Oct 30, 2016


यह कविता शायद मैं अपने प्राम्भिक कक्ष में पढ़ा था और अभी इन्टरनेट से कहीं मुझे इस कविता का पूरा अंश मिल गया, मज़ा आ गया पढ़ कर! शायद मैं कक्षा २ या ३ में पढ़ा था - एक और कविता होती थी - करो मित्र की मदद हमेशा, तन से, मन से , खुश हो हो कर! फ़िलहाल दीपावली के उपलक्ष्य में ये भेंट-

दीप जलाओ दीप जलाओ
आज दिवाली रे
ख़ुशी ख़ुशी सब हँसते आओ
आज दिवाली रे

नए नए मैं कपडे पहनूँ
खाऊं खूब मिठाई
हाथ जोड़ कर पूजा कर लूँ
आज दिवाली आयी

मैं तो लूंगा खूब खिलौने
तुम भी लेना भाई
फुलझड़ियां अब खूब जलाओ
आज दिवाली आयी

आज दुकानें खूब सजी हैं
घर भी चम चम करते
जगमग जगमग दीप जले हैं
कितने अच्छे लगते

दीप जलाओ दीप जलाओ
आज दिवाली रे
नाचो गाओ ख़ुशी मनाओ
आज दीवाली रे

No comments:

Post a Comment