Oct 30, 2016


यह कविता शायद मैं अपने प्राम्भिक कक्ष में पढ़ा था और अभी इन्टरनेट से कहीं मुझे इस कविता का पूरा अंश मिल गया, मज़ा आ गया पढ़ कर! शायद मैं कक्षा २ या ३ में पढ़ा था - एक और कविता होती थी - करो मित्र की मदद हमेशा, तन से, मन से , खुश हो हो कर! फ़िलहाल दीपावली के उपलक्ष्य में ये भेंट-

दीप जलाओ दीप जलाओ
आज दिवाली रे
ख़ुशी ख़ुशी सब हँसते आओ
आज दिवाली रे

नए नए मैं कपडे पहनूँ
खाऊं खूब मिठाई
हाथ जोड़ कर पूजा कर लूँ
आज दिवाली आयी

मैं तो लूंगा खूब खिलौने
तुम भी लेना भाई
फुलझड़ियां अब खूब जलाओ
आज दिवाली आयी

आज दुकानें खूब सजी हैं
घर भी चम चम करते
जगमग जगमग दीप जले हैं
कितने अच्छे लगते

दीप जलाओ दीप जलाओ
आज दिवाली रे
नाचो गाओ ख़ुशी मनाओ
आज दीवाली रे

Feb 23, 2016

कदमा बाजार

बचपन में स्कूल आने और जाने के दौरान, मुझे रास्ते के अगल-बगल, सड़क के किनारे होते गतिविधियों को करीब से देखने का बहुत शौक होता था। उन दिनों घर से स्कूल जाने के लिए, मुझे कदमा बाजार के आस-पास से गुज़रना पड़ता था।

उन दिनों के कदमा बाजार के माहौल को, किसी ग्रामीण हाट के परिष्कृत रूप में ही समझना चाहिए। बाज़ार के अंदर, टीन शेड वाले - स्थाई और अस्थाई के बीच झूलते से- कई सारे दुकान बिखरे पड़े थे। बाजार के अंदर, अनेको प्रकार के दूकान थे, पर बहुत कम संख्या में ही सीमेंट और ईंट के बने पक्के दुकान थे। ऐसा ज्ञात होता था कि शुरू के बने कुछ स्थाई दुकानों के इर्द गिर्द, कई सारे दूकान जुड़ते चले गए होंगे - और कुल मिला कर, बाज़ार बहुत ही घनी और भीड़ भरा, मेले के जैसा शकल ले लिया था।

रोजमर्रा की हर चीज़ों के लिए लोग कदमा बाज़ार आते थे जिनमें मिठाई से मछली, कपडे से लेकर कंसार के दूकान, गेंहू को पीसने वाले आटा-चक्की से लेकर शादी के कार्ड से किताब तक छापने वाले प्रेस, रेडियो से लेकर गाड़ी के मरम्मत करने वाले या फिर होमियोपैथी अथवा अंग्रेज़ी दवा-दारु करने वाले डाक्टर और दवा के दूकान - यानि जो कुछ भी एक घर को चलाने के लिए जरूरी हो सकता था, वे सभी कुछ उस बाजार में मिलते थे।

वैसे वहां कुछ "महंगे" दूकान से भी हुआ करते थे जो कदमा बाजार में भी साडी, कपडे या सोने के आभूषण बेचने जैसा दुस्साहस करते थे, क्योंकि ऐसे महंगे सौदे के लिए साकची अथवा बिष्टुपुर जाने का प्रचलन सा था।

कदमा बाजार से मेरा रिश्ता है, धुंधली सी हो गयी यादों में भी कदमा बाजार उभर कर आ जाता है।
  
मेरे नानाजी को बाजार जाने का व्यसन सा था और इस कारण वे शुबह या शाम एक चक्कर जरूर लगाते थे। मेरे जरा बड़ा हो जाने के बाद, मुझे उनके साथ सामान को ढोने का स्वतंत्र कार्य-भार के लिए चुना गया था। मेरे इस महत्वपूर्ण कार्य के चयन में मेरे घर पर उपद्रव करने से रोक, और शारीरिक क्षमता आदि जैसे अनेकों कारणों का समावेश सा रहा होगा।परन्तु अब लगता है कि संभवतः ऐसा इस लिए हुआ होगा क्योंकि अक्सर शाम के समय जब बच्चे एक-दूसरे के साथ खेलते या गप-शप करते, मैं घर पर अकेला बोर होता रहता था।

मेरे साथियों के बहिष्कार के अनेकों कारण का निचोड़ यह था कि - किसी भी खेल में लोगों को मेरी अधीनता स्वीकारनी पड़ती थी। मेरे पास क्रिकेट खेलने के लिए अपना बैट और बॉल होता था, जिस कारण लोग मेरे साथ खेलने मेरे पास आते थे, पर शर्त यह होता था कि जिनको मेरे साथ खेलना हो, वे अपने बैटिंग का क्रम निर्धारित कर लें, पर सबसे पहले बैटिंग मेरी ही होगी।

यहाँ तक के शर्त को मानने के लिए सब सहर्ष तैयार हो जाते थे, पर समस्या इसके बाद शुरू होती, जब मैं स्वयं को कभी आउट नहीं मानता, चाहे कोई भी नियम से मुझे आउट करने की कोशिश की जाए। एकाध बार मेरे आउट होने और मेरे नहीं मानने के कारण, धीरे-धीरे अपने बौद्धिक क्षमता के हिसाब से बच्चे खेल से गायब होने लग जाते थे। और अंत में जब चंद बचे हुए निरीह प्राणी, बड़े हसरत से अपने बैटिंग को पाने के लिए अधीर होकर जरा सा खीझने से लगते थे, तो मैं उनके इस तरह के विरोध को भी नहीं पचा पाता था। जल्द ही मैं बैट और बॉल को लेकर घर की ओर चल देता।

इस तरह के बहिष्कार करने के बाद, एकाध लोग दबे स्वर में विरोध प्रकट करते थे, पर चूँकि बैट और बॉल मेरा ही होता था, कोई मेरा कुछ भी नहीं कर पाते थे। मेरे घर के आस-पास ही खेलने के दौरान, घर के किसी अभिभावक के निगरानी होने के वजह से, ज्यादातर बच्चे कुछ बुदबुदाते हुए,  कुछ धीमे स्वर में गलियां देते और कुछ तो मुझसे कभी भी बात न करने की दुहाई देते हुए, बेबस, लाचार  और ठगे सा महसूस करते हुए अपने-अपने घर की ओर रुखसत कर जाते। 

इस तरह के एकाध बार के व्यवहार के बाद, बहुत कम ही धैर्यवान बचे थे, जो मेरे साथ खेलने की जुर्रत करने की हिम्मत जुटा पाते थे। जल्द ही मैं अकेला निराश होकर बाकी को खेलते हुए देखता, और फिर किसी बच्चे का मेरे तरफ कोई रूचि न दिखाने के कारण, मेरे अंतर्मन को बहुत ठेस सी लगती, और मैं अक्सर दुखी होकर अपने घर के सामने निराश खड़ा रहता था।

फिर कुछ दिनों तक घर के छत, अमरुद के पेड़ आदि पर चढ़ने, कूदने जैसे स्वततंत्र क्रिया-कलाप के बाद धीरे-धीरे यह महसूस करने लगा था कि - समाज परस्पर संबंधों पर आश्रित होता है, और मेरे इस तरह से लोगों के बहिष्कृत कर देने के कारण मैं बहुत दुखी एवं निराश रहने लगा था। अंततः एक दिन मेरे अंदर से स्वतः यह प्रस्फुटित हो गया कि -"नानाजी, मैं किसके साथ खेलूं?"

नानाजी को लगा कि मुझे अपने साथ कभी-कभार बाजार ले जाने से - एक पंथ दो काज होने लगा था। उन्हें भी रास्ते भर के लिए सामान उठाने के लिए मेरे जैसा एक सहायक मिल गया था। अनायास इस तरह के वैकल्पिक व्यवस्था के बन जाने से मुझे अनेको प्रकार के नए रोचक जानकारियां मिलने लगी थी। किसी अभिभावक के साथ बाजार जाने से मुझे सुरक्षित रूप से हर कोने के विचरण करने का अवसर मिलने लगा था।

बाजार के अनेको प्रकार के क्रिया-कलाप को करीब से देखने में बहुत दिलचस्पी आने लगी थी और इस तरह से जीवन के अनेको पहलुओं को करीब से देखने लगा था। साथ ही नानाजी कभी-कभार किसी मिठाई के दूकान में कुछ जलपान भी करा देते थे। ज्यादा समय मथुरा मिष्टान्न भंडार जाता था - काउंटर पर बैठे मिठाई दूकान के मालिक, नानाजी को देखते ही बड़े इज़्ज़त के साथ लगभग लाउडस्पीकर के फ्रीक्वेन्सी में -"आइये मिश्राजी, कहिये कैसे हैं?", कहता हुआ हमारे विशेष आवभगत करतने का निर्देश दे देता था।

रंकिनी मंदिर के तरफ से आने पर पहले मेरा स्कूल कदमा बॉयज़ स्कूल, फिर कदमा गर्ल्स सजूल और उसके बाद स्काउट सेंटर पड़ता था। तिकोने लाल रंग से बने उभरे डिज़ाइन वाले दीवार के ठीक बाद कदमा बाजार शुरू हो जाता था। सबसे कोने में दूध डिपो पड़ता था, जहाँ से मैं सुबह सुबह दूध के बोतल लेने आया करता था।  उसके ठीक बगल में टिन-शेड से ढंके दूकान होते थे जिनमे ज्यादातर टाइपिंग सीखाने वाले दुकान और एकाध प्रिंटिंग-प्रेस के दूकान होते थे, काफी दिनों तक इन दुकानों में जा कर प्रिंटिंग प्रेस के मशीन के बारीकियों को समझने की कोशेिश की थी। मेन रोड के तरफ एक राशन का दूकान होता था जिस पर जाने के लिए करीब ८-१० सीढ़ियों को चढ़ना पड़ता था।


इन दूकानों के कतार के दूसरे कोने में आटा चक्की हुआ करता था।

फ्लोर मिल के करीब आते-आते बरबस दो चीज़ों पर ध्यान चला जाता था। एक बहुत बड़ा सा तराजू जिसके बगल बचपन में देखी गयी सबसे बड़े बटखरे होते थे। और उस तराजू के ठीक सामने काफी मोटा सा इंसान बैठा होता था, जो उन भरी भरकम  बटखरे की तरह ही कभी-कभी ही उठ पाता था। तराजू के पीछे बैठा, मानो जीवन से पूरी तरह से निराश वाले भाव में वह बीच बीच में तराजू पर बटखरे रखता और, जैसे ही तराजू के धर्म-कांटा स्थिर होता, वह तुरंत वजन को लिखना शुरू कर देता।

वजन करने वाले की वेश-भूषा कुछ ऐसी होती थी कि मानो वह दूकान को बंद करते ही सीधा नहा सके, लुंगी के ऊपर एक गंजी, जिसमे वातानुकूलन के लिए अनेकों छोटे-बड़े छिद्रों की भरमार सी होती थी, उसे पहने वह पीसे हुए गेंहू के थैले की तरह बैठा होता था। सामने कुछ महिलाएं गोल बने "सूप" से फाटक फाटक कर गेंहू से कंकड़ और गंदगी निकालने वाले काम में - आटा चक्की के दूकान के परजीवी बन कर अपना पेट भी पाल रहे होते थे।

"गेंहू साफ़ करवा के फिर पीसने देने का विकल्प सामने दिख  ही रहा है, तो फिर बताने की क्या जरुरत है"- इस भावना के साथ तराजू में तौलने वाला मनुष्य इस तरह के विकल्प के बारे में बताने का कष्ट भी नहीं करता था, और अपने काम को पीछे चल रहे मशीन की तरह निशब्द भाव से करता रहता था। परिक्षा में पूछे किसी भी युद्ध के अनेको कारणों में से प्रमुख कारण - जिस के उल्लेख मात्र से परीक्षक को परीक्षार्थी के विषय पर सम्पूर्ण प्रभुत्व का बोध हो जाता हो, उसी तरह से इस शांत मनुष्य के निराकार भाव से तन्मयता पूर्वक काम करते हुए निशब्द होने का मुख्य कारण सर्वथा यह हो सकता था कि उसका मुंह खैनी के पीक से भरा हो, और जब तक जरुरत न पड़े वह थूकने के लिए उठने वाला व्यायाम नहीं करना चाहता हो।

सामने चल रहे गेंहू सफाई के प्रति अपने इस तरह भावना के जग जाने से लोग अपनी स्वेच्छा से गेंहू की सफाई के बाद पीसाई के काम का अनुमोदन करते हुए, वहां से बाजार के बाकी काम के लिए निकल जाते थे।
  
मिल में काम करने वाले लोग भी मशीन की तरह अपने अपने काम को करते रहते थे, मशीन के चीख-चीख कर शोर करने के बाद इंसानों के चीखने की इच्छा-शक्ति ख़त्म सी हो चुकी दिखती थी।मशीन अपना धर्म निभाते- अपने साथ काम करते इंसान बन चुके मशीन को भी अपने ही रंग में ही रंग चुका होता था। मिल के आसपास चारों ओर सफेद आटे की परत फैले होते थे। चौकोर चौड़े मुंह वाले शूट से गेंहू को डाला जाता था। सबसे ज्यादा शोर करते हुए मोटर से मोटे चक्की के बड़े-बड़े फ्लाईव्हील को अनवरत एक मोटा सा बेल्ट घूमाता रहता था। चलते मोटर में काफी शोर होता था, और बेल्ट के थोड़े ढीले होने और कुछ सिलाई आदि के कारण, हर बार उसके घूम कर वापस आने पर "फट्ट-फट्ट" के तमाचे मारने जैसी आवाज आती।

भूकम्प आने पर हिलते जमीन सा कांपता कंक्रीट के फ्लोर और शोर के बीच  सभी काम करने वाले कर्मचारी और तराजू के पास बैठी आदमियों के सिर और आँखों के बालों के ऊपर सफ़ेद आटे के परत लग जाने से, उनके कम उम्र के बूढ़े जैसा रूप-रेखा दिखता था। इतने शोर के बीच भी लोग बातें करते और आदमी और मशीन के बीच एक दूसरे के आवाज को शांत करने का प्रतिद्वंद सा चलता था। मेरा जी करता था कि चाहे तो वहाँ जितनी कोर से चाहे चीख लो, कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।

इतने शोर और  जलते हुए आटे के गंध के बीच भी एकाध लोग कुर्सी लगाए अखबार पढ़ने में लीन बैठे होते थे।

तराजू पर वजन करने के बाद, किसी भी तरीके से फाड़े हुए कागज़ के टुकड़े पर बेमन से उतने ही गंदे से लिखावट में गेंहू के वजन को लिख कर दे दिया जाता, और जब तक वजन लिखने का काम संपन्न होता, एक मज़दूर थैले को सामने के लम्बे कतार में लगा चुका होता था।

बारी-बारी से हर थैले को बड़े से चौकौर शूट में उड़ेल दिया जाता था। ठीक उसके नीचे के हिस्से में एक पैर के गोलाकर पजामे के शकल में लहराते कपडे के लम्बे पाइप जैसे हिस्से से सफ़ेद आटे निकलते रहते थे। मेरी समझ में आजतक यह नहीं आया कि  लगातार गेंहू के डालते रहने के कारण, मिल को ऑपरेट करने वाला मज़दूर को यह कैसे पता होता था कि किसके हिस्से का आटा कब निकल गया।

बहरहाल लगातार डाले जा रहे गेंहू और निकलते आटे का सिलसिला अनवरत चलता रहता, और जिस तरह से गेंहू के थैले के कतार किसी स्कूल में शिक्षा प्राप्त करनेवाले के पहले जैसे "कच्चे" अवस्था में होते, स्कूल से शिक्षा प्राप्त सफ़ेद महीन आटा बनकर सामने के कतार में बैठे मिलते। जिस तरह से सभी थैले के अभिभावक, अपने-अपने बच्चों को स्कूल में छोड़ कर जाते थे, कुछेक घंटों बाद वापस उन्हें लेने आ जाते थे। आटे के थैले को फिर से तौला जाता और गेंहू के बराबर वजन के बाद वहां का सिलसिला ख़त्म हो जाता।    


उन स्थाई दूकानों के बीचो-बीच बहुत बड़ा सा सब्जी-बाजार था। बिलकुल गाँव के हाट की तरह - जमीन पर बिछे हुए, बहुत सारे दूकान, ग्रामीण माहौल सा बना देता था। कतार में बैठे, अनेको सारे दूकान में - कोई मौसम के हिसाब से - सीज़नल - हरी सब्जियां बेचते हुए, तो दूसरी ओर सालों भर एकरसता के समां बनाये से - आलू-प्याज बेचने वाले भी एकाध कोने को सम्हाले रहते थे।

सब्जी-बाजार के एक कोने में, कुछ कम में ही संतोष करने वाले जैसे दूकान भी होते थे, जो सिर्फ नीम्बू, धनिया, मिर्च, अदरख और लहसुन बेच कर, अपने अस्तित्व को सम्हाले होते थे। आमतौर पर लोग सब्जियों के पूरे खरीद के बाद ही इन दूकानों के दर्शन करते हुए घर जाते थे। इस तरह के दूकान में अंत में आने का कारण यह होता था कि बचे खुचे - खुदरे से ही ऐसे दूकान का सौदा हो जाता था। साथ ही, बाकी भारी सब्जियों के खरीद के बाद, उनके थैले में जम जाने से, उनके ऊपर इस खरीद को रखने का फायदा यह था कि नाजुक से धनिया-पत्ते के झुण्ड के दब जाने का और पत्तों के टूट कर खराब हो जाने का भय नहीं होता था।

पूरे सब्जी-बाजार में बहुत शोर व्याप्त रहता था - हर कोई अपने सब्जियों के कुछ विशेष प्रकार से ज्यादा आकर्षक होने के प्रमाण स्वरुप - जैसे "हर्रा-हर्रा मटर" या "लाल-लाल टमाटर" या "ताज़ा करैला" आदि  जैसे विज्ञापन के "की-वर्ड्स" को प्रचारित करते रहते थे। साथ ही, सब्जियों के मूल्य को भी चिल्ला -चिल्लाकर सुनाते हुए, ग्राहकों को अपनी और आकर्षित करने के प्रयास में सतत लगे रहते थे। जो लोग सब्जियों को चुनने के काम में लगे होते थे, उनके पास एक डलिया होता था और जो उसी दूकान से खरीदने का मन बना लेते थे, उन्हें भी एक और डलिया दे दिया जाता था। जिसके बाद, सब्जियों को चुनने का ज्ञान होना, अपेक्षित था - अर्थात उनका ताज़ा होने का प्रमाण के लिए उपयोग में आने वाले व्यवहारिक ज्ञान या अनुभव।

वस्तुतः सब्जी के ढेर से अच्छी और ताज़ी सब्जी को चुनना - एक प्रकार से हर सब्जी के परीक्षण करके, उनको पास-फेल करने जैसी प्रक्रिया थी। हर सब्जी को परखने का एक निश्चित तरीका सा होता था, जिसमे उन सब्जियों का पास होना आवश्यक सा था - जैसे टमाटर का जरा कच्चा और सख्त होना, लौकी में नाख़ून से हल्का सा दाग लगाने से- हल्का सा रस की तरह - पानी का निकलना- या फिर भिन्डी के नीचले डंठल के तुरंत टूट जाना या बीन्स और बरबट्टी के आराम से टूट जाना आदि। ऐसे और भी सामान्य ज्ञान की शिक्षा - अपने बुजुर्गों के साथ, सब्जी बाजार में घूमने के दौरान मिल गया था। डलिया में सब्जी को छांटते या चुनते समय सिर्फ सोच का ही फेर था - अर्थात सकारात्मक भाव से सब्जी का चुना जाना और नकारात्मक भाव में उनको छांटना - अंततोगत्वा, सब्जी को उस डलिए में रखना ही लक्ष्य होता था। इस बात का भी ज्ञान होना आवश्यक था कि एक किलो में किस प्रकार के सब्जी का कितना मात्रा - "चढ़ेगा" - अन्यथा ज्यादा सब्जी को चुनने में लगाये समय व्यर्थ जाने वाला था। इस तरह से सब्जी का सौदा करना कोई बहुत "सरल-विधा" नहीं थी!

सब्जी बाजार को चारों ओर से कई और प्रकार के दूकानें कुछ इस तरह से घेरे होते थे, जैसे किसी हुड़दंगियों के झुण्ड को पुलिस घेरे हुए हों। इन दूकानों मे से कई सारे बाजार के सामने वाले रोड की ओर मुँह किये हुए होते थे। इन दूकानों में, कई सारे नाई के दूकान भी होते थे, जिनमें से एक - शर्माजी का नाई दूकान भी होता था, जो एकाध महीने में, हमारे सिर के बोझ को हल्का करने के लिए पहुँचने का एक निर्धारित सा लक्ष्य होता था। नाई दूकान और मेन-रोड के बीच के जगह - अमूमन तौर पर खाली होते थे। कई साल तक सड़क के दोनों ओर के फुटपाथ, वास्तव में लोगों के चलने के लिए ही हुआ करता था। इस वजह से, जैसा उम्मीद किया जाना चाहिए, वे खाली हुआ करते थे, बल्कि रोड के दूसरी ओर लाइन से बहुत सारे घर भी होते थे।

कालांतर में, उस रोड और बाजार के बीचे के खाली भाग में इक्का दुक्का करते हुए - बहुत सारे सब्जी बेचने वालों ने, जमीन पर सब्जियों का ढेर लगाकर सब्जी मंडी के जाल सा बनाना शुरू कर दिया, और फिर जैसा भारत के किसी खाली जगह का हश्र होता है- बाजार के पास वाले इस फुटपाथ में भी किसी अमरबेल की तरह से सड़क के दोनों ओर, सब्जियों का टीला सा लगने लगा। सब्जियों का ढेर - पंक्तिबद्ध - जिस तरह से खेतों में उगते थे, उसी प्रकार से बिकने के लिए भी कतारबद्ध से फ़ैल गए।

Feb 18, 2016

सड़क-छाप जड़ी-बूटी वाला

आज के दौर में बाबा रामदेव के पतंजली और आयुर्वेद के व्यवसायीकरण से बहुत पहले, आयुर्वेद, जड़ी-बूटी इत्यादि जैसे  दवा-उपचार का व्यवसाय एक कुटीर उद्योग के तौर पर हुआ करता था। इस तरह के व्यवसाय का जाल बहुत सारे वैद्य-हकीमों के बीच बिखरे पड़े थे। आये दिनों शहर के किसी भीड़-भाड़ वाले खाली जगहों पर इस तरह के वैद्य या हकीम अपना टेंट लगा कर अनेकों प्रकार के असाध्य और लम्बे समय से चले आ रहे बीमारियों को ठीक करने का दावा किया जाता था।

हिमालयी जड़ी-बूटी बेचनेवालों का हिसाब किताब कुछ अलग सा होता था। उनका टेंट  होता था जिसके अंदर उनके एकाध हफ्ते से महीनो का जुगाड़ सा लगता था। टेंट के सामने बहुत ही रोचक ढंग से अनेकों प्रकार के जड़ी बूटी और अन्य औषध के डिब्बे रखे होते थे। इन औषधियों मे काफी प्रकार के सूखे जड़ों के डंठल, सूखे बीज, या इसी तरह के अन्य प्राकृतिक सामग्रियाँ रखे होते थे, जिन्हे बड़े तरीके से शीशे के बरनी या कुछ उसी तरह के दिखने वाले जुगाड़ में बहुत हिसाब से प्रदर्शन के लिए रखा जाता था।

वैसे हमारे लिए बचपन में इस तरह के टेंट में कुछ ज्यादा समझने लायक तो होता नहीं था - क्योंकि इसमें बताये जाने वाले रोग एवं उपचार को जानने में हमारी कोई ख़ास रुचि नहीं होती थी। पर फिर भी अन्य कारणों से हम इन्हें देखने के लिए रुक जाया करते थे।

एक कारण तो यह हुआ करता था कि इस तरह के टेंट में बहुत अच्छे प्रकार का लाउडस्पीकर लगा होता था, जिसमे गाना वगेरह चलता रहता था। बीच बीच में गाने को रोक कर वैद्य या हकीम साहेब माइक में कुछ उद्धघोष करते थे और फिर टेंट के अंदर नुमाइश के तौर पर रखे अनेकों प्रकार के रंगीन पत्ते, बीज, इत्यादि फैले से होते थे और कहीं कही उनका ऊँचा सा ढेर लगा होता था  - जिन्हें वह अपने हाथ में रखे माइक से बहुत ही रोचक ढंग से बताया करते थे।

उस वैद्य के साथ ही उसका एक असिस्टेंट भी होता था जिसका काम तरह तरह के सामग्रियों को लेकर कुत्ते रहने या पीसने जैसे काम में लगा होना होता था। ज्यादातर वह बिलकुल चुपचाप सा होता था और अपने काम में बहुत निष्ठापूर्वक लगा होता था। मगर उसके बगल में एक बैटरी से चलने वाला माइक्रोफोन और कुछ गाने बजाने वाला - रिकार्ड प्लेयर होता था।  इतने सारे रोचक क्रियाओं को छाव से देखना बहुत ही सुखद अनुभूति होती थी। दवा का बनते देखना और उसका साथ में बज रहे मधुर गाने, फिर बीच बीच में रनिंग कमेंट्री भी सुनाई देता था।

मुख्य वैद्य या हकीम बिलकुल विद्वान सा लुक देकर सभी समस्याओं का समाधान बताने वाले मुद्रा में बैठा होता था।  बीच बीच में वह माइक से - अनेको प्रकार के बीमारी - उसके लक्षण- और फ़ी अचूक निदान के बारे में लोगो को जानकारी देता रहता था।  हरेक दो लाइन में - हिमालय, जड़ी-बूटी,  दुर्लभ, बेशकीमती, खानदानी वैद्य या हकीम. देसी जड़ी-बूटियों वाला काढ़ा, सालों से नहीं ठीक होने वाला बीमारी, सभी प्रकार के असाध्य रोग, शर्तिया इलाज़, गारंटी, पैसे वापस - जैसे शब्दों के उच्चारण से  समां बना रहता था।

बीच-बीच में वह एक छड़ी से दीखाता हुआ, कुछ अजब-अजब प्रकार के जड़ी-बूटियों की जानकारी देता हुआ, लोगो में अपने ज्ञान की छाप और विश्वसनीयता पैदा करने जैसा कुछ कार्यक्रम करता रहता था जब आस पास भीड़ काम हो जाती तो वह फिर से किसी हिंदी फ़िल्मी गाने का सहारा लेलेता और लोगों के मनोरंजन में अपने को भी समर्पित कर देता था।

भारत में फ़िल्मी गाने का बनने का मुख्य मकसद, फिल्म के किसी कठिन परिस्थिति को सहज और काव्यात्मक ढंग से संगीतबद्ध तरीके से व्यक्त करना रहा होगा। पर कालांतर में, फिल्म के गाने का मुख्य प्रयोग, रेडियो-स्टेशन में - विविध भारती  के २४ घंटे- सेवा में युक्त हो जाना, पार्टी-त्यौहार में बजते रहना और इस तरह के दूकान या मेले जैसे माहौल में बजते रहने का बहुत बड़ा उपयोग सा था।

इस कारण गाने का फिल्म में कोई प्रयोजन हो या न हो - पर उनका उपयोग, उसके अलावा और बहुत सारे अन्य क्षेत्र में ज्यादा होता था।

ये मैं हूँ!



क्रिकेट के झरोखे से बचपन - १९८३ वर्ल्ड कप

हर देश में कुछ ऐसी घटना होती हैं जो उस देश के इतिहास को काफी हद तक बदल सा देता है।  मैं जब गुज़रे सालों को देखता हूँ, तो भारत में अनेक सारे महत्वपूर्ण उपलब्धियों को या घटनाओं को - जिनको मैंने काफी करीब से देखा है - उनमे से कुछ प्रमुख हैं - भारत में इमर्जेन्सी का लगना फिर जे.पी. मूवमेंट और उसके बाद जनता पार्टी का बनना, सत्ता में आना और बिखरना, रोहणी के सफल प्रक्षेपण से लेकर कैप्टन रमेश शर्मा के अंतरिक्ष यात्रा और फिर पोखरण का परमाणु परीक्षण, ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गांधी की हत्या, और फिर दिल्ली का नरसंहार, और फिर न जाने कितने सारे इसी तरह के दुखद घटनाएं!
खेल जगत में भास्करन के टीम के द्वारा मास्को ओलम्पिक में हॉकी का गोल्ड मेडल, प्रकाश पादुकोणे का आल इंग्लैंड बैडमिंटन में विजय और अन्य।

पर इन सभी घटनाओं को एक तरफ रख दिया जाए और कपिलदेव के टीम का वर्ल्ड कप में विजय को दुसरे पलड़े पर, फिर भी १९८३ का विश्वकप के जीत जैसा अभूतपूर्व उल्लास मैंने अपने जीवन में नहीं देखा है!

ऐसा नहीं है कि इसके बाद कोई और उपलब्धियां नही हैं, पर मेरा मानना है कि इस जीत ने पूरे देश में एकनई संचार ला दी थी! 
The finest moment: Indian supporters invade the Lords cricket ground after India beat the West Indies to lift the World Cup in 1983. 

Feb 15, 2016

क्लास IV H2

ये लो मेरी याददाश्त के हिसाब से सभी के नाम : क्लास IV H 2 

Top Row (L-R) : Hemant Kumar,  Dheeraj Lal Patel, Vinay Kumar, Ram Kumar Jha, Akshaywar Nath Mishra, Binod Lal, Parmjeet Singh, Vijay Mahato, V. Anant, Babulal, ? (name nahee yaad aa raha hai, par, ye kadma ke ek biscuit bechne waale dukanwale ka beta tha), Ganesh Mahato

2nd Row (L- R) : Nitya Nand Choudhary (son of Tilak sirjee), Mani, Vijay Singh, Ghanshyam Kumar, Satpal Singh, Uday Narayan Singh, K, Shrinivas, Vinay Kumar, N. Srinivas, Girish Dubey, S. Ganesh, D. Sudhakar

3rd Row (L-R): Mahabir Bagh, N. Chandrashekhar, Chandrashekhar Mahato, Mohan Singh, Parmeshwar Sahoo, Sagar, Rajnish (?), Sandeep Gosain, Sanjay Jham Chandrashekhar Shukla

4th Row (L-R): Upendra Dubey, Jeetendra Kumar, Prasenjit Sinha, Abhijit Sinha, S. Jaiswal, R.C.Singh (Headmaster), Giri sir, Ram Kumar Singh, Bahadur Thapa, Rakesh Singh, Sajjan Singh

Last row on ground (L-R): Ravindra Kumar, Gocharan, Pratap Narayan Jha, Umesh Singh, Prem Swarup, V. Nagesh

Jan 24, 2016

क्रिकेट का संक्षेपण प्रक्रिया - मेरी राय

७० के दशक तक आते-आते लोग अपने दैनिक दिनचर्या में ज्यादा व्यस्त से होने लगे थे। अब उनके पास समय और धैर्य दोनों की कमी सी होने लगी थी। अब लोगों को लगातार ५-६ दिनों तक, बैट और बॉल के संघर्ष, और उस दौरान हो रहे रक्षात्मक खेल, कलात्मक तरीके से "कॉपी बुक स्टाइल" में खेले शॉट और इसी तरह के बारीकियों को देखने में कोई बहुत ज्यादा दिलचस्पी नहीं रह गई थी।

विदेशों में टीवी के आ जाने से क्रिकेट का लाइव कवरेज का प्रचलन तेज़ी से बढ़ते लगा था। अब लोग खेल को, देश की प्रतिष्ठा से कही ज्यादा, मनोरंजन के रूप में देखना चाहते थे। वे चाहते थे कि क्रिकेट को तेज़ गति से खेला जाए। साथ ही वे चाहते थे कि खेल का कोई परिणाम भी निकले। वैसे तो टेस्ट क्रिकेट में भी यह संभव है कि हर मैच में कोई परिणाम निकले, पर उन दिनों उस तरीके के नतीजे के लिए सकारात्मक टेस्ट क्रिकेट खेले जाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

टेस्ट -क्रिकेट : दर्शकों के धैर्य का टेस्ट

इसके लिए टेस्ट-क्रिकेट को समझने की आवश्यकता है, जिसमें इतने तरह के नियम हैं कि परिणाम के अनेक सारे संभावनाएं हो सकती हैं। किसी भी समय टेस्ट मैच कोई एक नया मोड़ ले सकता है। इसलिए अंतिम समय तक दर्शक को यह समझ में नहीं आता है कि कोई परिणाम निकलेगा भी या नहीं! मैदान में खेल रहे खिलाड़ी - ख़ास कर बैट्समेन, अगर चाहे तो खेल को कोई सा भी नया मोड़ दे सकते हैं। इस तरह से अगर कोई बैट्समैन मैच के अंतिम घड़ी में बॉल के साथ कम से कम छेड़छाड़ करे, तो इसका मतलब हैं कि रक्षात्मक तरीके से खेलते हुए ड्रॉ के लिए खेला जा रहा है।

इस तरह के बल्लेबाज के निर्णय का प्रभाव, टेस्ट मैच के परिणाम पर पड़ सकता है। कई बार जिस मैच को जीता जा सकता है, उसे रन के लक्ष्य का पीछा करने वाले ड्रा की ओर ले जाते हैं, क्योंकि वे उस क्रम में अपना विकेट गवां कर मैच हारना नहीं चाहते होंगे, या कोई और वजह - जैसे किसी का शतक बनाना खेल के परिणाम से ज्यादा महत्वपूर्ण लगता हो आदि आदि। पर अंत में जो भी हो, खेल को देखने वाले ठगा सा महसूस करने लगते हैं।

लोगो का अपने दैनिक दिनचर्या में से समय निकाल कर, क्रिकेट को देखना, एक स्वस्थ मनोरंजन के उद्देश्य से होता है। लोग दिन भर के व्यस्त जीवन से निकाले इन आराम के क्षणों में मनोरंजन चाहते हैं - जिसमे रोमांच हो, और खेल के फॉर्मेट कुछ ऐसा हो कि खिलाड़ी मज़बूर हो कर प्रतिस्पर्धा के कारण हर मैच में अपना १००% दें। टेस्ट क्रिकेट में वैसे क्षण कम ही रहते हैं और ऐसे ही कुछ कारणों से टेस्ट-क्रिकेट को देखने वालों में तेज़ी से गिरावट आने लगी है।

७०-८० के दशक में हालात इतने खस्ता हो गए थे कि ऐसा लगने लगा था कि क्रिकेट सिर्फ खेलने वालों का खेल बन के रह जाएगा। सप्ताह के अंत हो या छुट्टी के दिन, बड़े शहरों में टेस्ट मैच के दौरान, स्टेडियम खाली रहने लगी थी!

टेस्ट मैच के लिए छोटे शहर में सभी लॉजिस्टिक की सुविधाएँ भी नहीं होती थी - अच्छे पांच दिनों तक के बॉलिंग फील्डिंग के लायक पिच और मैदान के अलावा खिलाडियों के रहने खाने और अन्य सुविधाओं का भी ख्याल करना पड़ता था। 

इन सब कारणों से टेस्ट क्रिकेट सिर्फ बड़े शहरों में ही किया जा सकता था, और वहां बड़ी संख्या में खेल को देखने वाले आते नहीं थे। कुल मिला कर टेस्ट क्रिकेट काफी फीकी पड़ने लगी थी।

एकदिवसीय क्रिकेट : टेस्ट क्रिकेट की बाल-छंटाई

नए दौर में खेल भी एक व्यवसाय का रूप ले चुका था। विज्ञापन के द्वारा बहुत पैसे आने लगे थे और इसको लोगों में पॉपुलर बनाने के लिए टेस्ट क्रिकेट से हट कर वन-डे क्रिकेट खेल जाने लगा।

एकदिवसीय क्रिकेट को देखने के लिए ज्यादा लोग जुटने लगे थे। मगर क्रिकेट खेलने के इस नए फॉर्मेट के लिए उस दौर के क्रिकेट खिलाड़ी बिलकुल ही तैयार नहीं था। बेहतरीन बात यह यह हुई कि इस नए बदले खेल के फॉर्मेट में हरेक बॉलर को अधिकतम १२ ओवर्स (अब १०) और एक इनिंग में कुल मिला कर निर्धारित ६० (अब ५०) ओवर्स ही फेंकने होते हैं।

साथ ही बल्लेबाजों को भी अधिकतम रन का लक्ष्य बना कर विपक्षी टीम को देना होता है। दूसरे इनिंग में बैटिंग साइड को इस लक्ष्य का पीछा करना होता है। "करो या मरो" की नीति पर रनों के लक्ष्य का पीछा करने के नया फॉर्मेट दर्शकों को बहुत रास आया और देखते देखते यह लोकप्रिय होने लगा। अब क्रिकेट के भी वर्ल्ड कप होने लगे थे। और इस तरह से क्रिकेट, अब चलने के बजाय दौड़ने सा लगा था।

The scoreboard at the start of the match © ESPNcricinfo Ltd 

मगर उस दौर में क्रिेकट के कई सारे पुराने विचारधारा वाले - जो स्वयं को क्रिकेट के संरक्षक, "प्यूरिस्ट" या "महा-पंडित" से मानते थे - इस नए फॉर्मेट में खेले जाने वाले एकदिवसीय या ओडीआई को हेय दृष्टि से देखते, और यह कहते नहीं थकते थे कि असल क्रिकेट तो ५ दिन वाला टेस्ट मैच ही होता है। इस तरह के आलोचना या प्रतिक्रिया के बावजूद, दर्शको को इस तरह का खेल ज्यादा पसंद आने लगा था, और इसकी लोकप्रियता तेज़ी से बढ़ने लगी थी।
वर्तमान दौर में क्रिकेट का स्तर

जहाँ तक क्रिकेट के स्तर में ह्रास का प्रश्न है, मेरा मानना है कि इसके दोनों अपेक्षित और अनापेक्षित परिणाम सामने आये हैं। १९७१ से शुरू हुए एकदिवसीय खेल करीब ४००० बार खेला जा चुका है, २००५ में शुरू हुए टी-२० फॉर्मेट खेल करीब ५०० बार औपचारिक रूप से और उससे कई गुना ज्यादा बार अनेको तरह के लीग में खेले जा रहे हैं।

इसे और दूसरे परिपेक्ष्य में देखा जाना चाहिए- पिछले दस सालों में करीब ५०० टेस्ट मैच, १५०० एकदिवसीय और ५०० टी-२० मैच हुए हैं। पिछले ५ सालों में, जब से आईपीएल और अन्य टी-२० के लीग शुरू हुए हैं, सिर्फ २०० टेस्ट मैच, ६५० एकदिवसीय और करीब ३०० टी-२० खेल हुए हैं। टेस्ट क्रिकेट अब शनैः शनैः अवसान की ओर है।

टी-२० के आक्रामक और सकारात्मक खेल के कारण पुराने धारणाओं के विपरीत हर तरह के क्रिकेट के स्तर मे काफी इज़ाफ़ा ही हुआ है। यह एक विवाद का विषय है कि क्या आज के युग के क्रिकेटर - ख़ास कर बल्लेबाजों - में धैर्य की कमी आ गयी है, जिसके कारण अब किसी कठिन परिस्थिति में पहले की तरह बल्लेबाजों में जुझारूपन नही दीखता है।

ऐसा सम्भव है, क्योंकि बहुत ज्यादा एकदिवसीय और टी-२०, जहाँ "करो या मरो" के कारण वे बहुत तेज़ी से खेलना चाहते हैं - नतीज़ा यह है कि आजकल ज्यादातर टेस्ट मैच के परिणाम निकलते हैं। और ५ दिनों के जगह टेस्ट मैच अब ३-४ दिनों में ही ख़त्म हो जाते है - कहाँ गया वह मुदस्सर नज़र जैसे रक्षात्मक बल्लेबाजी का प्रदर्शन जब उसने ५५७ मिनटों में १०० रन बनाये थे! 

मगर अब टेस्ट मैचों में जितने शतक, दोहरे और तिहरे शतक लगते हैं, जितने चौके और छक्के लगते हैं, शायद वह वापस लोगों को टेस्ट मैच के तरफ आकर्षित कर पायेंगे!

आज के बल्लेबाजों को रन बनाने के लिए जिस स्तर के गेंदबाज और पहले के जमाने के कल्पनातीत चुस्त क्षेत्ररक्षण का सामना करना पड़ रहा है, वैसे स्तर के क्रिकेट में शायद पुराने खिलाडियों को अपने सारे "महान" रिकार्ड्स के आधे बनाने के लिए भी काफी पसीना चुआना पड़ता। 

पर इतिहास अपने हिस्से का मेहनत करके सोया हुआ है, इस लिए उनके उपलब्धियों को, इस सांत्वना के साथ कि उनके युग में भी जो बेहतरीन खिलाड़ी थे उनके बीच वे सारे कीर्तिमान बने हैं, तो उनको भी सलाम! साथ ही इस बात का उनको धन्यवाद देना होगा कि उन्हीं के प्रदर्शन के कंधे पर सवार होकर क्रिेकट आज के इस दौर में आ पाया है।

Jan 23, 2016

क्रिकेट का संक्षेपण प्रक्रिया - केरी पैकर का प्रभाव

कहा जाता है कि जो दीखता है वही बिकता है। क्रिकेट भी इसका अपवाद नहीं है। क्रिेकट के शुरुआती दौर में इस खेल का जो भी महत्त्व रहा हो, परंतु हाल के दशक तक आते-आते, यह वर्तमान के व्यवहारिक जीवन के साथ सामंजस्य नहीं बैठा पा रहा था। तदोपरांत पहले तो टेस्ट क्रिकेट में सुधार लाया गया, फिर एकदिवसीय खेल का दौर शुरू हुआ।

फिर भी क्रिकेट उतना रोचक नहीं बन पा रहा था, जितना कि यूरोप में फुटबॉल का खेल है या अमेरिका में बेसबॉल। वैसे भी क्रिकेट की लोकप्रियता ब्रिटिश साम्राज्य के देन के तौर पर ही है, और सिर्फ चंद कॉमनवेल्थ देशों में ही इस खेल को खेला जाता है। उस पर से देखने वालों की घटती संख्या से ऐसा लगने लगा था मानो उन दिनों क्रिकेट का भविष्य अंधकारमय सा था। साफ तौर पर उन दिनों टेस्ट क्रिकेट बड़ी तादाद में दर्शकों को अपने और खींचने में सक्षम नहीं रह गया था।

जाहिर है जहाँ आवश्यकता है वहां उसकी भरपाई करने के लिए बिज़नेस ऑपर्च्युनिटी भी होती है और इसीलिये संसार के परिवर्तन में पूंजीपतियों का बहुत बड़ा योगदान है! क्रिकेट इस से अछूता नहीं हो सकता था, और इस कारण से - केरी पैकर नाम के एक शख्सियत का प्रादुर्भाव हुआ।

यहाँ एक बात बताना आवश्यक है कि पहला एकदिवसीय क्रिेकट ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच १९७१ में शुरू हुआ था। इसके बाद  १९७५ में पहला वर्ल्ड कप भी आयोजित हुआ था, जिसे इंग्लॅण्ड के प्रूडेंशियल नाम के एक इंश्युरेंस कम्पनी ने प्रायोजित किया था। आगे आने वाले सालों में अनेक कंपनी ने व्यावसायिक रूप से क्रिकेट के अन्य २-३ देशों के एकदिवसीय श्रृंखला को प्रायोजित किया था। जल्द ही क्रिकेट का व्यवसायीकरण शुरू हो गया था और इस खेल में और भी पैसे आने लगे थे। लेकिन केरी पैकर की सोच महज स्पॉन्सरशिप से कही बहुत आगे की थी।

केरी पैकर: क्रिकेट का सफ़ेद से रंगीनियों तक का दौर 

बदलते दौर में इस नए एकदिवसीय क्रिकेट में तड़क-भड़क का तड़का लगना बाकी था। ऑस्ट्रेलिया के केरी पैकर नाम के एक बिजनेस मैन, जो शायद चैनल 9 के मालिक भी थे, उसने इसमें सबसे पहले पहल की।



उसने एक नए टूर्नामेंट - वर्ल्ड सीरीज़ कप - की शुरुआत की जिसमे उसने विश्व के सबसे बेहतरीन खिलाडियों को एक जगह ला कर अपने बनाये हुए "ऑट्रेलिया की टीम" के साथ बाकी खिलाडियों के एक टीम को बना कर आपस में खेलने के लिए एक लीग सा बना दिया। उसने इस बात को भांप लिया था कि लोग अच्छे क्रिकेट देखना चाहते थे। लाजमी है कि सभी अच्छे खिलाडियों को एक जगह एकत्रित करके आपस में खिलाया जाए तो खेल के प्रतिस्पर्धा का स्तर काफी ऊपर हो जाएगा। हालाँकि इसके और भी कई पहलू थे और इसका हर क्रिकेट बोर्ड और मीडिया ने जम के विरोध किया। केरी को आंशिक सफलता ही मिल पाई। कई मायने में आज का आईपीएल उसी की पुनरावृत्ति सी है।

पर आज के आईपीएल पर उतना विरोध नहीं होता है पर उन दिनों केरी पैकर को अपने इस प्रयास के लिए पूरे क्रिकेट जगत से खासा विरोध का सामना करना पड़ा था। बल्कि यों कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी कि उसे क्रिकेट के विलेन के रूप में देखा जाता था। पूरा क्रिकेट जगत दो खेमे में बँट गया था- टोनी ग्रेग, वेस्ट इंडीज़ और ऑस्ट्रेलिया के दिग्गज खिलाड़ी, और भी अतीत के कई सारे महान खिलाडियों ने खुल कर केरी का समर्थन किया।

केरी ने हर देश के क्रिकेट बोर्ड के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया था। केरी के विरोधियों ने उसके "वर्ल्ड सीरीज़ कप" को "केरी-सर्कस" का नाम दे दिया गया था, और जिन खिलाडियों ने उनके साथ करार कर लिया था - उन्हें "विद्रोही" का दर्ज़ा दे दिया गया। हर ऐसे खिलाडियों को उनके अपने देश के तरफ से खेलने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। मुझे याद है कि लोग क्रिकेट के भविष्य को लेकर बहुत चिंतित से हुआ करते थे। कारण स्पष्ट सा था कि विश्व के सबसे बेहतरीन खिलाड़ी पेशेवर बनकर पैसा कमाना चाहते थे, और शायद वे अच्छे खेल का प्रदर्शन करके और ज्यादा शोहरत और पैसे भी कमाना चाहते थे - भले वह किसी "सर्कस" के लिए ही हो।

केरी ने भारत से सुनील गावस्कर और बेदी को अपने "सर्कस" में शामिल होने का न्योता दिया था- पर उन्होंने उसे ठुकरा दिया।सभी देश के क्रिकेट बोर्ड्स ने संयुक्त रूप से इसका विरोध किया और अंततः केरी पैकर ने घुटने टेक दिए और इस तरह से सभी क्रिकेटर वापस अपने अपने देश के लिए खेलने लगे थे।

कई मायने में केरी पैकर ने क्रिकेट का आधुनीकिकरण सा कर दिया। केरी के वर्ल्ड सीरीज टूर्नामेंट में बहुत जल्दी-जल्दी में खेल होता था - जिस कारण से खिलाडियों को चुस्त -दुरुस्त रहना पड़ता था। साथ ही अपने उत्कृष्टतम खेल को दिखाना पड़ता था। इस प्रकार से क्रिकेट "सुस्त-आलसियों" के चंगुल से निकल कर वास्तव में एक "खिलाडियों" का खेल बनने लगा था। वरना छह दिनों वाले टेस्ट मैच में बहुत सारे खिलाड़ी तो ऐसे थे जो वास्तव में - शारीरिक और चुस्ती के मामले में खिलाड़ी कहलाने के योग्य भी नहीं थे,  कुछ बहुत आलसी से थे। जाहिर है, इस तरह के खिलाडियों से सिर्फ बोरिंग खेल की उम्मीद की जानी चाहिए थी । 

भारत के टीम में हर समय कुछ ऐसे खिलाड़ी भी हुआ करते थे जो अपने कलात्मक खेल और गौरवशाली इतिहास के वजह से टीम में थे - सिर्फ इसलिये कि वे "कभी कई सालों पहले कोई एक मैच जीता दिए थे"! इस तरह के दकियानूसी धारणाओं के ओट में शायद "स्वयं के लिए ही खेल रहे थे", देखने वाले दर्शकों के दुर्दशा पर उनका कोई ध्यान नहीं था।

केरी पैकर बहुत पैसेवाला था और एक टीवी चैनल का मालिक था। इस कारण से उसने टीवी पर क्रिकेट के कवरेज में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया। केरी पैकर ने क्रिकेट के खेल को टीवी पर बहुत ही रोचक और देखने योग्य बनाने में बहुत योगदान दिया - मैदान के अलग अलग कोने पर कैमरा लगा कर, उम्दा किस्म के कैमरा से क्लोज़-अप दिखाना, विकेट में माइक्रोफोन लगाना - और भी न जाने इस तरह के कितने प्रकार के प्रयोग हुये। एक तरह से उसने पूरे क्रिकेट के खेल को नया जामा पहना दिया था। 

इसी क्रम में खिलाडियों को भी रंगीन कपडे पहनाया गया - सफ़ेद कपडे के "वर्दी" से क्रिकेट खिलाडियों को मुक्ति मिलने लगा था। लोगों के सुविधा के हिसाब से क्रिकेट को पूरे दिन भर खेलने के बजाय, लाइट में रात-दिन के खेले जाने के शुरुआत का श्रेय भी केरी पैकर को ही जाता है। लाइट में गेंद को देखने में दिक्कत होती थी, इसलिए क्रिकेट के लाल गेंद को उजले गेंद से बदल दिया।

केरी पैकर के बाद क्रिकेट का दौर  

पर केरी पैकर ने कई मायने में क्रिकेट को पुनर्जीवित कर दिया। उनका क्रिकेट को आधुनिकीकरण करने में जो योगदान है, उसे इतिहास में स्वर्णाक्षर में लिखा जाना चाहिये, पर वैसा नहीं होगा - क्योंकि उसने जिस तरह से पारम्परिक क्रिकेट बोर्ड्स को धत्ता बताया था, उसकी कड़वाहट, क्रिकेट के "महा-पंडितों" में आज तक बरक़रार सा है। दरअसल उसने जिस अनुबंधित राशि का प्रलोभन विश्व के सभी खिलाड़ियों को दिया था, उतना हर देश के क्रिकेट बोर्ड्स अपने खिलाडियों को दे पाने में असमर्थ थे।

आज जब आईपीएल में वही सब कुछ, वैसा ही हो रहा है, जिसकी कल्पना केरी पैकर भाई साहब ने ३० साल पहले की थी - तो मैं उसके दूरदर्शिता के लिए नत-मस्तक हूँ। आज दबे स्वरों में लोग उनके प्रयास को जरूर सराहते होंगे। पर इतिहास में ये कोई पहली बार नहीं हुआ है, जब अज्ञानता और भय के घने बादल, हठता में बदल कर, नए विचार के किरणों को ढंकने की कोशिश करते रहे और अंततः प्रकाश ने अपना रास्ता ढूंढ ही लिया हो। केरी पैकर ने क्रिकेट के नए रूप का जो पौध लगाया वह आज टी-२० और आईपीएल सरीखे अनेकों लीग के बनकर बरगद पेड़ सा बन चुका है और शायद क्रिकेट का यही रूप आने वाले कई बरसों तक चलने वाला है !

कुल मिला कर क्रिकेट एक नए दौर में आ गया था। केरी के क्रांतिकारी परिवर्तन का असर था कि अब खेल का स्तर काफी ऊंचा हो गया था।  वैसे भी बदलते दौर में लोगों के पास कुछ काम-काज सा आने लगा था और क्रिकेट को देखने के आलावा भी कुछ करने जैसा और भी काम आ गया था इस लिए अब लोग छह दिनों तक के धीमी गति वाले खेल से ऊबने लगे थे।

समय के नज़ाकत को समझते हुए धीरे धीरे टेस्ट मैच से "रेस्ट डे" को अब हटा दिया गया है और लगातार पूरे पांच दिनों तक खेला जाता है। वैसे टेस्ट मैच में लोगों की, ख़ास कर नयी पीढ़ी के गिरते लोकप्रियता से ये अटकलें लगाई जा रही है कि - आखिर और कब तक? टेस्ट मैच अपनी अंतिम सांसें गिन रही हैं, क्योंकि अब दर्शकों के पास पूरे एक दिन का समय वन-डे देखने के लिए भी नहीं है और सभी टी -२० ज्यादा पसंद करने लगे हैं।

शुरुआत में वन डे इंटरनेशनल - ओडीआई - ६० ओवर्स का होता था और धीरे-धीरे उसमे कई सारे परिवर्तन लाये गए। अब यह सिर्फ ५० ओवर्स का खेल हो गया है। कई तरह के और परिवर्तन आये जैसे फील्ड रेस्ट्रिक्शन्स, पावर प्ले, नो बॉल के बाद एक बोनस बॉल पर -फ्री हिट - जिस पर बल्लेबाज आउट नहीं हो सकते हैं, इस तरह के और भी कई सारे फेर-बदल!

क्या सोचते हैं आज केरी के आलोचक?

क्रिकेट खेल में लोगों की रोचकता पहले से बहुत ज्यादा बढ़ गयी है।  अब ५० ओवर्स से कही ज्यादा २० ओवर्स के टी-२० ने ज्यादा लोकप्रियता पा ली है। आज अगर केरी पैकर्स होते तो उन्हें बहुत आश्चर्य सा होता कि उनके धुर -विरोधी भी उन्ही के क्रांतिकारी परिवर्तन की देन - क्रिकेट के व्यवसायीकरण के कारण खुशहाली के दिन देख पा रहे हैं! सुनील गावस्कर और बिशन सिंह बेदी ने भले ही केरी पैकर के प्रस्ताव को ठुकरा दिया हो, पर आज कमेंट्री बॉक्स में बैठ कर एकदिवसीय, टी-२० और न जाने असंख्य लीग मैचों के ऊपर अपनी प्रतिक्रिया देकर जितने पैसे कमाए हैं, उस कारण उनकी अंतरात्मा, एक बार केरी पैकर को जरूर धन्यवाद देता होगा!

४० सालों बाद, आज भी पुराने दिनों के लोग मानते हैं कि "वनडे क्रिकेट के आ जाने से, क्रिकेट के कलात्मक खेल के स्तर में ह्रास हुआ है।" परन्तु वे यह भूल जाते हैं कि उस कलात्मकता को बचाये रखने के चक्कर में आज शायद क्रिकेट के प्रति लोगों का प्यार ही ख़त्म हो जाता। समय के हिसाब से बदलाव जरूरी है- अगर लोग किसी खेल में बदलाव चाहते हैं, और उनके इच्छा की अपेक्षा होती रहे, तो धीरे धीरे लोग उस खेल के प्रति अपना नजरिया बदलने लगते हैं - और अंततः किसी दूसरे विकल्प की खोज में निकल पड़ते हैं। अगर क्रिकेट में बदलाव नहीं होता तो शायद लोग क्रिकेट को छोड़ किसी और खेल में ज्यादा रूचि लेने लगते।

केरी पैकर ने क्रिकेट में आज से कई साल पहले जितने भी प्रयोग किये थे, लगभग उन सभी को आज आईपीएल में सफलता पूर्वक प्रयोग में लाया जा रहा है और मेरा उनके दूरदर्शिता को सलाम! उनके और वैसे ही सोच वालों के, उनके समय के अनेक रूढ़िवादी विचारधारा के लाखों विरोध के बावजूद, क्रांतिकारी पहल का नतीज़ा है कि अब क्रिकेट अपने नए फॉर्मेट टी-२० में अमेरिका और कई और अन्य देशों में भी धीरे धीरे लोकप्रिय होता जा रहा है।

Jan 22, 2016

क्रिकेट का उद्भव: मेरी नज़र से

इतिहास बताता है कि मनुष्य सबसे पहले खानाबदोश था। जब भी भूख जैसा कुछ लगता, शिकार कर लेता और फिर "चल मुसाफिर दूर कहीं, तेरा यहां नहीं बसेरा" करते हुए आगे निकल पड़ता। आदम जात कई सालों या सदियों तक इस तरह से अपना जीवन-यापन करता रहा।

आदमी शुरू से आलसी जीव है, इसका प्रमाण था कि धीरे-धीरे वे ऐसे जगह में सेटल करने लगे जहाँ रहने खाने की सुविधा आसानी से मिलने लगे। इधर इंसान अपना ठिकाना बनाना शुरू किया, और उधर जंगल के जानवर भी कुछ सोचने को विवश हो गए। जंगल के जानवरों को अपने पुरखों के अनवरत ज्ञान-प्रवाह से एक बात स्पष्ट हो गया था कि उनके अच्छे संगत के लिस्ट में, इंसान नामक जीव नहीं आता था। इंसान के ज्यादा हिंसक होने का असर था कि जानवरों के भेजे में यह बात घुस गयी थी कि इंसान से दूरी बनाये रखना, उनके स्वास्थ्य के लिए ज्यादा अच्छा था।

इंसानों की तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या और जानवरों के जंगल के अंदर ही अंदर खिसकते चले जाने जैसी समस्या का तत्क्षण परिणाम यह हुआ कि अब इंसानों के लिए शिकार करना, पहले जैसा आसान सा काम नहीं रह गया था। आदमी का शिकार पर ही आश्रित रहना अब एक विकल्प नहीं था।

फिर इंसानों के अंदर का ट्यूब-लाइट जल उठा, और वे परिवार बना कर संगठित होकर खेती करने लगे। लाजमी है कि जब खेती शुरू हो गयी, तो फसल के तैयार होने तक काफी समय रहता होगा। मतलब अब जीवन-काल एक व्यवस्थित सा हो गया था। अब इंसान को सब कुछ आराम से मिलने लगा था, पर शिकारी रह चुके इंसान के अंदर के स्वाभाविक प्रतिस्पर्धा की भावना वाले कीड़े का शांत होना आसान नहीं था।

जानवरों को मार कर उनका विनाश करने से फसल को उगाने के- विध्वंस से सृजन का सफर - आसान नहीं रहा होगा! नए-नए शिकारी से किसान बने इंसान का जी मचलता रहता होगा कि कैसे किसी का पीछा करें, दौड़े - दौड़ाएं, हरा दें, जीत जाएँ, और भी न जाने कितने सारे ऐसे ही भावनाएं - जो उसके अंदर सदियों से हैं, और शायद हमेशा रहेगा।

इंसान के अंदर का शिकारी कभी न मरा हैं न मरेगा। अलबत्ता, इस भावना के तुष्टि करने के लिए इंसान ने सांकेतिक रूप से "सभ्य-लड़ाई" करने की आदत डाली, जिसे "क्रीड़ा" अथवा "खेल" कहा जाता है।

मानव के इस तरह से विकास के क्रम में और कई प्रकार के क्रिया कलाप हुआ- जिसे इतिहास में पढ़ा जा सकता है।

फ़ास्ट फॉरवर्ड अब हम आते हैं कोई दो-तीन सौ साल पहले के समय-काल में। शायद अंग्रेज़ों को अपने घर में मन-वन नहीं लगता था, और इसलिए ज्यादा समय वे इंग्लैंड से बाहर ही रहते थे। अंग्रेज़ों के पुरखे बहुत सोच समझ कर इंग्लैंड में सेटल किये होंगे। वे बहुत समझदार नस्ल थे, इस कारण से मैं आश्वस्त हूँ कि उनके रहने, खाने-पीने का कोई ख़ास कष्ट नहीं रहा होगा। मेरे हाल के इंग्लैंड के दौरे से यह और भी स्पष्ट हो गया कि अभी भी वहां पर्याप्त खाली जगह हैं। ऐसे में उनके अपने घर को छोड़ कर विश्व के हर कोने में फैलने का कारण खाने पीने की कमी या जगह की कमी तो नहीं रही होगी। फिर तो कारण रहा होगा, वही इंसान के अंदर का पुराना कीड़ा - शिकार, खानाबदोशी, जीतना, हरा देना, आदि आदि। बस उसी क्रम में अंग्रेज़ निकल पड़े होंगे अपने घर को छोड़, इधर-उधर अपनी हुकूमत की डुगडुगी बजाने के लिए।
Add caption


वाज़िब बात है, अच्छे खासे घर -परिवार को छोड़ कर कोई जब वीरान से जगह में आ जाए तो उसके पास कोई ख़ास काम-वाम तो रहता नहीं होगा। ऐसे में अंग्रेज़ जहाँ कहीं भी गए होंगे, वहाँ पर इनके पास पर्याप्त फालतू समय रहता होगा। अब पेट भरा हो, पर्याप्त से काफी ज्यादा समय हो और कोई जान-पहचान का जगह न हो तो समय काटने के लिए और जीवन कोउलझाये रखने के लिए कुछ तो करना होगा।

तो ऐसे में ईजाद हुआ अनेको ऐसे खेल, जिन्हें अगर गौर से देखा जाए, तो वे खेलने वालों के साथ-साथ देखने वाले, दोनों के लिए रोचक है। अंग्रेजों ने इस बात पर जरूर ध्यान रखा होगा कि जिस किसी खेल की वो उत्पत्ति करें, वे एकरस न हो और सबसे महत्वपूर्ण रहा होगा कि वे काफी लम्बे समय तक सबों को सामूहिक रूप से व्यस्त रख सकने में सक्षम हों। खेल को खेलने से भी ज्यादा देखने में रोचक लगे, इसकी अहमियत इसलिए रहे होगी क्योंकि कई अंग्रेज़ अपने परिवार के साथ रहते थे, और फिर कई बिलकुल ही निकम्मे क़िस्म के आलसी से अंग्रेज़ भी रहे होंगे जो खेलना नहीं चाहते होंगे।

इस तरह से बड़ी जुगत लगा के इन सभी खेलो का नियम-वगैरह बनाया गया होगा जो आज तक कायम है- अंग्रेज़ों के जितने खेल होते हैं वे बहुत लम्बे समय तक चलते रहने वाला कार्यक्रम सा था। अंग्रेज़ों के साथ-साथ उनके घोड़े भी बोर न हो जाए इस लिए घुड़सवारी करते हुए पोलो नामक खेल का भी अविष्कार का वजह स्पष्ट सा है। क्रिकेट, गोल्फ, लॉन टेनिस, बैडमिंटन और भी कई तरह के खेल का इज़ाद हुआ।

इन में से ज्यादातर खेल ऐसे हैं जो कुछ घंटो से लेकर कई दिनों तक लगातार खेला जा सकता था। इन खेलों में जितने तरह के नियम कानून बनाये गए हैं, उन सभी को किसी किताब में लिखा जाना और फिर उसे पढ़ कर इन खेलों को खेलना और देखना- दोनों लगभग असंभव सा काम है। अतः जैसा ब्रिटेन का अलिखित संविधान है, उसी तरीके से अंग्रेज़ों के हर खेल के नियम कानून लोगों को लगभग कंठस्थ सा होता है - आप समझ गए तो ठीक पर अगर किसी को समझाना हो तो वह बहुत मुश्किल सा काम है।

सीधी सी बात है कि अगर कोई इन खेलों को देखते और समझते हुए नहीं बड़ा हुआ है, तो नए सिरे से उनको समझा पाना जरा सा टेढ़ी खीर है। यकीन न आये तो कभी किसी क्रिकेट के अनाड़ी को खेल के नियम बताने की कोशिश करें, आपको स्वयं के जीनियस होने जैसा कुछ फील होने लगेगा!

अगर क्रिकेट के इतिहास के पेज को पलटा जाए, तो पाया जाता है कि पुराने दिनों में क्रिकेट १०-१२ दिनों तक चलता ही रहता था। मतलब लोग जिस तरह से काम करने निकलते हैं, उसी प्रकार से क्रिकेट का मैच खेलने निकलते होंगे। लोग किसान की तरह, कंधे पर हल की जगह बैट को रखे हुए घर से निकलते होंगे! अगर रास्ते में कोई मिल जाए तो बताते होंगे, क्रिकेट का महासंग्राम के अनुष्ठान में निकल पड़े हैं। समय के आभाव में शायद उनकी दैनिक दिनचर्या भी बिगड़ गया होगा, कम से कम शुरुआती दौर के - W G Grace सरीखे, बल्लेबाजों के लम्बी बड़ी हुई मूंछ -दाढ़ी को देख कर तो ऐसा ही एहसास होता है! दिन भर मैदान में रहने के कारण ऐसा लगता है कि वे बहुत ही उबाऊ किस्म के लोग होते होंगे।

चूँकि क्रिकेट का खेल अनेकों दिन तक चलने वाला कार्यक्रम सा था- इसलिए हर तरह की सुविधाएं - जो इंसान के लिए आवश्यक से हैं, उन सब को खेल का एक अभिन्न हिस्सा सा बना दिया गया है। हरेक घंटे पर ड्रिंक्स, लंच और शाम को टी के ब्रेक। सूर्योदय के आस-पास से शुरू होने वाला ऐसा कार्यक्रम सूर्यास्त के पहले ख़त्म हो जाने का जुगाड़ लगाया गया है। खिलाड़ी अगर थक जाए तो उनके बदले कोई आकर फील्डिंग कर सकते हैं। अगर बैट्समैन थक गया या चोटिल हो जाए तो उसके बदले में कोई और दौड़ने आ सकता है! जो खेल से ऊब गए हों या उतना फिट नहीं रह गए हों की सक्रिय रूप से खिलाड़ी के तौर पर खेलें, उन्हें अंपायर बनाके समय काटने का जुगाड़ दे दिया गया।

कुल मिला कर क्रिकेट में कई परिवर्तन आये और अब खेल को निर्धारित समय के लिए खेल जाने लगा है और साथ ही खेल के अंत में कोई जरूर जीतता है- ५ दिनों के बाद ड्रा जैसा कुछ नही होता है! पर अब भी टेस्ट मैच चल रहा है जो बहुत ही नीरस और उबाऊ होता है, पर कई लोगों को क्रिकेट में सिर्फ "टेस्ट-मैच" ही पसंद आता है! लेकिन अब मैं पूरे पांच दिनों तक खेल को नहीं देख सकता, धन्य हैं वे सभी लोग जो अब भी मैदान में जाकर खेल की बारीकियों को परखते हैं और तारीफ करते हैं!

Jan 11, 2016

भारत एक स्पिन प्रधान देश

सदियों से भारत के बारे में पढता आया हूँ कि - भारत एक कृषि प्रधान देश है। मेरे ख्याल से उसमे एक और वाक्य जोड़ देना चाहिए कि साथ ही भारत एक एक स्पिनर बॉलिंग प्रधान देश भी है।

पता नहीं क्यों परन्तु भारत की इतनी बड़ी जनसंख्या होने के बावजूद, इतने सालों में, आज तक एक भी सफल तेज गेंदबाज नहीं हो पाया है। जो इक्के-दुक्के हुए भी हैं, वे स्लो-मीडियम से मीडियम के रफ़्तार तक आते-आते टाँय-टाँय फिस्स हो गए! ये अलग बात है कि तेज़ गेंदबाज़ी और विकेट लेने के क्षमता में कोई ज्यादा सम्बन्ध नहीं होता है।

इतिहास गवाह है कि कई मौके पर, स्पिन गेंदबाज़ी देखने का मज़ा कुछ अलग ही रहा है। कई मौके पर बल्लेबाजों के लिए तेज़ गेंदबाज़ों से कहीं ज्यादा, स्पिनर्स ने खतरनाक परिस्थिति पैदा किए हैं! मेरे पास आंकड़े नहीं हैं, पर मैं इत्मीनान से कह सकता हूँ कि क्रिकेट के पूरे इतिहास में स्पिनर्स ने तेज गेंदबाजों से ज्यादा विकेट लिए होंगे। फिर भी तेज़ गेंदबाज़ी एक ऐसा हथियार सा है, जिसके होने से टीम का मनोबल और उसके प्रशंसकों को भी बहुत फख्र सा महसूस होता है।

मैं आज तक शेन वार्न के कलात्मक स्पिन गेंदबाज़ी का कायल हूँ! मुझे याद है एक मैच, जहाँ शेन ऑस्ट्रेलिया के किसी पिच पर गेंदबाज़ी कर रहे थे। उनके हरेक गेंद पर ऐसा लगता था, मानो बैट्समैन आउट होते-होते बच गया था! हरेक गेंद पर तालियों की गड़गड़ाहट पड़ती थी- शेन अद्भुत थे, जब वे अपने चरम पर खेल रहे होते थे। उसी तरह से मुरलीथरन, अब्दुल कादिर, अनिल कुंबले, सक़लैन मुश्ताक़ और भी कई दिग्गज स्पिन गेंदबाज हुए हैं, जिन्होंने कई बार अपने बल-बूते पर मैच का रुख बदल दिया है।

मानसून और स्पिन पर आश्रित भारत

जैसा पहले ही बताया गया है कि भारत एक कृषि और साथ ही स्पिन पर आश्रित देश है। अतः भारत सदियों से मानसून पर आश्रित रहा है - दोनों कृषि और क्रिकेट के लिए।

खेल के शुरू होते ही इस बात पर चर्चा होती थी कि - मैदान कैसा है? अर्थात, अगर पिच स्पिनर के मददगार न हो तो हम अगले ५-६ दिनों के लिए तनाव में रहते थे। हमें तभी से ही पराजय का बोध सा होने लगता था। फिर खिलाडियों के साथ-साथ हमारे जैसे भारतीय टीम के "भक्तों" के लिए, आने वाले ४-५ दिन बड़ी संकट की घड़ी सी होते थे। ऐसे माहौल में जब विपक्षी टीम के तेज़ गेंदबाज, हमारे बैट्समेन की धज्जी उड़ाते हुए लगभग हमें रौंद से देते थे, तो वैसे में कई बार हम यह सोचते थे कि क्या वास्तव में खेलना जरूरी था?

ऐसे समय, इंद्र देवता के प्रति हमारी आस्था काफी गहरी हो जाती थी - सही समय पर बरसात करा के, भारतीय टीम के निश्चित हार से बचने में उनके साथ देने की मनोकामना करते थे। कई बार बारिश हो जाने के वजह से भारत शर्तिया हार से बची है। 

बचपन से ही- भारत के क्रिकेट मैच में एक के बाद एक हार के खबर को सुन कर - हम में हीन भावना सी आ गयी थी। और रहा सहा कसर पूरा कर दिया था, शारजाह में हुए उस मैच ने जिसमे मियांदाद ने अंतिम गेंद पर एक छक्का जड़ कर, भारत की जीती हुई मैच भी हमसे छीन ली थी। कारण स्पष्ट था कि हमारे पास अच्छे गेंदबाज नहीं थे, और वाजिब बात है कि वह पिच स्पिन के लिए मददगार नहीं रहा होगा!

टेस्ट मैच के बारे में तो भारतीय टीम के गेंदबाज़ी का यह आलम था कि पहले नए गेंद को घास पर, अलाउद्दीन के चिराग की तरह रगड़-रगड़ कर स्पिन के जिन को बाहर निकालने का प्रयास करते हुए, उसे पुराना बनाया जाता था क्योंकि नयी गेंद की चमक और टाइट सीम, स्पिन गेंदबाज़ी के लिए मददगार से नहीं होते थे! गेंद के साथ ऐसा दुर्व्यवहार करना किसी तेज गेंदबाज के लिए आत्महत्या का सबब बन सकता है, क्योंकि नए गेंद उनका सबसे तीक्ष्ण हथियार सा होता है।

ऐसा नहीं था कि टीम में जुझारू खिलाडी नहीं थे। उन दिनों मंसूर अली खान पटौदी के आक्रामक खेल के कहानियां सुना करते थे। पटौदी, फारुख इंजीनयर और सलीम दुर्रानी के छक्के मारने के किस्से, एकनाथ सोलकर और यजुवेंद्र सिंह के चुस्त क्षेत्ररक्षण और गावस्कर, विशी जैसे कुशल बल्लेबाज़ हुए थे - पर टीम में आत्मविशवास की कमी थी।

सचमुच, कपिलदेव के दौर से, भारतीय टीम में आत्मविश्वास आया और काफी हद तक पिछले १०-१५ सालों में भारत के जीतने का दर काफी बढ़ा है, साथ ही भारत में एक से बढ़ कर एक आक्रामक बल्लेबाज और कुछ तेज़ गेंदबाज भी आये हैं - जिसके कारण टीम का संतुलन बहुत बढा है, और अब खेल के शुरुआत से ही भारत के हार की कल्पना मन में नहीं आती है। अब कहीं से भरोसे के साथ क्रिकेट अंतिम समय तक देख सकते हैं। साथ ही अब "क्रिकेट की जीत" में भी कुछ कमी आ गयी है, मतलब भारत अब ज्यादातर जीतता है।

स्पिन की चौकड़ी

भारत में अनेको प्रकार के स्पिन गेंदबाज हुए हैं जो गेंदबाज़ी के प्रमुख किरदार को निभाते आये हैं। हर युग में कोई न कोई ऐसा स्पिन गेंदबाज हुआ है जिसने अगले २-३ सालों तक टीम में अपनी जगह सुरक्षित कर लिए हैं। हाल के दिनों में अनिल कुंबले, मनिंदर सिंह, हरभजन सिंह और कुछेक स्पिनर्स ने कई सालों तक अच्छा या ख़राब खेलते हुए टीम में अपना जगह बरक़रार रखे। परन्तु भारत को हाल के दिनों में कभी भी एक साथ बेहतरीन विश्वस्तरीय स्पिनर्स नहीं मिले हैं, जैसा ७० के दशक में हुआ था।    
वेंकट राघवन, बिशन सिंह बेदी, ईरापल्ली प्रसन्ना, भगवत चंद्रशेखर - इस स्पिन-चौकड़ी के जितने विकेट होंगे, उतना इन सबों ने पूरे टेस्ट के मिला कर  रन नहीं बनाये होंगे!
उन दिनों भारत के टीम में एक बहुत ही सक्षम स्पिन की चौकड़ी हुआ करती थी। वाकई उनके कारण भारत ने कई मैच जीते होंगे।  संयोग-वश भारत के झोले में ७० के दशक में ही सुनील गावस्कर, विश्वनाथ और कुछ अन्य जुझारू बैट्समैन मिल गए थे जो किसी भी तरह के गेंदबाज़ी का डट के मुकाबला कर सकते थे। और उन्ही दिनों भारत को स्पिन के बेहतरीन चौकड़ी मिल गयी थी। अगर पिच स्पिन गेंदबाज़ी को साथ दे देता तो इस टीम के साथ विश्व के बेहतरीन टीम की हेंकड़ी निकल जाती थी। ७० के दशक में भारत को मिले अनेकों जीत का श्रेय इस पूरे टीम के मिली-जुली योगदान को है।

इस चौकड़ी में एक भगवत चंद्रशेखर थे, जिनके गेंद फेंकने के किस्से बहुत प्रसिद्ध हुआ करता था। ऐसा सुना था कि उनको बचपन में हाथ का लकवा हो गया था, जिसके कारण वे अपनी कलाई को पूरी तरह से गोल घुमा पाते थे, इस तरह से वे बहुत ही भयानक लेग-स्पिन और खासकर "गुगली" गेंद डाल दिया करते थे। इनके आलावा उस चौकड़ी के, बिशन सिंह बेदी - जो बाद में कप्तान भी बने थे - उनके बारे में मशहूर हुआ करता था कि वे एक ओवर में, एक दूसरे से बिलकुल अलग तरह के, छह के छह गेंद डाल सकते थे।

इस स्पिनर-चौकड़ी के बाकी दो- वेंकटराघवन और इरापल्ली प्रसन्ना मिलकर, अगर पिच भी मदद कर दे, तो विपक्ष के पूरे १० खिलाडियों को दो बार आउट कर पाती थी। और इस तरह से वे जीत की सोचते भी थे। वरना पिच में घास होने से- जो तेज़ गेंदबाज़ी के लिए मददगार हुआ करती थी, उस सूरत में भारत की टीम पहले से ही घुटने टेक कर, गावस्कर पर आश्रित से हो जाते थे। अगर सनी चल गए तो मैच ड्रा हो जाता, वर्ना एक बार फिर से - बड़े सहज ढंग से ही, महान खेल - किकेट की जीत हो जाया करती थी।

भारत की गेंदबाजी: एक दुःख भरी दर्दनाक कथा 

मैं बचपन में क्रिकेट खेलता था, और मुझे याद है कि सबों में ज्यादा जोर बैटिंग करने के लिए हुआ करता था। गेंदबाज़ी या फेिलडिंग को उतने चाव से नहीं देखा जाता था। शायद यही कारण है कि भारत में गेंदबाज़ी की विधा उतना सम्मानित नहीं हुआ जितना बल्लेबाजी हुआ है। ऐसे भी भारतीय दर्शको से छक्के या चौके मारने वाले को जितनी तालियां मिलती हैं, उस अनुपात में अच्छी फील्डिंग या गेंदबाज़ी पर प्रोत्साहन कम ही मिलता है।

कारण जो भी हो पर आज के दौर में कुल मिला कर भारत में गेंदबाज़ी का स्तर बहुत गिर गया है। कम से कम पुराने दौर में कुछ अच्छे स्पिन गेंदबाज तो हुआ करते थे पर आज के दौर में स्पिन गेंदबाजों में भी लगभग अकाल सा पड़ा हुआ है। एक कारण यह भी है कि स्पिन गेंदबाज को टीम में अपनी उपयोगिता बनाये रखने के कारण अच्छे बल्लेबाजी पर भी ध्यान देना पड़ता है क्योंकि कई बार अगर पिच स्पिन गेंदबाज़ी को मदद न करे तो उनका टीम में होने का औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है।


ऐसा पहले के दौर में नहीं होता था क्योंकि पहले के स्पिनर से बल्लेबाजी की उम्मीद ही नहीं की जाती थी। मुझे याद है एक मैच में बिशन सिंह बेदी ने ५० रन बनाये थे और हम सभी आश्चर्यचकित से हो गए थे, पर उस से भी ज्यादा आश्चर्य तो तब हुआ था जब भागवत चंद्रशेखर ने एक बार चौका मार दिया था! उस चौके पर शायद सुनने वाले से ज्यादा खुद चंद्रा को यकीन नही हुआ होगा, क्योंकि शायद सबसे ज्यादा शून्य पर आउट होने का रिकॉर्ड में उनका नाम भी शीर्ष पर आता होगा।

वैसे स्पिनर गेंदबाजों को इस बात पर खुशी होनी चाहिए कि सबसे ज्यादा शून्य पर आउट होने का रिकॉर्ड वेस्ट इंडीज़ के तेज़ गेंदबाज कोर्टनी वाल्श के नाम है! अन्य स्पिनर - क्रिस मार्टिन, शेन वार्न, मुरलीथरन, दानिश कनेरिया के साथ चंद्रशेखर ११वे नंबर पर हैं!

क्रिकेट के झरोखे से बचपन - कमेंट्री के विभिन्न प्रकार

आज यकीन करना मुश्किल सा लगता है कि मेरे इस छोटे से जीवन काल में ही मैंने ऐसे समय भी देखे हैं, जब दुनिया से संपर्क के लिए रेडियो ही एकमात्र सहारा हुआ करता था। अखबार या मैगज़ीन विकल्प हुआ करता था, पर उनसे बासी खबरें ही मिलती थी। किसी लाइव इवेंट के बारे में जानने के लिए जो था - वह सिर्फ रेडियो ही था। उन दिनों, आज की तरह अनेको सारे एफ एम रेडियो स्टेशन नहीं होते थे, और घूम फिर कर सिर्फ आकाशवाणी ही एक सहारा हुआ करता था।

ऐसे दौर में सुनने वालों के लिए, रेडियो के बहुत सारे अदाकारों के साथ, एक अदृश्य सा सम्बन्ध बन जाता था। उनके पेश करने का अंदाज़, उनके शब्दों का चयन और उनके लहज़े से लोग वाकिफ से हो जाते थे। उनकी आवाज़ें ही उनकी पहचान होती थी, पर हर समय सुनते रहने से, मन में एक उत्सुकता बनी रहती थी कि कैसा दीखता होगा, क्या उम्र होगी, हक़ीक़त में किस तरह से बातें करते होंगे? अपने मन में सोचते हुए उनके व्यक्तित्व की एक कल्पना सा कर लेते थे - और जब वे बोलते, मन मैं एक वैसी ही आकृति उभर कर आती थी। अदृश्य से पर जिनकी आवाज़ से हमारा एक बहुत पहचाना सा सम्बन्ध बन चुका था - एक ऐसा अनुभव, जो संभवतः अब टीवी के जमाने में कल्पनातीत है, पर हमारे बचपन में इसके अलावा कोई चारा ही नहीं था। टीवी के आ जाने के बाद रेडियो सुनने वालों की संख्या घटने लगी। ज्यादातर लोग टीवी के माध्यम से देखने और सुनने लगे।

बदलते हालात में, अपने दौर के नामी-गिरामी रेडियो की हस्तियां में से कई ने टीवी पर अाने का भी प्रयास किया, पर जिस तरह से टेस्ट के खिलाड़ी नए दौर के टी-२० में नहीं खेल पाये, वही हाल रेडिओ के महारथियों का भी हुआ। व्यक्तिगत तौर पर, मुझे कई सारे उन रेडियो के हस्तियों को टीवी पर देख कर कुछ हद तक निराशा सी हुयी, क्योंकि सालों से उन्हें रेडियो पर सुनकर, मन में जिस तरह के व्यक्तित्व की कल्पना बसी हुई थी, वे उन से काफी अलग से और फीके से नज़र आये। साफ़-साफ़ शब्दों में कहा जाए तो उनमे वो बात नहीं थी, जैसा रेडियो में सिर्फ उनके आवाज़ से उभर कर आती थी। शायद इसका कारण उनके संवादों का "स्क्रिप्टेड" होना रहा होगा या बिना कैमरा के उनके स्वछंद भाव से बोलना रहा होगा, बहरहाल जिन लोगों ने टीवी पर प्रयास किया, उनमे से सिर्फ कुछ लोग ही अपनी शोहरत को थोड़ा बहुत भुना पाये।

पर समय के उस दौर में, जब सिर्फ रेडियो ही हुआ करता था, इसमें कोई शक नहीं कि इनकी शोहरत का डंका चारों तरफ गूंजता सा था। उन दिनों आकाशवाणी से, बारी-बारी से हर घंटे पर हिंदी और अंग्रेज़ी में समाचार सुनाया जाता था। सुबह के ८  और रात के ८:४५ पर -प्राइम टाइम- के तौर पर १५ मिनट के विस्तार में समाचार प्रसारित किया जाता था।
ये आकाशवाणी है, आब आप दे-व-की नन-दन पान-डे से समाचार सुनिए..... और अंत में मुख्य समाचार एक बार फिर ..... और समाचार समाप्त हुए। 
इस तरह के शब्दों को तोड़ कर, उनके अक्षरशः उच्चारण के साथ समाचार को पढ़ने वालों में देवकी नंदन पाण्डे, इंदु वाही, अनादि मिश्र, और भी कई सारे प्रसिद्द नाम हुआ करते थे। हिंदी समाचार के खतम होते ही अंग्रेज़ी में समाचार शुरू हो जाता -
दिस इज़्ज़ - ओल इंडिया रेडी-ओ, द न्यूज़ - इज़्ज़ रेड बाई - बौरुन हलदर...
मज़ेदार बात यह थी कि अंग्रेज़ी के न्यूज़ में आकाशवाणी न कह कर, "आल इंडिया रेडियो" कहा जाता था। अंग्रेज़ी में भी कुछ प्रसिद्ध नाम होते थे - बरुण हलदार, सुरोजीत सेन, लतिका रत्नम, और भी कई सारे हुआ करते थे, पर अब वे याद नहीं हैं। एक और बात याद आती है कि सुबह ८ बजे हिंदी समाचार के शुरू होने के पहले और रात को ९ बजे जब समाचार ख़त्म होता, रेडियो स्टेशन के घड़ी की "पुक-पुक पुक " की तीखी आवाज़ रेडियो से प्रसारित होता, जिस से लोग अपने घड़ियों को मिला लिया करते थे!

उन दिनों हिंदी फ़िल्मी गाने और क्रिकेट का बोलबाला था। कभी-कभार हॉकी के आँखों देखा हाल का भी सीधा प्रसारण होता था। पर पूरे साल में हॉकी के बहुत अंतराल और कभी-कभी होने के कारण, लोगों में उसका बुखार थोड़े समय के लिए आता और फिर चला भी जाता था। हॉकी के प्रति लोगों का आकर्षण क्रिकेट की तरह नहीं होता था। क्रिकेट के मैच के दौरान पूरे ५-६ दिनों के लम्बे समय के लिए लोग अपने ट्रांजिस्टर रेडियो से कान लगाये रहते थे।

आकाशवाणी के द्वारा प्रसारित - "विविध-भारती" से, दिन भर विभिन प्रकार के गाने तो बजते रहते थे, परन्तु लोकप्रियता के शिखर पर होता था - रेडियो सीलोन से हर बुधवार को प्रसारित होने वाला एक प्रोग्राम, जिसका नाम था - बिनाका गीतमाला। हर हफ्ते के नए गानों के लोकप्रियता के चार्ट को पेश करते थे, एक मशहूर एनाउंसर- अमीन सयानी। उस आवाज़ की ऐसी धूम थी कि आने वाले कई सालों तक किसी भी सांस्कृतिक कार्यक्रम में लोग उन्ही के अंदाज़ में बोलते थे - "बहनों और भाइयों...!" अपने अनोखे शैली में श्रोताओं को सम्बोधित करने के बाद, प्रोग्राम आगे बढ़ता और उस हफ्ते के चार्ट के हर पायदान के गाने का मुखरा बजता था। अंत में हफ्ते का सिरमौर गाने के बजने के पहले, उसके स्वागत में एक ट्रम्पेट की आवाज़ आती थी! उन दिनों रेडियो स्टेशन पर नए गाने जल्दी नहीं बजते थे, और न ही हमारे पास कोई और सुनने के उपाय थे। ऐसे में, बिनाका गीतमाला का हम बेसब्री से इंतज़ार करते थे, ताकि हम गाने का कुछ मुखरा ही सुन लें!

क्रिकेट के कमेंट्री में सबसे लोकप्रिय नाम था -सुशील दोषी का! मेरे बचपन के दिनों में रेडियो के दुनिया में - अमीन सयानी और सुशील दोषी, ये दो बहुत ही प्रसिद्द आवाजें हुआ करते थे। परन्तु उनके साथ-साथ हिंदी के और भी कई सारे अन्य प्रसिद्द कॉमेंटेटर होते थे -मनीष देव, मुरली मनोहर मंजुल, जसदेव सिंह, रवि चतुर्वेदी, जोगा राव और भी कई सारे। अंग्रेज़ी के भी कई सारे प्रसिद्द कॉमेंटेटर हुआ करते थे, पर मुझे उस वक़्त अंग्रेज़ी बिलकुल समझ में नहीं आती थी, इस लिए अब उनके बारे में बहुत कुछ तो याद नहीं है, पर सुरेश सरैया, डॉ. नरोत्तम पुरी, अनंत सेतलवाड और कुछ नाम होते थे।

जसदेव सिंह 

जसदेव सिंह के कमेंट्री की विशेषता यह थी कि वे लगभग हर तरह के खेल की कमेंट्री कर लेते थे। शायद, दिल्ली एशियाड- ८२ में भी उन्होंने हर तरह के खेल की कमेंट्री की थी। यहां तक कि स्वतंत्रता दिवस को लाल किले से दिए प्रधानमंत्री के भाषण हो या फिर गणतंत्र दिवस के परेड, इन सब तरह के कार्यक्रम का भी बखूबी से कमेंट्री कर दिया करते थे।


इतनी बहुमुखी प्रतिभा और जानकारी का होना बहुत अच्छी बात थी, पर दिक्कत यह थी कि - उनका कमेंट्री का तरीका लगभग एकसमान रहता था। यह समझ में ही नहीं आता था कि किस खेल या किसी विशेष आयोजन का कमेंट्री हो रहा था। थोड़े फेर-बदल करके, हर कमेंट्री के दौरान कुछ इस तरह के वक्तव्य सुनने को मिल ही जाया करता था -
नमस्कार, मैं जस्स-देव सिंह बोल रहा हूँ.... आसमान धीरे धीरे खुलता हुआ.... आसमान का दूसरा कोना बिलकुल खुला हुआ.....बिल्कुल साफ़ नीला आसमान दीखता हुआ ... दूर कोने में एकाध बादल के टुकड़े जो अब हमसे काफी दूर जाते हुए, बादलों के बीच से सूरज आँख-मिचौनी करती हुयी... मद्धम-मद्धम से धूप छन-छन कर मैदान के हरे घासों पर पड़े ओस को सूखाने के प्रयास करते हुए, और उधर मैदान के चारों ओर दर्शक दीर्घा में काफी उत्साह! आज रविवार का दिन है और काफी बड़ी संख्या में लोग इस मैच को देखने आये हुए हैं....ख़ास बात है कि बहुत सारे स्कूली बच्चे भी इस मैच को देखने के लिए आज यहाँ स्टेडियम में उपस्थित हुए हैं......

जसदेव सिंह कभी भी उत्तेजित नहीं होते थे और बिना किसी भाव के सिर्फ और सिर्फ - "आँखों देखा हाल" बताते रहते थे!  सुशील दोषी से लगभग बिलकुल विपरीत से, पर अपने एक ख़ास अंदाज़ में।

बीच-बीच में जसदेव सामन्य ज्ञान की जानकारियां भी देते रहते थे - ख़ास कर तब, जब कोई मैच विदेश में हो रहा हो। मैदान के आस -पास के किसी पार्क, पहाड़, नदी, झील, समुद्र आदि के जानकारी के साथ-साथ शहर की भी विस्तृत जानकारी मिल जाया करता था। कई विशेष प्रकार के तकनीकी बातों से भी हम अवगत हुआ करते थे - जैसे किस तरह से ऑस्ट्रेलिया से भारत तक के संचार की व्यवस्था होती थी-
यहाँ मैदान में बने कमेंट्री बॉक्स से हमारी आवाज को सिडनी स्टूडियो तक पहुँचाया जाता है, और फिर वहाँ से, जैसा मुझे बताया गया है कि समुद्र के नीचे से एक केबल बिछाया गया है जिसके द्वारा सिग्नल को भारत में आकाशवाणी के दिल्ली केंद्र तक पहुंचाया जाता है, और वहां से इसे पूरे भारत में लो सिग्नल पर सैटेलाइट के माध्यम से प्रसारित किया जाता है और इस तरह से आपके तक हमारी आवाज़ पहुँच रही है - और इस बीच में कपिल देव के एक बेहतरीन इन-स्विंग करती गेंद....
एक बार जसदेव सिंह हॉकी की कमेंट्री कर रहे थे और उन दिनों भारत के टीम में सिख खिलाडियों की संख्या बहुत थी। शायद १९७५ के विश्वकप जीतने वाली टीम में अजित पाल सिंह कप्तान थे और उनके गाँव से ही ४ और खिलाड़ी थे। मैदान में इतनी तेज़ी से चलने वाले खेल में, इतने सारे सिख खिलाडियों को पहचानने का काम जसदेव सिंह से अच्छा शायद और कोई नहीं कर सकते थे, जो शायद वे बखूबी कर भी रहे थे पर हम सुनने वालों को कुछ यूँ सुनायी दे रहा था -
वरिंदर ने मोहिन्दर को गेंद पास किया... मोहिन्दर ने सुरिंदर को और गेंद फिर से वरिंदर के पास और.... इन्दर ने इन्दर को और इन्दर ने गोल कर दिया....!

रवि चतुर्वेदी 

रवि चतुर्वेदी के बारे में सबसे ज्यादा चर्चित बात यह थी कि वे पहले कॉलेज में प्रोफ़ेसर थे, फिर क्रिकेट में ज्यादा दिल आ गया और कमेंट्री करने लगे थे।  इनकी ख़ास बात यह थी कि वे सामान्य ज्ञान में भी जो न मिल सके उस तरह के रोचक जानकारियों के साथ कमेंट्री करते थे। जैसे -
जिम्बाब्वे के गेंदबाज जॉन ट्राइकस, जिनका जन्म मिस्त्र में हुआ है और पेशे से कब्र खोदते हैं, काफी उम्रदार होते हुए भी चुस्त, आ रहे हैं गेंद डालने!
या कुछ इसी तरह की जानकारियों के बीच
और आउट हो गए श्रीलंका के बल्लेबाज अट्टापट्टू, जो नाम से ही अटपटे से हैं, एक अटपटे शॉट खेल कर आउट हो गए!
बात उन दिनों की है जब भारत में इमर्जेन्सी लगा दी गयी थी और ऑल इंडिया रेडियो - ऑल इंदिरा रेडियो बन गया था जिस कारण हर किसी को उस समय के सरकार की, ख़ास कर गांधी-नेहरू परिवार की प्रशंसा करनी पड़ती थी। ऐसे में क्रिकेट कमेंट्री का अछूता रह पाना संभव नहीं था, और १९७६ में वेस्ट इंडीज़ के खिलाफ भारत के ऐतिहासिक ४०६ रन के लक्ष्य को सफलता पूर्वक करने की कमेंट्री रवि चतुर्वेदी कर रहे थे।

उस समय का शायद यह सबसे बड़ी रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए जीत थी इसलिए खेल अत्यंत रोमांचक हो गया था और विश्वनाथ के साथ मोहिन्दर अमरनाथ ने जब जीत के रन को पूरा किया तो कमेंट्री बॉक्स में जोश अपने पराकाष्ठा पर पहुँच गयी थी।  शायद अंगरेजी में डॉ. नरोत्तम पुरी कमेंट्री कर रहे थे पर उस ऐतिहासिक क्षण में रवि चतुर्वेदी ने माइक को लगभग छीनते हुए कहा था -
ये नेहरू का देश, ये गांधी का देश - जहाँ पर श्री संजय गांधी और श्रीमती इंदिरा गांधी के चलाये २०-सूत्री प्रोग्राम का नतीज़ा है कि भारत को ये ऐतिहासिक जीत मिली है..... !
वैसे उन दिनों के कमेंट्री का एक नमूना पेश है:
सुशील:  वेस्ट इंडीज़ के बॉलर काफी सटीक और नपी तुली गेंदबाज़ी कर रहे हैं। पिच पर जो घास हैं उसका बहुत सफल तरीके से फायदा उठा रहे हैं, इस कारण से अब भारत के ओपनर बड़े गंभीर परिस्थिति में हैं।
रवि: बिलकुल ठीक कहा आपने सुशील, वेस्ट इंडीज़ का क्षेत्ररक्षण बहुत अच्छी है, थोड़ी देर पहले जो गायकवाड़ का कैच गस लोगी ने लपका था, वे बहुत ही चुस्त और मुस्तैद फील्डर हैं।
सुशील: और ये बैट्समैन ने बल्ला घुमाया, गेंद तेज़ी से बॉउंड्री के तरफ बढ़ती हुयी....और ये चार रन्न्न्न्न!!........  फील्डर गेंद का पीछा नहीं कर पाये, और जब तक गेंद को पकड़ पाते, गेंद बाउंड्री लाइन को पार कर गयी थी। और इस तरह से भारत के खाते में ४ और रनों का इज़ाफ़ा। इस चौके के साथ, गावस्कर ५६ के निजी स्कोर पर और भारत धीरे-धीरे मजबूत स्थिति की ओर बढ़ते हुए, अब तीन विकेट खो कर २३४ रन पर।
रवि: और ये ओवर की समाप्ति, और इसके साथ ही अंपायर ने लंच-ब्रेक की घोषणा की, खिलाड़ी वापस पवेलियन लौट रहे हैं। और इसी के साथ मैं, रवि चतुर्वेदी, आपको वापस स्टूडियो लिए चलते हूँ।भोजनोपरांत के खेल के आँखों देखा हाल सुनाने के लिए हम पुनः १ बजे उपस्थित होंगे।   

जोगा राव 

जोगा राव अपने कमेंट्री करने के स्टाइल से काफी वृद्ध से कमेंटेटर लगते थे और उनकी कमेंट्री बहुत घटिया दर्जे का हुआ करता था। बिना किसी विवरण को दिए -
और ये गेंद...... इसे घुमा दिया चार रन के लिए
और ये आउट
ये गेंद..... और इस गेंद पर कोई रन नहीं बना
और ये तेज़ गेंद.... गौर से देखा और जाने दिया विकेटकीपर के पास
ऐसे आधे-अधूरे वाक्यों को बोल कर, बाकी "सुनने वाले! आप स्वयं कल्पना कर लीजिये" - जैसे विचार-भावना से काम चलता था। परन्तु मुझे उनकी की गयी कमेंट्री के एक पल बहुत याद आते हैं।

रवि शास्त्री - जो बहुत नीरस तरीके के बल्लेबाज थे और जितने नीरस थे उतनी ही धीमी गति से खेलते भी थे। एक मैच में वे ९० रन के ऊपर पहुँच कर - नर्वस नाइंटी पर - काफी देर से खेलते हुए, घंटो से शतक के इंतज़ार में क्रीज़ पर पसीने बहा रहे थे। श्रोताओं के साथ-साथ, शायद जोगा राव खुद भी कमेंट्री करते करते काफी बोर हो गए थे। ख़ास कर यह कहते-कहते कि - "इस गेंद को भी शास्त्री क्रीज़ पर दो कदम आगे बढ़ कर सम्मानपूर्ण ढंग से खेलते हुए गेंद को वापस बॉलर के पास पहुंचा दिया, और इसी के साथ एक और मेडन ओवर की समाप्ति..... " फिर कुछ देर बाद, शास्त्री बिना शतक बनाये शायद ९८ पर आउट हो गए और जोगा राव ने कहा - "इतना सम्मान दोगे तो यही होगा" - इस वाक्य में उनकी भावना, पूर्ण रूप से व्यक्त हो गयी थी - जो शायद श्रोता की भावना से मिलती जुलती सी थी। 

उन दिनों पूरे देश में प्रसारित होने वाले आकशवाणी का सिर्फ एक ही चैनल होता था, जहाँ से कमेंट्री आती थी। उसी चैनल पर हिंदी और अंग्रेज़ी में समाचार भी सुनाया जाता था। बड़े शहरों का अपना स्थानीय रेडियो स्टेशन भी होता था। एक बार ऐसे ही किसी न्यूज़ के प्रसारण के दौरान, कमेंट्री से हम वंचित थे। खेल कलकत्ता में हो रहा था। कुछ और करने को नहीं था तो समयकाटू प्रयोजन से, रेडियो ट्रांज़िस्टर के नॉब को घुमाते-घुमाते मैं अनजाने में कलकत्ता रेडियो-स्टेशन से बंगला भाषा में प्रसारित हो रहे कमेंट्री को सुना! यह एक अनूठा सा अनुभव था। जमशेदपुर में रहते हुए काफी कुछ बंगला समझ में आने लगी थी, इस लिए उस कमेंट्री का जो मैंने रसास्वादन लिया - वह आजतक के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव सा है। आकाशवाणी से प्रसारित हिंदी और अंग्रेज़ी में होने वाले कमेंट्री के तर्ज़ पर ही बंगला भाषा में भी पुष्पेन सरकार और अजोय दा जैसे कुछ कमेंटेटर और उनके साथ विशेषज्ञ के रूप में, पंकज रॉय भी साथ में थे, जो भारत के एक समय ओपनर बल्लेबाज रह चुके थे।

बंगला भाषा के कमेंट्री की खास बात यह थी कि उनकी क्रिकेट की शब्दावली खालिस बंगला में हुआ करती थी, इस लिए कभी-कभी तो ऐसा बोध होता था मानो कोई साहित्यिक विवेचना हो रही हो।  गुड लेंग्थ बॉल को "खाटूर लेंग्थेर बाल" और अब तो याद नहीं है पर, और भी कई तरह के क्लिष्ट बंगला भाषा के शब्दों के प्रयोग करते हुए कमेंट्री जारी रहता था। ऐसा लगता था मानो कमेंट्री कम और किसी नुक्कड़ पर "दादा-युगल" किसी गहन चर्चा में ज्यादा लगे होते थे।  मगर सबसे हास्यास्पद तो तब लगता था, जब कमेंटेटर अपने कमेंट्री के दौरान टीम के कप्तान या किसी खिलाड़ी को कुछ निर्देश सा देते थे और ऐसा आभास होता था, मानो वे सामने खड़े हों और उनको कॉमेंटेटर बता रहे हों कि किस तरह से उन्हें खेलना चाहिए -
ए काली चौरोन, जौदि तुमी जीतते चाओ, भालो कोरे बोलिंग टा कोरते होब्बे, एई रोकोम चोलबे ना!

वैसे उन दिनों ईडन गार्डन्स और मोहन बागान के बीच होने वाले फ़ुटबाल मैच के बंगला में होने वाले कमेंट्री से पूरा मोहल्ला गूंजता रहता था। परन्तु फ़ुटबाल में हमें कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं होती थी और इसलिए कभी बंग्ला में कमेंट्री नहीं सुना था, ऐसे में क्रिकेट के कमेंट्री को बंगला में सुनने का अनुभव बहुत मज़ेदार सा था!

आज भी पुराने दिनों को जब याद करता हूँ, तो हरेक खिलाडियों की यादें बिलकुल ताज़ी हो जाती हैं! उन दिनों, आज की तरह न उनके बारे में इंटरनेट पर जानकारी ले सकते थे या हम उन्हें खेलते हुए देख सकते नहीं थे, परन्तु किसी भी टेस्ट-श्रृंखला के शुरू होने के पूर्व, टीम और उनके हरेक खिलाड़ी के पूरे विवरण के साथ धर्मयुग का विशेष अंक प्रकाशित होता था। हम बड़े चाव से हरेक खिलाड़ी के बारे में पढ़ते थे, और फिर खेल के दौरान धृतराष्ट्र की तरह से "आँखों देखा हाल" सुन कर - कुरुक्षेत्र से महाभारत के विवरण की भांति खेल के बारे में सोचते रहते थे। आज विश्व के किसी भी कोने में मैच हो रहे हों, उनके बारे में जानने के लिए इतने तरह के सुविधा आ गए हैं, पर क्रिकेट का जो मज़ा उन दिनों था, वो बात अब नहीं रही!

अभावों में उछलते-कूदते बचपन में ज्यादा रोमांच था!   

क्रिकेट के झरोखे से बचपन - "क्रिकेट की जीत"

बचपन में हर दीवार पर यही पोस्टर होता था! 
हर खेल को मनोरंजन और प्रतिस्पर्धा की भावना से खेला जाता है । इस क्रम में हार और जीत का सिलसिला बहुत स्वाभाविक सा है। समय के दौर में टीम का प्रदर्शन संतोषप्रद होना चाहिए। यानी टीम अच्छा खेल का प्रदर्शन करे और ज्यादा समय जीते। जीतने के प्रयास करने के क्रम में अगर टीम हार भी जाए, तो उस टीम के प्रशंसकों को काफी हद तक संतोष मिलता है।

पर इस तथ्य को जानने के बाद भी भारत के क्रिकेट टीम का प्रदर्शन बहुत अद्भुत था! हमारे बचपन के दौर में, भारत के क्रिकेट टीम कुछ भी हो, पर ऐसा नहीं लगता था कि वे जीतने के उद्देश्य को लेकर खेला करते थे। शायद खिलाड़ी अहिंसावादी बन कर सभी विपक्षी टीम को प्रसन्न रखते थे, और इस तरह से गांधी के बताये रास्ते पर चलते हुए भारत की टीम, स्वेच्छापूर्वक हर - ऐरे गैरे नत्थू खैरे - टीम से हार जाया करती थी।

शुरुआत में तो सिर्फ टेस्ट मैच का प्रचलन था।पांच दिनों तक चलने वाले इस अजीब से बोरिंग खेल में तीन दिनों के खेल के बाद, एक दिन - "रेस्ट डे" - सुस्ताने के लिए भी मिला करता था। लाज़मी है कि किसी भी खेल में एक पक्ष हारेगा या जीतेगा। बावजूद इसके, आये दिन भारत बामुश्किल ड्रॉ कर पाने में सक्षम हो जाए, तो उसे ही बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। परन्तु ज्यादातर समय, भारत की टीम बहुत नाटकीय ढंग से आल आउट हो जाया करती थी, और "फॉलो ओन" के शर्मींदगी झेलते हुए, बुरी तरह से पारी के अंतर से हार जाया करती थी।

वैसे शुद्ध रूप से इंद्र देवता की अनुकम्पा है कि सही समय में बरसात के प्रसाद के वितरण करके उन्होंने भारतीय क्रिकेट के रिकार्ड-बुक में भारत को कई शर्तिया हार से बचाने में मदद की है, वरना उस दौर में भारत के हार का रेकार्ड और भी ख़राब सा दीखता!

धीरे-धीरे भारत की टीम क्रिकेट के इस फॉर्मेट में काफी हद तक टीम ठीक-ठाक सा खेलने लगे थे। मगर टेस्ट मैच छह दिनों तक चलता था, और खिलाड़ी इत्मीनान से काफी सुस्त होकर खेलते थे। उन दिनों जितने दिन तक टेस्ट क्रिकेट की एक श्रृंखला चलती थी, उतने दिनों के लिए तो आजकल आई टी में कॉन्ट्रैक्ट वाली नौकरी भी नहीं चलती है!

कहने का मतलब है, कि टेस्ट खिलाड़ी लगभग एक अस्थायी नौकरी में हुआ करते थे, और वे निहायत ही बेढब, आलसी और ढीले ढाले से होते थे - कई खिलाड़ी तो ऐसे थे जो दौड़ कर बाउंड्री लाइन से गेंद को भी पकड़ कर नहीं ला सकते थे, दौड़ कर बाउंड्री को रोकना तो दूर की बात थी।

मुझे याद है कि एक टेस्ट मैच में न्यूज़ीलैंड के बैट्समेन ने एक बार दौड़ कर ४ रन ले लिए थे, तो हम सभी सुन कर हैरान हो गए थे। अब यह एक विवाद का विषय है कि बल्लेबाज ज्यादा चुस्त थे या भारत के फील्डर इतने धीमे थे कि दौड़ कर चार रन लेना संभव हो पाया। संभवतः थोड़ा-थोड़ा दोनों का योगदान था।

साथ ही उन दिनों भारतीय टीम, साल में सिर्फ १०-१२ टेस्ट मैच खेला करते थे, इसलिए उनके प्रशंसकों को हार का दर्द भी कम ही चखना पड़ता था।

हार का बढ़ता हुआ दर्द

फिर ७० के दशक में वन डे का प्रचलन शुरू हुआ।अब क्रिकेट खेलने का ढर्रा बदलने लगा था - लोग अब छह दिनों तक के "कलात्मक क्रिकेट के खेल" को देखने के लिए स्टेडियम में आने में उतना उत्सुकता नहीं दिखाते थे।

अब यह नया फॉर्मेट भारतीय क्रिकेट के लिए एक नयी समस्या को लेकर सामने आ गयी थी। अब तक तो भारतीय खिलाड़ी खींच तान कर हार से बच कर ड्रा करा देते थे और उस पर गावस्कर के एकाध शतक लग जाने से प्रशंसक शांत भाव से एकाध हार को भी पचा लेते थे। पर इस नए फॉर्मेट में एक बात तो तय हो गयी थी कि भारत के टीम को जीतने के लिए खेलना पड़ेगा वरना ड्रा की गुंजाईश तो थी ही नहीं।

भारत के टीम ने नीलकंठ की तरह हार के घड़े को समुद्र-मंथन में बचे विष की तरह ग्रहण कर लिया था। भारत हर टीम को अपने जीत का रिकार्ड को ठीक करने का भरपूर मौका दिया करती थी। इस तरह से खेल-भावना का उच्चतम परिचय देते हुए, बहुत भाईचारा, शालीनता और सहिष्णुता पूर्वक भारत मैच से हार जाया करती थी।

अपनी कमज़ोरी जानते हुए, भारतीय क्रिकेट बोर्ड यह प्रयास करती थी कि एकदिवसीय फॉर्मेट में, कम से कम मैच खेला जाए। हालत यह थी कि जब पूरी दुनिया में १२४ एकदिवसीय क्रिकेट मैच का आयोजन हो गया था, और भारत ने भी करीब २५ एकदिवसीय मैच खेल चुके थे, तब कही जा कर नवम्बर १९८१ में, अहमदाबाद में भारत ने इंग्लैंड के साथ पहले एकदिवसीय मैच का आयोजन किया। 

जाहिर है भारत ने अपने - "अतिथि देवो भवः" का परिचय देते हुए, उस मैच को इंग्लैंड के अतिथि-सम्मान के तौर पर हार गयी। ध्यान देने वाली बात यह है कि विश्व का पहला एकदिवसीय मैच १९७१ में हुआ था और पड़ोसी देश पाकिस्तान ने १९७६ में ही इसका आयोजन करना शुरू कर दिया था।

मगर अब भारतीय टीम की मज़बूरी ये हो गयी कि १९७५ के आस-पास इंग्लॅण्ड में क्रिकेट का वर्ल्ड कप - जिलेट टूर्नामेंट का आयोजन शुरू कर दिया जो बेहद सफल हुआ था। इसके बाद हर देश की टीम जोर-शोर से एकदिवसीय क्रिकेट खेलना शुरू कर दिए थे। पर पूरे ७० के दशक में भारत में कोई एकदिवसीय मैच का आयोजन नहीं हुआ था। विदेशी दौरे में भारत स्वेच्छा पूर्वक हर एकदिवसीय क्रिकेट में हार जाया करती थी।

दरअसल उस दौर में, भारत के टीम में जितने खिलाड़ी थे, उनमे से ज्यादातर बूढ़ और बेहद नीरस किस्म के खिलाड़ी थे। गावस्कर हो या विश्वनाथ, उस दौर के सभी भारतीय खिलाड़ी सुरक्षात्मक, कलात्मक और तकनीकी रूप से सटीक खेलते थे पर वे सभी इस तेज़ गति से खेले जाने वाले फॉर्मेट के लिए भयानक थे! भारत को युवा खिलाडियों की तलाश थी पर उन दिनों भारतीय क्रिकेट कुछेक प्रान्त के अधीन थे और जैसा स्टालिन ने कहा था - "इलेक्शन में वोट किसी को भी पड़े, पर आखिरकार जीतेगा वही" - उसी तर्ज़ पर घूम फिर कर खिलाड़ी वही से आने वाले थे, इसलिए कोई नए चेहरे को कभी मौक़ा मिलना आसान नहीं था।

बार-बार के टीम के हारने से मन बहुत दुखी रहा करता था। भारत इंग्लॅण्ड, ऑस्ट्रेलिया और वेस्ट इंडीज़ से तो हारती ही रहती थी पर यदा-कदा न्यूज़ीलैंड, श्रीलंका और पाकिस्तान से भी हार कर अपना अहिंसा का झंडा फहराते रहते थे। तीसरे वर्ल्ड कप के पहले तक का भारत का रिकॉर्ड यूँ था कि ३९ एकदिवसीय खेल में सिर्फ १२ में जीते थे। फिर भारत के टीम तीसरे वर्ल्ड कप खेलने इंग्लैंड जा रही थी और उस से पहले भूले भटके वेस्ट-इंडीज़ भी चली गयी थी जहाँ पर सबसे शक्तिशाली टीम वेस्ट इंडीज़ को २७ रन से हरा दिया था। दुनिया ने पहली बार कपिल देव के आतिशी बल्लेबाजी का नमूना देखा था - ३८ गेंदों में ७ चौके और ३ छक्कों के साथ ७२ रन और बाद में १० ओवर में ३८ रन देकर २ विकेट।

अप्रत्याशित रूप से भारत की टीम काफी अच्छा प्रदर्शन कर रही थी।और देखते- देखते भारत ने तीसरा वर्ल्ड कप भी जीत लिया। वर्ल्ड कप के दौरान अगर किसी ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया था तो वह था कपिल देव ने - उनके १७५ रन की नाबाद पारी मेरे हिसाब से आज तक के क्रिकेट के किसी भी फॉर्मेट के सबसे बेहतरीन पारियों में एक गिना जाएगा।




भारत के वर्ल्ड कप जीतने का यह अप्रत्याशित नतीज़ा, क्रिकेट के इतिहास की सबसे चौंकाने वाले क्षणों में से एक घटना रही होगी। थोड़े दिनों बाद ज़ख़्मी वेस्ट इंडीज़ भारत के दौरे पर आई थी और उन्होंने बुरी तरह से भारत को ६-० से हराया। विश्व कप विजेता भारत, वेस्ट इंडीज़ के सामने बिलकुल बौना सा नज़र आ रही थी।
और उसके बाद बाद कुछेक मैच को जीतते हारते हुए, धीरे-धीरे भारत अपने पुराने दौर में आ गयी और फिर से हारने लगी।

उन दिनों भारत और पाकिस्तान के बीच खूब मैच होने लगा था और धीरे धीरे क्रिकेट के मानचित्र में शारजाह का नाम भी आ गया था, जहाँ हर साल भारत और पाकिस्तान का खेलना लगभग निश्चित सा था। शुरूआत के दिनों में कभी कभी भारत की जीत भी हो जाती थी, पर बाद में भारत लगातार हटने लगी थी, ख़ास कर उस मैच के बाद जब मियांदाद ने अंतिम ओवर में छक्का मार कर करोड़ों भारतीयों का दिल तोड़ दिया था।

क्रिकेट की जीत

पर हर बार हम सभी उत्साहित होकर भारत के टीम का अंतिम बॉल तक समर्थन करते रहते थे, पर करोड़ों प्रशंसकों के समर्थन के बावजूद जब भारत की टीम हार जाती थी तो हमारे साथ कॉमेंटेटर को भी भारत के हार के बारे में बोलने में ख़राब लगने लगा था। बारम्बार होने वाली इसी दुखद घटना के साथ साथ जब हारने का ढर्रा भी एक जैसा ही हो, तो उसके बारे में बात करने से बहुत ज्यादा मानसिक कष्ट होता है।

साहिर ने बड़ी अच्छी बात की है कि जब कोई बात न सम्हल पाये तो "उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ देना अच्छा" होता है।ऐसे में किसी कॉमेंटेटर ने एक बहुत ही सही अभिव्यक्ति दी थी -
भारत ने बहुत अच्छे खेल का परिचय दिया, और ये बहुत ही नज़दीकी मामला था पर अंत में आज फिर से "क्रिकेट की जीत" हो गयी।
इस मुहावरे का प्रचलन कई सालों तक होता रहा था। संभवतः, "क्रिकेट की जीत" वाले मुहावरे की शुरुआत, उन दिनों के सुप्रसिद्ध कमेंटटेटर सुशील दोषी ने की थी। कारण स्पष्ट था कि - भारत ज्यादातर मैच हारती ही रहती थी। ऐसे समय कमेंटटेटर्स के द्वारा भारतीय खिलाडियों के खेल-भावना की प्रशंसा, क्रिकेट की महानता या कुछ इस तरह की बातें करके, भारतीय टीम के साख को यथासंभव बचा लिया जाने का यह एक प्रयास सा था।

देश की हार और विपक्षी टीम के जीत को, "क्रिकेट के जीत" में समाहित कर देने से कुछ हद तक शालीनता का बोध होता था, साथ ही साथ पराजय का मलाल भी कुछ कम सा हो जाता होगा। संभवतः समय के उस दौर में, भारत में हार को खेल-भावना से स्वीकार करने में हिचकिचाहट सी रही होगी।

पुराने रिकार्ड्स को देखने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि उन दिनों भारत की टीम खासी कमज़ोर सी थी, और लगातार अपने शर्मनाक हार से देशवासी का मनोबल काफी टूट सा गया होगा।

उस दौर में "कभी किसी नीले चाँद में" - अर्थात "वंस इन ब्लू मून", अगर विपक्षी टीम बहुत ज्यादा ख़राब खेल दे, अथवा कभी विपक्षी टीम दान-पुण्य के मूड में हो और स्वेच्छा से हारने का मन बना ले, तो रिकार्ड बुक में भूले-भटके भारत के नाम भी जीत दर्ज हो जाया करता था।भारत की जीत की सम्भावना, ज्यादातर ऐसे मैच में होती थी, जहाँ पिच गेंद को स्पिन कराने में मददगार रही हो।

हालांकि कपिलदेव और श्रीकांत ने भारतीय क्रिकेट टीम में जोश और काफी हद तक आत्मविश्वास भरा था और धीरे-धीरे भारत जीतने के उद्देश्य से मैदान में उतरने लगी थी और बाद के दिनों में काफी अच्छे खेल का प्रदर्शन करने लगी थी। आज के दिनों में भारत विश्व के बेहतरीन टीम में से एक है और काफी समय जीतती है। मगर भारत के जीत के साथ ही कहाँ गया वह प्यारा सा जुमला - "क्रिकेट की जीत"!

Jan 8, 2016

क्रिकेट की रेडियो कमेंट्री - सुशील दोषी

उन दिनों क्रिकेट के खेल का आँखों देखा हाल - रेडियो कमेंट्री के माध्यम से आया करता था। लोगों के घर के ड्राइंग रूम के किसी एक कोने में बिजली से चलने वाला काफी बड़ा सा रेडियो, स्थापित सा हुआ करता था। उस ज़माने में मर्फी के रेडियो को किसी क्रोशिये से बने जालीदार कवर से बड़ी इज़्ज़त के साथ ढँक कर रखा जाता था। उन दिनों काफी हद तक रेडियो को वही गौरव प्राप्त था, जो आज के दौर में टीवी को प्राप्त है।

मेरे बड़े होने के दौर में ही बैटरी से चलने वाला ट्रांज़िस्टर रेडियो का प्रचलन हो गया था, और इस तरह से रेडियो से ट्रांज़िस्टर बनकर इसके छोटे संस्करण का ड्राइंग रूम से बाहर तक का सफर शुरू हो चुका था। अब लोग बड़े शान से अपने हाथ में एक ट्रांज़िस्टर को टाँगे हुए, किसी भी जगह निकल पड़ते थे। इस क्रम में मुझे याद आती है एक पिकनिक का, जब हम अपने साथ ट्रांज़िस्टर ले कर निकले थे और पिकनिक के दौरान घर से काफी दूर वीरान से जगह पर पूरे कमेंट्री को सुने थे!

आम तौर पर भारत में होने वाले खेल जाड़े के समय हुआ करता था और उन दिनों स्कूल बंद हुआ करता था। जिंदगी ज़रा आराम करके सुस्ताती सी होती थी। माहौल कुछ इस तरह का होता था-

लोग ठण्ड में घर के बाहर, जाड़े के कच्ची और नरम धूप को सेकने के लिए खाट, कुर्सियां, मचिया (बेंत का बना हुआ मोढ़ा) आदि पर बैठे अपने साथ रेडियो ट्रांज़िस्टर में कमेंट्री का इंतज़ार करते रहते थे। औरते साथ में ऊन के गुच्छे ले कर स्वेटर बुनने में लगे हुए, बड़े-बूढ़े अखबारों को पढ़ते हुए, हम बच्चे सामने के खुले रोड या मैदान में गिल्ली डंडा या क्रिकेट खेलते हुए, बीच-बीच में हर कोई रेडियो पर ध्यान देकर सुनते थे। कभी बारिश का खबर या कभी-कभार मैदान में ओस या कुहासे होने जैसे कारणों से कुछ देर से खेल के शुरू होने का समाचार मिलता, और फिर जैसे ही टॉस का खबर मिलता, हम उत्साहित होकर अपना सब काम छोड़ कर रेडियो के पास बैठ जाते थे।

कई तरह के अनुमान लगा कर लोग बातें करते थे। अनेकों प्रकार के अनुमान पर टिके हुए विवेचना चलती रहती थी - कि कहीं भारत टॉस न हार जाए, और वैसे में अगर पहले बैटिंग के लिए बुला दिया जाए, और अगर शुरुआत में ही कोई ऐसी भयानक गेंद आ जाए जिस से गावस्कर आउट हो जाए, फिर भारत क्या उस मुसीबत से उबर पायेगा आदि आदि। कुछ ज्यादा जानकार से लोग विपक्षी टीम के किसी घातक बॉलर के बारे में बता कर हमें और भयभीत से कर देते थे। एक तो गावसकर ओपनिंग क्यों करता था, यह भी बहुत कष्टप्रद सा विषय था - भारत के टीम में एक ही तो अच्छा बैट्समैन और वो भी शुरू में ही आ जाता था - बचपन में हमारे लिए यह एक बहुत विकट समस्या हुआ करता था!
सुशील दोषी 

एक और समस्या यह होती थी कि उन दिनों १५ मिनट के अंतराल पर बारी-बारी से हिंदी और अंग्रेजी में कमेंट्री होती थी। ऐसे में कोई अंग्रेज़ी जानने वाले का आस पास होना बहुत लाभकारी सा होता था, पर ऐसे लोग कम ही पाये जाते थे। और हम "आउट", "फोर रन्स", "एंड ऑफ़ थे ओवर" आदि जैसे शब्दावली से काम चला लिया करते थे।

क्रिकेट की कमेंट्री और विशेषज्ञ लाला अमरनाथ जी 

अगर हिंदी में कमेंट्री शुरू होता था तो उन दिनों आम तौर पर जसदेव सिंह या सुशील दोषी शुरुआत करते थे, जो कुछ इस तरह से होता था -
नमस्कार , मैं सुशील दोषी अपने साथी कमेंटेटर्स जसदेव सिंह और अंग्रेज़ी में सुरेश सरैया, मेलविल डेमेल्लो और एक्सपर्ट कमेंट्स के लिए लाला अमरनाथ के साथ-साथ हमारे कमेंट्री बॉक्स में स्कोरर कृष्णन के साथ दिल्ली के फिरोजशाह कोटला से आपका स्वागत करता हूँ। यहाँ कुछ ही देर में भारत और इंग्लैंड के बीच खेले जा रहे पांच मैचों के टेस्ट-श्रृंखला के पहले टेस्ट शुरू होने जा रहा है। इस मैच के आँखों देखा हाल का सीधा प्रसारण आकाशवाणी से सुनाया जा रहा है। स्टेडियम लगभग खचाखच भरी हुई और सभी लोगों में काफी उत्साह और रोमांच। भारत ने पिछले सीजन में न्यूज़ीलैंड को ३-२ से शिकस्त दी थी और उस सीरीज के बाद इंग्लैंड के दौरे में भारत के उम्दा प्रदर्शन की बहुत उम्मीद की जा रही है। क्या कहेंगे लाला आप इस सीरीज के बारे में?
माइक पर ही जोर-जोर से खांसते हुए, लाला अमरनाथ कुछ पंजाबी निष्ठ हिंदी बोलते हुए,
भारत्त को भौत उमीद्द है.... मोहन-दर काफी अच्छे फारम में है, सरिन-दर भी अच्छा फारम में है - दोनों को चान्नस मिलनी चहिये थी.... सभी खिलाड्डियों को अच्छा खेल खेलना चाहिए
आदि जैसे कुछ बातें बोलकर फिर से सुशील दोषी को माइक दे देते थे। ज्ञातव्य है कि लाला अमरनाथ आज़ाद भारत के टीम के पहले कप्तान थे और शायद पहले टेस्ट में ही शतक बनाया था। उम्रदराज़ थे, अस्वस्थ भी रहते थे रहते थे, और बुढ़ापे के दौर में अपने दोनों सुपुत्र मोहिन्दर अमरनाथ और सुरिंदर अमरनाथ के टीम में कभी चयन होने और ख़राब प्रदर्शन के बाद टीम से ड्राप कर देने से वे खासा नाराज़ सा रहते थे और टेस्ट मैच के विशेष टिप्पणी से ज्यादा उनका ध्यान पुत्र-मोह में ज्यादा बह रहा होता था। हालाँकि बाद के दिनों में मोहिन्दर बहुत सशक्त प्रदर्शन किये, और १९८३ के विश्वकप के मैन ऑफ द सीरीज भी रहे थे।

मैच शुरू होता और हर थोड़ी देर में पूरे मैदान के फील्ड सेटिंग का जिक्र बड़े रोचक ढंग से होता था -
काफी आक्रामक क्षेत्ररक्षण लगा रखा है कप्तान बेदी ने..... 
या कभी कभी "सुरक्षात्मक" फील्डिंग की भी व्यवस्था होती थी। मुझे फील्ड पोजिशन्स के बारे में कुछ ज्यादा समझ नहीं थी (अब भी नहीं है) बस कुछ लय में कहे गए - स्लिप, गली, मिड ऑन, कवर, थर्ड मैन, लॉन्ग ऑफ आदि जैसे पोसिशन्स - कई बार तो कमेंट्री के दौरान खुद ही बात करते वे निर्धारित करते रहते थे -
शार्ट मिड ओन बल्कि डीप कहा जा सकता है, शार्ट लेग बल्कि जरा सा और अंदर की ओर फॉरवर्ड शार्ट लेग.....
इसी तरह के पोजिशन के विवेचना को सुनते हुए इस प्रतीक्षा में रहते थे, जब फिर से कहा जाता था -
और इस बीच दूर पैवेलियन छोर से अगले गेंद के लिए तैयार..... और यह गेंद!!!!
थोड़ी देर तक स्तब्धतता- हमारी दिल की धड़कन रुकी हुयी सी - और फिर से चालू -
भाग्यशाली रहे गावस्कर, कि गेंद ने बल्ले का बाहरी किनारा नहीं लिया, काफी तेज़ गेंद, जो टप्पा खाने के बाद गेंद ऑफ स्टंप को लगभग चूमते हुए, बिना कोई क्षति पहुंचाए विकेटकीपर एलन नॉट के दस्ताने में!
सुबह के खेल शुरू होने से लंच के बीच में अगर गावस्कर नाबाद खेलते रह जाते, तो हम इसे एक उपलब्धि ही मानते थे। तब तक के मैच के दौरान फेंके गए हर गेंद पर, जितने भी देवी-देवता को जानते थे- और सर्व-धर्म में विश्वास करते हर धर्म के ईश्वर को याद करते हुए, ये विनती करते रहते थे कि रन बने न बने पर गावस्कर आउट न हो जाए। आज गावस्कर अपने रिकॉर्ड को देख कर, गर्व कर ले, पर उन इन्निंग्स के दौरान शायद उन्हें हम जैसे कितने सारे क्रिकेट के प्रसंशकों के द्वारा ईश्वर के प्रार्थना के योगदान का पता तक नहीं होगा।

गावस्कर या भारत के किसी भी बैट्समैन के हर सकारात्मक इनिंग के लिए - आम तौर पर अगर अर्ध-शतक या शतक लग जाये तो ह्रदय से ईश्वर को धन्यवाद देते थे। पर क्रिकेट की वजह से, ज्यादातर समय, मैं भगवान से "कट्टीस" ही रहता था - अर्थात मेरी बातचीत बंद रहती थी। भारत के हारने के कगार पर पहुँच जाने के स्थिति में और कुछ न कर पाने के विविशता में, ईश्वर को ही जी भर के कोसते थे और गालियां तक दे डालते थे!

पता नहीं गावस्कर के आउट होते ही भारत के हार का बोध होने लगता था। कारण भी काफी वास्तविक सा था - भारत के गेंदबाजी और फील्डिंग दोनों भगवान भरोसे थे। कपिल के आने के पहले तक तो नयी गेंद के चमक को मैदान के हरे घास पर रगड़-रगड़ कर ख़त्म किया जाता था और इस तरह से गेंद को पुराना बनाया जाता था, क्योंकि पुरानी गेंद से ही स्पिन गेंदबाज़ी अच्छी हुयी करती थी।

गावस्कर का शतक और मोटरसाइकल 

पर गावस्कर को क्या पता कि उनके नादान प्रशंसक को उनके शतक के पूरा होने का कितना बेसब्री से इंतज़ार होता था!

और उधर इस बात से बेखबर कि कितने लोग अपने नाखून को काट कर खाए जा रहे हैं,  ऐसा लगता था मानो गावस्कर अपना मालिकाना हक़ समझते हुए ९९ के स्कोर पर, जितनी मर्ज़ी उतनी देर तक अपनी सुरक्षात्मक खेल खेलते ही रहते थे ।

कभी- कभी लंच या टी ब्रेक के आधे घंटे पहले भी ९९ के स्कोर पर होने के बाद भी गावस्कर हरेक गेंद को "सम्मान पूर्वक" खेलते रहते थे। जिसके कारण जब हम डकार ले कर, अगले भोजन या चाय पीने की तैयारी में होते थे, तभी सुशील दोषी के शब्दों में, गावस्कर "बाहर जाती गेंद के साथ छेड़ छाड़" जैसा कुछ कर देते थे!

ऐसे माहौल में, जब हम सभी भयानक तनाव से भरे होते थे, और काफी देर से मैदान में रक्षात्मक, सम्मानपूर्वक आदि जैसे विशेषताओं  के साथ "निष्क्रिय" भाव से खेल चल रहा होता था, और ऐसे में अंततः गावस्कर ने जब "कुछ" किया हो, ठीक तभी, ऐसा लगता था मानो Murphy's Law के तर्ज़ पर, हमारे घर के सामने के सड़क पर कोई मोटरसाइकिल वाला आ जाता था।

बाकी समय मोटरसाइकल वाले आये जाए हमें कोई फरक नहीं पड़ता था, पर जब हम ट्रांज़िस्टर पर कमेंट्री सुन रहें हों तब आ जाए तो बड़ी मुश्किल हो जाती थी, क्योंकि हमारे ट्रांजिस्टर में मोटरसाइकल के कारण सिर्फ "कट कट कट.…" जैसा कुछ आवाज़ आने लगती थी। और उस पर से जब गावस्कर अपने शतक के लक्ष्य पर आ कर रन के कब्जियत से तड़प रहे हों, तब मोटर साइकल वाले का आना बहुत कष्टप्रद होता था।

उस "कट-कट" के  शोर के बीच, कॉमेंटेटर क्या कह रहा होता था, हमें कुछ भी समझ में नहीं आता था। और, थोड़ी देर बाद जब मोटर-साइकल आगे चल जाता, सुशील दोषी किसी पिता की तरह, सांत्वना देने वाले स्वर में बोलते पाये जाते थे -
… बिलकुल गेंद टप्पा खा कर ऊपर...... और ऊपर (कितनी ऊपर?) आ कर....... मिडल स्टंप से ऑफ़ स्टंप के ओर जाती हुयी.... और फिर ऑउटस्विंग होती हुयी बाहर... और बाहर.... बिलकुल बाहर (कितनी बाहर? स्टेडियम से भी बाहर?) जा रही थी.…… ! 
इतने बारीक और विस्तृत जानकारी के बीच सुशील दोषी अंततः क्या हुआ ये एक बार भी नही बताते थे, फलस्वरूप बहुत देर तक समझ में ही नहीं आता था कि - गावस्कर आउट... या सेंचुरी.... या फिर कुछ नहीं?

 जब काफी देर बाद यह सुनते कि -
…और अगली गेंद को गावस्कर ने, जिन्हें अब गेंद "फुटबॉल की तरह नज़र" आ रही होगी, बहुत ही सुरक्षात्मक ढंग से खेलते हुए मिड ओन की तरफ हल्का सा पुश कर दिया.... 
ऐसे कुछ लाइन को सुनने के बाद जाकर यह स्पष्ट होता था कि गावस्कर अभी भी पिच पर खेल ही रहे हैं!

सुशील दोषी की एक और खासियत थी कि वे कमेंट्री करते समय, "एयर-टाइम" का भरपूर इस्तेमाल करते थे। मतलब खेल हो रहा हो या न हो रहा हो, वे कुछ न कुछ बोलते ही रहते थे, अगर मैदान में कुछ ख़ास न भी हो रहा हो तो कुछ काल्पनिक सी ही बातें, जिसका कोई ख़ास अर्थ नहीं होता था, पर सुनने से ठीक-ठाक रोचक सा ही लगता था, जैसे -
.... और जब तक गावस्कर पिच पर हैं, मैच में भारत का पलड़ा काफी भारी सा है...वैसे यह कल्पना करना बहुत रोचक होगा कि अगर तीसरे दिन के चाय के वक़्त तक भारत खेल कर २०० रन की बढ़त ले ले तो, इस पिच पर कुछ भी होने की संभावना हो सकती है..... वैसे इस वक़्त कुछ भी कहा नहीं जा सकता है...  

सुनील और सुशील: ओवल का अविस्मरणीय मैच 

मैं सुशील दोषी के कमेंट्री का कायल था। ख़ास कर सुशील दोषी के किये उस कमेंट्री के दौरान दिए गए विवरण को कभी नहीं भूलूंगा, जिसने उस अति रोमांचकारी मैच को और भी रोचक बना दिया था। सुनील और सुशील ने उस मैच को सजीव बना दिया था।

इंग्लैंड के साथ ओवल में हो रहे मैच के दौरान गावस्कर के उस बेमिसाल इनिंग ने भारत को लगभग जीत के कगार पर ला कर खड़ा कर दिया था। कौन भूल सकता है गावस्कर के उस २२१ रन के पारी को! मेरे हिसाब से शायद उसे क्रिकेट के इतिहास में सबसे बेहतरीन इन्निंग्स में गिना जाना चाहिए।

और उस मैच के हरेक क्षण का सजीव चित्रण के लिए सुशील दोषी को भी हमेशा याद किया जाना चाहिए।

जीतने के लिए अंतिम २० ओवर्स में जिसे मैंडेटरी ओवर्स कहे जाते थे उसमे भारत को जीतने के लिए १०९ रन बनाने थे और उनके ९ विकेट बाकी थे। ऐसे में सिर्फ कपिल देव से ही भारत को तेज़ गति से रन बनाने की उम्मीद थी, और शायद इसी कारण से उन्हें बल्लेबाजी के क्रम में विश्वनाथ से ऊपर भेजा गया था।

कपिल आये और अपने इनिंग के तीसरे गेंद पर ही छक्का मारने के चक्कर में, ठीक बाउंड्री लाइन पर गूच के द्वारा- शून्य - पर ही कैच आउट कर लिए गए थे।

उफ़.... उस दिन के कमेंट्री का क्या कहना! इतना रोमांच था कि आखिर के ३० मिनट में ऐसा लग रहा था मानो मैच किसी भी तरफ जा सकता था, उस दिन कपिल और विश्वनाथ दोनों ने बेहद निराश किया था।पर बॉथम के अंतिम ५ ओवर की गेंदबाज़ी के क्या कहने, उस ने भारत को जीत से लगभग हार के कगार पर पहुंचा दिया था।
Gavaskar on his way to his double-hundred Adrian Murrell / © Getty Images(ESPN )

अंत में मैच किसी तरह से ड्रा हो गया पर भारत जीत से सिर्फ ९ रन दूर थी और हार से सिर्फ २ विकेट दूर!

अपने ख़राब खेल से आउट होने के कारण भारत के मैच को नहीं जीत पाने से कपिल इतने आहत हुए थे कि बाद में अपने एक इंटरव्यू में वे कहते पाये गए थे कि - "मैं इतना दुखी था कि मुझे लग रहा था कि इंडिया लौटते समय प्लेन से कूद कर जान दे दूँ.."

उस रोमांच से भरे मैच के दौरान सुशील दोषी ने जो एक वाक्य कहा था, वह आज भी मेरे कानों में वैसे ही गूंजता रहता है, और शायद यह उस मैच के उत्तेजना को भी पूरी तरह से व्यक्त कर देता है -
जिन लोगों को दिल की बीमारी है, वो कॉमेंट्री न सुने तो बेहतर है, क्योंकि उनके डॉक्टर उन्हें ये सलाह दे रहे होंगे कि ये रोमांच जो सर पर चढ़ कर हावी हो रहा है, ये उनके दिल के लिए हानिकारक साबित हो सकता है।