आज अनायास ही हरिशंकर परसाई जी का कथा-संग्रह - "प्रेमचंद के फटे जूते" पढ़ने लगा।
आज आपसे एक मज़ेदार बात भी शेयर करता हूँ, मैं कभी भी उपन्यास को, सिल-सिलेबार ढंग से नहीं पढता हूँ। बल्कि मैं, रैंडम-आर्डर में, कही से भी पढ़ने लगता हूँ- "राग-दरबारी" को पिछले १० सालों से पढ़ ही रहा हूँ- और लगता है कि आगे भी पढता ही रहूँगा!
उसी क्रम में, आज परसाई के इस पुस्तक के एक कथा - "टॉर्च बेचने वाला" को पढ़ा। उसके पढ़ते ही, कथा के पात्र, उनके चित्रण और दिए सन्देश - सभी के मनन करने का दिल करने लगा। फिर क्या था, इस पुस्तक को छोड़, मैं खूब सोचने लगा। हर दिशा से, मानस पटल पर, उमड़-घुमड़ कर बादलों की तरह, अनेको तरह के विचार के बरसात से होने लगे।
परसाई के इस कथा - "टॉर्च बेचनेवाला" में, दो मित्र- विपन्नता से ग्रसित हैं। दोनों अपने जीविकोपार्जन के लिए, किसी भी तरह के "धंधा" करके के सोचते हैं। "3 Idiots" - की तरह, पांच साल बाद, दोनों वापस मिल कर, अपने अपने चुने रास्ते का स्वावलोकन और सफलता का आंकलन करने की सोचते हैं। कहानी में जैसा विदित है, वे पुनः मिलते हैं। संयोगवश, दोनों "अंधकार और प्रकाश" के ही धंधे में होते हैं। लोगो को "अन्धकार" से डराने, और फिर उसके निदान के रूप में - प्रकाश - का सौदा।
जहाँ एक मित्र, लोगो को सामान्य जीवन में अन्धकार के नुक्सान और उससे बचने के लिए उजाले देने वाले टॉर्च के फायदे बता कर, "सूरज छाप" टॉर्च बेचता है। तो वही दूसरा मित्र, मनुष्य के जीवन की सूक्ष्मता और फिर आत्मा के अन्धकार में होने के बारे में उन्हें अवगत कराता है। निदान स्वरुप, लोगों को - "साधना -मंदिर" में आने का हल बताता है। यहाँ, वह भी सबों को प्रकाश की ओर ले जाने में मदद करने वाले, "अदृश्य-टॉर्च" को ही बेच कर, "सनातन" व्यवसायी के रूप में, सफल होकर एक फलता-फूलता व्यवसाय को चला रहा है ।
परसाई जी के लेखनी का कमाल है, कि पाठक को यह समझने में देर नहीं लगता कि दोनों के वक्तव्यों में बहुत समानतायें हैं। पर - सन्दर्भ और परिपेक्ष्य के अंतर ने - उन्ही वक्तव्यों के गूढ़ता और गहराई में, मीलों का फासला ला दिया हैं। फलस्वरूप, जहाँ पहले को टॉर्च बेचकर लोगों से पैसे की मांग करनी पड़ती है, वहीं दूसरी ओर - उसके मित्र के द्वारा, जीवन के परिपेक्ष्य में दिए वैसे ही वक्तव्यों पर - बड़ी संख्या में श्रद्धालु समर्पण के भाव से, नत-मस्तक होकर - स्वतः धन को उन्मुक्त भाव से "अर्पित" कर रहे होते हैं। कहना नहीं होगा कि "बाबा" बन चुके मित्र का "धंधा" फल-फूल रहा है। कहानी, समाज में व्याप्त धर्मांधों और धर्म-गुरुओं के ढकोसले पर सटीक कटाक्ष है।
कथा पढ़ते समय, मेरे मन में एक और विचार आया - अन्धकार क्या है? वस्तुतः अन्धकार कुछ होता नहीं है, अपितु, प्रकाश का अभाव ही अन्धकार है। प्रकाश के अभाव में बने, अंधकार को ही दूर करने के लिए - प्रकाश के पूरक के रूप में, टॉर्च की आवश्यकता होती है।
मुझे स्मरण हुआ कि कुछ साल पहले, मैं अपने घर में, एक मीडिया रूम बना रहा था। उस क्रम में, प्रोजेक्टर लगाते समय अनुभव किया कि - परदे पर पड़ रहे सिनेमा के सजीवता को, और प्रखर बनाने के लिए, मुझे - ब्लैक के लेवेल - को, और बढ़ाने की आवश्यकता थी। ब्लैक के लेवल बढाने का अर्थ था कि अन्धकार को और बढ़ाना! प्रोजेक्टर से अन्धकार को नहीं लाया जा सकता था। बल्कि अन्धकार को बढ़ाने के लिए, कमरे के इर्द-गिर्द के रोशनी को ही बंद करना पड़ा था।
जीवन में भी, जब हम प्रकाश के सभी स्त्रोत को बंद करते जाते हैं तो - प्रकाश के कमी से - अंधकार बढ़ता जाता है। फिर, हमें भय सा होने लगता है - या फिर, कोई बाहर से भय को और उजागर करने के लिए - टॉर्च जैसे अस्थायी और सीमित ज्योति -पुंज से हमारा परिचय करा देता है, जिस पर हम आश्रित से होने लगते हैं - क्योकि अन्धकार से हमें अब भय होने लगता है।अंततः, जब तक हम अपने अन्तः ज्योति को जागृत न करें - जीवन अन्धकारमय ही रह जाता है - टॉर्च जैसे प्रकाश के स्त्रोत से आगे, हमें किसी स्थाई प्रकाश के ओर अग्रसारित होने की प्रबल इच्छा होने लगता है।
करना तो हमें स्वयं ही होता है, पर विकल्पों के तलाश में हम बाहर की ओर झांकते फिरते हैं - कबीर के दोहे में व्यक्त कस्तूरी मृग की भाँति -
आज आपसे एक मज़ेदार बात भी शेयर करता हूँ, मैं कभी भी उपन्यास को, सिल-सिलेबार ढंग से नहीं पढता हूँ। बल्कि मैं, रैंडम-आर्डर में, कही से भी पढ़ने लगता हूँ- "राग-दरबारी" को पिछले १० सालों से पढ़ ही रहा हूँ- और लगता है कि आगे भी पढता ही रहूँगा!
उसी क्रम में, आज परसाई के इस पुस्तक के एक कथा - "टॉर्च बेचने वाला" को पढ़ा। उसके पढ़ते ही, कथा के पात्र, उनके चित्रण और दिए सन्देश - सभी के मनन करने का दिल करने लगा। फिर क्या था, इस पुस्तक को छोड़, मैं खूब सोचने लगा। हर दिशा से, मानस पटल पर, उमड़-घुमड़ कर बादलों की तरह, अनेको तरह के विचार के बरसात से होने लगे।
इस कहानी में - मानव धर्म और समाज में व्याप्त धारणाओं का - बड़ा ही सटीक चित्रण किया गया है। एक जैसे विचारों का, सिर्फ माध्यम और उपयोगिता का परिपेक्ष्य बदल दिया जाए, तो उस विचार और "विचारक" के प्रति समाज की अवधारणा को, बदलते देर नहीं लगता। कई मिलते जुलते विचार, मन में आने लगे।
तुरंत, पीटर सेलर्स अभिनीत - "Being There" - का स्मरण हो गया। इस सिनेमा मे बहुत ही रोचक ढंग से, सांसारिकता से अनभिज्ञ - एक गार्डनर यानी माली का चित्रण है, जो पूरी जिंदगी, कभी भी अपने घर के बाहर कदम तक नहीं रखा होता है। अपने पूरे जीवन-काल में उसे, सिर्फ और सिर्फ पेड़-पौधे और बागवानी का ही जानकारी हो पाता है। पर, अब बदले माहौल में, उसे उस चहारदीवारी से बाहर निकलना पड़ता है। अब वह संसार के दुसरे हिस्से में भी - जहाँ पहले कभी नहीं गया होता है - वहां भी जाता है।
घर से बाहर निकलते ही, उस गार्डनर को, अनेकों ऐसे प्रश्नो का सामना करना पड़ता है, जिनके बारे में उसे कोई अनुभव ही नहीं होता है। परन्तु पूरी तरह से अनभिज्ञ होकर भी, वह अपने मौलिक - बागवानी - के अनुभव और ज्ञान पर आधारित, उत्तर देता रहता है। जैसा सिनेमा में चित्रण है, प्रश्नकर्ता और बाकी लोग ये पाते हैं कि - गार्डनर का दिया हर एक बागवानी से जुड़ा मौलिक सा उत्तर - उन सभी समस्या, माहौल या प्रश्न के लिए, बिलकुल सटीक बैठता है। इस फिल्म को देखते समय, बार-बार इस बात का स्मरण होता है कि - महात्मा बनते नही हैं, बल्कि स्वतः बन जाते हैं - या बना दिए जाते हैं ।
प्रसिद्द हिंदी फिल्म - गाइड - में भी कुछ ऐसा ही चित्रण है। जब राजू-गाइड के आडंबर और वेश भूषा को देख कर, अकाल-पीड़ित गाँव के भूखे और मरणासन्न निवासी - उसमे ही आखरी उम्मीद के किरण के रूप में, ईश्वर का प्रभाव देखने लगते हैं। विवशता-वश, सारे गाँव वाले उनके चरणो में लेट कर, उससे ही बारिश करवाने के लिए, ईश्वर की प्रार्थना और उपवास करने की मांग कर बैठते हैं।
तुरंत, पीटर सेलर्स अभिनीत - "Being There" - का स्मरण हो गया। इस सिनेमा मे बहुत ही रोचक ढंग से, सांसारिकता से अनभिज्ञ - एक गार्डनर यानी माली का चित्रण है, जो पूरी जिंदगी, कभी भी अपने घर के बाहर कदम तक नहीं रखा होता है। अपने पूरे जीवन-काल में उसे, सिर्फ और सिर्फ पेड़-पौधे और बागवानी का ही जानकारी हो पाता है। पर, अब बदले माहौल में, उसे उस चहारदीवारी से बाहर निकलना पड़ता है। अब वह संसार के दुसरे हिस्से में भी - जहाँ पहले कभी नहीं गया होता है - वहां भी जाता है।
घर से बाहर निकलते ही, उस गार्डनर को, अनेकों ऐसे प्रश्नो का सामना करना पड़ता है, जिनके बारे में उसे कोई अनुभव ही नहीं होता है। परन्तु पूरी तरह से अनभिज्ञ होकर भी, वह अपने मौलिक - बागवानी - के अनुभव और ज्ञान पर आधारित, उत्तर देता रहता है। जैसा सिनेमा में चित्रण है, प्रश्नकर्ता और बाकी लोग ये पाते हैं कि - गार्डनर का दिया हर एक बागवानी से जुड़ा मौलिक सा उत्तर - उन सभी समस्या, माहौल या प्रश्न के लिए, बिलकुल सटीक बैठता है। इस फिल्म को देखते समय, बार-बार इस बात का स्मरण होता है कि - महात्मा बनते नही हैं, बल्कि स्वतः बन जाते हैं - या बना दिए जाते हैं ।
प्रसिद्द हिंदी फिल्म - गाइड - में भी कुछ ऐसा ही चित्रण है। जब राजू-गाइड के आडंबर और वेश भूषा को देख कर, अकाल-पीड़ित गाँव के भूखे और मरणासन्न निवासी - उसमे ही आखरी उम्मीद के किरण के रूप में, ईश्वर का प्रभाव देखने लगते हैं। विवशता-वश, सारे गाँव वाले उनके चरणो में लेट कर, उससे ही बारिश करवाने के लिए, ईश्वर की प्रार्थना और उपवास करने की मांग कर बैठते हैं।
आस्था का जन्म - विवशता के शव से हो के गुजरती है। और यह प्रक्रिया अति संक्रामक होता है - विश्वास - आस्था का ही जुड़वा होता है, एक का अनुभव, दुसरे के लिए विश्वसनीयता और तत्पश्चात आस्था का स्त्रोत - और फिर, लोग स्वयं ही प्रश्न करते हैं, और किसी - महापुरुष - के वाणी में, स्वतः ही उत्तर भी ढूंढ लेते हैं।
परसाई के इस कथा - "टॉर्च बेचनेवाला" में, दो मित्र- विपन्नता से ग्रसित हैं। दोनों अपने जीविकोपार्जन के लिए, किसी भी तरह के "धंधा" करके के सोचते हैं। "3 Idiots" - की तरह, पांच साल बाद, दोनों वापस मिल कर, अपने अपने चुने रास्ते का स्वावलोकन और सफलता का आंकलन करने की सोचते हैं। कहानी में जैसा विदित है, वे पुनः मिलते हैं। संयोगवश, दोनों "अंधकार और प्रकाश" के ही धंधे में होते हैं। लोगो को "अन्धकार" से डराने, और फिर उसके निदान के रूप में - प्रकाश - का सौदा।
जहाँ एक मित्र, लोगो को सामान्य जीवन में अन्धकार के नुक्सान और उससे बचने के लिए उजाले देने वाले टॉर्च के फायदे बता कर, "सूरज छाप" टॉर्च बेचता है। तो वही दूसरा मित्र, मनुष्य के जीवन की सूक्ष्मता और फिर आत्मा के अन्धकार में होने के बारे में उन्हें अवगत कराता है। निदान स्वरुप, लोगों को - "साधना -मंदिर" में आने का हल बताता है। यहाँ, वह भी सबों को प्रकाश की ओर ले जाने में मदद करने वाले, "अदृश्य-टॉर्च" को ही बेच कर, "सनातन" व्यवसायी के रूप में, सफल होकर एक फलता-फूलता व्यवसाय को चला रहा है ।
परसाई जी के लेखनी का कमाल है, कि पाठक को यह समझने में देर नहीं लगता कि दोनों के वक्तव्यों में बहुत समानतायें हैं। पर - सन्दर्भ और परिपेक्ष्य के अंतर ने - उन्ही वक्तव्यों के गूढ़ता और गहराई में, मीलों का फासला ला दिया हैं। फलस्वरूप, जहाँ पहले को टॉर्च बेचकर लोगों से पैसे की मांग करनी पड़ती है, वहीं दूसरी ओर - उसके मित्र के द्वारा, जीवन के परिपेक्ष्य में दिए वैसे ही वक्तव्यों पर - बड़ी संख्या में श्रद्धालु समर्पण के भाव से, नत-मस्तक होकर - स्वतः धन को उन्मुक्त भाव से "अर्पित" कर रहे होते हैं। कहना नहीं होगा कि "बाबा" बन चुके मित्र का "धंधा" फल-फूल रहा है। कहानी, समाज में व्याप्त धर्मांधों और धर्म-गुरुओं के ढकोसले पर सटीक कटाक्ष है।
कथा पढ़ते समय, मेरे मन में एक और विचार आया - अन्धकार क्या है? वस्तुतः अन्धकार कुछ होता नहीं है, अपितु, प्रकाश का अभाव ही अन्धकार है। प्रकाश के अभाव में बने, अंधकार को ही दूर करने के लिए - प्रकाश के पूरक के रूप में, टॉर्च की आवश्यकता होती है।
मुझे स्मरण हुआ कि कुछ साल पहले, मैं अपने घर में, एक मीडिया रूम बना रहा था। उस क्रम में, प्रोजेक्टर लगाते समय अनुभव किया कि - परदे पर पड़ रहे सिनेमा के सजीवता को, और प्रखर बनाने के लिए, मुझे - ब्लैक के लेवेल - को, और बढ़ाने की आवश्यकता थी। ब्लैक के लेवल बढाने का अर्थ था कि अन्धकार को और बढ़ाना! प्रोजेक्टर से अन्धकार को नहीं लाया जा सकता था। बल्कि अन्धकार को बढ़ाने के लिए, कमरे के इर्द-गिर्द के रोशनी को ही बंद करना पड़ा था।
जीवन में भी, जब हम प्रकाश के सभी स्त्रोत को बंद करते जाते हैं तो - प्रकाश के कमी से - अंधकार बढ़ता जाता है। फिर, हमें भय सा होने लगता है - या फिर, कोई बाहर से भय को और उजागर करने के लिए - टॉर्च जैसे अस्थायी और सीमित ज्योति -पुंज से हमारा परिचय करा देता है, जिस पर हम आश्रित से होने लगते हैं - क्योकि अन्धकार से हमें अब भय होने लगता है।अंततः, जब तक हम अपने अन्तः ज्योति को जागृत न करें - जीवन अन्धकारमय ही रह जाता है - टॉर्च जैसे प्रकाश के स्त्रोत से आगे, हमें किसी स्थाई प्रकाश के ओर अग्रसारित होने की प्रबल इच्छा होने लगता है।
करना तो हमें स्वयं ही होता है, पर विकल्पों के तलाश में हम बाहर की ओर झांकते फिरते हैं - कबीर के दोहे में व्यक्त कस्तूरी मृग की भाँति -
कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढत बन माहि | ज्यो घट घट राम है, दुनिया देखे नाही |जैसा कि कहीं पढ़ा या सुना था -
उम्र भर यही भूल करता रहा, धूल था चेहरे पर और आईना साफ़ करता रहा।

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