Dec 5, 2015

गणेश मेला

आज गणेश चतुर्थी है और मुझे कदमा के गणेश मेला की बहुत याद आती है।
ऊपर लिखे वाक्य की शुरुआत करने के बाद, मैं इस पोस्ट को, समाप्त नहीं कर पाया था। आज फुर्सत मिला है, सोचता हूँ, इसे पूरा कर दूँ!

मुझे जमशेदपुर छोड़े कई साल हो गए। स्थान, संस्कृति और मान्यताओं के बदलाव के बाद भी, आजतक मेरे अंदर बसा बचपन, उतनी ही ताजगी के साथ बरकरार है। अपने अतीत के यादों के उस सागर में, अब मैं एक और गोता लगाने जा रहा हूँ।

अपनी जिंदगी के रंगमहल के बहुत सारे झरोखे में से एक, जो मुझे अपना बचपन दिखाता है, उस से जब कभी झांकता हूँ, तो मुझे सबसे पहले अपना नर्सरी स्कूल याद आता है। स्कूल के ठीक सामने, गणेश मेला का मैदान होता था। बगल में ही, ऊँचे दीवारों से घिरा, मंगल सिंह का अखाड़ा था। हर साल गणेशोत्सव के दौरान, प्रयोग में आने वाले गणेश जी के विशाल भव्य रथ को, पूजा के बाद उसी अखाड़े के अंदर रख दिया जाता था। अखाड़े के फाटक से, दीखने वाले रथ का कुछ हिस्सा, हमारे उत्सुकता का एक केंद्र बना रहता था। पूजा के दिन नज़दीक आते ही, उस रथ का फिर से पेंटिंग और साज सज्जा शुरू हो जाता था। जब कभी हमारे स्कूल में कोई ब्रेक होता था, सभी बच्चे अखाड़े के गेट से अंदर झांक कर, रथ में हो रहे बदलाव को देखते थे। 

स्कूल के ठीक सामने का विशाल सपाट मैदान - जो गणेश मैदान के नाम से आज भी जाना जाता है - आम तौर पर बिलकुल वीरान सा रहता था। क्लास रूम के खिड़की से, मैदान और उस से आगे, मेन रोड दीखता था। उन दिनों, मेन रोड पर, साइकल वाले की भी 'औकात' होती थी। सुर-ताल के तर्ज़ पर, सड़क के किनारे पैदल चलने वाले, साइकल वाले का संगत देते थे। एकाध घंटे के अंतराल पर, "लाल डब्बा" के नाम से प्रसिद्द, टाटा का बना लाल रंग का एक बस, सड़क पर आते और जाते दिख जाता था।

"अंग्रेज चले गए और अंग्रेज़ी छोड़ गए" के आगे - अंग्रेजों के जमाने के छोड़े कार - जिनका सामने का भाग कुछ गोलाकार आकृति का होता था और जो अक्सर काले रंग का ही होता था - भूले-भटके सड़क पर, धीमी गति से ही सही, पर मुस्तैदी से अपने पुराने शानो-शौकत के साथ, चलते दिख जाते थे। उन दिनों, एम्बेस्डर और फ़िएट कारों का भी प्रादुर्भाव हो चुका था, पर वे सड़क पर, अल्पसंख्यक से होते थे। थोड़ी-थोड़ी देरी में, इक्का-दुक्का स्कूटर या मोटरसाइकल भी दिख जाया करता था- जो उन दिनों के हिसाब से, लोगों के वैभवता की, पहली निशानी सी थी! पर ज्यादातर सड़क पर, पैदल या साइकल-सवार ही दीखते थे।

साल भर, स्कूल के सामने के मैदान में, कुछ भी नहीं होता था - कुछ नहीं, मतलब, वाकई कुछ भी नहीं - और मैदान, बिलकुल वीरान-सा पड़ा रहता था। अफ्रीका के जंगल के सूख जाने के बाद से, सपाट पड़े उस मैदान में, गणेश चतुर्थी के करीबन एक महीने पहले, बारिश की बूंदों की तरह, अचानक एक ट्रक आती और बांसों के ढेर को गिरा कर चल जाती! जिस तरह से वीरान सूखे जंगल में, पेड़-पौधों के धीरे-धीरे उगने की प्रक्रिया से, जंगल के हरा-भरा होने की पुनरावृत्ति हो जाती हैं, उसी तरह से, उस पूजा के मैदान में भी - हमारे आँखों के सामने, समतल जमीन पर, धीरे-धीरे अनेक सारे छोटे-बड़े पंडाल, बिजली के गगनचुम्बी झूले, साथ में छोटे-बड़े अनेक प्रकार के झूले - जिनमे घोड़े, शेर, ऊँट और न जाने कितने जानवर के बने हुए, गोल घुमने वाले merry-go-round झूले - बहुतायत में होते थे, उनके साथ साथ और भी तरह-तरह के कई आकर्षण, जुड़ने शुरू हो जाते थे।

पूजा के पंडाल के बनने की प्रक्रिया, गणेश मेला की तैयारी के शुरुआत का बिगुल फूँक देता था। इसके बाद, धीरे-धीरे उस पंडाल के इर्द गिर्द, और भी बहुत सारी तैयारियां शुरू हो जाती थी। नर्सरी स्कूल के बच्चों के लिए, ये बहुत ही सुखद क्षण हुआ करते थे। मैदान में हो रहे अनेको गतिविधियों को, करीब से देखने को मिलता था - गड्ढे के खोदे जाने, फिर बांस को गाड़ने के बाद उनको आपस में समानांतर बांसों से जोड़ने के लिए, नारियल के रस्सी से बांधे जाने का पूरा उपक्रम, और उसके बाद अचानक से उपर "तिरपाल" (tarpaulin) के डाल देने के बाद, बन गए एक अस्थायी घर जैसा माहौल- सभी एक जादुई प्रक्रिया सा लगता था।


कल तक जो बिलकुल वीरान सा खाली मैदान होता था - उसके बीचो-बीच एक अस्थायी सा निवास का बन जाना, हम सभी को एक सुखद-आश्चर्य सा लगता था! उस पर से जब कभी बारिश हो जाती, तो उस पंडाल के अंदर खड़े होने का लुत्फ़, एक मज़ेदार अनुभव होता था - ऊपर तिरपाल पर पड़ते पानी के छींटों की आवाज - चारों तरफ से ढलकते पानी की धारें - अंदर अचानक से रुके हर वर्ग के लोग - ऐसा लगता था, जैसे बहते समाज का अचानक से लिया एक स्नैपशॉट हो - कुछ पैदल जा रहे लोग़ , कुछ साइकल सवार,  खोमचे वाले, तो हमारे जैसे कुछ बेकाम के लोग - पंडाल में काम करने वाले मज़दूरों के लिए 'बोनस' के तौर पर मिले कुछ विश्राम के क्षण - सभी एक साथ अंदर, इस इंतज़ार में, कि कब बारिश थमे और जिंदगी फिर से अपने लय में वापस आ जाए।

आकार में सबसे बड़ा - गणेश मंडप का स्थान तो निश्चित होता था। पर, हमें उस से ज्यादा उत्सुकता, तैयारी में लगे आस-पास के पंडालों में होता था, जिनके आकार और प्रकार को देख कर, हम अनुमान लगाने का प्रयास करते थे कि कहाँ कौन सा सर्कस, नौटंकी, चिड़ियाघर या कोई विशेष प्रकार का दूकान के होने की सम्भावना थी। हर साल के गणेश मेला में, हमें इंतज़ार होता था कि हमारे लिए कोई नयी तरह का मनोरंजन आये। बचपन से बड़े होने के क्रम में, हर साल उन्हीं आकर्षणों को देखने के बाद भी, देखने की पुनरावृत्ति में उतनी ही रूचि होती थी।

दुसरे शब्दों में - हमारा बचपन काफी manual सा होता था। यानी साधनों के कमी में, हम खुद से इज़ाद किये गए उपक्रमों पर ज्यादा आश्रित होते थे। उन दिनों टीवी या वीडियो गेम के आभाव में, हमारे लिए गणेश-मेला का एक विशेष स्थान होता था, क्योंकि यह काफी वृहत आयोजन होता था, और मेले की ख़ास बात यह थी कि यह काफी लम्बे अंतराल के लिए - लगभग महीने भर के लिए - होता था।

इस मेला के अलावा, हमारे मनोरंजन के लिए और भी दिन-प्रतिदिन के क्रिया-कलाप होते थे। सालों भर क्रिकेट मैच का जज़्बा बरक़रार रहता था। जज़्बा - मैच खेलने का, न कि टीवी पर देखने का - आज तो घरों के आस पास, उतने खाली मैदान भी नहीं बचे, पर उन दिनों जिधर नज़र पड़ती थी - कोई न कोई मैच चालू रहता था।

साल के शुरुआत में, ठंड के समय, आस-पास के किसी रमणीक स्थान पर - जैसे डिमना, पटमदा या दोमुहानी - पिकनिक का आयोजन, फिर सरस्वती पूजा का धूमधाम, और फिर - होलिका-दहन की तैयारी शुरू हो जाती थी। उन दिनों, हमारे घर से थोड़ी दूरी पर ही, नदी के किनारे - जंगल सा होता था, जहाँ से मोहल्ले के सभी छोटे-बड़े बच्चों के साथ मिलकर, होलिका के लिए पेड़ों से लकड़ियाँ काट कर लाने का, एक विशेष कार्यकम सा संचालन होता था।

अपने घर के सामने बने मैदान के बीचो-बीच, लकड़ियों का बड़ा सा ढेर बना कर, लकड़ियों को सूखने देने के लिए, एक ऊँचा टीला सा बना दिया जाता था। मोहल्ले के किसी भी बच्चे को, कहीं भी, लकड़ी के टूटे-फूटे फर्नीचर मिल जाते, उन्हें होलिका-दहन के टीले में जोड़ दिया जाता था। इस तरह से, लकड़ियों के जुड़ते रहने से टीले की बढ़ती हुयी ऊंचाई और चारो तरफ फैलाव में हो रही बढ़ोत्तरी को देख कर, हम सभी बहुत गौरवान्वित होते थे - उस अनुभव का मज़ा कुछ और ही था! साथ ही, होलिका दहन के दिन तक, लकड़ी की चोरी को रोकना, और उल्टा कहीं से लकड़ियों को चुरा कर, ढेर में जमा कर देने का मज़ा- एक अद्भुत सा अनुभव होता था!

अपने मोहल्ले में सरस्वती और गणेश पूजा का आयोजन, और कभी कभी किसी बड़े आयोजको के द्वारा सरस्वती पूजा के उपलक्ष्य में आयोजित - म्यूजिक पार्टी इत्यादि जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों का रसास्वादन! ये था हमारा बचपन, और उनके कुछ विशेष आयाम का ब्यौरा, इस पर कभी और, विस्तार से...!

खैर, वापस आते हैं गणेश पूजा के विवरण पर - पूजा के दिन के करीब आ जाने पर, सभी दूकानों और अन्य आकर्षणों पर, अंतिम चरण की तैयारी बड़े जोर-शोर से होने लगता था। शादी के दुल्हन के साज-सज्जा की तरह, दूकानों को भी, मानो नए परिधान से सजा दिया जाता था। दुल्हन के हाथों में मेहँदी की श्रृंगार की तरह, मेला के हर कोने को, बेहद आकर्षक सा बना दिया जाता था। शादी के मंडप की तरह - हर दूकान को, रंग बिरंगी आकर्षक कपडे, पोस्टर और साज-सज्जा से, जगमगा दिया जाता था। ऐसा लगता था, मानो उस वीरान समतल मैदान में, एक नयी दुनिया बस गयी हो। 

मेला के समीप स्कूल होने का एक बहुत बड़ा फायदा, यह होता था कि स्कूल में मिलने वाली गणेश चतुर्थी की छुट्टियीं के पहले, मेला में हो रहे अंतिम चरण तक की तैयारी को, हम बिलकुल करीब से देख पाते थे। मिठाई के दूकान में, तरह-तरह के व्यंजन बन रहे होते थे, जिस से हमें मिठाइयों को बिलकुल शुरुआत से बनते देखने का अनुभव होता था, और साथ ही पाक-शास्त्र का ज्ञान भी प्राप्त होता रहता था।

झूलों के लगाने के क्रम में,  प्रयोग में आने वाले तरह तरह के नट-बोल्ट, स्क्रू-ड्राइवर, रेंच और अनेक प्रकार के अन्य मशीनों के प्रयोग को देख कर, हमें थोड़ी बहुत इंजीनियरिंग का भी ज्ञान मिल जाता था - उसी क्रम में, कई बार हमें झूलों पर 'ट्रायल रन' के तौर पर, मुफ्त का झूला भी झूलने का अवसर मिल जाया करता था। कई बार, हमें मेला के चिड़ियाघर के जानवरों को भी, चोरी-छिपे देखने का अवसर मिल जाता था।

उन दिनों गणेश मेला का भ्रमण, एक पारिवारिक कार्यक्रम सा होता था। घर के अभिवावक के साथ जाना अपरिहार्य था, और इसका आयोजन बाकायदा हफ्ते भर पहले से होता था कि - "अमुक दिन, हम सभी मेला देखने जाएंगे"। मेला में जाने के पहले हमें काफी सारे निर्देश दिए जाते थे - "बड़े बच्चों को छोटे पर ध्यान", "सबों को हमेशा एक दुसरे के हाथ पकड़ कर चलने का" और इसी तरह के अनेक सारे "ब्रीफिंग" देने का मूल कारण  - "मेला में बच्चे खो जायेंगे"- इसके रोकथाम से सम्बंधित होता था। शायद, उस ज़माने के अभिभावकों को अंदाज़ा नहीं था कि उन दिनों के मेले का भीड़, आज किसी भी फुटपाथ पर देखने को मिल जाता है - और आज भीड़ में हर कोई यूँ ही भटका सा घूम रहा है!

कदमा पोस्ट-ऑफिस के पास आते ही मेला का शोर और चकाचौंध दिखना शुरू हो जाता था। मेला के परिसर से काफी पहले ही - "भूखे भजन न होहि गोपाला"- के समर्थन में अनेको खाने वाले - जिनमें प्रमुखतः -गोलगप्पे, चाट, समोसे, मूंगफली और अन्य प्रकार के खाने के सामग्री वाले होते थे - अपने ठेले को लगाये होते थे। वे कुछ इस बेरौनकी से खड़े होते थे - जैसे उन्हें मेले के अंदर आने का मौका नहीं मिला हो। फलस्वरूप, वे मेले से काफी पहले ही, दूर अँधेरे में अपने किस्मत को आजमाने के हिसाब से खड़े रहते थे। इतने शोर के बीच भी, इन ठेले वालों का, अपने उपस्थिति को दर्ज़ कराने के साथ-साथ, मेला में अंदर जाने वालों का ध्यान आकर्षित करने के लिए, कुछ विशेष अंदाज़ होता था।

डोसा बेचने वाला, अपने तवे पर छलनी को पीट-पीट कर ठन-ठन के ध्वनि को उद्गारित करते हुए - चनाचूर और सनपापड़ी वाले, अपने ठेले में लगे घंटी को बजाते हुए - अनेको गुब्बारे वाले, तरह-तरह की आकृतियों को बना कर उन्हें रगड़-रगड़ कर एक तीखी आवाज़ निकाल कर - बांसुरी वाला, एक हाथ से बांस के एक मोटे स्तम्भ के ऊपर लगे बांसुरी के ढेर को सम्हाले, और दुसरे हाथ से, एक विशेष प्रकार से बांसुरी को बजाते हुए - तो भोंपू वाला, अपने किसी भोंपू को ही फूंक-फूंक कर, लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते पाये जाते थे। उन सबों के बीच, मूंगफली वाले, अपने ठेले के ऊपर मूंगफली के ढेर लगाये, उनके ऊपर सिर्फ एक मिट्टी के बने हांडी- जो मूंगफली को पकाने के काम आता था - उस से निकलते धुँए से ही, खुद के मूक प्रचार में, विश्वास रखते थे।

मेले के अंदर घुसते ही, बहुत सारे लकड़ी के झूलों का एक काफिला सा होता था - जिन्हें झूलेवाले, हाथ से ही खींच-खींच कर, चलाते रहते थे। पर मेरी दिलचस्पी, आगे मेले के अंदर जाने की होती थी - जहाँ दोस्तों के द्वारा बताये गए, कुछ नए तरह के आकर्षण को, देखने की होती थी- जैसे, "बोलती गुड़िया के कारनामे" या "आठ पैरों वाली लड़की के प्रदर्शनी" आदि-आदि। मगर घर के बड़े बुजुर्गों का आदेश होता था कि - "पहले गणेश जी का दर्शन, और उसके बाद ही कोई और मनोरंजन"। इस लिए, क्रिकेट मैच के दौरान, स्टेडियम में तैनात सिपाहियों की तरह, हम अपने इर्द गिर्द के सभी आकर्षणों को देखने के बावजूद - चुपचाप दम साधे - भगवान के मंडप तक आगे बढ़ते चले जाते थे।

आगे बढ़ते ही, अनायास "बजरंग-चिड़ियाघर" दीख जाता था, जो काफी विस्तृत क्षेत्र में फैला सा होता था।चिड़ियाघर के सामने, काफी ऊंचाई पर एक मचान सा बना होता था, जिस पर - सफ़ेद पंख और बहुत बड़े चोंच वाले - किसी विशेष प्रकार के पक्षी (शायद Pelican - जिसे "जलसिंह" भी कहते हैं) के बगल में बैठा दूकानदार, चीख-चीख कर अंदर के जानवरों के बारे में - अनेको प्रकार के सही या गलत, पर रोचक - जानकारियां देता रहता था। लाउडस्पीकर में, किसी फ़िल्मी गाने के शोर के बीच, गाने की आवाज को धीमा करते हुए, सामने लटक रहे हर जानवर के बिल्ले पर डंडे से इशारा कर के दिखाते हुए, कुछ अजीब सी तीखी और सधी हुयी आवाज में -
आइये, देखिये इस मस्त-कलंदर-बन्दर को - ये दिन भर में दो दर्जन केला खा जाता है- दिन में सोता है रात को जागता है - जंगल में एक बार छूट जाए तो - किसी के पकड़ में नहीं आता है - आइये देखिये - इनको करीब से देखिये- और वो देखिये - वो है साइबेरिया का भालू- ये दिन में २२ घंटे सिर्फ सोता रहता है - ये सिर्फ बांस खाता है... !
और पुनः लाउडस्पीकर में फिर से गाना शुरू, बीच-बीच में सामने लटक रहे चवन्नी के सिक्के के चित्र के बने गोल से बड़े घंटे पर, जोर से डंडा मारते हुए -
मेहरबान, कदरदान, आइये-आइये सिर्फ २५ पैसे में देखिये ये सारे जानवर- बिलकुल जिन्दा - आइये, पूरे परिवार के साथ....!
जानवरों के बारे में दी गयी जानकारियां, इतनी रोचक होती थी कि अंदर जा कर देखने की बहुत इच्छा हो ही जाती थी। परन्तु हर साल चिड़ियाघर के अंदर जा कर निराशा ही होती थी क्योंकि ज्यादातर जानवर - थके, बीमार, कमज़ोर से होते थे - ऊपर से उतने छोटे से केज में बंद - बिलकुल निरीह से दीखते थे। बेचारे घड़ियाल का तो यह हालत होता था कि जाल से घिरे छोटे से केज, जिसके नीचे तलछटी में जीने के लिए थोड़ा सा पानी होता था - लोग उसमें कुछ पैसे डालते रहते थे- और -"जिन्दा है क्या?" - पूछे जाने पर, कोई कर्मचारी उसे डंडे से हुड़का देता - जिस के बाद भी, वह बामुश्किल सिर्फ हिल कर, अपनी बची-खुची मरणासन्न जिंदगी के कड़वे दुःख को, कुढ़ते हुए बयां कर, अपने जिन्दा होने का सबूत दे ही देता था!
आगे कहीं नंदन-कानन भवन दिख जाता था, जिसमे अनेको प्रकार की मूर्तियां - जिनके हाथ या पैर मोटर से चलते थे - उनकी प्रदर्शनी होती थी। इन कलाकृतियों की ख़ास बात यह होती थी कि इसमें कुछ ख़ास रोचक नहीं होता था, पर मोटर से उनमें कुछ गति लाकर किसी "व्यक्ति-विशेष संज्ञा" को "क्रिया" में बदल कर दिखाने की कोशिश होती थी - जैसे किसी सुखी परिवार के सभी सदस्यों के हाथ से हिलाते हुए -"टा -टा" करते हुए अभिवादन,  किसी लोहार का भट्टी के पास कुछ हिलते डुलते हुए -  सामने कुछ धधकते हुए आग सा दिखना, किसी देवी-देवता का हाथ उठा कर आशीर्वाद देना- यानि आज के कार्टून के प्रारम्भ के दौर की झलक सा होता था!

फिर अचानक सामने, काफी ऊंचाई पर बने प्लेटफार्म पर - मोटर साइकल के ऊपर सहज भाव में सवार, कुछ आकर्षक कपडे में बैठे जाबांज़ से कलाकार - एक्सीलेटर को दबा कर, कर्णभेदी तेज़ आवाज़ निकालते और ढेर सारे धुंवा को छोड़ते से - नज़र आते थे। सामने बने मचान पर बैठ कर उद्घोषणा होती - "आइये देखिये, इस मौत के खेल को - जान हथेली में रख के ये जांबाज़", ऊपर की और दिखाते हुए -
इस मौत के कुँए में मोटर साइकल चलायेगा, एक नही......दो..... जी हाँ, दो मोटरसाइकल चलेगा 
और इतने पर भी अगर लोग प्रभावित नहीं होते थे, तो वह आगे बोलता था -
एक चूक..... और मौत, जी हाँ.... मौत.... आइये, देखिये इन जाबांजों के कारनामे को, सिर्फ ५० पैसे में, आइये देखिये... ज़िंदगी ("ज़ि" को काफी देर तक खींच कर बोलते हुए)...... और मौत का तमाशा देखिये...... बस मौत का खेल शुरू होने को है - आइये इस खेल को देखना मत भूलिए.....आज का आखिरी शो, आइये... ।
इस रोमांचकारी कारनामे के शो के प्रचार में, "मौत" शब्द पर, बहुत जोर होता था। हर थोड़ी देर में, मोटर साइकल पर बैठा कलाकार - जिनमे महिलाएं भी होती थी - एक्सलेटर को खूब raise करते रहते थे, जिस से पूरी तरह से वातावरण में, रोमांच और कोलाहल सा मचा रहता था। साथ ही, वहां आस-पास में जले हुए टायर और जले-अधजले ईंधन का गंध भी व्याप्त रहता था।

इन सबों के बीच, देश के लगभग सभी बड़े शहर -  कलकत्ता, दिल्ली, पटना, बंबई, मद्रास, बनारस, लखनऊ - के नाम पर बने, मिठाई और चाट-भण्डार के अनगिनत छोटे-बड़े दूकान होते थे। कुछ भगवान के नाम जैसे - श्री कृष्ण चाट, भोला मिष्टान्न, मथुरा चाट - अपने पवित्रता और सात्विकता का बोध कराते थे तो कुछ सिर्फ अपने नाम पर ही भरोसा करते थे - जगदीश चनाचूर, गोलू कुल्फी आदि। कुछ प्रसिद्द स्थानीय खाने के दूकान - फकीरा चनाचूर, गौरांग मिठाई, भोला महाराज, नवरंग कुल्फी आदि के भी स्टाल लगे होते थे। पर एक विशेष आकर्षण होता था - बनारसी पान दूकान - जहाँ पर, बर्फ की सिल्ली पर रखे ठन्डे पान की कीमत, किसी मिठाई से भी ज्यादा होता था!

तरह-तरह के गुड्डे गुड्डियां - साज सामान के दूकानें, खिलौने के दूकान, और अनेको तरह के आकर्षण के बीच कुछ अजीब प्रकार के स्टाल या दूकान भी लगे होते थे जो - मेले के मूड से अलग - कुछ रोजमर्रा के काम में आने वाले सामान को बेचने में लगे होते थे - जैसे बिस्तर में बिछाने वाले चादर या रसोई के काम में आने वाले चाकू-छूरियां, चम्मच, बर्तन आदि के दूकान!

फिर सदियों से चले आ रहे निशाना लगाने वाला दूकान - चादर पर लगे छोटे-छोटे रंग-बिरंगे गुब्बारों को गोल आकृति देकर सजाया जाता था और उन पर, बन्दूक से निशाना लगाने का मज़ा, कुछ और ही था - जब निशाना लगाओ, तो चूक जाता और जब अनाड़ी की तरह चलाते थे, तो गुब्बारा क्या, सामने लटकती गुड़िया को भी छलनी कर देते थे - साथ ही, कुछ वैसे दूकान भी होते थे - जहाँ रिंग फेंक कर - सामान जीतने वाले का होड़ सा लगा रहता था।

मेला के परिक्रमा के दौरान कुछ विशेष प्रकार के आकर्षण भी होते थे, जो शायद उन दिनों के कुटीर उद्योग का, उत्कृष्टतम प्रमाण सा होता था। आज के जामने में - चीन से बन के आये हर खिलौनों से काफी अलग - देसी खिलौनों का दौर हुआ करता था। अनेकों खिलौने उन दिनों का काफी हिट आइटम हुआ करता था - जैसे रबर के स्प्रिंग से बना मगरमच्छ, जिसे खीच देने से, वह खुद से चलने जैसा अनुभव कराता था।

बचपन में एक और खिलौना बहुत प्रचलित हुआ था, जिसमे नाव के पिछले हिस्से के ऊपर मोमबत्ती को जला कर उसे पानी में स्वतः चलते देख कर, हमें विज्ञान के चमत्कार में यकीन करने का दिल कर जाता था। कुछ बेहद ही सस्ता और सामान्य सा खिलौना - जैसे किसी ठोस वस्तु से बने छोटे से गेंद को किसी इलास्टिक वाले रबर से लगा कर दूर तक खींच के वापस हथेली में ला देने वाला खिलौना- शायद इसे उन दिनों - "रफूचक्कर" (yo-yo) - कहा जाता था!

एक और खिलौना होता था -जिसमें किसी स्प्रिंग से बने बन्दूक जैसे उपकरण से, खिलौने को हवा में पहुंचा दिया जाता था, जहाँ से नीचे गिरते समय, वह एक पैराशूट से लटकती गुड़िया सा बन कर आसमान से धीरे धीरे उतरता सा दिखता था - और इसी तरह के अनगिनत खिलौने, उन दिनों हमारे लिए, एक विशेष आकर्षण से होते थे। हमारे लिए उनका महत्त्व, आज के बच्चों के विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक गैज़ेट या अन्य आधुनिक गेम कंसोल से, कही बहुत ज्यादा होता था!      

कुल मिला कर आज के युग के मुकाबले हमारा बचपन ब्लैक एंड व्हाइट सा होता था - और. गणेश मेला जैसा आकर्षण, उनमें रंग भरने का एक सार्थक सा काम करता था। वैसे, उन दिनों के फोटो-स्टूडियो में फोटोग्राफ में, अलग से रंग भर कर उन्हें उन दिनों के हिसाब से "रंगीन बनाने" का भी प्रचलन सा था। उस युग के लोगों के सामान्य व सरल सी जिंदगी में, चुटकी भर 'रंगों' का महत्त्व, आज के रंगीन जिंदगी के मुकाबले,  कुछ और होता था!

3 comments:

  1. सुमन चौधरीDecember 6, 2015 at 12:26 PM

    संजय, तुम्हारे द्वारा किया गया कदमा गणेश पूजा मेला का चित्रण बहुत ही सटीक है । बचपन के वे सारेे सुनहरे पल जीवंत हो उठे । कुछ खास चीज जो तुमने बिल्कुल सटीक याद दिलाया वो है घडियाल को डंडे से कुरेदने वाली घटना । साधुवाद।

    चिडिया घर वालों का अपने तरफ ग्राहकों को अपने तरफ आकर्षित करने का अंदाज बडा ही निराला होता था .....इधर्रर्र....

    ढेर सारी खाजा दुकानों मे से एक से खाजा खरीदना हम लोग किसी भी वर्ष नही भूलते थे।

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  2. अक्षयवर मिश्राDecember 6, 2015 at 12:28 PM

    संजय भक बे ब्लॉग मॆ तुम गणेशमेला का विवरण किये हो, अदभुत है, वो सभी बाते फ़िर से तरोताजा हो गये !

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  3. कमल देव सिंहDecember 6, 2015 at 12:32 PM

    नत मस्तक हूँ संजय भाई। मैंने भी इस मेले को करीब से देखा है। लिंक रोड में जो रहता था। पढ़ते समय सोच रहा था कि कुछ मैं भी योगदान दूंगा। पर आपने तो शुरू से अंत तक, कहीं भी कुछ भी नहीं छोड़ा।
    यकीन मानिये पंखा हो गया हूँ मैं आपका।

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