Jan 11, 2016

भारत एक स्पिन प्रधान देश

सदियों से भारत के बारे में पढता आया हूँ कि - भारत एक कृषि प्रधान देश है। मेरे ख्याल से उसमे एक और वाक्य जोड़ देना चाहिए कि साथ ही भारत एक एक स्पिनर बॉलिंग प्रधान देश भी है।

पता नहीं क्यों परन्तु भारत की इतनी बड़ी जनसंख्या होने के बावजूद, इतने सालों में, आज तक एक भी सफल तेज गेंदबाज नहीं हो पाया है। जो इक्के-दुक्के हुए भी हैं, वे स्लो-मीडियम से मीडियम के रफ़्तार तक आते-आते टाँय-टाँय फिस्स हो गए! ये अलग बात है कि तेज़ गेंदबाज़ी और विकेट लेने के क्षमता में कोई ज्यादा सम्बन्ध नहीं होता है।

इतिहास गवाह है कि कई मौके पर, स्पिन गेंदबाज़ी देखने का मज़ा कुछ अलग ही रहा है। कई मौके पर बल्लेबाजों के लिए तेज़ गेंदबाज़ों से कहीं ज्यादा, स्पिनर्स ने खतरनाक परिस्थिति पैदा किए हैं! मेरे पास आंकड़े नहीं हैं, पर मैं इत्मीनान से कह सकता हूँ कि क्रिकेट के पूरे इतिहास में स्पिनर्स ने तेज गेंदबाजों से ज्यादा विकेट लिए होंगे। फिर भी तेज़ गेंदबाज़ी एक ऐसा हथियार सा है, जिसके होने से टीम का मनोबल और उसके प्रशंसकों को भी बहुत फख्र सा महसूस होता है।

मैं आज तक शेन वार्न के कलात्मक स्पिन गेंदबाज़ी का कायल हूँ! मुझे याद है एक मैच, जहाँ शेन ऑस्ट्रेलिया के किसी पिच पर गेंदबाज़ी कर रहे थे। उनके हरेक गेंद पर ऐसा लगता था, मानो बैट्समैन आउट होते-होते बच गया था! हरेक गेंद पर तालियों की गड़गड़ाहट पड़ती थी- शेन अद्भुत थे, जब वे अपने चरम पर खेल रहे होते थे। उसी तरह से मुरलीथरन, अब्दुल कादिर, अनिल कुंबले, सक़लैन मुश्ताक़ और भी कई दिग्गज स्पिन गेंदबाज हुए हैं, जिन्होंने कई बार अपने बल-बूते पर मैच का रुख बदल दिया है।

मानसून और स्पिन पर आश्रित भारत

जैसा पहले ही बताया गया है कि भारत एक कृषि और साथ ही स्पिन पर आश्रित देश है। अतः भारत सदियों से मानसून पर आश्रित रहा है - दोनों कृषि और क्रिकेट के लिए।

खेल के शुरू होते ही इस बात पर चर्चा होती थी कि - मैदान कैसा है? अर्थात, अगर पिच स्पिनर के मददगार न हो तो हम अगले ५-६ दिनों के लिए तनाव में रहते थे। हमें तभी से ही पराजय का बोध सा होने लगता था। फिर खिलाडियों के साथ-साथ हमारे जैसे भारतीय टीम के "भक्तों" के लिए, आने वाले ४-५ दिन बड़ी संकट की घड़ी सी होते थे। ऐसे माहौल में जब विपक्षी टीम के तेज़ गेंदबाज, हमारे बैट्समेन की धज्जी उड़ाते हुए लगभग हमें रौंद से देते थे, तो वैसे में कई बार हम यह सोचते थे कि क्या वास्तव में खेलना जरूरी था?

ऐसे समय, इंद्र देवता के प्रति हमारी आस्था काफी गहरी हो जाती थी - सही समय पर बरसात करा के, भारतीय टीम के निश्चित हार से बचने में उनके साथ देने की मनोकामना करते थे। कई बार बारिश हो जाने के वजह से भारत शर्तिया हार से बची है। 

बचपन से ही- भारत के क्रिकेट मैच में एक के बाद एक हार के खबर को सुन कर - हम में हीन भावना सी आ गयी थी। और रहा सहा कसर पूरा कर दिया था, शारजाह में हुए उस मैच ने जिसमे मियांदाद ने अंतिम गेंद पर एक छक्का जड़ कर, भारत की जीती हुई मैच भी हमसे छीन ली थी। कारण स्पष्ट था कि हमारे पास अच्छे गेंदबाज नहीं थे, और वाजिब बात है कि वह पिच स्पिन के लिए मददगार नहीं रहा होगा!

टेस्ट मैच के बारे में तो भारतीय टीम के गेंदबाज़ी का यह आलम था कि पहले नए गेंद को घास पर, अलाउद्दीन के चिराग की तरह रगड़-रगड़ कर स्पिन के जिन को बाहर निकालने का प्रयास करते हुए, उसे पुराना बनाया जाता था क्योंकि नयी गेंद की चमक और टाइट सीम, स्पिन गेंदबाज़ी के लिए मददगार से नहीं होते थे! गेंद के साथ ऐसा दुर्व्यवहार करना किसी तेज गेंदबाज के लिए आत्महत्या का सबब बन सकता है, क्योंकि नए गेंद उनका सबसे तीक्ष्ण हथियार सा होता है।

ऐसा नहीं था कि टीम में जुझारू खिलाडी नहीं थे। उन दिनों मंसूर अली खान पटौदी के आक्रामक खेल के कहानियां सुना करते थे। पटौदी, फारुख इंजीनयर और सलीम दुर्रानी के छक्के मारने के किस्से, एकनाथ सोलकर और यजुवेंद्र सिंह के चुस्त क्षेत्ररक्षण और गावस्कर, विशी जैसे कुशल बल्लेबाज़ हुए थे - पर टीम में आत्मविशवास की कमी थी।

सचमुच, कपिलदेव के दौर से, भारतीय टीम में आत्मविश्वास आया और काफी हद तक पिछले १०-१५ सालों में भारत के जीतने का दर काफी बढ़ा है, साथ ही भारत में एक से बढ़ कर एक आक्रामक बल्लेबाज और कुछ तेज़ गेंदबाज भी आये हैं - जिसके कारण टीम का संतुलन बहुत बढा है, और अब खेल के शुरुआत से ही भारत के हार की कल्पना मन में नहीं आती है। अब कहीं से भरोसे के साथ क्रिकेट अंतिम समय तक देख सकते हैं। साथ ही अब "क्रिकेट की जीत" में भी कुछ कमी आ गयी है, मतलब भारत अब ज्यादातर जीतता है।

स्पिन की चौकड़ी

भारत में अनेको प्रकार के स्पिन गेंदबाज हुए हैं जो गेंदबाज़ी के प्रमुख किरदार को निभाते आये हैं। हर युग में कोई न कोई ऐसा स्पिन गेंदबाज हुआ है जिसने अगले २-३ सालों तक टीम में अपनी जगह सुरक्षित कर लिए हैं। हाल के दिनों में अनिल कुंबले, मनिंदर सिंह, हरभजन सिंह और कुछेक स्पिनर्स ने कई सालों तक अच्छा या ख़राब खेलते हुए टीम में अपना जगह बरक़रार रखे। परन्तु भारत को हाल के दिनों में कभी भी एक साथ बेहतरीन विश्वस्तरीय स्पिनर्स नहीं मिले हैं, जैसा ७० के दशक में हुआ था।    
वेंकट राघवन, बिशन सिंह बेदी, ईरापल्ली प्रसन्ना, भगवत चंद्रशेखर - इस स्पिन-चौकड़ी के जितने विकेट होंगे, उतना इन सबों ने पूरे टेस्ट के मिला कर  रन नहीं बनाये होंगे!
उन दिनों भारत के टीम में एक बहुत ही सक्षम स्पिन की चौकड़ी हुआ करती थी। वाकई उनके कारण भारत ने कई मैच जीते होंगे।  संयोग-वश भारत के झोले में ७० के दशक में ही सुनील गावस्कर, विश्वनाथ और कुछ अन्य जुझारू बैट्समैन मिल गए थे जो किसी भी तरह के गेंदबाज़ी का डट के मुकाबला कर सकते थे। और उन्ही दिनों भारत को स्पिन के बेहतरीन चौकड़ी मिल गयी थी। अगर पिच स्पिन गेंदबाज़ी को साथ दे देता तो इस टीम के साथ विश्व के बेहतरीन टीम की हेंकड़ी निकल जाती थी। ७० के दशक में भारत को मिले अनेकों जीत का श्रेय इस पूरे टीम के मिली-जुली योगदान को है।

इस चौकड़ी में एक भगवत चंद्रशेखर थे, जिनके गेंद फेंकने के किस्से बहुत प्रसिद्ध हुआ करता था। ऐसा सुना था कि उनको बचपन में हाथ का लकवा हो गया था, जिसके कारण वे अपनी कलाई को पूरी तरह से गोल घुमा पाते थे, इस तरह से वे बहुत ही भयानक लेग-स्पिन और खासकर "गुगली" गेंद डाल दिया करते थे। इनके आलावा उस चौकड़ी के, बिशन सिंह बेदी - जो बाद में कप्तान भी बने थे - उनके बारे में मशहूर हुआ करता था कि वे एक ओवर में, एक दूसरे से बिलकुल अलग तरह के, छह के छह गेंद डाल सकते थे।

इस स्पिनर-चौकड़ी के बाकी दो- वेंकटराघवन और इरापल्ली प्रसन्ना मिलकर, अगर पिच भी मदद कर दे, तो विपक्ष के पूरे १० खिलाडियों को दो बार आउट कर पाती थी। और इस तरह से वे जीत की सोचते भी थे। वरना पिच में घास होने से- जो तेज़ गेंदबाज़ी के लिए मददगार हुआ करती थी, उस सूरत में भारत की टीम पहले से ही घुटने टेक कर, गावस्कर पर आश्रित से हो जाते थे। अगर सनी चल गए तो मैच ड्रा हो जाता, वर्ना एक बार फिर से - बड़े सहज ढंग से ही, महान खेल - किकेट की जीत हो जाया करती थी।

भारत की गेंदबाजी: एक दुःख भरी दर्दनाक कथा 

मैं बचपन में क्रिकेट खेलता था, और मुझे याद है कि सबों में ज्यादा जोर बैटिंग करने के लिए हुआ करता था। गेंदबाज़ी या फेिलडिंग को उतने चाव से नहीं देखा जाता था। शायद यही कारण है कि भारत में गेंदबाज़ी की विधा उतना सम्मानित नहीं हुआ जितना बल्लेबाजी हुआ है। ऐसे भी भारतीय दर्शको से छक्के या चौके मारने वाले को जितनी तालियां मिलती हैं, उस अनुपात में अच्छी फील्डिंग या गेंदबाज़ी पर प्रोत्साहन कम ही मिलता है।

कारण जो भी हो पर आज के दौर में कुल मिला कर भारत में गेंदबाज़ी का स्तर बहुत गिर गया है। कम से कम पुराने दौर में कुछ अच्छे स्पिन गेंदबाज तो हुआ करते थे पर आज के दौर में स्पिन गेंदबाजों में भी लगभग अकाल सा पड़ा हुआ है। एक कारण यह भी है कि स्पिन गेंदबाज को टीम में अपनी उपयोगिता बनाये रखने के कारण अच्छे बल्लेबाजी पर भी ध्यान देना पड़ता है क्योंकि कई बार अगर पिच स्पिन गेंदबाज़ी को मदद न करे तो उनका टीम में होने का औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है।


ऐसा पहले के दौर में नहीं होता था क्योंकि पहले के स्पिनर से बल्लेबाजी की उम्मीद ही नहीं की जाती थी। मुझे याद है एक मैच में बिशन सिंह बेदी ने ५० रन बनाये थे और हम सभी आश्चर्यचकित से हो गए थे, पर उस से भी ज्यादा आश्चर्य तो तब हुआ था जब भागवत चंद्रशेखर ने एक बार चौका मार दिया था! उस चौके पर शायद सुनने वाले से ज्यादा खुद चंद्रा को यकीन नही हुआ होगा, क्योंकि शायद सबसे ज्यादा शून्य पर आउट होने का रिकॉर्ड में उनका नाम भी शीर्ष पर आता होगा।

वैसे स्पिनर गेंदबाजों को इस बात पर खुशी होनी चाहिए कि सबसे ज्यादा शून्य पर आउट होने का रिकॉर्ड वेस्ट इंडीज़ के तेज़ गेंदबाज कोर्टनी वाल्श के नाम है! अन्य स्पिनर - क्रिस मार्टिन, शेन वार्न, मुरलीथरन, दानिश कनेरिया के साथ चंद्रशेखर ११वे नंबर पर हैं!

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