Dec 31, 2015

आगमन २०१६ का

हमारे जीवन के कितने रंग हैं  - कितने सारी कड़ियाँ और कितने सारे अनसुलझे सी गुत्थियां- पर इन सब के बीच, समय अपना चक्र चलाता रहता है - हर घड़ी एक नयी चुनौती, नया अवसर, नया अनुभव।

जब बीते सालों का अवलोकन करता हूँ, तो पाता हूँ कि हर नए साल की शुरुआत - एक मील के पत्थर के सामान होता है - जब बीते साल और साथ में कई बार पूरे अतीत के बारे में सोच कर, मन में अपने भूले-बिसरे क्षणों के साथ-साथ उनसे जुड़े कई सारे यादों के विचार आते हैं।

बचपन में दीवार पर कैलेंडर टंगे होते थे, और हर महीने के पेज को बदलते हुए, साल के अंत में कैलेंडर को ही बदल दिया जाता था। अब समय का दौर बदल गया, और अब बदलाव के तरीके भी बदल गए - अब तो कैलेंडर होता ही नहीं है, बल्कि उसके जगह सब कुछ डिजिटल हो गया है। जीवन का एक झंझट तो कम हो गया है, पर साथ ही साथ, हमारे समक्ष सदैव कुछ नयी चुनौतियाँ, अपने नए रूप में आ जाते हैं। जीवन की ऐसी ही उलझनें, हमें अपने जमीन, अपने वजूद और अपने वास्तविकता से जोड़े रखते हैं। कल्पना और यथार्थ के बीच, प्रयास के तार जुड़े हुए हैं, और उपलब्धियाँ, उनका प्रतिफल है।

कई बार वांछित फल न पाकर मन बहुत दुखी हो जाता है या जीवन में कुछ कटुता सी आ जाती हैं। मैंने कहीं पढ़ा या किसी से सुना था -"Life is unfair" - इस वाक्य को दो रूप से समझना चाहिए - Life is unfair अथवा Life is not fair? दोनों में अंतर है, काफी अंतर है। और, अगर इस कथन में, समय के दौर और अंतराल को भी जोड़ दिया जाए, तो सर्वथा ज्यादा स्पष्टता आ जाएगी। पहला का अभिप्राय है कि जीवन छली है, तो दूसरा का अर्थ यह निकलता है कि जीवन यथोचित नहीं करता। मेरा मानना है की प्रतिबिम्ब को देख कर आकृति का अनुमान लगाना गलत है। जीवन हमेशा सबके मूल तत्व सा है, इसके बिना हमारा कोई अस्तित्व ही नहीं है - तो फिर यह कभी भी किसी के लिए अन्यायी नहीं हो सकता है।  समय के दौर में अच्छे और बुरे परिणाम का न्याय सा हो जाता है और समय आने पर ही पता चलता है कि अनेकों अथक प्रयास के बाद भी जिस वांछित फल की मनोकामना की गयी थी, उसके नहीं मिलने का अंततः परिणाम स्वरुप क्या हुआ? कई बार असफलता के जड़ से ही भविष्य के सफलता के वृक्ष का सृजन होता है!

जीवन सबों के लिए एकसमान नहीं होता - एक जैसे प्रयास के फलस्वरूप, कभी किसी को अधिकतम तो किसी को न्यूनतम देता है। पर साथ ही अनुभव कहता है कि समय के लम्बे दौर में कई बार जीवन के खोये -पाये का योग सब कुछ बराबर कर देता है। और निष्ठापूर्वक किये प्रयास के बाद जो हासिल होता है, उसे जब दूसरों के साथ तुलना कर के देखते हैं, तब ही अच्छे और खराब का बोध होता है। इसलिए जीवन में काफी कटु अनुभवों, और उनसे उपजे मानसिक क्लेश के बाद, मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि जीवन को अपने दृष्टिकोण से ही देखना चाहिए,न कि तुलनात्मक रूप से।

सर्वप्रथम, यह समझ में आया कि जीवन को जितना सरल बनाया जाए, और अपने प्रयास को सिर्फ यथोचित प्राप्ति के लिए ही सीमित किया जाए, तो काफी कुछ यूँ ही सरल हो जाते हैं। अपने अतीत का पुनरावलोकन करने से, इस बात का भी बोध हुआ कि कई सारे वांछित फल सरलता पूर्वक मिल गए, तो कई के लिए अथक प्रयास करनी पड़ी। और, कई ऐसे भी हैं, जिसके पास तक भी नहीं पहुँच पाया- पर प्रयास जारी है। परन्तु अपने जीवन में अनेक सारे अपूरित वांछित फलों में से - कई ऐसे हैं जो एक समय बहुत ही आवश्यक से लगते थे या जिनकी बहुत चाहत सी थी - परन्तु, अचानक समय के दौर में वे सूक्ष्म से सूक्ष्मतर और कई तो दृष्टिगोचर होते चले गए। अर्थात, प्रबल इच्छा होना - उसके आवश्यक होने का द्योतक कतई नहीं है!

मुझे यह बात समझाने वाला कोई नहीं था कि - जीवन के सुख और सर्वांगीण प्रसन्नता के लिए किन उपलब्धियों की और कब किन सुविधाओं की आवश्यकता है? इस बात को काफी देर से समझ पाया कि जीवन की असली खुशी उसके अपने ही रूप में है। स्वतः रूप से जीवन की आवश्यकताओं को अपने प्रयास से प्राप्त कर के प्रसन्न रहना - एक कला है, जिसकी प्रशिक्षण दी जानी चाहिए - इस से जीवन के हर पहलू के साथ बराबर का न्याय हो पता है, न कि एक संकीर्ण अंधाधुंध दौड़!

हर कथित उपलब्धियों के लिए प्रयासरत हो जाने के अंधाधुंध दौड़ में कई मानसिक दुःख और क्लेश को अनुभव करने के बाद यह समझ पाया कि - मैंने कभी स्वावलोकन किया ही नहीं था कि - "आखिर, मुझे क्या चाहिए था?"  प्रयास की अपनी प्रतिबंधतायें हैं - और सब कुछ हासिल नहीं किया जा सकता - और गौर से देखने और समझने पर, यह भी समझ में आया कि शायद उनकी आवश्यकता भी नहीं हैं।

आज कई सालों बाद, साल के अंतिम दिन, कुछ एकांत के क्षण मिले हैं। मैंने सोचा कि अपने मन के उदगार को व्यक्त कर दूँ। जीवन अपने पूरी मस्ती में है - खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ काफी संतुष्ट सा हूँ। गुजरे साल भी बहुत अच्छे और समृद्ध अनुभवों को अपने दामन में सिमटे से हैं, और आने वाले नये साल से भी ऐसी ही उम्मीद है कि संतोषप्रद रहेगा। अच्छा और ख़राब, तो मन के भाव ही हैं- अस्तित्व का उल्लास मानना चाहिए!

इन्हीं शब्दों के साथ, सबों को नूतन वर्ष २०१६ के अनेकानेक शुभकामनाये!

Dec 30, 2015

जादू के खेल का वृतांत

मदारीवाला अपने मुख्य कार्यक्रम की ओर बढ़ता था। ठीक-ठाक भीड़ जमा हो चुकी होती थी और अचानक से, मदारीवाला दर्शक-दीर्घा में से किसी एक ऐसे इंसान को बुला लेता था, जो अगले १५-२० मिनटों तक उसके हर प्रश्नों के जवाब देते हुए जादू के प्रक्रिया का हिस्सा सा बन जाता था। साथ ही साथ, मदारीवाला दर्शकों में से चुने गए अपने "सहायक" से कुछ ऐसे प्रश्न करता था, और उन प्रश्नों में उसे कुछ ऐसा उलझा देता था कि लोगों को बरबस हंसी आने लग जाती थी।
मदारी वाला बाते करते-करते, लोगो के घेरे में बीच में बिछे चादर को ठीक तरीके से फैला कर रखते हुए, साथ में डमरू को बजाता और बोलता-
मेहरबान! कदरदान!! साहेबान!!!
हिन्दू को राम राम, मुसलमान को सलाम!
अभी आपके सामने जादू का खेल होगा!
साहेबान, बहुत मेहनत का काम है भूत का सामना, एक चूक और बस जान से हाथ धो लेना पड़ता है......मगर मेहरबान, पापी पेट का सवाल है, सब कुछ करेगा!
मेरे मालिक, फिर भी कर के दिखायेगा, जान की परवाह नहीं करेगा, सभी को दिखायेगा!
ये बच्चा, जी हाँ, इस बच्चे को भेजेगा, उस नीम के पेड़ के ऊपर भेजेगा,बच्चा जायेगा, नीम के पेड़ वाले प्रेत आत्मा के पास जायेगा, अपनी जान पर खेल के जायेगा....और उधर छोड़ के आएगा भूत को...
साहेबान, आपके सामने, ये गायब हो जाएगा.....और्रर्र .. मेहरबान, कदरदान, साहेबान, ये पहुंचा देगा, उसको अपने घर, वो उद्धर्रर्र ..ये जाएगा, आपके सामने से जाएगा, जान पे खेल के जाएगा और उसको अपने घर पहुंचा के आएगा!
इस लम्बे चलने वाले प्रवचनात्मक एवं डरावनी बातों के सिलसिले के बीच, जिस बच्चे के उपर भूत आने की बात हो रही होती थी, वह छोटा बच्चा चीख-चीख कर जवाब देता हुआ, थाली पर चम्मच्च को ठोकते हुए - जादूगर के बातों और उसके डमरू के साथ ताल मिला रहा होता था।

मदारीवाला भले ही बार-बार अपने साथ के बच्चे के ऊपर भूत के प्रकोप और उस से हो रही परेशानियों के बारे बता रहा हो, पर उन बातों से बेफिक्र सा, छोटा-बच्चा पूरे विश्वास के साथ काफी सहज होकर अपनी "जान की बाज़ी" लगाने की तैयारी में लगा होता था।

इधर समां बंधता जा रहा होता था, और उधर मदारीवाला तन्मयता से बीच-बीच में डमरू को बजा कर जोर जोर से - "ड्रीम, ड्रीम" की आवाज़ निकालते हुए, और अंत में एक बार डमरू को, कंधे के ऊपर से कमर के नीचे तक के एक घुमाव में लिए झटके के साथ जोर की  "...ड्राम" की आवाज़ निकालते हुए, लगभग चीखते हुए कहता -
हा-ई-एह, वाह रे वाह, शाब्बाश मेरे शेर!
सभी साहेबन को तमाशा दिखायेगा?
सबों को जान पर लड़ कर दिखायेगा?
अपनी जान पे खेल के उस के पास जाएगा?
इन सभी प्रश्नवाचक चीखों को बिना कुछ सुने या समझे हुए- जिसकी कोई गुंजाइश भी नहीं होती थी- छोटा बच्चा भी चीख-चीख कर सकारात्मक प्रत्युत्तर देकर, अपना हिस्सा पूरा कर रहा होता था - और हर बार "करेगा", "दिखायेगा", "जाएगा" -आदि में से किसी एक को चुन कर बोल डालता था। फिर सहानुभूति प्राप्त करने के हिसाब से मदारी बोलता था-
देखिये साहब, आप सभी इत्मीनान से देखिये!
आप इस तमाशा को देखिये....
ये बच्चा जान पर खेलेगा....
ये आपका दिल बहलाएगा....
साहेबान, आपको पसंद आ जाए तो इस गरीब के चादर पर चार आना,आठ आना देते जाइयेगा....
आपके घर में भी ऐसे ही बच्चे होंगे, ऊपरवाला आपके बच्चों को सलामत रखेगा!
फिर माहौल को और रोचक बनाते हुए -
तो बेटा, खेल के लिए तैयार है?
छोटा बच्चा लगभग आग में कूदने वाले अंदाज़ में -
ज--य्य खल्ल-बली, तैयार है, करके दिखायेगा!
मदारीवाला जोश को और बढ़ाते हुए और दर्शक दीर्घा की ओर घूम कर देखते हुए -
मेहरबान, कदरदान, साहेबान, मेरे मालिक, इस्स्स बच्चे का हौसलाफज़ाई कर दीजिये, एक बार जोर से ताली बजा दीजिये..!
लोग बड़े जोश में ताली बजाते और फिर मदारीवाला वापस बच्चे से -
तो चल आ जा बेटा, इधर आ के लेट जा बेटा!
दर्शक दीर्घा के घेरे के बीच में बिछाए चादर पर बच्चा लेट जाता। उसके लेटने के बाद बहुत सारे चादर से उसे ढंकते हुए - डुगडुगी और बांसुरी के सुर-ताल के साथ, मदारीवाला एक बेंत से बने चौकोर आकार के टेंट से बने कवर से बच्चे को ढँक देता था। कुछ और वार्तालाप होता रहता था, जिसमे बच्चे के भूत के प्रकोप और भूत के द्वारा कुछ "प्रेतात्मक" बातों  का सिलसिला का जिक्र होता था।

अंततः, उस टेंट से बने कवर के ऊपर भी कई चादरों को डाल कर, उसे भी ढंकना शुरू कर दिया जाता था। फिर थोड़ी देर घूमते-फिरते उस दर्शकों में से निकाले गए "सहायक" व्यक्ति के करीब आ कर -
भाई, ये बताइये कि मरा हुआ इंसान का कपड़ा छूना अच्छा बात है, क्या?
अनजाने में मदारीवाले के जादू के सहायक के रूप में फंस चुका इंसान, कुछ झुंझलाते हुए -
हम्म...नहीं
मदारीवाला पहले उसकी बात का समर्थन पर उस से बाकी को और डराते हुए -
ये बात तो ठीक बोला है, बिलकुल सही बोला है मेरे भाई ने......
पर साहेबान, एक बात याद रखना, छूने में कोई खराबी नहीं है,
ऐ मेरे मालिक, ऐ मेरे मौला, ऐ मेरे जहाँपनाह, मुर्दा भी कभी ज़िंदा था!
ज़िंदा आदमी ही तो कपड़ा पहनता है और जिन्दा आदमी ही मरता है!
फिर मदारीवाला हँसते हुए, सबों की ओर देखते हुए, पूछता-
साहेबान, ये बताना कि जिन्दा आदमी ही मरता है न?
फिर थोड़े देर के बाद, अचानक से कुछ दार्शनिक सी बातें करता हुआ  -
कल तो गज़ब हो गया भाई, एक ज़िंदा आदमी मर गया!
लोग उसकी बातों को सुनकर हँसते भी थे और कभी-कभी कुछ ऐसे बातों में, जिनमे जीवन का कड़वा सत्य होता था, उनमें उसके व्यक्तित्व के गहराइयों को भी भांपते हुए, बिलकुल खेल में निमग्नित से हो जाते थे। इसके बाद मदारीवाला उस साथ वाले छोटे बच्चे की और इशारा करते हुए-
और मेरे दोस्तों, यह बच्चा आजकल बहुत बीमार रहता है....
क्योंकि इसने एक मुर्दे का कपडा पहन लिया था.....
मगर अभी इसका इलाज़ होगा, ये बच्चा जाएगा!
उस प्रेत के पास जाएगा, उससे माफी मांग कर आएगा....
फिर बच्चे से पूछते हुए-
बेटा, भूत के पास जाने को तैयार है?
अंदर लेटे हुए बच्चे की आवाज़ -
जय खलबली, तैयार है, उस्ताद, जाएगा!
फिर कुछ देर तक, बच्चे और उस व्यक्ति के साथ सवाल-जवाब के माध्यम से कुछ हंसी मजाक का सिलसिला चलता रहता था - बांसुरी और डुगडुगी को बजा कर मनोरंजन के अनवरत बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ। बीच-बीच में, दर्शक से बुलाये व्यक्ति के ऊपर, कुछ ऐसे सवाल-जवाब का सिलसिला सा चलता रहता था कि उस व्यक्ति का खुद का दिया जवाब ही लोगों में हंसी, खिलखिलाहट और उस व्यक्ति के अंदर - थोड़ी सी झुंझलाहट भी पैदा कर देता था। फिर मदारीवाला उस से एक बड़े से चादर के निरीक्षण करने का आग्रह करता-
अय-ये खोपड़ी, इस चादर को जरा ठीक से देख लो भाई, इसमें कही कोई सांप या जानवर या कुछ है?
व्यक्ति के कुछ कहने से पहले वह उस चादर को उस लेते हुए बच्चे के ऊपर डालने को कहता और बीच के जिससे को ऊपर उठाये पकडे रहने का आग्रह करता-
जब तक मैं न बोलूं, पकडे रहना, छोड़ना नहीं, वरना बहुत गड़बड़ हो जाएगा!
और इसके बाद फिर से बांसुरी के साथ-साथ डुगडुगी बजता रहता था और इन सब के बीच, वह बच्चा कुछ अनाप-शनाप सा बोलते हुए, वास्तव में ऐसा लगने लगता था मानो वह किसी प्रेत के आत्मा के चंगुल में हो। चीख-चिल्लाहट, डराने वाले और वीभत्स संवादों का अजब समागम सा होता था - ऐसे नाटकीय अभिनय से वहां पर जो समां बंध जाता था - उसके लिए मेरी तरफ से, हरेक मदरीवाले के सहायक बच्चों को - सर्वोत्तम बाल कलाकार के अभिनय का पुरस्कार अवश्य मिलना चाहिए! डमरू को बजाते हुए और साथ में एक हाथ से बांसुरी को बजाते हुए, अचानक से रुक जाता और फिर लगभग चीखते हुए -
ऐ-ये-ए, खड़ंगा बाबा, निकाल दे इसके भूत को..... 
और अचानक से चौकोर से बने उस टेंट से संरचना के बीचो-बीच, जिसके अंदर बच्चा लेटा होता था, वहां हाथ से पकड़ा चादर का हिस्सा छूट कर गिर जाता, जिसके कारण वहां पर बिलकुल खाली होने का एहसास होता!

मतलब अंदर लेटा बच्चा गायब!

फिर थोड़ी देर तक तो ऐसा लगता मानो वास्तव में सामने के नीम या किसी और पेड़ के ऊपर बच्चा किसी प्रेत से मिलने चला गया हो! जादू का असर सर चढ़ कर बोल रहा होता था- सभी हैरान से होते थे कि आखिर बच्चा गया तो कहाँ गया?

बहुत देर तक संशय की स्थिति बनी रहती थी। फिर मदारीवाला भीड़ से बुलाये हुए "सहायक" को अपने पास बुलाता था, और फिर उस टेंट के ऊपर के चादर के अंदर अपने और उसके सर को घुसा कर, अंदर का माज़रा दिखाता था - मुझे पता नहीं कि अंदर क्या दीखता था पर, कुछ ऐसी बात होती थी जिस से एहसास होता था कि बच्चा वापस आ गया है। फिर और भी कुछ नाटक वगैरह सा होता था, और अंत में बच्चा वापस हँसता-खेलता बाहर आ जाता था।

विश्वास और अविश्वास के झूला में डगमगाते जैसे माहौल में, कई बार मुझे लगता था कि इसे जादू मानूं या न मानूं, पर अगले ही क्षण, नाटकीय ही सही, पर ऐसा प्रतीत होता था मानो सामने सब कुछ यथार्थ में ही हो रहा हो।

इस तरह के अनेकों क्षण को मैंने अत्यधिक चाव से देखा है, जिया है और आज तक अपने अंदर संजो के रखा है! 

घर से स्कूल के बीच - जादू का खेल

बचपन में स्कूल दो शिफ्ट्स में चलते थे - एक महीना हम सुबह ७ बजे से ११:३० तक वाले शिफ्ट में आते थे और अगले महीने १२ से ४:३० शाम तक वाले में।  इस तरह से स्कूल से लौटते समय या जाते समय अक्सर बाजार के आस पास किसी न किसी तरह के गतिविधियों को देखने का मौका मिल जाया करता था।

बचपन में अनेकों बार मदारी के रस्सी पर चलने के करतब या संपेरों, और भालू-बन्दर को नचाने वाले के खेल को देख चुका था, इस कारण से इस तरह के खेल में मेरे लिए कोई नयापन नहीं बचा था। ज्यादातर समय इस तरह के खेल को बिना देखे, मैं स्कूल की ओर चला जाता था। पर इन सबों के बीच, एक मदारी वाले का - जादू का खेल होता था - जिसे मैं बचपन से अनेकों बार देख चुका था। इसके बाद भी, उसे फिर से देखने में मेरी दिलचस्पी बरकरार सी थी।

कारण अनेकों हो सकते थे - पर सबसे महत्वपूर्ण था - जादू के पीछे के राज़ को जानने की इच्छा। इतना तो पता हो ही चुका था कि जो सामने होते दीखता था, वह वास्तविक तो कतई नहीं था। फलस्वरूप, हर बार इस उम्मीद से उन मैजिक के ट्रिक्स से चकमा खाते रहते थे कि कोई सुराग तो मिले और जान पाये कि आखिर मैजिक ट्रिक का राज़ क्या था?

इस सिलसिले में याद आता है कि जरा सा बड़े हो जाने के बाद, अपने बचपन के मित्रो के साथ पैसे इकट्ठे करके हमने एक जादू के रहस्योद्घाटन करने वाली किताब खरीदी थी। अंततः, हम बहुत सारे जादू के रहस्य को समझ पाने में सफल हो गये थे। जादू के पीछे छुपे राज को जान लेने के बाद, जादू दिखाने वाले मदारी के खेल में, अब वो पहले वाली बात नहीं रह गयी थी।


अब हमारे लिए मदारीवाले का जादू का खेल, कोई इतना आकर्षक खेल नहीं रह गया था कि मैं इसके लिए रुक जाऊं - अलबत्ता कुछ अनसुलझे से रहस्य अब भी थे। पर यह भरोसा ही चुका था कि हर ऐसे खेल जिनका रहस्य अब तक नहीं जान पाये थे , उनके पीछे भी कुछ वैसा ही ट्रिक होगा जैसा बाकी के बाए में हम जानने लगे थे। और, इसीलिए अक्सर हम इनके चल रहे खेल को अनदेखा करते आगे निकल जाते थे।

इस तरह के जादू के खेल में मदारी जादूगर के साथ, कोई हमारे उम्र का ही छोटा-सा बच्चा भी हुआ करता था। खेल के शुरुआत में, मदारीवाला के सहायक के रूप में छोटा बच्चा काफी व्यस्त रहा करता था। मदारीवाला लोगों से बातों का सिलसिला बनाये गोल-गोल घूमता रहता था - जिस से लोगों के भीड़ को गोलाकार घेरे में फैला सके।

इधर उसका सहायक, भीड़ के बीचो-बीच चादर या दरी बिछाता रहता था। फिर उसके ऊपर, गंदे मटमैले ही चुके अनेको प्रकार के झोले या बोरे में से विभिन्न तरह के - जादू के दिखने लायक - हड्डियाँ और एक मानव खोपड़ी, कुछ लकड़ी के विचित्र आकृति वाले टुकड़े, बगुले के गर्दन जैसा एक टोंटी लगा लोटा, और भी इसी तरह के अन्य कई समानों को फैलाने में मदद करता दिख जाया करता था। इसके आलावा, कभी डमरू बजाने में, या जादूगर के द्वारा भीड़ को व्यस्त रखने के उद्देश्य से पूछे गए अनेक प्रकार के अनर्गल प्रश्नों के सवाल-जवाब में भी सक्रिय रहता था।

पूरे खेल के दौरान मदारीवाला और उसके साथ का बच्चा, हंसी-मजाक के माहौल बना कर लोगो का मनोरंजन भी करता रहता था। उनकी बातें जन-साधारण के लिए इतनी रोचक होती थी कि बाजार जैसे व्यस्त जगह में भी लोग रुक कर उन्हें देखने और बरबस हंसने के लिए विवश हो जाते थे! मेरे मन में यह कौतूहल होता था कि उन प्रश्नों का वैसा ही सटीक और चुभता सा उत्तर देने की कला को विकसित करने में, उन दोनों के बीच किस तरह का तालमेल और अभ्यास की आवशयकता पडी होगी?

सहायक बच्चा कम उम्र का होकर भी अपने व्यक्तित्व से वयोवृद्ध सा होता था। उस से किये बहुत सारे प्रश्न का प्रत्युत्तर, छूटते ही मिलता था - जिस से साफ़ पता चलता था कि वे सारे प्रश्न और उत्तर - काफी अच्छे ढंग से रिहर्सल किये हुए और लगभग रटे-रटाये से थे। फिर भी, "बनावटी मासूमियत" से बहुत ही सधा सा दिया हुआ जवाब, अप्राकृतिक लगने के बावजूद, रोचक सा ही लगता था। साथ ही उसके द्वारा कृत्रिम रूप से किया गया बातचीत का मकसद होता था कि वह प्रश्नो से बिलकुल अनभिज्ञ सा लगे, और जैसा दीखता था वैसा ही - मतलब, बच्चे जैसा ही लगे।

खेल के शुरुआत में, अनेकों प्रकार के छोटे-मोटे हाथ के सफाई वाले कारनामे होते रहते थे। और भीड़ को इकठ्ठा करने के प्रतीक्षा के दौरान जमा हो चुके भीेड़ का मनोरंजन कुछ ऐसे छोटे मोटे ट्रिक्स से होता जैसे - एक सिक्के को दो सिक्का बना देना या लकड़ी को झोले में डाल कर उस लकड़ी को सांप बना देना, और इसी तरह के अन्य करतबें। उस दौरान करतबों और कहकहों का सिलसिला चालू रहता था।

इस सिलसिले में जादूगर उस बच्चे से जुड़े कोई मनगढंत सी कहानी का जिक्र शुरू कर देता था - जिसमें बच्चे को भूत के आतंक से हो रही परेशानियों का जिक्र होता था। फिर, अंत में बच्चे के अंदर घुस चुके भूत से, उसे छुटकारा दिलाने का वादा होता था, जिसमें इन्द्र्जाली तिलिस्म का निहायत ही जरूरत होता था।

मदारी का खेल, इन सब के जिन्दा मिसाल पेश करने जैसा ही कुछ होता था। और, इस पूरे कार्यक्रम का पटाक्षेप होता था, ताबीज़ इत्यादि जैसे कुछ बेचने से या प्रसन्नता-पूर्वक लोगों के दिए कुछ पारिश्रमिक से। भीड़ में से आधे लोग तो यूँ ही आतंकित से होते थे, और जो नहीं होते थे, वे खेल के दौरान दिखाए द्रष्टव्य से, अपने बचे-खुचे भरोसे पर पुनर्विचार करते हुए यथोचित कर लेते थे।

सारांश में, मदारी वाले के खेल का पूरा मसौदा यही होता था। संभवतः उन दिनों के दिखाए मदारी वालों के खेल की इतनी सी पटकथा भी, आज के किसी हिंदी फिल्म से, ज्यादा हुआ करता था। आज के हिंदी फिल्म का मकसद भी लगभग यही होता है, जो उन मदारीवालों का होता था - अर्थात भीड़ जमा करके, लोगो को कुछ देर व्यस्त करने का प्रयास और अंततः पैसे इकट्ठा करना।

ये अलग बात है कि फिल्मवाले पहले ही पैसे ले लेते हैं, और फिर ३ लाइन के कहानी को समूचे ३ घंटे के सिरदर्द कहानी बनाकर खींचते हैं। परन्तु, मदारीवालों के खेलों को कई बार देखने के बाद भी, वे आज के सिरदर्द फिल्मों से ज्यादा रोचक से लगते थे। वैसे भी लोग, मदारीवालों के खेल को देखने के बाद, अपने श्रद्धा भक्ति से पैसे देते थे, न कि खेल देखने के लिए!

उन दिनों के मदारीवाले के खेल को, आज के सन्दर्भ में देखना, बहुत ही अजीब सा लगता है। अब कहाँ मदरीवाले, कहाँ लोगों में इन मदारीवाले और उसके खेल को देखने में दिलचस्पी रही, कहाँ वो फुर्सत में घूमते लोग - जो सब्जी खरीदने के लिए टहलते हुए बाजार जाते थे। अब तो इस भाग दौड़ की ज़िंदगी में - मदारीवाले और उनके सभी हैरतअंगेज खेलों का सिलसिला - वक़्त के किसी पृष्ठ में दर्ज़ होकर संग्रहालय में रखे जाने योग्य से हो गए हैं।

परन्तु आज भी जब किसी अच्छे वक्ता को किसी कॉन्फ्रेंस या सेमीनार में आकर्षक, मनोरंजक और रोचक ढंग से बोलते देखता हूँ. बरबस उन मदारीवाले की याद आ जाती है। "पब्लिक स्पीकिंग" और "कनेक्टिंग विथ पीपल" का जीता जागता और बहुत ही प्रखर प्रमाण के रूप में, वे मदारीवाले हमेशा याद आते रहेंगे!

Dec 28, 2015

घर से स्कूल के बीच की 'पढाई'

बचपन में स्कूल आने और जाने के दौरान, मुझे रास्ते के अगल-बगल, सड़क के किनारे होते गतिविधियों को करीब से देखने का बहुत शौक होता था। उन दिनों घर से स्कूल जाने के लिए, मुझे कदमा बाजार के आस-पास से गुज़रना पड़ता था। कदमा बाजार का माहौल, किसी गांव के हाट के परिष्कृत रूप में ही समझना चाहिए।

बदले दौर का कदमा बाज़ार - सिर्फ दूकान ही दुकानें!
बाज़ार के अंदर, टिन की छत वाले - स्थाई और अस्थाई के बीच झूलते से- कई सारे दुकान बिखरे पड़े थे। बाजार के अंदर, अनेको प्रकार के दूकान थे, पर बहुत कम संख्या में ही सीमेंट और ईंट के बने पक्के दुकान थे। ऐसा ज्ञात होता था कि शुरू के बने कुछ स्थाई दुकानों के इर्द गिर्द, कई सारे दूकान जुड़ते चले गए होंगे - और कुल मिला कर, बाज़ार बहुत ही घनी और भीड़ भरा, मेले के जैसा शकल ले लिया था।

उन स्थाई दूकानों के बीचो-बीच बहुत बड़ा सा सब्जी-बाजार था। बिलकुल गाँव के हाट की तरह - जमीन पर बिछे हुए, बहुत सारे दूकान, ग्रामीण सा माहौल बना देता था। मेन-रोड और बाज़ार के बीच का जगह - अमूमन खाली ही होता था। कई साल तक सड़क के दोनों ओर के फुटपाथ, वास्तव में लोगों के चलने के लिए ही हुआ करता था। इस वजह से, जैसा उम्मीद किया जाना चाहिए, वे खाली ही हुआ करते थे, बल्कि रोड के दूसरी ओर लाइन से बहुत सारे घर भी होते थे।

कालांतर में, उस रोड और बाजार के बीचे के खाली भाग में इक्का दुक्का करते हुए - बहुत सारे सब्जी बेचने वालों ने, जमीन पर सब्जियों का ढेर लगाकर सब्जी मंडी के जाल सा बनाना शुरू कर दिया। फिर जैसा भारत के किसी भी खाली जगह का हश्र होता है- बाजार के पास वाले  सड़क के दोनों ओर के फुटपाथ में भी किसी अमरबेल की तरह से, सब्जियों का टीला सा लगने लगा। जिस तरह से पंक्तिबद्ध होकर खेतों में सब्जियों के ढेर उगते थे, उसी प्रकार से वे बिकने के लिए भी कतारबद्ध से फ़ैले होते थे।

परन्तु मेरे बड़े होने तक, यानि जब तक मैं स्कूल जाता था, सड़क और बाज़ार के बीच के भाग ज्यादातर खाली सा ही रहता था। आये दिन वहां किसी ताबीज़, हकीम-जड़ी-बूटी और इसी तरह के दवा बेचने वालों का, टेंट-नुमा सा दूकान लगता रहता था। एक बार ऐसे दूकान के स्थापित होने के बाद, वे कुछ हफ्ते से लेकर महीने भर, उसी जगह पर जमे से रहते थे।

जब कभी बाजार का कोई जगह खाली रहता था, वहां मदारी के जादू -खेल के साथ-साथ, सांप-बिच्छू, बन्दर - भालू के नाच आदि जैसे खेल भी होते रहते थे - जो आई पी एल क्रिकेट के "टी -२०" के तर्ज़ पर थोड़े देर के लिए चलता और फिर कहीं और आगे के लिए निकल जाता।

मेरी स्कूल के पढाई-लिखाई में, ज्यादा दिलचस्पी नहीं होती थी। स्कूल से आने-जाने के क्रम में, इस तरह के रोचक कार्यक्रमों को देखने से मन बहल जाता था। मेरी खोजी नज़रें और सालों का अनुभव, हमेशा इस तरह के होने वाले गतिविधियों के तलाश मे रहती थीं।

इन खेलों को देखने का अद्भुत आनंद था और आज जब अपने अतीत में डुबकी लगाता हूँ,  इन सब के बिना, वे दिन अधूरे से दीखते हैं! बोनस के तौर पर, अनेकों प्रकार के नयी जानकारी भी मिलते रहते थे - जैसे नीम के पेड़ पर भूत होता है, या दोमुंहा सांप छह महीने एक तरफ के मुंह को इस्तेमाल करता है फिर बाकी समय दूसरे वाले को, या नाना प्रकार के "ताकतों" के दास्ताँ इत्यादि ।

और भी कई सारे इसी तरह के ज्ञानवर्धक बातें, जिनका स्कूल के किताबों में कभी कोई जानकारी नहीं मिल पाता था, वे सभी वहां बाजार में चल रहे किसी मदारीवाले या अन्य विजिटिंग प्रोफ़ेसर के "कक्षा" में मिल जाया करता था । अनेकों बार स्कूल जाते समय, किसी ऐसे ही मज़मे को देखने के चक्कर में, मैं लेट से स्कूल पहुंचा होऊंगा, जिसके कारण क्लास-टीचर से सजा भी भुगता होऊंगा!

आज के टीवी में जिस तरह से लोग चैनल बदलते हैं, उसी प्रकार से उन दिनों बाजार के पास के उन खाली हिस्सों में, हमेशा कुछ न कुछ पसंदीदा सा प्रोग्राम होता ही रहता था - मर्जी थी कि देखूं या कहीं आगे बढ़ता चला जाऊँ। कभी जड़ी-बूटी के बारे में, कभी जादू का खेल, तो कभी किसी दीवाल पर बनते किसी इश्तहार की पेंटिंग को देखने का सिलसिला!

हमारे उन दिनों के लाइव टेलीकास्ट के चैनल लाइनअप में समय-समय पर मनोरंजन के लिए, इस तरह के अनेक सारे गतिविधियाँ, निःशुल्क उपलब्ध होते रहते थे। आज जब कभी ठन्डे दिमाग से बैठ कर, उन अतीत के दिनों में खो जाता हूँ, तो हर वैसे अनुभव के क्षण - बिलकुल आँखों के सामने तैरने से लग जाते हैं।

आज यादों के उस जखीरे में से, कुछेक मुख्य विकर्षणों को - जो मुझे स्कूल और पढाई से दूर करने में प्रबल सक्षम से थे - उनको याद करने का प्रयास कर रहा हूँ। ये यादें ऐसी हैं जो मेरे मानस-पटल पर काफी गहरे रेखांकन कर गए हैं।

आगे मैं कभी उन सारे तमाशबीनों का ज़िक्र करूँगा - मैं काफी गहराई से उनके हर एक गतिविधियों को देखा करता था, और किसी वीडियो कैमरा के न होने के बावजूद, हरेक दृश्य आज भी मुझे उसी ताज़गी के साथ याद हैं! कई बार तो लगता है कि मैं अब भी उन सभी दृश्यों को अपने आँखों के आगे घटित होता देख रहा हूँ!

Dec 20, 2015

संस्मरण: बचपन, कार और उसके सफर के पहले

बचपन के दिन, साधनों और सुविधाओं के अभावों में जितना गरीब सा होता था, आज उन दिनों के यादों के भरमार से, वे उतने ही अमीर से लगते हैं! जीवन के खेत में, बचपन के खेती करने के बाद, अनाज के अनेकों गठरियों की तरह, यादों के ढेर सारे गठरियाँ, गुजरे वक़्त के -मज़बूत गांठो से बंधा पड़ा है। जब कभी अतीत में खो जाता हूँ- ऐसा लगता है मानो उन यादों की कोई एक गठरी, स्वतः खुलता सा चला जाता है, और फिर मैं घंटों उसी में गोते लगाता रहता हूँ।

अब जब हम पीछे मुड़ कर देखते हैं, तो याद आता है हमारा बचपन और उस वक़्त की जीवनशैली, जो बहुत सरल सा होता था। बचपन के दिन, बहुत ही प्यारे दिन होते थे। पहाड़ी नदी की तरह, हर चिंता से मुक्त - उछलती, कूदती, बलखाती और निरंतर प्रवाहित - तितली की तरह, इस फूल से, उस उपवन तक का सफर! बचपन से, बड़े होने की प्रक्रिया, जीवन में जटिलता अवश्य लाई है, परन्तु उन दिनों के यादें - जब हमने सीमितताओं में भी, प्रसन्न रहने की कला, सीखी थी - आज भी स्वयं को, सहज और सरल बने रहने की प्रेरणा देता रहता है।

उन दिनों, हर नुक्क्ड़ पर पान दूकान के होने का प्रचलन था - जहाँ पान, सिगरेट, टॉफी, "लेमनचूस" के साथ-साथ, घर में तुरंत इस्तेमाल में आने वाले, जरुरत के सामान, जैसे - साबुन, छोटे से चायपत्ती का पैकेट, बिस्कुट आदि मिलते थे। पान के दूकान के साथ, सटा हुआ, एक सायकल मिस्त्री का दुकान, प्रायः अनिवार्य सा होता था। हमारे ज़माने में ज्यादातर लोग, साइकल से ही सफर किया करते थे।

लोगों को अपने पास एक अच्छी सायकल होने का गर्व सा होता था। लोग अपने साइकल को विशेष प्रकार से सजा कर रखते थे। साइकल में सामने एक टोकरी या बास्केट सा लगा होता था। लोग साइकल के चक्के में, प्लास्टिक के गोल फूलों का गुच्छा, लगाये होते थे। साइकल के हैंडिल में भी, झूलता हुआ - कुछ रंग-बिरंगे झालर सा लगा होता था। कई साइकलों के चक्के में, मैंने पायल की तरह घंटी भी लगा देखा था, जो साइकल चलते समय, "छन-छन " की आवाज़ करता हुआ - सामने हैंडल में घंटी का लगा होना, और कई साइकलों में एक हेड लाइट जैसे जुगाड़ का होना, काफी सामान्य सी प्रथा होती थी।

कुल मिलकर,  उस जमाने में साइकल, शोले के "धन्नो" की तरह सजी-धजी सी होती थी। साइकल पर बैठे लोग, काले-चश्मे को लगा कर, घंटियाँ बजाते हुए, बड़े शान से, एक-दूसरे को ओवरटेक भी करते थे।

उन दिनों, मोटरसाईकिल या स्कूटर की सवारी ही बहुत बड़ी बात होती थी। कार तो सिर्फ शादी में दूल्हे के बैठने के लिए, या फिर कहीं लम्बे सफर करने के बाद, बस स्टॉप से या रेलवे-स्टेशन से, घर तक आने जैसे काम में इस्तेमाल होता था। यहाँ मैं बता दूँ, कि ऑटो या थ्री-व्हीलर का उद्भव काफी देर से हुआ है- हमारे बिलकुल बचपन के दिनों में, रेलवे स्टेशन आदि जैसे जगह पर, एम्बेसडर कार का ही प्रयोग होता था। वैसे रेलवे-स्टेशन से घर आने के दौरान, या गाँव में शादी - इत्यादि के समय, कार के सवारी में - जितने लोग एक कार में समा जाते थे, वो आज के दिनों में - एक कार में कितने लोग समा सकते हैं -  इसका, विश्व कीर्तिमान बना सकने में सक्षम है।

वैसे उन दिनों भी, कुछेक बड़े लोग कार से सफर करते थे -  जिन्हें "साहब" से सम्बोधित किया जाता था। हालाँकि, वैसे लोग तो बड़े बंगले वगैरह में ही रहते थे - जो हमारे मोहल्ले से कही दूर हुआ करता था। अलबत्ता उनके ड्राईवर, हमारे घर के आस-पास ही रहते थे। जब कभी दोपहर में, भोजन करने के वक़्त, ड्राइवर अपने घर आते थे, लाजमी है कि वे साहेब के कार से ही आते थे। इस कारण से, कार को करीब से देखने का अवसर मिल जाया करता था। कर के अंदर झांक कर देखना, करीब से छू कर देखना, और मौका मिलते ही कभी-कभी अंदर भी घुस कर बैठने जैसा अनुभव, अब भी मन को झंकृत कर जाता है!

आज अचानक, अपने बचपन की याद आने लगी और पहली बार "कार में बैठने" का अनुभव की यादें आाँखो के सामने आने लगी हैं। हालाँकि अब यह बिलकुल याद नही है कि बिलकुल पहली बार, मैंने कार का सफर कब किया था - पर उस से ज्यादा, यादें आनी लगी हैं - कार में बैठने के पूर्व के, उस लम्बे कार्यक्रम का, और उसके साथ जुड़े, खट्टे-मीठे अनुभवों का।

कार में बैठने का, सबसे शुरुआती अनुभव - किसी शादी के समय के अनुभव से जुड़ा है। जैसा पहले बताया था, कार में लोगों को ठूँसने का तो विशेष कार्यक्रम होता ही था पर उन सबसे पूर्व आम की टोकरी, बैग, सुटकेस आदि जैसे सामानों को ठुँसने जैसा पुनीत कार्य - जो लोग कार में नही बैठेंगे, वैसे लोग कर देते थे।

image courtesy: BBC 
इस विशेष कार्यक्रम में काफी समय लगता था और इस प्रक्रिया में ड्राइवर अपना विशेष टिप्पणी और फेर-बदल करने या करवाने जैसे क्रिया कलाप में पूर्ण रूप से लग जाया करता था। इसके पश्चात लोगों को ठूँसने के ऊपर विशेष ध्यान दिया जाता था। इस कार्यक्रम को देखने के लिए भी लोगों के पास बहुत समय होता था और जिनको जहाँ खड़ा होने का जगह मिल जाता था - वे उधर से ही ध्यान लगाकर बहुत रूचि के साथ, इस पूरे कार्यक्रम को देखते थे।

कार के इर्द-गिर्द - बहुतायत की संख्या में - अनेक लोग होते थे, और उनमे आधे से ज्यादा, उस कार में बैठ कर हिंदी का सफर और अंग्रेज़ी का भी - सफर (suffer) - करने वाले होते थे। यदि कार का डिज़ाइन करने वाला इंजिनियर, एक बार भी उस कार में बैठने वाले - जनसैलाब - को देख लेता, तो उसके प्राण-पखेरू हो जाते! पर उस से भी ज्यादा धन्यवाद - अम्बेसडर कार के दरवाज़े बनने वाले को देना होगा, जिसे बंद कर देने के बाद - किसी मज़बूत किले के दरवाजे की तरह बिलकुल जकड कर बंद ही रहता था - हालाँकि उस दरवाज़े को बंद करना भी, अपने आप में एक काम सा ही होता था।

कार में बैठने का "संघर्ष" और "रोमांचकारी" प्रकरण - युद्ध-स्तर पर होता था। हर युद्ध में जिस तरह से दो सेना होता है उसी प्रकार से इस कार्यक्रम में भी दो दल होते थे, जो एक दुसरे के सुझावों या प्रयास के धूर-विरोधी होते थे। दोनों पक्ष से एक सेनापति से होते थे जो मुख्य रोल में होते थे और इकट्ठे लोगो में स्वतः धूर्वीकरण सा हो जाता था, और वे किसी एक के पक्ष में विश्वास रखते थे। बीच-बीच में सामान्य लोग भी अपना सलाह देने से बाज नहीं आते थे।

उस दौरान होने वाला वार्तालाप, कुछ इस तरह से होता था - कल्पना करिये कि कार में सामान को ठूंस ठूंस कर रखने के बाद. लोगों को भी ठूंस दिया गया है, और अब कार के दरवाजे को बंद करने का प्रयास किया जा रहा है :
सेनापति १ - "अर्रे.....लग जाएगा - अंदर कर लो बाबू.... हाथ अन्दर रख लो बाबू....."
सेनापति २- "अरे बच्चा है, थोड़ी न समझेगा, ले लो सोनू को, गोदी में ले लो न..."
सेनापति १ - "ओह हो, अरे कैसे बंद होगा? टोकरी जो है....... पकड़िये.... इस टोकरी को...हाँ हाँ वही वाला, उसको हाथ में पकड़ लीजिये तो..."
सेनापति २ - पहले ही कहे थे न, ठीक से सामान रखिये,...अब देख लीजिये सही ढंग से "संईत के" नहीं रखने का नतीज़ा देख लीजिये.. "
आम आदमी #१ - "क्या हुआ जी? नही बंद हो रहा है क्या ...."
आम आदमी #२ - "नहीं...ए तरफ का गेट तो बन्दे नहीं हो पा रहा है....."
सेनापति १ - "भांग पीये है क्या महराज? ये आपको दीखता नहीं है कि अभी एगो टांग बाहरे है, तो दरवाजा कैसे बंद हो जायेगा? एक दम्मे दिमाग से पैदल है..."
सेनापति २ - "हम पहले ही बोल रहे थे न, कल से ही बोल रहे थे कि अंदर बक्सा मत डालिए, कोई मेरा बात सुनाता ही नही है..."
ड्राइवर - "अरे सुनिए न एक काम कीजिए, उसको निकालिए न....."
आम आदमी #१ - किसको? बच्चा को?
सेनापति १ - "कह रहे थे न, ये (आम आदमी #१ की ओर इशारा करते हुए ) - अभागा, लगता है भांग पीये है.....! बौरा गए हो क्या? बच्चा को साथ जाना है.... तो, कार से उसको कैसे निकाल दोगे?"
इस डायलॉग के बाद, आम आदमी # १ दुखी हो कर, हथियार डाल सा दिया था, और ठिठक के एक किनारे जा कर खड़ा हो गया था। वह अब वापस मूक दर्शक की श्रेणी में शामिल हो गया था। किसी निर्दलीय उम्मेदवार की तरह, अधूरे मन से चुनाव लड़ने के चक्कर में, सारे जमा-पूंजी गँवा कर, अपनी जमानत भी जब्त करवा लेने के बाद वाली भावना के साथ - अब भारी और दुःखी मन से - आउट होकर, पैविलियन से, सामने हो रहे - खेल - को देख रहा था। बात को फिर से सम्हालने के हिसाब से ड्राइवर ने स्पष्टीकरण किया कि वह किसे निकालने को कह रहा था -
ड्राइवर - "अरे नही भाई, हम तो उ वाला बड़का बक्सा को निकालने को कह रहे थे...."
आम आदमी # २ - "अच्छा ई वाला? ए बाबू जरा पैर उठाना तो...."
सेनापति २ - "कोई हमसे पहले पूछता, तब न? अरे इसको तो कार के ऊपर भी बांधा जा सकता है न..."
आम आदमी # २ - कैरियर नही है न इस कार में...
सेनापति २ - "ये सब देख के कार लेना चाहिऐ था न, आप लोग भी तो...."
आम आदमी १०६ - "अरे, कोई और कार तैयार ही नही हो रहा था न, तो क्या करते..."
सेनापति २ - "अरे विजय बाबू का सब काम ऐसा ही होता है...सब कुछ उल्टा पुल्टा.... "
आम आदमी # ९९ - "अरे आपलोग काहे के लिए इतना परेशान हैं...?"
आम आदमी # ४४ - "हटिये, आप सब हटिये न...."
आम आदमी # २- "अरे ठहरिये न, हो गया है...बस अब एकदम दरवाजा बंद हो जाएगा..."
आम आदमी # ५६ - "न्नह, अब्भियो नही होगा..."
और इस वाक्य को बोलते समय उस आम आदमी ने, अंदर व्याप्त सारे निराशा के भावना को एक सांस में निकाल दिया, और - आधे "न" फिर पूरे "न" और नहीं के "ह" के संधि करते हुए एक लंबा - "न्नह" कहा था ! मगर भीड़ में सभी इस तरह से निराशावादी नहीं थे- और तत्क्षण, तिमिर से आशा के सूरज की किरणें लिए -
आम आदमी # ३२ - "हो जाएगा..."
आम आदमी # १२ - "नही अभी नहीं हो रहा है ..."
सेनापति १ - "अरे हटिये न....आप सब लोग हटिये...सब अपना इंजीनियरिंग मत छाँटिए..."
यहाँ यह बताना अत्यधिक आवश्यक है कि ऐसे विशेष परिस्थिति में अगर कोई कुछ प्रयास करने में विफल हो जाता था तो तुरंत "इंजीनियरिंग" जैसे विषय को वार्तालाप में लाकर, उपहास के रूप में प्रयोग किया जाता था - मेरे भविष्य में बनने वाले इंजीनियर का, उन दिनों भी दिल बैठ जाता था!
ड्राइवर - "जरा सा जगह... दीजिए न..."
आम आदमी # ७६- "क्या बोले? क्या दीजिये? खैनी मांग रहे हैं क्या?..."
ड्राइवर - "नही भाई, कह रहे थे "जगह" दीजिए...
(जगह शब्द पर विशेष जोर देते हुए - और फिर होंठ के अंदर दबाये खैनी को थूकते हुए)
ड्राइवर - "वैसे है क्या खैनी आपके पास ?..."
सेनापति २ - "अरे रुकिए अभी, पहले गाड़ी में सबको जमा दीजिए न, फिर खैनी खावेंगे..."
सेनापति १ - "नारियल रस्सी है क्या..."
ड्राइवर- "नहीं वो तो नहीं है ..पर काहे मांगे थे रस्सी?"
सेनापति २- "लीजिये ये भी गाडी में नही रखता है? कैसा डरैवर है रे तुम....?"
ड्राइवर - "अरे था न, परसों एगो शादी में गिया था एही वाला गाडी, बस वही पर ले लिया पार्टी। क्या बताये, डरैवर लोगों को गाडी देने से यही होता है, अब सब जगह हमही गाडी नही न चला सकते हैं...!"
आम आदमी # २७ - "ओः हो, तो ये आपका गाडी है? कितना साल हो गिया इसका?...."
यहाँ एक रहस्योधघाटन यह हुआ था कि जो ड्राइवर था वह वास्तव में गाड़ी का मालिक भी था, और ध्यान देने वाली बात यह थी कि इस बात की विशेष जानकारी देने के बाद, वह अपना यथोचित सम्मान की अपेक्षा कर रहा था। 
सेनापति १ - "अरे चन्दुआ...बतियाना बाद में, समान जमाओ पहले, देर हो रहा है...."
आम आदमी # २७ यानि चंदू - "अरे वही तो कर रहे है न, पप्पू नारियल का रस्सी खोजने गया है, अन्दर...."
सेनापति २  - "अरे हम बोल रहे हैं न, अभी भी सामान को एडजस्ट कर दो न, तो हो जाएगा..."
सेनापति १ - "तो आपको का लग रहा है? हम टराई नही मारे क्या ? सब कर के देख लिए..."
फिर अचानक से उस भीड़ को चीरते हुए महामहिम राष्ट्रपति की तरह दोनों सभा को सम्बोधित करने के अंदाज़ में - घर के मुखिया विजय बाबू का आगमन, और फिर उद्घोषणा -
"सुरेंदर बाबू, एक काम कीजिए न, सोनू को आप अपने साथ ही बस में ले लीजियेगा?"
बहुत देर से संसद के अंदर ध्यानाकर्षण और बहस का मुद्दा सा बना सोनू अब बिलकुल विचलित सा होते हुए -
सोनू - "नही मामा, हम कार में ही जायेंगे..."
सेनापति १ - "अरे, हो जाएगा न, रहने दीजिये, सोनू को कार में ही रहने दीजिये, देखते हैं फिर से...."

और, इस पूरे प्रक्रिया के दौरान, गाडी में बैठे लोग, उसी तरह से दिख रहे होते थे - जैसे अंतरिक्ष में जाने के पूर्व, अन्तरिक्ष-यात्रियों को शटल में बैठा कर, किसी कैमरे से लाइव टेलीकास्ट के तौर पर टीवी पर दिखाया जाता है...! सभी बाबा रामदेव के, किसी विचित्र प्राणायाम के मुद्रा में बैठे, अपने अपने सांसों को लम्बा खींच कर, देर तक रोकने जैसे प्रक्रिया में लीन से बैठे होते थे।

अनेक प्रकार के प्रयोजन के पश्चात्, जब घर के "चीफ कमांडर ऑफिसर्स" का अनुमोदन हो जाता था कि - 'हाँ ,अब कार के दरवाजे को अंततः बंद किया जाये', तब कार के ड्राईवर विवश सा सिर्फ मूक दर्शक की तरह अपने लाचारी को साफ़ प्रकट करते हुए किसी कोने में खड़ा दीखता था।

ड्राइवर की भी, इस पूरे प्रक्रिया में, क्या से क्या दशा हो जाता था! कुछ अरसे में ही, हिमालय पर्वत जैसे ऊंचाइयों से बंगाल की खड़ी तक का सफर सा ! जब गाडी को लेकर घर पर आता, तो अपना रुतबा झाड़ता हुआ, जहाँ मर्ज़ी गाड़ी को पार्क करता था। उस प्रक्रिया में - सड़क के किनारे चल रहे विश्व-स्तरीय बातों को करते लोगो के झुण्ड में से, दो -चार लोग - अपने महत्वपूर्ण चर्चा से कॉमर्शियल ब्रेक लेकर - ट्रैफिक पुलिस के अंदाज़ में - आगे-पीछे, दांये- बांये का निर्देश देने जैसा - स्वैच्छिक कार्य के लिए तुरंत उपलब्ध हो जाते थे। और फिर कुछ इस तरह के निर्देशों का सिलसिला शुरू हो जाता जिसे देखने के क्रम में आस पास भीड़ के जमा होने की प्रक्रिया शुरू हो जाती थी -
"आने दो, और आन्ने दो...... , जरा सा दांया काट लो, हाँ लो.... लो और ले लो, बस, बस... बस्स"! 
अंतिम "बस्स" के समय, गाड़ी के किसी हिस्से पर जोर से हाथ से मारने का प्रचलन - कीर्तन के संगत में साथ देने वाले ढोलकिये के ढोलक पर बेरहमी से पीटे गए थाप - जैसा होता था। इस प्रक्रिया में, कई बार - सामने पड़े खाट या कुर्सी जैसे सामानों को हटाने - जैसे कार्य को भी - ड्राइवर के सम्मान और प्रतिष्ठा बढ़ाने जैसे - भावना से प्रेरित होकर संपन्न कर दिया जाता था।

मगर सामान और आदमी को गाड़ी में ठूंसने के पूरे "पांच-दिवसीय क्रिकेट" जैसे - प्रक्रिया में, उसी डाइवर की हेँकड़ी पूरी तरह निकल जाता था। उस के बाद, ड्राइवर एक निरीह प्राणी की तरह, अपने ही आंखों के आगे, बाकी कुछ मजबूत, मगर दिमागी हालत पर प्रश्न चिह्न लिए लोगों के द्वारा कार के दरवाजे के बंद होने की प्रक्रिया को देखने के सिवा और कुछ नही कर सकने की स्थिति में विवश -"हाँ जरा देख के, जरा धीरे से भाई, ...आ हा हा, जरा बचा के, देखियेगा .." - जैसे सिसकी लेने वाले स्वरों में डूबा, कही कोने में खड़ा हो जाता था।

दरवाजा बंद करने के पहले - "देख के बाबू ...हाथ अन्दर कर लो, पैर ऊपर रख लो..." आदि जैसे चीख-पुकार के बीच, अंततः इस जटिल कार्यक्रम का पटाक्षेप होता था।

इसके बाद, "कहाँ है ड्राईवर, स्टार्ट करो..देर हो रहा है .." जैसे चीख-चिल्लाहट के साथ, लोग यात्रा का आरोहन शुरू करने जैसी कुछ भूली हुई प्रक्रिया का स्मरण करते और अंदर बैठे "भुक्तभोगियों" को - मरुस्थल में प्यास से सूखे गले को मरूद्यान के मिलने वाली - राहत सी मिलती।

जाहिर है, कार में एयर-कंडीशन जैसे उपलब्धियों का चर्चा, बहुत कोरी-कल्पना वाली बात सी थी। गर्मी से भी ज्यादा - गाड़ी में ठूंस-ठूंस कर लाद दिए गए सामनों में से - दही या रसगुल्ले - के साथ-साथ पसीने के दुर्गन्ध से जीना मुश्किल हो जाता था। हालाँकि गाडी चलने के बाद, पसीना सूखते रहने के साथ-साथ आँखे भी लग जाती थी, जिसका एक स्वाभाविक फायदा यह होता था कि नाक स्वतः साँस लेने जैसे स्वतंत्र कार्य में, पूरी तरह से संलग्नित हो जाता था और सूंघने जैसी प्रक्रिया स्थगित हो जाता था।

गाँव में कार सड़क पर कम और खेत-खलिहान, टूटे पुल के कारण सूखी नदियों को पार करने के क्रम में, रोलर कोस्टर का मजा हमें बचपन से ही कराता आता था। इन सब "छोटे-मोटे" समस्याओं के बावजूद - हम ऐसे शादी जैसे अवसरों का इंतजार करते रहते थे। हमें ऐसे मौके पर, अनेकों प्रकार के विशेष अनुभवों का - विशेष अवसर मिलते रहते थे - जैसे कार में चढ़ना, नए कपडे मिलना, अच्छे पकवान, किराये पर लाये -रिकॉर्ड प्लेयर से लाउडस्पीकर पर बजने वाले कर्णभेदी संगीत का आनदं - और अनेकानेक ऐसे ही कुछ मूलभूत सुखद गतिविधियाँ के साथ प्रथम साक्षात्कार या उनकी पुनरावृत्ति।

अच्छे या बुरे- यह तो देखने का नजरिया भर होता था - पर आज याद करने से लगता है कि वाकई ऐसी हर घटनायें, हमारे लिए उन दिनों भी और आज भी याद करने पर बहुत ही मजेदार अनुभूतियाँ सी देती हैं!

Dec 14, 2015

एल टी - संस्मरण

बचपन के दिनों के सबसे यादगार पल- हाई-स्कूल के दिन थे। यह समय का वह दौर था, जब हम ऊंची आसमानी कूद की,  तैयारी शुरू ही कर रहे थे । खुले आकाश में उन्मुक्त पंछी की तरह, जिंदगी की लम्बी उड़ान लगाने के लिए, बचपन के चोले को उतारकर, जवानी के पैराशूट को पहनने की शुरुआत कर चुके थे।

हाई-स्कूल तक आने के क्रम में, किसी पुराने योद्धा की तरह, हम कई तरह के बाधाओं को पार कर चुके थे और अनेको तरह के जटिल और नीरस विषयों को - और उनसे भी ज्यादा, कई शिक्षको के उबाऊ और मशीनी अंदाज़ में पढ़ाने के तौर-तरीके के - आदी से हो गए थे। किसी सुरंग के अंधकार में रोशनी के किरण से दिखने वाले - उन्मुक्तता का बोध कराने वाले - "कॉलेज" जाने के सुनहरे सुबह के सपने को देखते हुए - हम नौवी कक्षा को दस्तक दे चुके थे।

अगले दो साल की पढ़ाई, काफी गहन होने वाला था। वर्ल्ड कप के एलिमिनेशन राउंड की तरह, अब से पढ़ाई का, वास्तव में महत्व बहुत ज्यादा हो गया था - क्योंकि १०वीं के परीक्षाफल के आधार पर ही, भविष्य के पढ़ाई का निर्णय होने का प्रचलन था। ऐसे माहौल में, जैसा उम्मीद की जानी चाहिए - सब कुछ गंभीरता के कालिख में लिप्त से थे - अतः हमें किसी भी विषय की पढ़ाई या किसी शिक्षक के क्लास के, रोचक होने की कोई उम्मीद नहीं थी।

परन्तु, इन सब के बीच, हमारे जीवन में "एल टी" युग का प्रादुर्भाव हुआ!

एल टी अर्थात - श्री ललन तिवारी। कैसे इनके बारे में कुछ बताऊँ? संक्षेप में, एक अनुभव के रूप में ही इन्हे व्यक्त किया जा सकता है। कहने के लिए तो ये हमारे नौवी और दसवी में हिंदी और संस्कृत के शिक्षक थे। पर कई मायनों में, ये हमारे क्लास के दिल में बसे धड़कन से थे - जिनके माध्यम से पूरे दो साल तक, हमारे अंदर एक नयी ऊर्जा का संचार सा होता रहा। एल टी के बिना - स्कूल के दिनों की कल्पना - किसी चित्रकार के बनाये चेहरे में, आँखों को छोड़ देने जैसा होगा।
पहले मिडिल स्कूल और बाद में कदमा बॉयज हाई स्कूल - लगभग पूरी स्कूलिंग इसी स्कूल में 
पढ़ाई के हर तौर तरीके और मापदंड से बिलकुल बेफिक्र, अलमस्त, बेख़ौफ़, बुलंद और मस्तमौला से शिक्षक। इनसे साक्षात्कार होने के पूर्व, जितने भी शिक्षक मिले थे - उन से बिलकुल ही अलग - किसी भी पंरपरागत शिक्षक के परिभाषा से नितांत ही अलग से - बहुत ही मौलिक और पठन -पाठन के विषय-वस्तु से काफी ऊपर दर्जे के - अपने ही अनूठे ढर्रे में ढले से - बिलकुल ही अलग नस्ल के शिक्षक - एल टी सर!

कुल मिला कर, "एल-टी" के साथ बिताये सुखद क्षणों का पिटारा - पूरे १० साल के स्कूल की पढ़ाई पर - कई गुना भारी पड़ेगा!

एल टी सर के कल्पना मात्र से ही, एक काफी रोबदार सा व्यक्तित्व की छवि, उभर कर सामने आती है। लम्बी और भव्य कदकाठी, चौड़ा-तना हुआ सीना, और किसी पहलवान जैसा बुलंद शरीर। हमेशा खद्दर के धोती-कुर्ता पहने - एक बहुत ही प्रभावशाली सा व्यक्तित्व का स्मरण होता है। चौड़ी ललाट और सिर के भू-मंडल के दूर क्षितिज तक बाल उड़े होने के कारण - साफ़ सुथरा चिकना सा सिर - जिसके कारण जाज्वल्यमान सा शौर्य-मंडल और भी प्रखर होकर -चमकता सा दीखता था। धान के खेत के कटाई के बाद छोड़े हुए जड़ों की तरह, गालों पर हलके से बढे हुए कच्ची-पकी दाढ़ी - ऐसा लगता, मानो गाल को मेघाच्छादित सा किये हुए हो।

अक्सर, एल टी सर क्लास जरा देर से आते थे - बाद में पता चला कि वे पान के बेहद शौक़ीन थे, और स्कूल के बाहर से पान खा कर आने के बाद ही, क्लास में पढ़ाने का मिज़ाज़ बनता था।

धीमे-धीमे क़दमों से बढ़ते हुए, एल टी सर क्लास के अंदर आते, फिर एक बार पूरी क्लास के ऊपर गहरी-सी निगाहें डालते। सहसा ऐसा प्रतीत होता था, मानो क्लास के अंदर कोई शेर आ गया हो, और हमारे क्लास के अंदर अनायास ही स्तब्धता सी छा जाती थी। क्लास के बीच के अंतराल में, कई उछृंखल से छात्रों के उछल-कूद या किसी को तंग करने की आदत सी थी, पर क्लास के अंदर, एल टी सर के पैर पड़ते ही, सब मृदु शशक की भांति भागते हुए - दुबक कर अपने- अपने सीट पर बैठ जाते थे। इनके व्यक्तित्व का ऐसा असर था कि इनकी निशब्द उपस्थिति मात्र ही, शेर का बोध कराता और पूरा क्लास शांत और चौकन्ना सा हो जाता था।

पान के तो शौकीन थे ही, पर उसका परिचायक सा बन चुका था - उनके होठों के दोनों कोने, जहाँ लाल-लाल स्थाई से दाग बन गए थे। मुँह के अंदर पान को दबाये रखने के कारण, कोई एक तरफ का गाल और भी ज्यादा उभरा सा रहता था। हमेशा पान से सिंचित लाल-लाल हो चुके होंठ उनके आभा-मंडल को और भी सुसज्जित सा कर देता था। बीच-बीच में दाँतो से चबाते हुए - पान का बड़ी चाव से रसास्वादन करते हुए - अपने मुखारबिंदु से शब्दों का उच्चारण करते थे, और सामने बैठे किसी छात्र से हिंदी की पुस्तक - "भाषा -सरिता" मांगते और फिर किसी अध्याय को खोल कर, हम सभी को भी उस पाठ को खोलने का निर्देश मिलता। इसके बाद, हिंदी का कोई एक पाठ का अध्ययन शुरू हो जाता।

बुलंद आवाज, लयबद्ध और धाराप्रवाह हिंदी, शब्दों का शुद्धतम उच्चारण, और उस पर से, नायाब शब्दों का चयन- जादूगर सा था यह शिक्षक! क्लास में ऐसा समां बन जाता था कि हर कोई मन्त्र-मुग्ध होकर, उन्हीं की तरफ, एकाग्रचित्त होकर देखने को विवश सा हो जाता था। धाराप्रवाह और ओजपूर्ण व्याख्या का ऐसा जादुई प्रभाव होता था कि कई बार तो ऐसा प्रतीत होता था कि मूल कविता से ज्यादा रोचक और भावपूर्ण तो शायद, एल टी सर की समीक्षा थी!

लिखने के क्रम में, बरबस उनके हरेक पहलू याद आने लगे, और ऐसा लग रहा है, मानो मेरे समक्ष खड़े होकर एल टी सर कुछ धाराप्रवाह सा बोले जा रहे हैं।

शुरुआत के दिनों में, एल टी सर के व्याख्या या सामान्य बोलचाल में शब्दों के चयन - हम में से कई लोगो के, समझ के परे सा होता था। उदाहरण के तौर पर - अपने व्याख्यान के दौरान, एल टी सर इस तरह के वाक्य बोलते थे - "इस कार्य को संपादित करने के पश्चात, नृपेश, अपने कक्ष के द्वार से शनैः शनैः अग्रसारित हो गए, और आखेट करने हेतु, वन की ओर प्रस्थान कर दिए।"

परन्तु, धीरे धीरे इनके भाषा और शब्दों का नशा किसी जाम की तरह, हमारे सिर चढ़ के बोलने लगा। फिर तो थोड़े अंतराल के बाद ही, हर किसी के जुबान पर क्लिष्ट हिंदी के बोल, यूँ स्वाभाविक रूप से आने लगे, मानो हम सभी ऐसी ही भाषा बोलने के आदी से थे! आज भी, जब किसी के समक्ष शुद्ध हिंदी का प्रयोग प्रारम्भ करता हूँ, तो एल टी के दिए शब्दों के तरकश में से, शब्दों के तीर की कभी कमी नहीं होती है।

एल टी से मैं इतना प्रभावित हो गया था कि मैं इनके सान्निध्य रहने का, कोई सा भी मौका नहीं छोड़ना चाहता था। और ऐसे में, जब मुझे यह पता चला कि वे अपने घर पर ही ट्यूशन पढ़ाया करते थे, तो मैं बिना किस उद्देश्य के ही - सिर्फ एल टी सर के संसर्ग में रहने की भावना से- बरबस इनके घर जाने लगा था। ट्यूशन का माहौल, काफी लचर सा होता था। कई तरह के छात्र, घर पर यूँ ही अनमने ढंग से पड़े रहते थे। कोई एल टी सर के बेटे को स्कूटर में घुमा लाता, तो कोई इनके घर का काम कर देता - और इन सब के बीच, कभी सर का मूड हो गया तो पढ़ा भी देते थे।

परन्तु मेरे लिए इन सब से कही ज्यादा महत्वपूर्ण - एल टी सर के साथ बिताये क्षण का लुत्फ़ उठाना होता था। मैं और मेरे कुछ और साथी, जो ट्यूशन पढ़ने जाते थे - घंटो मन्त्र-मुग्ध होकर एल टी सर की बातों को ही सुनते रहते थे - घर पर, देश की राजनीति से लेकर और भी कई स्थानीय और हलके विषयों पर, उन्मुक्त भाव से बाते करते और ठहाका भी लगाते थे।

ट्यूशन तो सिर्फ मिलने जुलने का एक बहाना सा था - मुझे नहीं याद है कि उन्होंने कभी पैसे की मांग की हो या कभी स्वयं पैसे लिए भी हों, कोई पैसे देने को आता तो - कहते थे - "ऊपर वाले शेल्फ पर रख दो"- व्यावसायिक तो कतई नहीं थे - बस, उनके घर पर भी स्नेह और ज्ञान की धारा का अनवरत प्रवाह सा चलता रहता था।

एक बार, एल टी सर के घर के एक शेल्फ के ऊपर रखे कुछ पुस्तकों को निहारते हुए, मुझे सर के कवि और लेखक होने का कुछ प्रमाण सा मिल गया। कुछ पुराने से कागज़ों का पुलिंदा सा था - जिसे पढ़ने से ज्ञात हुआ कि वे एल टी सर के हस्तलिखित पाण्डुलिपि से थे। ऐसा प्रतीत होता था कि एल टी सर कोई उपन्यास या कहानी सा लिख रहे थे, पर संभवतः समयाभाव के कारण, कई अरसे से वह अधूरा सा ही पड़ा हुआ था। इस के बारे में, सर से पूछने की कभी हिम्मत तो नहीं हुई, पर मैं उन्हें चोरी-छिपे पढता रहता था।

मेरी आंतरिक इच्छा होती थी कि काश मैं भी उनकी तरह ही, मौलिक रूप से, कुछ लिख पाता। आज इतने सालों बाद, अब मुझे यह कहते बिलकुल ही झिझक नहीं होती है कि मैं उनके सानिध्य रह कर साहित्य में डूबना चाहता था, और उसी की पढ़ाई भी करना चाहता था। पर सामाजिक और पारिवारिक दबाव था कि - नौकरी को सुरक्षित करने के लिए - इंजीनियरिंग या मेडिकल की ही पढ़ाई करूँ। और मैंने वैसा ही किया - परन्तु अंदर के पनपते साहित्यकार का - कही स्वतः अवसान सा हो गया।

शुरुआत में, हमें एल टी सर के पूर्ण व्यक्तित्व का पता नहीं था। पर जैसे-जैसे समय बीतने लगा - ऐसा लगने लगा कि इनके अंदर भी एक छोटे से बच्चे का वास सा था, जो हमारे साथ मिलते ही मानो झूम-झूम कर अपनी जिंदगी जीता था। हमारे बीच एक ऐसा सम्बन्ध बन गया था, जो शिक्षक और छात्रों के बीच का उत्कृष्टतम और सर्वथा अनुकरणीय सा सम्बन्ध था।

धीरे-धीरे एल टी सर के क्लास में, कुछ छात्र, उनके "विशेष प्रसाद" के हकदार से बन गए थे। उस लिस्ट में सबसे ऊपर - मनोज सिंह हुआ करता था - जिसे हम "तैमूर-लंग" कह कर पुकारते थे। मनोज बहुत ही उत्पाती जीव था - और, ऊपर से एल टी सर उनके पिता - जो स्वयं एक शिक्षक थे, उनको जानते भी थे। फलस्वरूप, यह विशेष संवाद और उसके साथ जुड़ा कार्यक्रम, अनेको पुनरावृत्ति के बाद अब बिलकुल कंठस्थ सा हो गया है, और आँखे बंद करके सोचता हूँ, तो ऐसा लगता है कि अभी सामने ही घटित हो रहा हो!

एल टी सर, खेत से सब्जी उखाड़ने वाले अंदाज़ में मनोज के केश को मुट्ठी में पकड़ कर हंसते हुए -
अच्छे बाप का - नालायक बेटा - गेंहू के खेत में लेढा
मनोज भी धाराप्रवाह कुछ न कुछ बोल कर, एल टी सर को उकसाते ही रहता था।

किसी ने अनेको बार इस डायलॉग के सुनने के बाद, यह प्रश्न कर ही दिया कि आखिर "लेढा" क्या होता है - जिसके जवाब में हमें पता चला कि शुरुआत में गेंहू और लेढा एक साथ ही उगते हैं, और दीखते भी एक जैसे हैं, पर बाद में जाकर गेंहू तो काम का होता है पर लेढा कोई काम का नहीं - शायद लेढा एक प्रकार का weed होता होगा।

एक और छात्र होता था - मधुप पांडे, इसकी ख़ास बात यह थी कि यह भी बहुत हाजिरजवाब सा था और इसकी आवाज़ काफी ऊंची और कर्णभेदी सी थी। गाँव से अपने शुरुआती पढ़ाई करके आया था और भोजपुरी-निष्ठ हिंदी बोलता था - साथ ही, काफी निर्भीक होकर, फ़ौरन एल टी सर के प्रश्नों का प्रत्युत्तर देता रहता था।

एक हमारे मित्र हैं - बालाजी भगवती झा- अब नाम की लम्बाई के अनुरूप हो गया है, पर उन दिनों कदकाठी में बहुत छोटा हुआ करता था। और इसी वजह से, दसवीं क्लास में भी, हाफ पेंट में अाने वाले कुछेक छात्रों में से एक हुआ करता था। बालाजी बहुत ही उत्पाती छात्र था, और हमेशा किसी ने किसी प्रकार के खुराफात में लगा रहता था - जिस कारण, एल टी सर उसे अपने पास बुलाते और कुछ "प्रसाद" देते हुए कहते- "देखेन में छोटन लागे, घाव करे गंभीर"

एक दिन, एल टी सर उसके उत्पात से तंग आ गए और एक थप्पड़ रसीद करते हुए कह दिए -
चूहे की तरह बदमाशी कर के भाग जाता है
जिसके बाद, कहना नहीं होगा कि आजतक उसे किस नाम से पुकारा जाता है।

"चूहा" के किसी और उत्पात के - धारावाहिक अंक के नवीनतम संस्करण के उपलक्ष्य में - एल टी सर उसके हाथों को मोड़ते हुए पूछ बैठे -
अरे तुम किस नक्षत्र में पैदा हुआ है?
रावण नक्षत्र में सर
इसके बाद जो हुआ, वह क्लास के हर किसी के यादों में, आज भी बिलकुल हरा है!
पीठ पर दो-चार थप्पड़ के बाद एल टी सर ने पूछा -
आखिर किस खानदान के हो तुम?
जिस खानदान के आप हैं, उसी खानदान के हैं, सर!
कौन सा?
ढाबुड खानदान सर
ढा - बुड, ये कौन सा खानदान होता है?
 ये बोलते-बोलते ललन तिवारी इतने जोर से हँसे थे कि सारा क्लास भी ठहाके में गूंज गया! उन दिनों कुछेक शब्दों को उल्टा बोलने का प्रचलन सा था और सर्वथा यह "बुड्ढा" शब्द का उल्टा - "ढा -बु " का अपभ्रंश सा रहा होगा।

अक्सर क्लास में, इस तरह के मनोविनोद के क्षण होते रहते थे। और, फिर देर तक चलता था, हंसी और ठहाकों का सिलसिला। कई बार तो अगल-बगल के क्लासरूम कर शिक्षक, चिंतित होकर, हमारे क्लास में आकर झांकते - शायद, ये देखने आ जाते थे, कि क्लास में किसी शिक्षक के न होने के कारण, हम सभी अपनी मस्ती में होंगे - पर, जैसे ही देखते थे कि एल टी सर क्लास में ही हैं - वे कुछ निराश सा होकर लौट जाते थे!

एल टी सर के शब्दावली के संकलन में, हमें सम्बोधित करने के लिए अनेको शब्द थे, जैसे-
नालायक, पाखंडी, दुष्ट, पापी, भ्रष्ट, पराक्रमी, कृतघ्न, दुष्कर्मी, उछृंखल, गेंहू के खेत में लेढ़ा, अच्छे बाप का नालायक बेटा, आदि आदि।

एल टी के क्लास की बात ही कुछ अलग होती थी- अगर ये सातवी क्लास में भी आते तो - ऐसा लगता जैसे खाने में कोई तीखी चटनी का चटखारा ले रहे हों!

छात्रों में अपनी विशेष लोकप्रियता के कारण, स्कूल में होने वाले सरवती पूजा के लिए एल टी सर को, संचालन की कार्यवाही दी गयी। एल टी सर हर क्लास में घूम घूम कर अपील करते हुए चंदे की मांग करने लगे। और उस क्रम में एल टी सर ने चुटकी लेते हुए कहा कि चंदा देने से सब का भला होगा - और सभी अव्वल दर्जे में मैट्रिक की परीक्षा को पास कर लेंगे।

इस पर हमारे क्लास का सबसे हंसमुख और हाजिरजवाब साईं ने कहा -
सर, इस बात का हम सभी को लिखित में प्रमाण दीजिये, तब चन्दा मिलेगा!
छूटते ही एल टी सर ने जो ठहाका लगाया था, उसकी गूंज आज तक याद है।

एल टी सर और उनके क्लास के ऐसे कितने ही अविस्मरणीय किस्से याद आते रहते हैं। जी करता है कि वापस अतीत में चला जाऊं। जहाँ एक तरफ हंसी और ठहाके का दौर चलता था और क्लास में खुशनुमा सा माहौल रहता था, वही दूसरी तरफ उनसे प्राप्त किये ज्ञान का कोई अंत नहीं होता था।

उनसे सीखने की तो कोई सीमा ही नहीं थी - उनके पास हिंदी और संस्कृत के ज्ञान का अपरम्पार भण्डार सा था - जयशंकर प्रसाद हो या निराला, महादेवी वर्मा हो या दिनकर, मैथिली शरण गुप्त हो या हरिऔध, रामचन्द्र शुक्ल हो या रामवृक्ष बेनीपुरी, रेणु हो या पंत, कबीर हो या सूरदास, विद्यापति हो या बिहारीलाल, रहीम हो या जायसी, कालिदास हो या किसी वेद का श्लोक - हर विषय पर बहुत ही रोचकता से व्याख्यान कर सकते थे।

हमारे बहुत ही प्रिय ललन तिवारी अब नहीं रहे!

मेरी बहुत इच्छा थी कि उनसे मैं इस बार के अपने  जमशेदपुर के दौरे में मिल पाता -पर ईश्वर को शायद वह पसंद नहीं था। पता चला कि कुछ महीने पहले, उनका अपने गाँव में स्वर्गवास हो गया। मेरे सबसे प्रिय शिक्षक ललन तिवारी - मेरे अंतिम साँसों तक, मेरे अंदर जीते ही रहेंगे। मेरे अंतर्मन में, हिंदी साहित्य के प्रति उन्होंने जो रूचि पैदा की है, वह चिनगारी अब दावानल सी बन गयी है। जब कभी मैं हिंदी पढता हूँ, लिखता हूँ और बोलता हूँ- एल टी सर का ही प्रभाव दीखता है।

एल टी सर अपने हर छात्र के लिए - अभिभावक, मित्र, शिक्षक, रोल-मॉडल से थे।  वे सबों के लिए श्रद्धेय तो थे ही, पर उनके साथ सबों का ऐसा सम्बन्ध भी था कि कोई भी खुल के कुछ भी उनको व्यक्त कर सके। इस सन्दर्भ में, मुझे स्मरण होता है एक घटना, जिसमे उनके एक बिलकुल ही अलग रूप का पता चला था। 

हमारे साथ एक छात्र होता था - अरुण सिंह। किसी पारिवारिक या अन्य कारणों से वह बहुत ही उद्विग्न सा रहता था। उसका व्यवहार काफी दबंग और कर्कश सा हो गया था - आये दिन किसी से भी झगड़ा या मारपीट करना - आम बात थी। एक दिन - अरुण, स्कूल में तलवार लेकर आ गया, और उसके बाद अचानक,  हेडमास्टर से उसकी बहुत झड़प हो गयी। उसके बाद, अरुण चीखता -चिल्लाता हुआ, हेडमास्टर के ऑफिस से बाहर निकला।

चीख -चिल्लाहट के गूंज को सुन कर, सभी लोग क्लास के बाहर आ गए और सामने देखने लगे - अरुण को संभवतः स्कूल से निष्कासित करने के बाद गेट से बाहर निकाल दिया गया था। फिर क्या था, गुस्से में अरुण को जो कुछ सामने दिख रहा था - पत्थर, ढेला, ईंट, लकड़ी- उसे ही फेंकता हुआ- बिलकुल आतंकित शेर की तरह दहाड़ने लगा था और गंदी-गंदी गालियां और धमकियाँ भी दे रहा था।

किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए, फलतः सभी मूक दर्शक बने देख रहे थे। अचानक स्कूल के गेट से बाहर - एल टी सर दिखे - बिलकुल निडर उसके करीब पहुँच गए। पता नहीं क्यों, उन्हें देख कर पहले तो अरुण एकाध पत्थर फेंका पर, एल टी सर को निडर होकर, अपनी ओर आगे आते देख - अचानक से वह ठिठक सा गया और अगले कुछ क्षणों में बिलकुल टूट गया - फिर दहाड़ मार कर रोते हुए, उनके चरणों में गिर गया। एल टी सर उसे अपनी बाँहों में ले लिए और फिर उससे कुछ बाते करते हुए - उसे समझाते हुए स्कूल वापस ले आये। उस दिन के बाद - अरुण सिंह एक आदर्श छात्र सा बन गया और प्रतिदिन, एल टी के चरणो को छूकर प्रणाम करता था!

मुझे लगता था कि एल टी सर के प्रति मेरा ही इतना अगाढ़ प्रेम रहा होगा, पर मैं गलत था। हाल ही में, जमशेदपुर में अपने हाई-स्कूल के करीब १५-२० साथियों के साथ - एक मिलन समारोह का आयोजन किया गया - और, उस मिलन के दौरान - हर दो वाक्यों के बाद - सिर्फ ललन तिवारी का या उनके क्लास में हुए घटनाओं का ही जिक्र हो रहा था!

उस मिलन के बाद बने व्हाट्सप्प ग्रुप में, जब लोगों ने कुछ गंभीरता से लिखना शुरू किया - अलौकिक रूप से - सबों के लिखने के शैली में, शब्दों के चयन में, और भाषा के प्रवाह में, एल टी सर का ही प्रभाव झलकता है!

मेरे पास हिंदी में इसका सही पर्याय नहीं है पर जो मैं कहना चाहता हूँ, वह यह है कि - There is an uncanny resemblance in everyone's expression and selection of words, such is the profound impact of this teacher, that even after nearly 33 years, people are influenced by his style!

जीवन एक रेलगाड़ी की तरह, कई प्लेटफॉर्म पर बिना रुके, सरपट भागी चली सी जा रही है। कई प्लेटफार्म ऐसे हैं, जहाँ अब कभी वापस जाने का, मौका नहीं मिल पायेगा! न जाने क्यों, इस बार के भारत-भ्रमण के दौरान, एक कसक सी रह गयी और शायद अब जीवन भर इसका मलाल भी रहेगा, कि मेरे बहुत ही प्रिय ललन तिवारी सर से अब कभी मुलाकात नहीं हो पायेगा! उनका हम सभी के जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव है।

मुझे स्मरण हो रहा है, अपने अंतिम वर्ष के शिक्षक दिवस के वो पल, जब वे हमारी कक्षा में आये थे, और हमारे बारे में ये बातें कही थी, जो आज तक मेरे मानस पटल पर रेखांकित हैं-
बच्चे तो उच्छृंखल होते ही हैं - क्योंकि यह उनका बाल-स्वाभाव है, ये नदी की तरह होते हैं और इनका प्रवाह किनारो से टकरा कर यूँ ही शोर करता है, फिर जब बड़े हो जायेंगे - तो किसी सागर में समा कर शांत हो जायेंगे।

Dec 13, 2015

तिमिर और परसाई के टॉर्च

आज अनायास ही हरिशंकर परसाई जी का कथा-संग्रह - "प्रेमचंद के फटे जूते" पढ़ने लगा।

आज आपसे एक मज़ेदार बात भी शेयर करता हूँ, मैं कभी भी उपन्यास को, सिल-सिलेबार ढंग से नहीं पढता हूँ। बल्कि मैं, रैंडम-आर्डर में, कही से भी पढ़ने लगता हूँ- "राग-दरबारी" को पिछले १० सालों से पढ़ ही रहा हूँ- और लगता है कि आगे भी पढता ही रहूँगा!

उसी क्रम में, आज परसाई के इस पुस्तक के एक कथा - "टॉर्च बेचने वाला" को पढ़ा। उसके पढ़ते ही, कथा के पात्र, उनके चित्रण और दिए सन्देश - सभी के मनन करने का दिल करने लगा। फिर क्या था,  इस पुस्तक को छोड़, मैं खूब सोचने लगा। हर दिशा से, मानस पटल पर, उमड़-घुमड़ कर बादलों की तरह, अनेको तरह के विचार के बरसात से होने लगे।

इस कहानी में - मानव धर्म और समाज में व्याप्त धारणाओं का - बड़ा ही सटीक चित्रण किया गया है। एक जैसे विचारों का, सिर्फ माध्यम और उपयोगिता का परिपेक्ष्य बदल दिया जाए, तो उस विचार और "विचारक" के प्रति समाज की अवधारणा को, बदलते देर नहीं लगता। कई मिलते जुलते विचार, मन में आने लगे।

तुरंत, पीटर सेलर्स अभिनीत - "Being There" - का स्मरण हो गया। इस सिनेमा मे बहुत ही रोचक ढंग से, सांसारिकता से अनभिज्ञ - एक गार्डनर यानी माली का चित्रण है, जो पूरी जिंदगी, कभी भी अपने घर के बाहर कदम तक नहीं रखा होता है। अपने पूरे जीवन-काल में उसे, सिर्फ और सिर्फ पेड़-पौधे और बागवानी का ही जानकारी हो पाता है। पर, अब बदले माहौल में, उसे उस चहारदीवारी से बाहर निकलना पड़ता है। अब वह संसार के दुसरे हिस्से में भी - जहाँ पहले कभी नहीं गया होता है - वहां भी जाता है।

घर से बाहर निकलते ही, उस गार्डनर को, अनेकों ऐसे प्रश्नो का सामना करना पड़ता है, जिनके बारे में उसे कोई अनुभव ही नहीं होता है। परन्तु पूरी तरह से अनभिज्ञ होकर भी, वह अपने मौलिक - बागवानी - के अनुभव और ज्ञान पर आधारित, उत्तर देता रहता है। जैसा सिनेमा में चित्रण है, प्रश्नकर्ता और बाकी लोग ये पाते हैं कि - गार्डनर का दिया हर एक बागवानी से जुड़ा मौलिक सा उत्तर - उन सभी समस्या, माहौल या प्रश्न के लिए, बिलकुल सटीक बैठता है। इस फिल्म को देखते समय, बार-बार इस बात का स्मरण होता है कि - महात्मा बनते नही हैं, बल्कि स्वतः बन जाते हैं - या बना दिए जाते हैं ।

प्रसिद्द हिंदी फिल्म - गाइड - में भी कुछ ऐसा ही चित्रण है। जब राजू-गाइड के आडंबर और वेश भूषा को देख कर, अकाल-पीड़ित गाँव के भूखे और मरणासन्न निवासी - उसमे ही आखरी उम्मीद के किरण के रूप में, ईश्वर का प्रभाव देखने लगते हैं। विवशता-वश, सारे गाँव वाले उनके चरणो में लेट कर, उससे ही बारिश करवाने के लिए, ईश्वर की प्रार्थना और उपवास करने की मांग कर बैठते हैं। 

आस्था का जन्म - विवशता के शव से हो के गुजरती है। और यह प्रक्रिया अति संक्रामक होता है - विश्वास - आस्था का ही जुड़वा होता है, एक का अनुभव, दुसरे के लिए विश्वसनीयता और तत्पश्चात आस्था का स्त्रोत - और फिर, लोग स्वयं ही प्रश्न करते हैं, और किसी - महापुरुष - के वाणी में, स्वतः ही उत्तर भी ढूंढ लेते हैं।

परसाई के इस कथा - "टॉर्च बेचनेवाला" में, दो मित्र- विपन्नता से ग्रसित हैं। दोनों अपने जीविकोपार्जन के लिए, किसी भी तरह के "धंधा" करके के सोचते हैं। "3 Idiots" - की तरह, पांच साल बाद, दोनों वापस मिल कर, अपने अपने चुने रास्ते का स्वावलोकन और सफलता का आंकलन करने की सोचते हैं। कहानी में जैसा विदित है, वे पुनः मिलते हैं। संयोगवश, दोनों "अंधकार और प्रकाश" के ही धंधे में होते हैं। लोगो को "अन्धकार" से डराने, और फिर उसके निदान के रूप में - प्रकाश - का सौदा।


जहाँ एक मित्र, लोगो को सामान्य जीवन में अन्धकार के नुक्सान और उससे बचने के लिए उजाले देने वाले टॉर्च के फायदे बता कर, "सूरज छाप" टॉर्च बेचता है। तो वही दूसरा मित्र, मनुष्य के जीवन की सूक्ष्मता और फिर आत्मा के अन्धकार में होने के बारे में उन्हें अवगत कराता है। निदान स्वरुप, लोगों को - "साधना -मंदिर" में आने का हल बताता है। यहाँ, वह भी सबों को प्रकाश की ओर ले जाने में मदद करने वाले, "अदृश्य-टॉर्च" को ही बेच कर, "सनातन" व्यवसायी के रूप में, सफल होकर एक फलता-फूलता व्यवसाय को चला रहा है ।

परसाई जी के लेखनी का कमाल है, कि पाठक को यह समझने में देर नहीं लगता कि दोनों के वक्तव्यों में बहुत समानतायें हैं। पर - सन्दर्भ और परिपेक्ष्य के अंतर ने - उन्ही वक्तव्यों के गूढ़ता और गहराई में, मीलों का फासला ला दिया हैं। फलस्वरूप, जहाँ पहले को टॉर्च बेचकर लोगों से पैसे की मांग करनी पड़ती है, वहीं दूसरी ओर - उसके मित्र के द्वारा, जीवन के परिपेक्ष्य में दिए वैसे ही वक्तव्यों पर - बड़ी संख्या में श्रद्धालु समर्पण के भाव से, नत-मस्तक होकर - स्वतः धन को उन्मुक्त भाव  से "अर्पित" कर रहे होते हैं।  कहना नहीं होगा कि "बाबा" बन चुके मित्र का "धंधा" फल-फूल रहा है। कहानी, समाज में व्याप्त धर्मांधों और धर्म-गुरुओं के ढकोसले पर सटीक कटाक्ष है। 

कथा पढ़ते समय, मेरे मन में एक और विचार आया - अन्धकार क्या है? वस्तुतः अन्धकार कुछ होता नहीं है, अपितु, प्रकाश का अभाव ही अन्धकार है। प्रकाश के अभाव में बने, अंधकार को ही दूर करने के लिए - प्रकाश के पूरक के रूप में, टॉर्च की आवश्यकता होती है।

मुझे स्मरण हुआ कि कुछ साल पहले, मैं अपने घर में, एक मीडिया रूम बना रहा था। उस क्रम में, प्रोजेक्टर लगाते समय अनुभव किया कि - परदे पर पड़ रहे सिनेमा के सजीवता को, और प्रखर बनाने के लिए, मुझे - ब्लैक के लेवेल - को, और बढ़ाने की आवश्यकता थी। ब्लैक के लेवल बढाने का अर्थ था कि अन्धकार को और बढ़ाना! प्रोजेक्टर से अन्धकार को नहीं लाया जा सकता था। बल्कि अन्धकार को बढ़ाने के लिए, कमरे के इर्द-गिर्द के रोशनी को ही बंद करना पड़ा था।

जीवन में भी, जब हम प्रकाश के सभी स्त्रोत को बंद करते जाते हैं तो - प्रकाश के कमी से - अंधकार बढ़ता जाता है। फिर, हमें भय सा होने लगता है - या फिर, कोई बाहर से भय को और उजागर करने के लिए - टॉर्च जैसे अस्थायी और सीमित ज्योति -पुंज से हमारा परिचय करा देता है, जिस पर हम आश्रित से होने लगते हैं - क्योकि अन्धकार से हमें अब भय होने लगता है।अंततः, जब तक हम अपने अन्तः ज्योति को जागृत न करें - जीवन अन्धकारमय ही रह जाता है - टॉर्च जैसे प्रकाश के स्त्रोत से आगे, हमें किसी स्थाई प्रकाश के ओर अग्रसारित होने की प्रबल इच्छा होने लगता है।

करना तो हमें स्वयं ही होता है, पर विकल्पों के तलाश में हम बाहर की ओर झांकते फिरते हैं - कबीर के दोहे में व्यक्त कस्तूरी मृग की भाँति -
कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढत बन माहि | ज्यो घट घट राम है, दुनिया देखे नाही |
जैसा कि कहीं पढ़ा या सुना था -
उम्र भर यही भूल करता रहा, धूल था चेहरे पर और आईना साफ़ करता रहा। 

Dec 7, 2015

किंकर्तव्यविमूढ़

यह चित्र मुझे इंटरनेट पर मिल गया। मैं नहीं जानता कि यह चित्र कैसे, कहाँ से और किस प्रयोजन से लिया गया है - बहरहाल, मुझे यह बहुत पसंद आया, और मुझे इस पर, कुछ लिखने का मन कर गया, इस लिए, इसे यहाँ प्रस्तुत किया हूँ।




इस चित्र में, एक गधे को मझधार में पड़े एक नाव पर, बिना किसी सहारे के दिखाया गया है। गौर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि गधे को, इस बात का कोई इल्म भी नही है, कि वह किस मुसीबत में फंस चुका है! ऐसा उसका गधा होने के कारण है या स्थिति ने उसे गधा बना दिया है - गधा एक संज्ञा के रूप में लेना चाहिए या विशेषण? गधा - तो गधा होता ही है, पर क्या स्थिति भी किसी को "गधा" बना देता है?
मुझे इस गधे को देख कर, अपने देश की शिक्षा पद्धत्ति के परिणाम के तौर पर, कॉलेज से डिग्री ले कर निकले छात्रों का बोध होता है। कुछ विचार-बिंदु :
१. चारों तरफ पानी काफी गहरा है- इस से साबित होता है कि मामला काफी गंभीर है।
२. इस स्थिति में वह स्वयं नहीं आया है, बल्कि किसी ने लाकर छोड़ दिया है।
३. इतनी दूर तक वह हठात् नहीं आ गया है, बल्कि आने में काफी considerable समय लगा होगा।
४. यथास्थित में बने रहना कोई option नहीं है।
५. "What got you here will not take you there" - स्पष्ट रूप से यहाँ तक आने का जो भी तरीका था, अब वह इसके लिए नहीं उपलब्ध है, अतः किनारे तक वापस जाने के लिए, इसे तैरना होगा या फिर कोई और जुगत लगानी पड़ेगी।
६. यह परिस्थिति, इस गधे के लिए एक "टर्निंग पॉइंट" हो सकता है - क्योंकि इसके बाद वह काफी जागरूक रहेगा और इस तरह के स्थिति में स्वयं को कभी नही देखना चाहेगा।

मैं बचपन में, विनोबा भावे का लिखा एक निबंध - "जीवन और शिक्षण"  - पढ़ा था,  जिसमे विद्यार्थी जीवन से यथार्थ के यात्रा को - "हनुमान -कूद" - की उपमा दी गयी है! ये एक विसंगति नहीं है तो क्या है कि - शिक्षण पद्धति को यथार्थ जीवन के लिए व्यवहारिक बनाने हेतु, उनके बताये सुझावों और अन्य सन्देशों का, हमारे शिक्षा-विदों पर यह असर हुआ कि - व्यवहारिकता के समावेश या ज्यादा महत्व देने वाले इस निबंध को ही पाठ्य-कर्म में डाल कर उनके विचारों की तिलांजलि दे दी गयी। हम सभी ने इस निबंध के रट्टे लगा कर, अच्छे अंक प्राप्त कर लिए, और विनोबा के ज्ञानों को रद्दी के टोकरी में डाल कर, लगभग उनका उपहास ही कर बैठे, और उस निबंध के ५० साल बाद भी समस्या यथावत है और आज भी छात्र जीवन से यथार्थ की कूद - "हनुमान -कूद" ही है! लेख की कुछ पंक्तियों बरबस याद आ जाते हैं। इतने साल के अनुभव के साथ आज वे ज्यादा तर्कसंगत लगते हैं-

संम्पूर्ण गैरजिम्मेदारी से संम्पूर्ण जिम्मेदारी में कूदना तो एक हनुमान-कूद ही हुई । ऐसी हनुमान-कूद की कोशिश में हाथ-पैर टूट जाय तो क्या अचरज? - विनोबा भावे
आज भी, हमारे देश की शिक्षा-पद्धति, व्यवहारिक से इतनी दूर है, कि जब छात्र पढ़ाई पूरी कर के वास्तविक जीवन में प्रवेश करता है - तो स्कूल में पढ़ाये गए सभी ज्ञान - धरे के धरे रह जाते हैं, और हर किसी के लिए, हकीकत की दुनिया, एक बिलकुल नयी सी  - जहाँ पूरी की पूरी पढाई निरर्थक, और कोई मतलब की नहीं नज़र आती है! हर कोई स्वयं को एक बिलकुल अजीबोगरीब सी स्थिति में पाता है - "किंकर्तव्यविमूढ़"!

Dec 5, 2015

गणेश मेला

आज गणेश चतुर्थी है और मुझे कदमा के गणेश मेला की बहुत याद आती है।
ऊपर लिखे वाक्य की शुरुआत करने के बाद, मैं इस पोस्ट को, समाप्त नहीं कर पाया था। आज फुर्सत मिला है, सोचता हूँ, इसे पूरा कर दूँ!

मुझे जमशेदपुर छोड़े कई साल हो गए। स्थान, संस्कृति और मान्यताओं के बदलाव के बाद भी, आजतक मेरे अंदर बसा बचपन, उतनी ही ताजगी के साथ बरकरार है। अपने अतीत के यादों के उस सागर में, अब मैं एक और गोता लगाने जा रहा हूँ।

अपनी जिंदगी के रंगमहल के बहुत सारे झरोखे में से एक, जो मुझे अपना बचपन दिखाता है, उस से जब कभी झांकता हूँ, तो मुझे सबसे पहले अपना नर्सरी स्कूल याद आता है। स्कूल के ठीक सामने, गणेश मेला का मैदान होता था। बगल में ही, ऊँचे दीवारों से घिरा, मंगल सिंह का अखाड़ा था। हर साल गणेशोत्सव के दौरान, प्रयोग में आने वाले गणेश जी के विशाल भव्य रथ को, पूजा के बाद उसी अखाड़े के अंदर रख दिया जाता था। अखाड़े के फाटक से, दीखने वाले रथ का कुछ हिस्सा, हमारे उत्सुकता का एक केंद्र बना रहता था। पूजा के दिन नज़दीक आते ही, उस रथ का फिर से पेंटिंग और साज सज्जा शुरू हो जाता था। जब कभी हमारे स्कूल में कोई ब्रेक होता था, सभी बच्चे अखाड़े के गेट से अंदर झांक कर, रथ में हो रहे बदलाव को देखते थे। 

स्कूल के ठीक सामने का विशाल सपाट मैदान - जो गणेश मैदान के नाम से आज भी जाना जाता है - आम तौर पर बिलकुल वीरान सा रहता था। क्लास रूम के खिड़की से, मैदान और उस से आगे, मेन रोड दीखता था। उन दिनों, मेन रोड पर, साइकल वाले की भी 'औकात' होती थी। सुर-ताल के तर्ज़ पर, सड़क के किनारे पैदल चलने वाले, साइकल वाले का संगत देते थे। एकाध घंटे के अंतराल पर, "लाल डब्बा" के नाम से प्रसिद्द, टाटा का बना लाल रंग का एक बस, सड़क पर आते और जाते दिख जाता था।

"अंग्रेज चले गए और अंग्रेज़ी छोड़ गए" के आगे - अंग्रेजों के जमाने के छोड़े कार - जिनका सामने का भाग कुछ गोलाकार आकृति का होता था और जो अक्सर काले रंग का ही होता था - भूले-भटके सड़क पर, धीमी गति से ही सही, पर मुस्तैदी से अपने पुराने शानो-शौकत के साथ, चलते दिख जाते थे। उन दिनों, एम्बेस्डर और फ़िएट कारों का भी प्रादुर्भाव हो चुका था, पर वे सड़क पर, अल्पसंख्यक से होते थे। थोड़ी-थोड़ी देरी में, इक्का-दुक्का स्कूटर या मोटरसाइकल भी दिख जाया करता था- जो उन दिनों के हिसाब से, लोगों के वैभवता की, पहली निशानी सी थी! पर ज्यादातर सड़क पर, पैदल या साइकल-सवार ही दीखते थे।

साल भर, स्कूल के सामने के मैदान में, कुछ भी नहीं होता था - कुछ नहीं, मतलब, वाकई कुछ भी नहीं - और मैदान, बिलकुल वीरान-सा पड़ा रहता था। अफ्रीका के जंगल के सूख जाने के बाद से, सपाट पड़े उस मैदान में, गणेश चतुर्थी के करीबन एक महीने पहले, बारिश की बूंदों की तरह, अचानक एक ट्रक आती और बांसों के ढेर को गिरा कर चल जाती! जिस तरह से वीरान सूखे जंगल में, पेड़-पौधों के धीरे-धीरे उगने की प्रक्रिया से, जंगल के हरा-भरा होने की पुनरावृत्ति हो जाती हैं, उसी तरह से, उस पूजा के मैदान में भी - हमारे आँखों के सामने, समतल जमीन पर, धीरे-धीरे अनेक सारे छोटे-बड़े पंडाल, बिजली के गगनचुम्बी झूले, साथ में छोटे-बड़े अनेक प्रकार के झूले - जिनमे घोड़े, शेर, ऊँट और न जाने कितने जानवर के बने हुए, गोल घुमने वाले merry-go-round झूले - बहुतायत में होते थे, उनके साथ साथ और भी तरह-तरह के कई आकर्षण, जुड़ने शुरू हो जाते थे।

पूजा के पंडाल के बनने की प्रक्रिया, गणेश मेला की तैयारी के शुरुआत का बिगुल फूँक देता था। इसके बाद, धीरे-धीरे उस पंडाल के इर्द गिर्द, और भी बहुत सारी तैयारियां शुरू हो जाती थी। नर्सरी स्कूल के बच्चों के लिए, ये बहुत ही सुखद क्षण हुआ करते थे। मैदान में हो रहे अनेको गतिविधियों को, करीब से देखने को मिलता था - गड्ढे के खोदे जाने, फिर बांस को गाड़ने के बाद उनको आपस में समानांतर बांसों से जोड़ने के लिए, नारियल के रस्सी से बांधे जाने का पूरा उपक्रम, और उसके बाद अचानक से उपर "तिरपाल" (tarpaulin) के डाल देने के बाद, बन गए एक अस्थायी घर जैसा माहौल- सभी एक जादुई प्रक्रिया सा लगता था।


कल तक जो बिलकुल वीरान सा खाली मैदान होता था - उसके बीचो-बीच एक अस्थायी सा निवास का बन जाना, हम सभी को एक सुखद-आश्चर्य सा लगता था! उस पर से जब कभी बारिश हो जाती, तो उस पंडाल के अंदर खड़े होने का लुत्फ़, एक मज़ेदार अनुभव होता था - ऊपर तिरपाल पर पड़ते पानी के छींटों की आवाज - चारों तरफ से ढलकते पानी की धारें - अंदर अचानक से रुके हर वर्ग के लोग - ऐसा लगता था, जैसे बहते समाज का अचानक से लिया एक स्नैपशॉट हो - कुछ पैदल जा रहे लोग़ , कुछ साइकल सवार,  खोमचे वाले, तो हमारे जैसे कुछ बेकाम के लोग - पंडाल में काम करने वाले मज़दूरों के लिए 'बोनस' के तौर पर मिले कुछ विश्राम के क्षण - सभी एक साथ अंदर, इस इंतज़ार में, कि कब बारिश थमे और जिंदगी फिर से अपने लय में वापस आ जाए।

आकार में सबसे बड़ा - गणेश मंडप का स्थान तो निश्चित होता था। पर, हमें उस से ज्यादा उत्सुकता, तैयारी में लगे आस-पास के पंडालों में होता था, जिनके आकार और प्रकार को देख कर, हम अनुमान लगाने का प्रयास करते थे कि कहाँ कौन सा सर्कस, नौटंकी, चिड़ियाघर या कोई विशेष प्रकार का दूकान के होने की सम्भावना थी। हर साल के गणेश मेला में, हमें इंतज़ार होता था कि हमारे लिए कोई नयी तरह का मनोरंजन आये। बचपन से बड़े होने के क्रम में, हर साल उन्हीं आकर्षणों को देखने के बाद भी, देखने की पुनरावृत्ति में उतनी ही रूचि होती थी।

दुसरे शब्दों में - हमारा बचपन काफी manual सा होता था। यानी साधनों के कमी में, हम खुद से इज़ाद किये गए उपक्रमों पर ज्यादा आश्रित होते थे। उन दिनों टीवी या वीडियो गेम के आभाव में, हमारे लिए गणेश-मेला का एक विशेष स्थान होता था, क्योंकि यह काफी वृहत आयोजन होता था, और मेले की ख़ास बात यह थी कि यह काफी लम्बे अंतराल के लिए - लगभग महीने भर के लिए - होता था।

इस मेला के अलावा, हमारे मनोरंजन के लिए और भी दिन-प्रतिदिन के क्रिया-कलाप होते थे। सालों भर क्रिकेट मैच का जज़्बा बरक़रार रहता था। जज़्बा - मैच खेलने का, न कि टीवी पर देखने का - आज तो घरों के आस पास, उतने खाली मैदान भी नहीं बचे, पर उन दिनों जिधर नज़र पड़ती थी - कोई न कोई मैच चालू रहता था।

साल के शुरुआत में, ठंड के समय, आस-पास के किसी रमणीक स्थान पर - जैसे डिमना, पटमदा या दोमुहानी - पिकनिक का आयोजन, फिर सरस्वती पूजा का धूमधाम, और फिर - होलिका-दहन की तैयारी शुरू हो जाती थी। उन दिनों, हमारे घर से थोड़ी दूरी पर ही, नदी के किनारे - जंगल सा होता था, जहाँ से मोहल्ले के सभी छोटे-बड़े बच्चों के साथ मिलकर, होलिका के लिए पेड़ों से लकड़ियाँ काट कर लाने का, एक विशेष कार्यकम सा संचालन होता था।

अपने घर के सामने बने मैदान के बीचो-बीच, लकड़ियों का बड़ा सा ढेर बना कर, लकड़ियों को सूखने देने के लिए, एक ऊँचा टीला सा बना दिया जाता था। मोहल्ले के किसी भी बच्चे को, कहीं भी, लकड़ी के टूटे-फूटे फर्नीचर मिल जाते, उन्हें होलिका-दहन के टीले में जोड़ दिया जाता था। इस तरह से, लकड़ियों के जुड़ते रहने से टीले की बढ़ती हुयी ऊंचाई और चारो तरफ फैलाव में हो रही बढ़ोत्तरी को देख कर, हम सभी बहुत गौरवान्वित होते थे - उस अनुभव का मज़ा कुछ और ही था! साथ ही, होलिका दहन के दिन तक, लकड़ी की चोरी को रोकना, और उल्टा कहीं से लकड़ियों को चुरा कर, ढेर में जमा कर देने का मज़ा- एक अद्भुत सा अनुभव होता था!

अपने मोहल्ले में सरस्वती और गणेश पूजा का आयोजन, और कभी कभी किसी बड़े आयोजको के द्वारा सरस्वती पूजा के उपलक्ष्य में आयोजित - म्यूजिक पार्टी इत्यादि जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों का रसास्वादन! ये था हमारा बचपन, और उनके कुछ विशेष आयाम का ब्यौरा, इस पर कभी और, विस्तार से...!

खैर, वापस आते हैं गणेश पूजा के विवरण पर - पूजा के दिन के करीब आ जाने पर, सभी दूकानों और अन्य आकर्षणों पर, अंतिम चरण की तैयारी बड़े जोर-शोर से होने लगता था। शादी के दुल्हन के साज-सज्जा की तरह, दूकानों को भी, मानो नए परिधान से सजा दिया जाता था। दुल्हन के हाथों में मेहँदी की श्रृंगार की तरह, मेला के हर कोने को, बेहद आकर्षक सा बना दिया जाता था। शादी के मंडप की तरह - हर दूकान को, रंग बिरंगी आकर्षक कपडे, पोस्टर और साज-सज्जा से, जगमगा दिया जाता था। ऐसा लगता था, मानो उस वीरान समतल मैदान में, एक नयी दुनिया बस गयी हो। 

मेला के समीप स्कूल होने का एक बहुत बड़ा फायदा, यह होता था कि स्कूल में मिलने वाली गणेश चतुर्थी की छुट्टियीं के पहले, मेला में हो रहे अंतिम चरण तक की तैयारी को, हम बिलकुल करीब से देख पाते थे। मिठाई के दूकान में, तरह-तरह के व्यंजन बन रहे होते थे, जिस से हमें मिठाइयों को बिलकुल शुरुआत से बनते देखने का अनुभव होता था, और साथ ही पाक-शास्त्र का ज्ञान भी प्राप्त होता रहता था।

झूलों के लगाने के क्रम में,  प्रयोग में आने वाले तरह तरह के नट-बोल्ट, स्क्रू-ड्राइवर, रेंच और अनेक प्रकार के अन्य मशीनों के प्रयोग को देख कर, हमें थोड़ी बहुत इंजीनियरिंग का भी ज्ञान मिल जाता था - उसी क्रम में, कई बार हमें झूलों पर 'ट्रायल रन' के तौर पर, मुफ्त का झूला भी झूलने का अवसर मिल जाया करता था। कई बार, हमें मेला के चिड़ियाघर के जानवरों को भी, चोरी-छिपे देखने का अवसर मिल जाता था।

उन दिनों गणेश मेला का भ्रमण, एक पारिवारिक कार्यक्रम सा होता था। घर के अभिवावक के साथ जाना अपरिहार्य था, और इसका आयोजन बाकायदा हफ्ते भर पहले से होता था कि - "अमुक दिन, हम सभी मेला देखने जाएंगे"। मेला में जाने के पहले हमें काफी सारे निर्देश दिए जाते थे - "बड़े बच्चों को छोटे पर ध्यान", "सबों को हमेशा एक दुसरे के हाथ पकड़ कर चलने का" और इसी तरह के अनेक सारे "ब्रीफिंग" देने का मूल कारण  - "मेला में बच्चे खो जायेंगे"- इसके रोकथाम से सम्बंधित होता था। शायद, उस ज़माने के अभिभावकों को अंदाज़ा नहीं था कि उन दिनों के मेले का भीड़, आज किसी भी फुटपाथ पर देखने को मिल जाता है - और आज भीड़ में हर कोई यूँ ही भटका सा घूम रहा है!

कदमा पोस्ट-ऑफिस के पास आते ही मेला का शोर और चकाचौंध दिखना शुरू हो जाता था। मेला के परिसर से काफी पहले ही - "भूखे भजन न होहि गोपाला"- के समर्थन में अनेको खाने वाले - जिनमें प्रमुखतः -गोलगप्पे, चाट, समोसे, मूंगफली और अन्य प्रकार के खाने के सामग्री वाले होते थे - अपने ठेले को लगाये होते थे। वे कुछ इस बेरौनकी से खड़े होते थे - जैसे उन्हें मेले के अंदर आने का मौका नहीं मिला हो। फलस्वरूप, वे मेले से काफी पहले ही, दूर अँधेरे में अपने किस्मत को आजमाने के हिसाब से खड़े रहते थे। इतने शोर के बीच भी, इन ठेले वालों का, अपने उपस्थिति को दर्ज़ कराने के साथ-साथ, मेला में अंदर जाने वालों का ध्यान आकर्षित करने के लिए, कुछ विशेष अंदाज़ होता था।

डोसा बेचने वाला, अपने तवे पर छलनी को पीट-पीट कर ठन-ठन के ध्वनि को उद्गारित करते हुए - चनाचूर और सनपापड़ी वाले, अपने ठेले में लगे घंटी को बजाते हुए - अनेको गुब्बारे वाले, तरह-तरह की आकृतियों को बना कर उन्हें रगड़-रगड़ कर एक तीखी आवाज़ निकाल कर - बांसुरी वाला, एक हाथ से बांस के एक मोटे स्तम्भ के ऊपर लगे बांसुरी के ढेर को सम्हाले, और दुसरे हाथ से, एक विशेष प्रकार से बांसुरी को बजाते हुए - तो भोंपू वाला, अपने किसी भोंपू को ही फूंक-फूंक कर, लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते पाये जाते थे। उन सबों के बीच, मूंगफली वाले, अपने ठेले के ऊपर मूंगफली के ढेर लगाये, उनके ऊपर सिर्फ एक मिट्टी के बने हांडी- जो मूंगफली को पकाने के काम आता था - उस से निकलते धुँए से ही, खुद के मूक प्रचार में, विश्वास रखते थे।

मेले के अंदर घुसते ही, बहुत सारे लकड़ी के झूलों का एक काफिला सा होता था - जिन्हें झूलेवाले, हाथ से ही खींच-खींच कर, चलाते रहते थे। पर मेरी दिलचस्पी, आगे मेले के अंदर जाने की होती थी - जहाँ दोस्तों के द्वारा बताये गए, कुछ नए तरह के आकर्षण को, देखने की होती थी- जैसे, "बोलती गुड़िया के कारनामे" या "आठ पैरों वाली लड़की के प्रदर्शनी" आदि-आदि। मगर घर के बड़े बुजुर्गों का आदेश होता था कि - "पहले गणेश जी का दर्शन, और उसके बाद ही कोई और मनोरंजन"। इस लिए, क्रिकेट मैच के दौरान, स्टेडियम में तैनात सिपाहियों की तरह, हम अपने इर्द गिर्द के सभी आकर्षणों को देखने के बावजूद - चुपचाप दम साधे - भगवान के मंडप तक आगे बढ़ते चले जाते थे।

आगे बढ़ते ही, अनायास "बजरंग-चिड़ियाघर" दीख जाता था, जो काफी विस्तृत क्षेत्र में फैला सा होता था।चिड़ियाघर के सामने, काफी ऊंचाई पर एक मचान सा बना होता था, जिस पर - सफ़ेद पंख और बहुत बड़े चोंच वाले - किसी विशेष प्रकार के पक्षी (शायद Pelican - जिसे "जलसिंह" भी कहते हैं) के बगल में बैठा दूकानदार, चीख-चीख कर अंदर के जानवरों के बारे में - अनेको प्रकार के सही या गलत, पर रोचक - जानकारियां देता रहता था। लाउडस्पीकर में, किसी फ़िल्मी गाने के शोर के बीच, गाने की आवाज को धीमा करते हुए, सामने लटक रहे हर जानवर के बिल्ले पर डंडे से इशारा कर के दिखाते हुए, कुछ अजीब सी तीखी और सधी हुयी आवाज में -
आइये, देखिये इस मस्त-कलंदर-बन्दर को - ये दिन भर में दो दर्जन केला खा जाता है- दिन में सोता है रात को जागता है - जंगल में एक बार छूट जाए तो - किसी के पकड़ में नहीं आता है - आइये देखिये - इनको करीब से देखिये- और वो देखिये - वो है साइबेरिया का भालू- ये दिन में २२ घंटे सिर्फ सोता रहता है - ये सिर्फ बांस खाता है... !
और पुनः लाउडस्पीकर में फिर से गाना शुरू, बीच-बीच में सामने लटक रहे चवन्नी के सिक्के के चित्र के बने गोल से बड़े घंटे पर, जोर से डंडा मारते हुए -
मेहरबान, कदरदान, आइये-आइये सिर्फ २५ पैसे में देखिये ये सारे जानवर- बिलकुल जिन्दा - आइये, पूरे परिवार के साथ....!
जानवरों के बारे में दी गयी जानकारियां, इतनी रोचक होती थी कि अंदर जा कर देखने की बहुत इच्छा हो ही जाती थी। परन्तु हर साल चिड़ियाघर के अंदर जा कर निराशा ही होती थी क्योंकि ज्यादातर जानवर - थके, बीमार, कमज़ोर से होते थे - ऊपर से उतने छोटे से केज में बंद - बिलकुल निरीह से दीखते थे। बेचारे घड़ियाल का तो यह हालत होता था कि जाल से घिरे छोटे से केज, जिसके नीचे तलछटी में जीने के लिए थोड़ा सा पानी होता था - लोग उसमें कुछ पैसे डालते रहते थे- और -"जिन्दा है क्या?" - पूछे जाने पर, कोई कर्मचारी उसे डंडे से हुड़का देता - जिस के बाद भी, वह बामुश्किल सिर्फ हिल कर, अपनी बची-खुची मरणासन्न जिंदगी के कड़वे दुःख को, कुढ़ते हुए बयां कर, अपने जिन्दा होने का सबूत दे ही देता था!
आगे कहीं नंदन-कानन भवन दिख जाता था, जिसमे अनेको प्रकार की मूर्तियां - जिनके हाथ या पैर मोटर से चलते थे - उनकी प्रदर्शनी होती थी। इन कलाकृतियों की ख़ास बात यह होती थी कि इसमें कुछ ख़ास रोचक नहीं होता था, पर मोटर से उनमें कुछ गति लाकर किसी "व्यक्ति-विशेष संज्ञा" को "क्रिया" में बदल कर दिखाने की कोशिश होती थी - जैसे किसी सुखी परिवार के सभी सदस्यों के हाथ से हिलाते हुए -"टा -टा" करते हुए अभिवादन,  किसी लोहार का भट्टी के पास कुछ हिलते डुलते हुए -  सामने कुछ धधकते हुए आग सा दिखना, किसी देवी-देवता का हाथ उठा कर आशीर्वाद देना- यानि आज के कार्टून के प्रारम्भ के दौर की झलक सा होता था!

फिर अचानक सामने, काफी ऊंचाई पर बने प्लेटफार्म पर - मोटर साइकल के ऊपर सहज भाव में सवार, कुछ आकर्षक कपडे में बैठे जाबांज़ से कलाकार - एक्सीलेटर को दबा कर, कर्णभेदी तेज़ आवाज़ निकालते और ढेर सारे धुंवा को छोड़ते से - नज़र आते थे। सामने बने मचान पर बैठ कर उद्घोषणा होती - "आइये देखिये, इस मौत के खेल को - जान हथेली में रख के ये जांबाज़", ऊपर की और दिखाते हुए -
इस मौत के कुँए में मोटर साइकल चलायेगा, एक नही......दो..... जी हाँ, दो मोटरसाइकल चलेगा 
और इतने पर भी अगर लोग प्रभावित नहीं होते थे, तो वह आगे बोलता था -
एक चूक..... और मौत, जी हाँ.... मौत.... आइये, देखिये इन जाबांजों के कारनामे को, सिर्फ ५० पैसे में, आइये देखिये... ज़िंदगी ("ज़ि" को काफी देर तक खींच कर बोलते हुए)...... और मौत का तमाशा देखिये...... बस मौत का खेल शुरू होने को है - आइये इस खेल को देखना मत भूलिए.....आज का आखिरी शो, आइये... ।
इस रोमांचकारी कारनामे के शो के प्रचार में, "मौत" शब्द पर, बहुत जोर होता था। हर थोड़ी देर में, मोटर साइकल पर बैठा कलाकार - जिनमे महिलाएं भी होती थी - एक्सलेटर को खूब raise करते रहते थे, जिस से पूरी तरह से वातावरण में, रोमांच और कोलाहल सा मचा रहता था। साथ ही, वहां आस-पास में जले हुए टायर और जले-अधजले ईंधन का गंध भी व्याप्त रहता था।

इन सबों के बीच, देश के लगभग सभी बड़े शहर -  कलकत्ता, दिल्ली, पटना, बंबई, मद्रास, बनारस, लखनऊ - के नाम पर बने, मिठाई और चाट-भण्डार के अनगिनत छोटे-बड़े दूकान होते थे। कुछ भगवान के नाम जैसे - श्री कृष्ण चाट, भोला मिष्टान्न, मथुरा चाट - अपने पवित्रता और सात्विकता का बोध कराते थे तो कुछ सिर्फ अपने नाम पर ही भरोसा करते थे - जगदीश चनाचूर, गोलू कुल्फी आदि। कुछ प्रसिद्द स्थानीय खाने के दूकान - फकीरा चनाचूर, गौरांग मिठाई, भोला महाराज, नवरंग कुल्फी आदि के भी स्टाल लगे होते थे। पर एक विशेष आकर्षण होता था - बनारसी पान दूकान - जहाँ पर, बर्फ की सिल्ली पर रखे ठन्डे पान की कीमत, किसी मिठाई से भी ज्यादा होता था!

तरह-तरह के गुड्डे गुड्डियां - साज सामान के दूकानें, खिलौने के दूकान, और अनेको तरह के आकर्षण के बीच कुछ अजीब प्रकार के स्टाल या दूकान भी लगे होते थे जो - मेले के मूड से अलग - कुछ रोजमर्रा के काम में आने वाले सामान को बेचने में लगे होते थे - जैसे बिस्तर में बिछाने वाले चादर या रसोई के काम में आने वाले चाकू-छूरियां, चम्मच, बर्तन आदि के दूकान!

फिर सदियों से चले आ रहे निशाना लगाने वाला दूकान - चादर पर लगे छोटे-छोटे रंग-बिरंगे गुब्बारों को गोल आकृति देकर सजाया जाता था और उन पर, बन्दूक से निशाना लगाने का मज़ा, कुछ और ही था - जब निशाना लगाओ, तो चूक जाता और जब अनाड़ी की तरह चलाते थे, तो गुब्बारा क्या, सामने लटकती गुड़िया को भी छलनी कर देते थे - साथ ही, कुछ वैसे दूकान भी होते थे - जहाँ रिंग फेंक कर - सामान जीतने वाले का होड़ सा लगा रहता था।

मेला के परिक्रमा के दौरान कुछ विशेष प्रकार के आकर्षण भी होते थे, जो शायद उन दिनों के कुटीर उद्योग का, उत्कृष्टतम प्रमाण सा होता था। आज के जामने में - चीन से बन के आये हर खिलौनों से काफी अलग - देसी खिलौनों का दौर हुआ करता था। अनेकों खिलौने उन दिनों का काफी हिट आइटम हुआ करता था - जैसे रबर के स्प्रिंग से बना मगरमच्छ, जिसे खीच देने से, वह खुद से चलने जैसा अनुभव कराता था।

बचपन में एक और खिलौना बहुत प्रचलित हुआ था, जिसमे नाव के पिछले हिस्से के ऊपर मोमबत्ती को जला कर उसे पानी में स्वतः चलते देख कर, हमें विज्ञान के चमत्कार में यकीन करने का दिल कर जाता था। कुछ बेहद ही सस्ता और सामान्य सा खिलौना - जैसे किसी ठोस वस्तु से बने छोटे से गेंद को किसी इलास्टिक वाले रबर से लगा कर दूर तक खींच के वापस हथेली में ला देने वाला खिलौना- शायद इसे उन दिनों - "रफूचक्कर" (yo-yo) - कहा जाता था!

एक और खिलौना होता था -जिसमें किसी स्प्रिंग से बने बन्दूक जैसे उपकरण से, खिलौने को हवा में पहुंचा दिया जाता था, जहाँ से नीचे गिरते समय, वह एक पैराशूट से लटकती गुड़िया सा बन कर आसमान से धीरे धीरे उतरता सा दिखता था - और इसी तरह के अनगिनत खिलौने, उन दिनों हमारे लिए, एक विशेष आकर्षण से होते थे। हमारे लिए उनका महत्त्व, आज के बच्चों के विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक गैज़ेट या अन्य आधुनिक गेम कंसोल से, कही बहुत ज्यादा होता था!      

कुल मिला कर आज के युग के मुकाबले हमारा बचपन ब्लैक एंड व्हाइट सा होता था - और. गणेश मेला जैसा आकर्षण, उनमें रंग भरने का एक सार्थक सा काम करता था। वैसे, उन दिनों के फोटो-स्टूडियो में फोटोग्राफ में, अलग से रंग भर कर उन्हें उन दिनों के हिसाब से "रंगीन बनाने" का भी प्रचलन सा था। उस युग के लोगों के सामान्य व सरल सी जिंदगी में, चुटकी भर 'रंगों' का महत्त्व, आज के रंगीन जिंदगी के मुकाबले,  कुछ और होता था!