Jan 24, 2016

क्रिकेट का संक्षेपण प्रक्रिया - मेरी राय

७० के दशक तक आते-आते लोग अपने दैनिक दिनचर्या में ज्यादा व्यस्त से होने लगे थे। अब उनके पास समय और धैर्य दोनों की कमी सी होने लगी थी। अब लोगों को लगातार ५-६ दिनों तक, बैट और बॉल के संघर्ष, और उस दौरान हो रहे रक्षात्मक खेल, कलात्मक तरीके से "कॉपी बुक स्टाइल" में खेले शॉट और इसी तरह के बारीकियों को देखने में कोई बहुत ज्यादा दिलचस्पी नहीं रह गई थी।

विदेशों में टीवी के आ जाने से क्रिकेट का लाइव कवरेज का प्रचलन तेज़ी से बढ़ते लगा था। अब लोग खेल को, देश की प्रतिष्ठा से कही ज्यादा, मनोरंजन के रूप में देखना चाहते थे। वे चाहते थे कि क्रिकेट को तेज़ गति से खेला जाए। साथ ही वे चाहते थे कि खेल का कोई परिणाम भी निकले। वैसे तो टेस्ट क्रिकेट में भी यह संभव है कि हर मैच में कोई परिणाम निकले, पर उन दिनों उस तरीके के नतीजे के लिए सकारात्मक टेस्ट क्रिकेट खेले जाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

टेस्ट -क्रिकेट : दर्शकों के धैर्य का टेस्ट

इसके लिए टेस्ट-क्रिकेट को समझने की आवश्यकता है, जिसमें इतने तरह के नियम हैं कि परिणाम के अनेक सारे संभावनाएं हो सकती हैं। किसी भी समय टेस्ट मैच कोई एक नया मोड़ ले सकता है। इसलिए अंतिम समय तक दर्शक को यह समझ में नहीं आता है कि कोई परिणाम निकलेगा भी या नहीं! मैदान में खेल रहे खिलाड़ी - ख़ास कर बैट्समेन, अगर चाहे तो खेल को कोई सा भी नया मोड़ दे सकते हैं। इस तरह से अगर कोई बैट्समैन मैच के अंतिम घड़ी में बॉल के साथ कम से कम छेड़छाड़ करे, तो इसका मतलब हैं कि रक्षात्मक तरीके से खेलते हुए ड्रॉ के लिए खेला जा रहा है।

इस तरह के बल्लेबाज के निर्णय का प्रभाव, टेस्ट मैच के परिणाम पर पड़ सकता है। कई बार जिस मैच को जीता जा सकता है, उसे रन के लक्ष्य का पीछा करने वाले ड्रा की ओर ले जाते हैं, क्योंकि वे उस क्रम में अपना विकेट गवां कर मैच हारना नहीं चाहते होंगे, या कोई और वजह - जैसे किसी का शतक बनाना खेल के परिणाम से ज्यादा महत्वपूर्ण लगता हो आदि आदि। पर अंत में जो भी हो, खेल को देखने वाले ठगा सा महसूस करने लगते हैं।

लोगो का अपने दैनिक दिनचर्या में से समय निकाल कर, क्रिकेट को देखना, एक स्वस्थ मनोरंजन के उद्देश्य से होता है। लोग दिन भर के व्यस्त जीवन से निकाले इन आराम के क्षणों में मनोरंजन चाहते हैं - जिसमे रोमांच हो, और खेल के फॉर्मेट कुछ ऐसा हो कि खिलाड़ी मज़बूर हो कर प्रतिस्पर्धा के कारण हर मैच में अपना १००% दें। टेस्ट क्रिकेट में वैसे क्षण कम ही रहते हैं और ऐसे ही कुछ कारणों से टेस्ट-क्रिकेट को देखने वालों में तेज़ी से गिरावट आने लगी है।

७०-८० के दशक में हालात इतने खस्ता हो गए थे कि ऐसा लगने लगा था कि क्रिकेट सिर्फ खेलने वालों का खेल बन के रह जाएगा। सप्ताह के अंत हो या छुट्टी के दिन, बड़े शहरों में टेस्ट मैच के दौरान, स्टेडियम खाली रहने लगी थी!

टेस्ट मैच के लिए छोटे शहर में सभी लॉजिस्टिक की सुविधाएँ भी नहीं होती थी - अच्छे पांच दिनों तक के बॉलिंग फील्डिंग के लायक पिच और मैदान के अलावा खिलाडियों के रहने खाने और अन्य सुविधाओं का भी ख्याल करना पड़ता था। 

इन सब कारणों से टेस्ट क्रिकेट सिर्फ बड़े शहरों में ही किया जा सकता था, और वहां बड़ी संख्या में खेल को देखने वाले आते नहीं थे। कुल मिला कर टेस्ट क्रिकेट काफी फीकी पड़ने लगी थी।

एकदिवसीय क्रिकेट : टेस्ट क्रिकेट की बाल-छंटाई

नए दौर में खेल भी एक व्यवसाय का रूप ले चुका था। विज्ञापन के द्वारा बहुत पैसे आने लगे थे और इसको लोगों में पॉपुलर बनाने के लिए टेस्ट क्रिकेट से हट कर वन-डे क्रिकेट खेल जाने लगा।

एकदिवसीय क्रिकेट को देखने के लिए ज्यादा लोग जुटने लगे थे। मगर क्रिकेट खेलने के इस नए फॉर्मेट के लिए उस दौर के क्रिकेट खिलाड़ी बिलकुल ही तैयार नहीं था। बेहतरीन बात यह यह हुई कि इस नए बदले खेल के फॉर्मेट में हरेक बॉलर को अधिकतम १२ ओवर्स (अब १०) और एक इनिंग में कुल मिला कर निर्धारित ६० (अब ५०) ओवर्स ही फेंकने होते हैं।

साथ ही बल्लेबाजों को भी अधिकतम रन का लक्ष्य बना कर विपक्षी टीम को देना होता है। दूसरे इनिंग में बैटिंग साइड को इस लक्ष्य का पीछा करना होता है। "करो या मरो" की नीति पर रनों के लक्ष्य का पीछा करने के नया फॉर्मेट दर्शकों को बहुत रास आया और देखते देखते यह लोकप्रिय होने लगा। अब क्रिकेट के भी वर्ल्ड कप होने लगे थे। और इस तरह से क्रिकेट, अब चलने के बजाय दौड़ने सा लगा था।

The scoreboard at the start of the match © ESPNcricinfo Ltd 

मगर उस दौर में क्रिेकट के कई सारे पुराने विचारधारा वाले - जो स्वयं को क्रिकेट के संरक्षक, "प्यूरिस्ट" या "महा-पंडित" से मानते थे - इस नए फॉर्मेट में खेले जाने वाले एकदिवसीय या ओडीआई को हेय दृष्टि से देखते, और यह कहते नहीं थकते थे कि असल क्रिकेट तो ५ दिन वाला टेस्ट मैच ही होता है। इस तरह के आलोचना या प्रतिक्रिया के बावजूद, दर्शको को इस तरह का खेल ज्यादा पसंद आने लगा था, और इसकी लोकप्रियता तेज़ी से बढ़ने लगी थी।
वर्तमान दौर में क्रिकेट का स्तर

जहाँ तक क्रिकेट के स्तर में ह्रास का प्रश्न है, मेरा मानना है कि इसके दोनों अपेक्षित और अनापेक्षित परिणाम सामने आये हैं। १९७१ से शुरू हुए एकदिवसीय खेल करीब ४००० बार खेला जा चुका है, २००५ में शुरू हुए टी-२० फॉर्मेट खेल करीब ५०० बार औपचारिक रूप से और उससे कई गुना ज्यादा बार अनेको तरह के लीग में खेले जा रहे हैं।

इसे और दूसरे परिपेक्ष्य में देखा जाना चाहिए- पिछले दस सालों में करीब ५०० टेस्ट मैच, १५०० एकदिवसीय और ५०० टी-२० मैच हुए हैं। पिछले ५ सालों में, जब से आईपीएल और अन्य टी-२० के लीग शुरू हुए हैं, सिर्फ २०० टेस्ट मैच, ६५० एकदिवसीय और करीब ३०० टी-२० खेल हुए हैं। टेस्ट क्रिकेट अब शनैः शनैः अवसान की ओर है।

टी-२० के आक्रामक और सकारात्मक खेल के कारण पुराने धारणाओं के विपरीत हर तरह के क्रिकेट के स्तर मे काफी इज़ाफ़ा ही हुआ है। यह एक विवाद का विषय है कि क्या आज के युग के क्रिकेटर - ख़ास कर बल्लेबाजों - में धैर्य की कमी आ गयी है, जिसके कारण अब किसी कठिन परिस्थिति में पहले की तरह बल्लेबाजों में जुझारूपन नही दीखता है।

ऐसा सम्भव है, क्योंकि बहुत ज्यादा एकदिवसीय और टी-२०, जहाँ "करो या मरो" के कारण वे बहुत तेज़ी से खेलना चाहते हैं - नतीज़ा यह है कि आजकल ज्यादातर टेस्ट मैच के परिणाम निकलते हैं। और ५ दिनों के जगह टेस्ट मैच अब ३-४ दिनों में ही ख़त्म हो जाते है - कहाँ गया वह मुदस्सर नज़र जैसे रक्षात्मक बल्लेबाजी का प्रदर्शन जब उसने ५५७ मिनटों में १०० रन बनाये थे! 

मगर अब टेस्ट मैचों में जितने शतक, दोहरे और तिहरे शतक लगते हैं, जितने चौके और छक्के लगते हैं, शायद वह वापस लोगों को टेस्ट मैच के तरफ आकर्षित कर पायेंगे!

आज के बल्लेबाजों को रन बनाने के लिए जिस स्तर के गेंदबाज और पहले के जमाने के कल्पनातीत चुस्त क्षेत्ररक्षण का सामना करना पड़ रहा है, वैसे स्तर के क्रिकेट में शायद पुराने खिलाडियों को अपने सारे "महान" रिकार्ड्स के आधे बनाने के लिए भी काफी पसीना चुआना पड़ता। 

पर इतिहास अपने हिस्से का मेहनत करके सोया हुआ है, इस लिए उनके उपलब्धियों को, इस सांत्वना के साथ कि उनके युग में भी जो बेहतरीन खिलाड़ी थे उनके बीच वे सारे कीर्तिमान बने हैं, तो उनको भी सलाम! साथ ही इस बात का उनको धन्यवाद देना होगा कि उन्हीं के प्रदर्शन के कंधे पर सवार होकर क्रिेकट आज के इस दौर में आ पाया है।

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