आज के दौर में बाबा रामदेव के पतंजली और आयुर्वेद के व्यवसायीकरण से बहुत पहले, आयुर्वेद, जड़ी-बूटी इत्यादि जैसे दवा-उपचार का व्यवसाय एक कुटीर उद्योग के तौर पर हुआ करता था। इस तरह के व्यवसाय का जाल बहुत सारे वैद्य-हकीमों के बीच बिखरे पड़े थे। आये दिनों शहर के किसी भीड़-भाड़ वाले खाली जगहों पर इस तरह के वैद्य या हकीम अपना टेंट लगा कर अनेकों प्रकार के असाध्य और लम्बे समय से चले आ रहे बीमारियों को ठीक करने का दावा किया जाता था।
हिमालयी जड़ी-बूटी बेचनेवालों का हिसाब किताब कुछ अलग सा होता था। उनका टेंट होता था जिसके अंदर उनके एकाध हफ्ते से महीनो का जुगाड़ सा लगता था। टेंट के सामने बहुत ही रोचक ढंग से अनेकों प्रकार के जड़ी बूटी और अन्य औषध के डिब्बे रखे होते थे। इन औषधियों मे काफी प्रकार के सूखे जड़ों के डंठल, सूखे बीज, या इसी तरह के अन्य प्राकृतिक सामग्रियाँ रखे होते थे, जिन्हे बड़े तरीके से शीशे के बरनी या कुछ उसी तरह के दिखने वाले जुगाड़ में बहुत हिसाब से प्रदर्शन के लिए रखा जाता था।
वैसे हमारे लिए बचपन में इस तरह के टेंट में कुछ ज्यादा समझने लायक तो होता नहीं था - क्योंकि इसमें बताये जाने वाले रोग एवं उपचार को जानने में हमारी कोई ख़ास रुचि नहीं होती थी। पर फिर भी अन्य कारणों से हम इन्हें देखने के लिए रुक जाया करते थे।
एक कारण तो यह हुआ करता था कि इस तरह के टेंट में बहुत अच्छे प्रकार का लाउडस्पीकर लगा होता था, जिसमे गाना वगेरह चलता रहता था। बीच बीच में गाने को रोक कर वैद्य या हकीम साहेब माइक में कुछ उद्धघोष करते थे और फिर टेंट के अंदर नुमाइश के तौर पर रखे अनेकों प्रकार के रंगीन पत्ते, बीज, इत्यादि फैले से होते थे और कहीं कही उनका ऊँचा सा ढेर लगा होता था - जिन्हें वह अपने हाथ में रखे माइक से बहुत ही रोचक ढंग से बताया करते थे।
उस वैद्य के साथ ही उसका एक असिस्टेंट भी होता था जिसका काम तरह तरह के सामग्रियों को लेकर कुत्ते रहने या पीसने जैसे काम में लगा होना होता था। ज्यादातर वह बिलकुल चुपचाप सा होता था और अपने काम में बहुत निष्ठापूर्वक लगा होता था। मगर उसके बगल में एक बैटरी से चलने वाला माइक्रोफोन और कुछ गाने बजाने वाला - रिकार्ड प्लेयर होता था। इतने सारे रोचक क्रियाओं को छाव से देखना बहुत ही सुखद अनुभूति होती थी। दवा का बनते देखना और उसका साथ में बज रहे मधुर गाने, फिर बीच बीच में रनिंग कमेंट्री भी सुनाई देता था।
मुख्य वैद्य या हकीम बिलकुल विद्वान सा लुक देकर सभी समस्याओं का समाधान बताने वाले मुद्रा में बैठा होता था। बीच बीच में वह माइक से - अनेको प्रकार के बीमारी - उसके लक्षण- और फ़ी अचूक निदान के बारे में लोगो को जानकारी देता रहता था। हरेक दो लाइन में - हिमालय, जड़ी-बूटी, दुर्लभ, बेशकीमती, खानदानी वैद्य या हकीम. देसी जड़ी-बूटियों वाला काढ़ा, सालों से नहीं ठीक होने वाला बीमारी, सभी प्रकार के असाध्य रोग, शर्तिया इलाज़, गारंटी, पैसे वापस - जैसे शब्दों के उच्चारण से समां बना रहता था।
बीच-बीच में वह एक छड़ी से दीखाता हुआ, कुछ अजब-अजब प्रकार के जड़ी-बूटियों की जानकारी देता हुआ, लोगो में अपने ज्ञान की छाप और विश्वसनीयता पैदा करने जैसा कुछ कार्यक्रम करता रहता था जब आस पास भीड़ काम हो जाती तो वह फिर से किसी हिंदी फ़िल्मी गाने का सहारा लेलेता और लोगों के मनोरंजन में अपने को भी समर्पित कर देता था।
भारत में फ़िल्मी गाने का बनने का मुख्य मकसद, फिल्म के किसी कठिन परिस्थिति को सहज और काव्यात्मक ढंग से संगीतबद्ध तरीके से व्यक्त करना रहा होगा। पर कालांतर में, फिल्म के गाने का मुख्य प्रयोग, रेडियो-स्टेशन में - विविध भारती के २४ घंटे- सेवा में युक्त हो जाना, पार्टी-त्यौहार में बजते रहना और इस तरह के दूकान या मेले जैसे माहौल में बजते रहने का बहुत बड़ा उपयोग सा था।
इस कारण गाने का फिल्म में कोई प्रयोजन हो या न हो - पर उनका उपयोग, उसके अलावा और बहुत सारे अन्य क्षेत्र में ज्यादा होता था।
हिमालयी जड़ी-बूटी बेचनेवालों का हिसाब किताब कुछ अलग सा होता था। उनका टेंट होता था जिसके अंदर उनके एकाध हफ्ते से महीनो का जुगाड़ सा लगता था। टेंट के सामने बहुत ही रोचक ढंग से अनेकों प्रकार के जड़ी बूटी और अन्य औषध के डिब्बे रखे होते थे। इन औषधियों मे काफी प्रकार के सूखे जड़ों के डंठल, सूखे बीज, या इसी तरह के अन्य प्राकृतिक सामग्रियाँ रखे होते थे, जिन्हे बड़े तरीके से शीशे के बरनी या कुछ उसी तरह के दिखने वाले जुगाड़ में बहुत हिसाब से प्रदर्शन के लिए रखा जाता था।
वैसे हमारे लिए बचपन में इस तरह के टेंट में कुछ ज्यादा समझने लायक तो होता नहीं था - क्योंकि इसमें बताये जाने वाले रोग एवं उपचार को जानने में हमारी कोई ख़ास रुचि नहीं होती थी। पर फिर भी अन्य कारणों से हम इन्हें देखने के लिए रुक जाया करते थे।
एक कारण तो यह हुआ करता था कि इस तरह के टेंट में बहुत अच्छे प्रकार का लाउडस्पीकर लगा होता था, जिसमे गाना वगेरह चलता रहता था। बीच बीच में गाने को रोक कर वैद्य या हकीम साहेब माइक में कुछ उद्धघोष करते थे और फिर टेंट के अंदर नुमाइश के तौर पर रखे अनेकों प्रकार के रंगीन पत्ते, बीज, इत्यादि फैले से होते थे और कहीं कही उनका ऊँचा सा ढेर लगा होता था - जिन्हें वह अपने हाथ में रखे माइक से बहुत ही रोचक ढंग से बताया करते थे।
उस वैद्य के साथ ही उसका एक असिस्टेंट भी होता था जिसका काम तरह तरह के सामग्रियों को लेकर कुत्ते रहने या पीसने जैसे काम में लगा होना होता था। ज्यादातर वह बिलकुल चुपचाप सा होता था और अपने काम में बहुत निष्ठापूर्वक लगा होता था। मगर उसके बगल में एक बैटरी से चलने वाला माइक्रोफोन और कुछ गाने बजाने वाला - रिकार्ड प्लेयर होता था। इतने सारे रोचक क्रियाओं को छाव से देखना बहुत ही सुखद अनुभूति होती थी। दवा का बनते देखना और उसका साथ में बज रहे मधुर गाने, फिर बीच बीच में रनिंग कमेंट्री भी सुनाई देता था।
मुख्य वैद्य या हकीम बिलकुल विद्वान सा लुक देकर सभी समस्याओं का समाधान बताने वाले मुद्रा में बैठा होता था। बीच बीच में वह माइक से - अनेको प्रकार के बीमारी - उसके लक्षण- और फ़ी अचूक निदान के बारे में लोगो को जानकारी देता रहता था। हरेक दो लाइन में - हिमालय, जड़ी-बूटी, दुर्लभ, बेशकीमती, खानदानी वैद्य या हकीम. देसी जड़ी-बूटियों वाला काढ़ा, सालों से नहीं ठीक होने वाला बीमारी, सभी प्रकार के असाध्य रोग, शर्तिया इलाज़, गारंटी, पैसे वापस - जैसे शब्दों के उच्चारण से समां बना रहता था।
बीच-बीच में वह एक छड़ी से दीखाता हुआ, कुछ अजब-अजब प्रकार के जड़ी-बूटियों की जानकारी देता हुआ, लोगो में अपने ज्ञान की छाप और विश्वसनीयता पैदा करने जैसा कुछ कार्यक्रम करता रहता था जब आस पास भीड़ काम हो जाती तो वह फिर से किसी हिंदी फ़िल्मी गाने का सहारा लेलेता और लोगों के मनोरंजन में अपने को भी समर्पित कर देता था।
भारत में फ़िल्मी गाने का बनने का मुख्य मकसद, फिल्म के किसी कठिन परिस्थिति को सहज और काव्यात्मक ढंग से संगीतबद्ध तरीके से व्यक्त करना रहा होगा। पर कालांतर में, फिल्म के गाने का मुख्य प्रयोग, रेडियो-स्टेशन में - विविध भारती के २४ घंटे- सेवा में युक्त हो जाना, पार्टी-त्यौहार में बजते रहना और इस तरह के दूकान या मेले जैसे माहौल में बजते रहने का बहुत बड़ा उपयोग सा था।
इस कारण गाने का फिल्म में कोई प्रयोजन हो या न हो - पर उनका उपयोग, उसके अलावा और बहुत सारे अन्य क्षेत्र में ज्यादा होता था।
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