाइकल के कारण सिर्फ "कट कट कट.…" जैसा कुछ आवाज़ आने लगती थी। और उस पर से जब गावस्कर अपने शतक के लक्ष्य पर आ कर रन के कब्जियत से तड़प रहे हों, तब मोटर साइकल वाले का आना बहुत कष्टप्रद होता था।
उस "कट-कट" के शोर के बीच, कॉमेंटेटर क्या कह रहा होता था, हमें कुछ भी समझ में नहीं आता था। और, थोड़ी देर बाद जब मोटर-साइकल आगे चल जाता, सुशील दोषी किसी पिता की तरह, सांत्वना देने वाले स्वर में बोलते पाये जाते थे -
जब काफी देर बाद यह सुनते कि -
सुशील दोषी की एक और खासियत थी कि वे कमेंट्री करते समय, "एयर-टाइम" का भरपूर इस्तेमाल करते थे। मतलब खेल हो रहा हो या न हो रहा हो, वे कुछ न कुछ बोलते ही रहते थे, अगर मैदान में कुछ ख़ास न भी हो रहा हो तो कुछ काल्पनिक सी ही बातें, जिसका कोई ख़ास अर्थ नहीं होता था, पर सुनने से ठीक-ठाक रोचक सा ही लगता था, जैसे -
इंग्लैंड के साथ ओवल में हो रहे मैच के दौरान गावस्कर के उस बेमिसाल इनिंग ने भारत को लगभग जीत के कगार पर ला कर खड़ा कर दिया था। कौन भूल सकता है गावस्कर के उस २२१ रन के पारी को! मेरे हिसाब से शायद उसे क्रिकेट के इतिहास में सबसे बेहतरीन इन्निंग्स में गिना जाना चाहिए।
और उस मैच के हरेक क्षण का सजीव चित्रण के लिए सुशील दोषी को भी हमेशा याद किया जाना चाहिए।
जीतने के लिए अंतिम २० ओवर्स में जिसे मैंडेटरी ओवर्स कहे जाते थे उसमे भारत को जीतने के लिए १०९ रन बनाने थे और उनके ९ विकेट बाकी थे। ऐसे में सिर्फ कपिल देव से ही भारत को तेज़ गति से रन बनाने की उम्मीद थी, और शायद इसी कारण से उन्हें बल्लेबाजी के क्रम में विश्वनाथ से ऊपर भेजा गया था।
कपिल आये और अपने इनिंग के तीसरे गेंद पर ही छक्का मारने के चक्कर में, ठीक बाउंड्री लाइन पर गूच के द्वारा- शून्य - पर ही कैच आउट कर लिए गए थे।
उफ़.... उस दिन के कमेंट्री का क्या कहना! इतना रोमांच था कि आखिर के ३० मिनट में ऐसा लग रहा था मानो मैच किसी भी तरफ जा सकता था, उस दिन कपिल और विश्वनाथ दोनों ने बेहद निराश किया था।पर बॉथम के अंतिम ५ ओवर की गेंदबाज़ी के क्या कहने, उस ने भारत को जीत से लगभग हार के कगार पर पहुंचा दिया था।
अंत में मैच किसी तरह से ड्रा हो गया पर भारत जीत से सिर्फ ९ रन दूर थी और हार से सिर्फ २ विकेट दूर!
अपने ख़राब खेल से आउट होने के कारण भारत के मैच को नहीं जीत पाने से कपिल इतने आहत हुए थे कि बाद में अपने एक इंटरव्यू में वे कहते पाये गए थे कि - "मैं इतना दुखी था कि मुझे लग रहा था कि इंडिया लौटते समय प्लेन से कूद कर जान दे दूँ.."
उस रोमांच से भरे मैच के दौरान सुशील दोषी ने जो एक वाक्य कहा था, वह आज भी मेरे कानों में वैसे ही गूंजता रहता है, और शायद यह उस मैच के उत्तेजना को भी पूरी तरह से व्यक्त कर देता है -
मेरे बड़े होने के दौर में ही बैटरी से चलने वाला ट्रांज़िस्टर रेडियो का प्रचलन हो गया था, और इस तरह से रेडियो से ट्रांज़िस्टर बनकर इसके छोटे संस्करण का ड्राइंग रूम से बाहर तक का सफर शुरू हो चुका था। अब लोग बड़े शान से अपने हाथ में एक ट्रांज़िस्टर को टाँगे हुए, किसी भी जगह निकल पड़ते थे। इस क्रम में मुझे याद आती है एक पिकनिक का, जब हम अपने साथ ट्रांज़िस्टर ले कर निकले थे और पिकनिक के दौरान घर से काफी दूर वीरान से जगह पर पूरे कमेंट्री को सुने थे!
आम तौर पर भारत में होने वाले खेल जाड़े के समय हुआ करता था और उन दिनों स्कूल बंद हुआ करता था। जिंदगी ज़रा आराम करके सुस्ताती सी होती थी। माहौल कुछ इस तरह का होता था-
लोग ठण्ड में घर के बाहर, जाड़े के कच्ची और नरम धूप को सेकने के लिए खाट, कुर्सियां, मचिया (बेंत का बना हुआ मोढ़ा) आदि पर बैठे अपने साथ रेडियो ट्रांज़िस्टर में कमेंट्री का इंतज़ार करते रहते थे। औरते साथ में ऊन के गुच्छे ले कर स्वेटर बुनने में लगे हुए, बड़े-बूढ़े अखबारों को पढ़ते हुए, हम बच्चे सामने के खुले रोड या मैदान में गिल्ली डंडा या क्रिकेट खेलते हुए, बीच-बीच में हर कोई रेडियो पर ध्यान देकर सुनते थे। कभी बारिश का खबर या कभी-कभार मैदान में ओस या कुहासे होने जैसे कारणों से कुछ देर से खेल के शुरू होने का समाचार मिलता, और फिर जैसे ही टॉस का खबर मिलता, हम उत्साहित होकर अपना सब काम छोड़ कर रेडियो के पास बैठ जाते थे।
कई तरह के अनुमान लगा कर लोग बातें करते थे। अनेकों प्रकार के अनुमान पर टिके हुए विवेचना चलती रहती थी - कि कहीं भारत टॉस न हार जाए, और वैसे में अगर पहले बैटिंग के लिए बुला दिया जाए, और अगर शुरुआत में ही कोई ऐसी भयानक गेंद आ जाए जिस से गावस्कर आउट हो जाए, फिर भारत क्या उस मुसीबत से उबर पायेगा आदि आदि। कुछ ज्यादा जानकार से लोग विपक्षी टीम के किसी घातक बॉलर के बारे में बता कर हमें और भयभीत से कर देते थे। एक तो गावसकर ओपनिंग क्यों करता था, यह भी बहुत कष्टप्रद सा विषय था - भारत के टीम में एक ही तो अच्छा बैट्समैन और वो भी शुरू में ही आ जाता था - बचपन में हमारे लिए यह एक बहुत विकट समस्या हुआ करता था!
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| सुशील दोषी |
एक और समस्या यह होती थी कि उन दिनों १५ मिनट के अंतराल पर बारी-बारी से हिंदी और अंग्रेजी में कमेंट्री होती थी। ऐसे में कोई अंग्रेज़ी जानने वाले का आस पास होना बहुत लाभकारी सा होता था, पर ऐसे लोग कम ही पाये जाते थे। और हम "आउट", "फोर रन्स", "एंड ऑफ़ थे ओवर" आदि जैसे शब्दावली से काम चला लिया करते थे।
क्रिकेट की कमेंट्री और विशेषज्ञ लाला अमरनाथ जी
अगर हिंदी में कमेंट्री शुरू होता था तो उन दिनों आम तौर पर जसदेव सिंह या सुशील दोषी शुरुआत करते थे, जो कुछ इस तरह से होता था -नमस्कार , मैं सुशील दोषी अपने साथी कमेंटेटर्स जसदेव सिंह और अंग्रेज़ी में सुरेश सरैया, मेलविल डेमेल्लो और एक्सपर्ट कमेंट्स के लिए लाला अमरनाथ के साथ-साथ हमारे कमेंट्री बॉक्स में स्कोरर कृष्णन के साथ दिल्ली के फिरोजशाह कोटला से आपका स्वागत करता हूँ। यहाँ कुछ ही देर में भारत और इंग्लैंड के बीच खेले जा रहे पांच मैचों के टेस्ट-श्रृंखला के पहले टेस्ट शुरू होने जा रहा है। इस मैच के आँखों देखा हाल का सीधा प्रसारण आकाशवाणी से सुनाया जा रहा है। स्टेडियम लगभग खचाखच भरी हुई और सभी लोगों में काफी उत्साह और रोमांच। भारत ने पिछले सीजन में न्यूज़ीलैंड को ३-२ से शिकस्त दी थी और उस सीरीज के बाद इंग्लैंड के दौरे में भारत के उम्दा प्रदर्शन की बहुत उम्मीद की जा रही है। क्या कहेंगे लाला आप इस सीरीज के बारे में?माइक पर ही जोर-जोर से खांसते हुए, लाला अमरनाथ कुछ पंजाबी निष्ठ हिंदी बोलते हुए,
भारत्त को भौत उमीद्द है.... मोहन-दर काफी अच्छे फारम में है, सरिन-दर भी अच्छा फारम में है - दोनों को चान्नस मिलनी चहिये थी.... सभी खिलाड्डियों को अच्छा खेल खेलना चाहिएआदि जैसे कुछ बातें बोलकर फिर से सुशील दोषी को माइक दे देते थे। ज्ञातव्य है कि लाला अमरनाथ आज़ाद भारत के टीम के पहले कप्तान थे और शायद पहले टेस्ट में ही शतक बनाया था। उम्रदराज़ थे, अस्वस्थ भी रहते थे रहते थे, और बुढ़ापे के दौर में अपने दोनों सुपुत्र मोहिन्दर अमरनाथ और सुरिंदर अमरनाथ के टीम में कभी चयन होने और ख़राब प्रदर्शन के बाद टीम से ड्राप कर देने से वे खासा नाराज़ सा रहते थे और टेस्ट मैच के विशेष टिप्पणी से ज्यादा उनका ध्यान पुत्र-मोह में ज्यादा बह रहा होता था। हालाँकि बाद के दिनों में मोहिन्दर बहुत सशक्त प्रदर्शन किये, और १९८३ के विश्वकप के मैन ऑफ द सीरीज भी रहे थे।
मैच शुरू होता और हर थोड़ी देर में पूरे मैदान के फील्ड सेटिंग का जिक्र बड़े रोचक ढंग से होता था -
काफी आक्रामक क्षेत्ररक्षण लगा रखा है कप्तान बेदी ने.....या कभी कभी "सुरक्षात्मक" फील्डिंग की भी व्यवस्था होती थी। मुझे फील्ड पोजिशन्स के बारे में कुछ ज्यादा समझ नहीं थी (अब भी नहीं है) बस कुछ लय में कहे गए - स्लिप, गली, मिड ऑन, कवर, थर्ड मैन, लॉन्ग ऑफ आदि जैसे पोसिशन्स - कई बार तो कमेंट्री के दौरान खुद ही बात करते वे निर्धारित करते रहते थे -
शार्ट मिड ओन बल्कि डीप कहा जा सकता है, शार्ट लेग बल्कि जरा सा और अंदर की ओर फॉरवर्ड शार्ट लेग.....इसी तरह के पोजिशन के विवेचना को सुनते हुए इस प्रतीक्षा में रहते थे, जब फिर से कहा जाता था -
और इस बीच दूर पैवेलियन छोर से अगले गेंद के लिए तैयार..... और यह गेंद!!!!थोड़ी देर तक स्तब्धतता- हमारी दिल की धड़कन रुकी हुयी सी - और फिर से चालू -
भाग्यशाली रहे गावस्कर, कि गेंद ने बल्ले का बाहरी किनारा नहीं लिया, काफी तेज़ गेंद, जो टप्पा खाने के बाद गेंद ऑफ स्टंप को लगभग चूमते हुए, बिना कोई क्षति पहुंचाए विकेटकीपर एलन नॉट के दस्ताने में!सुबह के खेल शुरू होने से लंच के बीच में अगर गावस्कर नाबाद खेलते रह जाते, तो हम इसे एक उपलब्धि ही मानते थे। तब तक के मैच के दौरान फेंके गए हर गेंद पर, जितने भी देवी-देवता को जानते थे- और सर्व-धर्म में विश्वास करते हर धर्म के ईश्वर को याद करते हुए, ये विनती करते रहते थे कि रन बने न बने पर गावस्कर आउट न हो जाए। आज गावस्कर अपने रिकॉर्ड को देख कर, गर्व कर ले, पर उन इन्निंग्स के दौरान शायद उन्हें हम जैसे कितने सारे क्रिकेट के प्रसंशकों के द्वारा ईश्वर के प्रार्थना के योगदान का पता तक नहीं होगा।
गावस्कर या भारत के किसी भी बैट्समैन के हर सकारात्मक इनिंग के लिए - आम तौर पर अगर अर्ध-शतक या शतक लग जाये तो ह्रदय से ईश्वर को धन्यवाद देते थे। पर क्रिकेट की वजह से, ज्यादातर समय, मैं भगवान से "कट्टीस" ही रहता था - अर्थात मेरी बातचीत बंद रहती थी। भारत के हारने के कगार पर पहुँच जाने के स्थिति में और कुछ न कर पाने के विविशता में, ईश्वर को ही जी भर के कोसते थे और गालियां तक दे डालते थे!
पता नहीं गावस्कर के आउट होते ही भारत के हार का बोध होने लगता था। कारण भी काफी वास्तविक सा था - भारत के गेंदबाजी और फील्डिंग दोनों भगवान भरोसे थे। कपिल के आने के पहले तक तो नयी गेंद के चमक को मैदान के हरे घास पर रगड़-रगड़ कर ख़त्म किया जाता था और इस तरह से गेंद को पुराना बनाया जाता था, क्योंकि पुरानी गेंद से ही स्पिन गेंदबाज़ी अच्छी हुयी करती थी।
गावस्कर का शतक और मोटरसाइकल
पर गावस्कर को क्या पता कि उनके नादान प्रशंसक को उनके शतक के पूरा होने का कितना बेसब्री से इंतज़ार होता था!और उधर इस बात से बेखबर कि कितने लोग अपने नाखून को काट कर खाए जा रहे हैं, ऐसा लगता था मानो गावस्कर अपना मालिकाना हक़ समझते हुए ९९ के स्कोर पर, जितनी मर्ज़ी उतनी देर तक अपनी सुरक्षात्मक खेल खेलते ही रहते थे ।
कभी- कभी लंच या टी ब्रेक के आधे घंटे पहले भी ९९ के स्कोर पर होने के बाद भी गावस्कर हरेक गेंद को "सम्मान पूर्वक" खेलते रहते थे। जिसके कारण जब हम डकार ले कर, अगले भोजन या चाय पीने की तैयारी में होते थे, तभी सुशील दोषी के शब्दों में, गावस्कर "बाहर जाती गेंद के साथ छेड़ छाड़" जैसा कुछ कर देते थे!
ऐसे माहौल में, जब हम सभी भयानक तनाव से भरे होते थे, और काफी देर से मैदान में रक्षात्मक, सम्मानपूर्वक आदि जैसे विशेषताओं के साथ "निष्क्रिय" भाव से खेल चल रहा होता था, और ऐसे में अंततः गावस्कर ने जब "कुछ" किया हो, ठीक तभी, ऐसा लगता था मानो Murphy's Law के तर्ज़ पर, हमारे घर के सामने के सड़क पर कोई मोटरसाइकिल वाला आ जाता था।
बाकी समय मोटरसाइकल वाले आये जाए हमें कोई फरक नहीं पड़ता था, पर जब हम ट्रांज़िस्टर पर कमेंट्री सुन रहें हों तब आ जाए तो बड़ी मुश्किल हो जाती थी, क्योंकि हमारे ट्रांजिस्टर में मोटरसाइकल के कारण सिर्फ "कट कट कट.…" जैसा कुछ आवाज़ आने लगती थी। और उस पर से जब गावस्कर अपने शतक के लक्ष्य पर आ कर रन के कब्जियत से तड़प रहे हों, तब मोटर साइकल वाले का आना बहुत कष्टप्रद होता था।
उस "कट-कट" के शोर के बीच, कॉमेंटेटर क्या कह रहा होता था, हमें कुछ भी समझ में नहीं आता था। और, थोड़ी देर बाद जब मोटर-साइकल आगे चल जाता, सुशील दोषी किसी पिता की तरह, सांत्वना देने वाले स्वर में बोलते पाये जाते थे -
… बिलकुल गेंद टप्पा खा कर ऊपर...... और ऊपर (कितनी ऊपर?) आ कर....... मिडल स्टंप से ऑफ़ स्टंप के ओर जाती हुयी.... और फिर ऑउटस्विंग होती हुयी बाहर... और बाहर.... बिलकुल बाहर (कितनी बाहर? स्टेडियम से भी बाहर?) जा रही थी.…… !इतने बारीक और विस्तृत जानकारी के बीच सुशील दोषी अंततः क्या हुआ ये एक बार भी नही बताते थे, फलस्वरूप बहुत देर तक समझ में ही नहीं आता था कि - गावस्कर आउट... या सेंचुरी.... या फिर कुछ नहीं?
जब काफी देर बाद यह सुनते कि -
…और अगली गेंद को गावस्कर ने, जिन्हें अब गेंद "फुटबॉल की तरह नज़र" आ रही होगी, बहुत ही सुरक्षात्मक ढंग से खेलते हुए मिड ओन की तरफ हल्का सा पुश कर दिया....ऐसे कुछ लाइन को सुनने के बाद जाकर यह स्पष्ट होता था कि गावस्कर अभी भी पिच पर खेल ही रहे हैं!
सुशील दोषी की एक और खासियत थी कि वे कमेंट्री करते समय, "एयर-टाइम" का भरपूर इस्तेमाल करते थे। मतलब खेल हो रहा हो या न हो रहा हो, वे कुछ न कुछ बोलते ही रहते थे, अगर मैदान में कुछ ख़ास न भी हो रहा हो तो कुछ काल्पनिक सी ही बातें, जिसका कोई ख़ास अर्थ नहीं होता था, पर सुनने से ठीक-ठाक रोचक सा ही लगता था, जैसे -
.... और जब तक गावस्कर पिच पर हैं, मैच में भारत का पलड़ा काफी भारी सा है...वैसे यह कल्पना करना बहुत रोचक होगा कि अगर तीसरे दिन के चाय के वक़्त तक भारत खेल कर २०० रन की बढ़त ले ले तो, इस पिच पर कुछ भी होने की संभावना हो सकती है..... वैसे इस वक़्त कुछ भी कहा नहीं जा सकता है...
सुनील और सुशील: ओवल का अविस्मरणीय मैच
मैं सुशील दोषी के कमेंट्री का कायल था। ख़ास कर सुशील दोषी के किये उस कमेंट्री के दौरान दिए गए विवरण को कभी नहीं भूलूंगा, जिसने उस अति रोमांचकारी मैच को और भी रोचक बना दिया था। सुनील और सुशील ने उस मैच को सजीव बना दिया था।इंग्लैंड के साथ ओवल में हो रहे मैच के दौरान गावस्कर के उस बेमिसाल इनिंग ने भारत को लगभग जीत के कगार पर ला कर खड़ा कर दिया था। कौन भूल सकता है गावस्कर के उस २२१ रन के पारी को! मेरे हिसाब से शायद उसे क्रिकेट के इतिहास में सबसे बेहतरीन इन्निंग्स में गिना जाना चाहिए।
और उस मैच के हरेक क्षण का सजीव चित्रण के लिए सुशील दोषी को भी हमेशा याद किया जाना चाहिए।
जीतने के लिए अंतिम २० ओवर्स में जिसे मैंडेटरी ओवर्स कहे जाते थे उसमे भारत को जीतने के लिए १०९ रन बनाने थे और उनके ९ विकेट बाकी थे। ऐसे में सिर्फ कपिल देव से ही भारत को तेज़ गति से रन बनाने की उम्मीद थी, और शायद इसी कारण से उन्हें बल्लेबाजी के क्रम में विश्वनाथ से ऊपर भेजा गया था।
कपिल आये और अपने इनिंग के तीसरे गेंद पर ही छक्का मारने के चक्कर में, ठीक बाउंड्री लाइन पर गूच के द्वारा- शून्य - पर ही कैच आउट कर लिए गए थे।
उफ़.... उस दिन के कमेंट्री का क्या कहना! इतना रोमांच था कि आखिर के ३० मिनट में ऐसा लग रहा था मानो मैच किसी भी तरफ जा सकता था, उस दिन कपिल और विश्वनाथ दोनों ने बेहद निराश किया था।पर बॉथम के अंतिम ५ ओवर की गेंदबाज़ी के क्या कहने, उस ने भारत को जीत से लगभग हार के कगार पर पहुंचा दिया था।
| Gavaskar on his way to his double-hundred Adrian Murrell / © Getty Images(ESPN ) |
अंत में मैच किसी तरह से ड्रा हो गया पर भारत जीत से सिर्फ ९ रन दूर थी और हार से सिर्फ २ विकेट दूर!
अपने ख़राब खेल से आउट होने के कारण भारत के मैच को नहीं जीत पाने से कपिल इतने आहत हुए थे कि बाद में अपने एक इंटरव्यू में वे कहते पाये गए थे कि - "मैं इतना दुखी था कि मुझे लग रहा था कि इंडिया लौटते समय प्लेन से कूद कर जान दे दूँ.."
उस रोमांच से भरे मैच के दौरान सुशील दोषी ने जो एक वाक्य कहा था, वह आज भी मेरे कानों में वैसे ही गूंजता रहता है, और शायद यह उस मैच के उत्तेजना को भी पूरी तरह से व्यक्त कर देता है -
जिन लोगों को दिल की बीमारी है, वो कॉमेंट्री न सुने तो बेहतर है, क्योंकि उनके डॉक्टर उन्हें ये सलाह दे रहे होंगे कि ये रोमांच जो सर पर चढ़ कर हावी हो रहा है, ये उनके दिल के लिए हानिकारक साबित हो सकता है।

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