कहा जाता है कि जो दीखता है वही बिकता है। क्रिकेट भी इसका अपवाद नहीं है। क्रिेकट के शुरुआती दौर में इस खेल का जो भी महत्त्व रहा हो, परंतु हाल के दशक तक आते-आते, यह वर्तमान के व्यवहारिक जीवन के साथ सामंजस्य नहीं बैठा पा रहा था। तदोपरांत पहले तो टेस्ट क्रिकेट में सुधार लाया गया, फिर एकदिवसीय खेल का दौर शुरू हुआ।
फिर भी क्रिकेट उतना रोचक नहीं बन पा रहा था, जितना कि यूरोप में फुटबॉल का खेल है या अमेरिका में बेसबॉल। वैसे भी क्रिकेट की लोकप्रियता ब्रिटिश साम्राज्य के देन के तौर पर ही है, और सिर्फ चंद कॉमनवेल्थ देशों में ही इस खेल को खेला जाता है। उस पर से देखने वालों की घटती संख्या से ऐसा लगने लगा था मानो उन दिनों क्रिकेट का भविष्य अंधकारमय सा था। साफ तौर पर उन दिनों टेस्ट क्रिकेट बड़ी तादाद में दर्शकों को अपने और खींचने में सक्षम नहीं रह गया था।
जाहिर है जहाँ आवश्यकता है वहां उसकी भरपाई करने के लिए बिज़नेस ऑपर्च्युनिटी भी होती है और इसीलिये संसार के परिवर्तन में पूंजीपतियों का बहुत बड़ा योगदान है! क्रिकेट इस से अछूता नहीं हो सकता था, और इस कारण से - केरी पैकर नाम के एक शख्सियत का प्रादुर्भाव हुआ।
यहाँ एक बात बताना आवश्यक है कि पहला एकदिवसीय क्रिेकट ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच १९७१ में शुरू हुआ था। इसके बाद १९७५ में पहला वर्ल्ड कप भी आयोजित हुआ था, जिसे इंग्लॅण्ड के प्रूडेंशियल नाम के एक इंश्युरेंस कम्पनी ने प्रायोजित किया था। आगे आने वाले सालों में अनेक कंपनी ने व्यावसायिक रूप से क्रिकेट के अन्य २-३ देशों के एकदिवसीय श्रृंखला को प्रायोजित किया था। जल्द ही क्रिकेट का व्यवसायीकरण शुरू हो गया था और इस खेल में और भी पैसे आने लगे थे। लेकिन केरी पैकर की सोच महज स्पॉन्सरशिप से कही बहुत आगे की थी।
फिर भी क्रिकेट उतना रोचक नहीं बन पा रहा था, जितना कि यूरोप में फुटबॉल का खेल है या अमेरिका में बेसबॉल। वैसे भी क्रिकेट की लोकप्रियता ब्रिटिश साम्राज्य के देन के तौर पर ही है, और सिर्फ चंद कॉमनवेल्थ देशों में ही इस खेल को खेला जाता है। उस पर से देखने वालों की घटती संख्या से ऐसा लगने लगा था मानो उन दिनों क्रिकेट का भविष्य अंधकारमय सा था। साफ तौर पर उन दिनों टेस्ट क्रिकेट बड़ी तादाद में दर्शकों को अपने और खींचने में सक्षम नहीं रह गया था।
जाहिर है जहाँ आवश्यकता है वहां उसकी भरपाई करने के लिए बिज़नेस ऑपर्च्युनिटी भी होती है और इसीलिये संसार के परिवर्तन में पूंजीपतियों का बहुत बड़ा योगदान है! क्रिकेट इस से अछूता नहीं हो सकता था, और इस कारण से - केरी पैकर नाम के एक शख्सियत का प्रादुर्भाव हुआ।
यहाँ एक बात बताना आवश्यक है कि पहला एकदिवसीय क्रिेकट ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच १९७१ में शुरू हुआ था। इसके बाद १९७५ में पहला वर्ल्ड कप भी आयोजित हुआ था, जिसे इंग्लॅण्ड के प्रूडेंशियल नाम के एक इंश्युरेंस कम्पनी ने प्रायोजित किया था। आगे आने वाले सालों में अनेक कंपनी ने व्यावसायिक रूप से क्रिकेट के अन्य २-३ देशों के एकदिवसीय श्रृंखला को प्रायोजित किया था। जल्द ही क्रिकेट का व्यवसायीकरण शुरू हो गया था और इस खेल में और भी पैसे आने लगे थे। लेकिन केरी पैकर की सोच महज स्पॉन्सरशिप से कही बहुत आगे की थी।
केरी पैकर: क्रिकेट का सफ़ेद से रंगीनियों तक का दौर
बदलते दौर में इस नए एकदिवसीय क्रिकेट में तड़क-भड़क का तड़का लगना बाकी था। ऑस्ट्रेलिया के केरी पैकर नाम के एक बिजनेस मैन, जो शायद चैनल 9 के मालिक भी थे, उसने इसमें सबसे पहले पहल की।
उसने एक नए टूर्नामेंट - वर्ल्ड सीरीज़ कप - की शुरुआत की जिसमे उसने विश्व के सबसे बेहतरीन खिलाडियों को एक जगह ला कर अपने बनाये हुए "ऑट्रेलिया की टीम" के साथ बाकी खिलाडियों के एक टीम को बना कर आपस में खेलने के लिए एक लीग सा बना दिया। उसने इस बात को भांप लिया था कि लोग अच्छे क्रिकेट देखना चाहते थे। लाजमी है कि सभी अच्छे खिलाडियों को एक जगह एकत्रित करके आपस में खिलाया जाए तो खेल के प्रतिस्पर्धा का स्तर काफी ऊपर हो जाएगा। हालाँकि इसके और भी कई पहलू थे और इसका हर क्रिकेट बोर्ड और मीडिया ने जम के विरोध किया। केरी को आंशिक सफलता ही मिल पाई। कई मायने में आज का आईपीएल उसी की पुनरावृत्ति सी है।
पर आज के आईपीएल पर उतना विरोध नहीं होता है पर उन दिनों केरी पैकर को अपने इस प्रयास के लिए पूरे क्रिकेट जगत से खासा विरोध का सामना करना पड़ा था। बल्कि यों कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी कि उसे क्रिकेट के विलेन के रूप में देखा जाता था। पूरा क्रिकेट जगत दो खेमे में बँट गया था- टोनी ग्रेग, वेस्ट इंडीज़ और ऑस्ट्रेलिया के दिग्गज खिलाड़ी, और भी अतीत के कई सारे महान खिलाडियों ने खुल कर केरी का समर्थन किया।
केरी ने हर देश के क्रिकेट बोर्ड के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया था। केरी के विरोधियों ने उसके "वर्ल्ड सीरीज़ कप" को "केरी-सर्कस" का नाम दे दिया गया था, और जिन खिलाडियों ने उनके साथ करार कर लिया था - उन्हें "विद्रोही" का दर्ज़ा दे दिया गया। हर ऐसे खिलाडियों को उनके अपने देश के तरफ से खेलने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। मुझे याद है कि लोग क्रिकेट के भविष्य को लेकर बहुत चिंतित से हुआ करते थे। कारण स्पष्ट सा था कि विश्व के सबसे बेहतरीन खिलाड़ी पेशेवर बनकर पैसा कमाना चाहते थे, और शायद वे अच्छे खेल का प्रदर्शन करके और ज्यादा शोहरत और पैसे भी कमाना चाहते थे - भले वह किसी "सर्कस" के लिए ही हो।
केरी ने भारत से सुनील गावस्कर और बेदी को अपने "सर्कस" में शामिल होने का न्योता दिया था- पर उन्होंने उसे ठुकरा दिया।सभी देश के क्रिकेट बोर्ड्स ने संयुक्त रूप से इसका विरोध किया और अंततः केरी पैकर ने घुटने टेक दिए और इस तरह से सभी क्रिकेटर वापस अपने अपने देश के लिए खेलने लगे थे।
कई मायने में केरी पैकर ने क्रिकेट का आधुनीकिकरण सा कर दिया। केरी के वर्ल्ड सीरीज टूर्नामेंट में बहुत जल्दी-जल्दी में खेल होता था - जिस कारण से खिलाडियों को चुस्त -दुरुस्त रहना पड़ता था। साथ ही अपने उत्कृष्टतम खेल को दिखाना पड़ता था। इस प्रकार से क्रिकेट "सुस्त-आलसियों" के चंगुल से निकल कर वास्तव में एक "खिलाडियों" का खेल बनने लगा था। वरना छह दिनों वाले टेस्ट मैच में बहुत सारे खिलाड़ी तो ऐसे थे जो वास्तव में - शारीरिक और चुस्ती के मामले में खिलाड़ी कहलाने के योग्य भी नहीं थे, कुछ बहुत आलसी से थे। जाहिर है, इस तरह के खिलाडियों से सिर्फ बोरिंग खेल की उम्मीद की जानी चाहिए थी ।
केरी पैकर बहुत पैसेवाला था और एक टीवी चैनल का मालिक था। इस कारण से उसने टीवी पर क्रिकेट के कवरेज में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया। केरी पैकर ने क्रिकेट के खेल को टीवी पर बहुत ही रोचक और देखने योग्य बनाने में बहुत योगदान दिया - मैदान के अलग अलग कोने पर कैमरा लगा कर, उम्दा किस्म के कैमरा से क्लोज़-अप दिखाना, विकेट में माइक्रोफोन लगाना - और भी न जाने इस तरह के कितने प्रकार के प्रयोग हुये। एक तरह से उसने पूरे क्रिकेट के खेल को नया जामा पहना दिया था।
आज जब आईपीएल में वही सब कुछ, वैसा ही हो रहा है, जिसकी कल्पना केरी पैकर भाई साहब ने ३० साल पहले की थी - तो मैं उसके दूरदर्शिता के लिए नत-मस्तक हूँ। आज दबे स्वरों में लोग उनके प्रयास को जरूर सराहते होंगे। पर इतिहास में ये कोई पहली बार नहीं हुआ है, जब अज्ञानता और भय के घने बादल, हठता में बदल कर, नए विचार के किरणों को ढंकने की कोशिश करते रहे और अंततः प्रकाश ने अपना रास्ता ढूंढ ही लिया हो। केरी पैकर ने क्रिकेट के नए रूप का जो पौध लगाया वह आज टी-२० और आईपीएल सरीखे अनेकों लीग के बनकर बरगद पेड़ सा बन चुका है और शायद क्रिकेट का यही रूप आने वाले कई बरसों तक चलने वाला है !
कुल मिला कर क्रिकेट एक नए दौर में आ गया था। केरी के क्रांतिकारी परिवर्तन का असर था कि अब खेल का स्तर काफी ऊंचा हो गया था। वैसे भी बदलते दौर में लोगों के पास कुछ काम-काज सा आने लगा था और क्रिकेट को देखने के आलावा भी कुछ करने जैसा और भी काम आ गया था इस लिए अब लोग छह दिनों तक के धीमी गति वाले खेल से ऊबने लगे थे।
समय के नज़ाकत को समझते हुए धीरे धीरे टेस्ट मैच से "रेस्ट डे" को अब हटा दिया गया है और लगातार पूरे पांच दिनों तक खेला जाता है। वैसे टेस्ट मैच में लोगों की, ख़ास कर नयी पीढ़ी के गिरते लोकप्रियता से ये अटकलें लगाई जा रही है कि - आखिर और कब तक? टेस्ट मैच अपनी अंतिम सांसें गिन रही हैं, क्योंकि अब दर्शकों के पास पूरे एक दिन का समय वन-डे देखने के लिए भी नहीं है और सभी टी -२० ज्यादा पसंद करने लगे हैं।
शुरुआत में वन डे इंटरनेशनल - ओडीआई - ६० ओवर्स का होता था और धीरे-धीरे उसमे कई सारे परिवर्तन लाये गए। अब यह सिर्फ ५० ओवर्स का खेल हो गया है। कई तरह के और परिवर्तन आये जैसे फील्ड रेस्ट्रिक्शन्स, पावर प्ले, नो बॉल के बाद एक बोनस बॉल पर -फ्री हिट - जिस पर बल्लेबाज आउट नहीं हो सकते हैं, इस तरह के और भी कई सारे फेर-बदल!
४० सालों बाद, आज भी पुराने दिनों के लोग मानते हैं कि "वनडे क्रिकेट के आ जाने से, क्रिकेट के कलात्मक खेल के स्तर में ह्रास हुआ है।" परन्तु वे यह भूल जाते हैं कि उस कलात्मकता को बचाये रखने के चक्कर में आज शायद क्रिकेट के प्रति लोगों का प्यार ही ख़त्म हो जाता। समय के हिसाब से बदलाव जरूरी है- अगर लोग किसी खेल में बदलाव चाहते हैं, और उनके इच्छा की अपेक्षा होती रहे, तो धीरे धीरे लोग उस खेल के प्रति अपना नजरिया बदलने लगते हैं - और अंततः किसी दूसरे विकल्प की खोज में निकल पड़ते हैं। अगर क्रिकेट में बदलाव नहीं होता तो शायद लोग क्रिकेट को छोड़ किसी और खेल में ज्यादा रूचि लेने लगते।
केरी पैकर ने क्रिकेट में आज से कई साल पहले जितने भी प्रयोग किये थे, लगभग उन सभी को आज आईपीएल में सफलता पूर्वक प्रयोग में लाया जा रहा है और मेरा उनके दूरदर्शिता को सलाम! उनके और वैसे ही सोच वालों के, उनके समय के अनेक रूढ़िवादी विचारधारा के लाखों विरोध के बावजूद, क्रांतिकारी पहल का नतीज़ा है कि अब क्रिकेट अपने नए फॉर्मेट टी-२० में अमेरिका और कई और अन्य देशों में भी धीरे धीरे लोकप्रिय होता जा रहा है।
पर आज के आईपीएल पर उतना विरोध नहीं होता है पर उन दिनों केरी पैकर को अपने इस प्रयास के लिए पूरे क्रिकेट जगत से खासा विरोध का सामना करना पड़ा था। बल्कि यों कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी कि उसे क्रिकेट के विलेन के रूप में देखा जाता था। पूरा क्रिकेट जगत दो खेमे में बँट गया था- टोनी ग्रेग, वेस्ट इंडीज़ और ऑस्ट्रेलिया के दिग्गज खिलाड़ी, और भी अतीत के कई सारे महान खिलाडियों ने खुल कर केरी का समर्थन किया।
केरी ने हर देश के क्रिकेट बोर्ड के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया था। केरी के विरोधियों ने उसके "वर्ल्ड सीरीज़ कप" को "केरी-सर्कस" का नाम दे दिया गया था, और जिन खिलाडियों ने उनके साथ करार कर लिया था - उन्हें "विद्रोही" का दर्ज़ा दे दिया गया। हर ऐसे खिलाडियों को उनके अपने देश के तरफ से खेलने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। मुझे याद है कि लोग क्रिकेट के भविष्य को लेकर बहुत चिंतित से हुआ करते थे। कारण स्पष्ट सा था कि विश्व के सबसे बेहतरीन खिलाड़ी पेशेवर बनकर पैसा कमाना चाहते थे, और शायद वे अच्छे खेल का प्रदर्शन करके और ज्यादा शोहरत और पैसे भी कमाना चाहते थे - भले वह किसी "सर्कस" के लिए ही हो।
केरी ने भारत से सुनील गावस्कर और बेदी को अपने "सर्कस" में शामिल होने का न्योता दिया था- पर उन्होंने उसे ठुकरा दिया।सभी देश के क्रिकेट बोर्ड्स ने संयुक्त रूप से इसका विरोध किया और अंततः केरी पैकर ने घुटने टेक दिए और इस तरह से सभी क्रिकेटर वापस अपने अपने देश के लिए खेलने लगे थे।
कई मायने में केरी पैकर ने क्रिकेट का आधुनीकिकरण सा कर दिया। केरी के वर्ल्ड सीरीज टूर्नामेंट में बहुत जल्दी-जल्दी में खेल होता था - जिस कारण से खिलाडियों को चुस्त -दुरुस्त रहना पड़ता था। साथ ही अपने उत्कृष्टतम खेल को दिखाना पड़ता था। इस प्रकार से क्रिकेट "सुस्त-आलसियों" के चंगुल से निकल कर वास्तव में एक "खिलाडियों" का खेल बनने लगा था। वरना छह दिनों वाले टेस्ट मैच में बहुत सारे खिलाड़ी तो ऐसे थे जो वास्तव में - शारीरिक और चुस्ती के मामले में खिलाड़ी कहलाने के योग्य भी नहीं थे, कुछ बहुत आलसी से थे। जाहिर है, इस तरह के खिलाडियों से सिर्फ बोरिंग खेल की उम्मीद की जानी चाहिए थी ।
भारत के टीम में हर समय कुछ ऐसे खिलाड़ी भी हुआ करते थे जो अपने कलात्मक खेल और गौरवशाली इतिहास के वजह से टीम में थे - सिर्फ इसलिये कि वे "कभी कई सालों पहले कोई एक मैच जीता दिए थे"! इस तरह के दकियानूसी धारणाओं के ओट में शायद "स्वयं के लिए ही खेल रहे थे", देखने वाले दर्शकों के दुर्दशा पर उनका कोई ध्यान नहीं था।
केरी पैकर बहुत पैसेवाला था और एक टीवी चैनल का मालिक था। इस कारण से उसने टीवी पर क्रिकेट के कवरेज में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया। केरी पैकर ने क्रिकेट के खेल को टीवी पर बहुत ही रोचक और देखने योग्य बनाने में बहुत योगदान दिया - मैदान के अलग अलग कोने पर कैमरा लगा कर, उम्दा किस्म के कैमरा से क्लोज़-अप दिखाना, विकेट में माइक्रोफोन लगाना - और भी न जाने इस तरह के कितने प्रकार के प्रयोग हुये। एक तरह से उसने पूरे क्रिकेट के खेल को नया जामा पहना दिया था।
इसी क्रम में खिलाडियों को भी रंगीन कपडे पहनाया गया - सफ़ेद कपडे के "वर्दी" से क्रिकेट खिलाडियों को मुक्ति मिलने लगा था। लोगों के सुविधा के हिसाब से क्रिकेट को पूरे दिन भर खेलने के बजाय, लाइट में रात-दिन के खेले जाने के शुरुआत का श्रेय भी केरी पैकर को ही जाता है। लाइट में गेंद को देखने में दिक्कत होती थी, इसलिए क्रिकेट के लाल गेंद को उजले गेंद से बदल दिया।
केरी पैकर के बाद क्रिकेट का दौर
पर केरी पैकर ने कई मायने में क्रिकेट को पुनर्जीवित कर दिया। उनका क्रिकेट को आधुनिकीकरण करने में जो योगदान है, उसे इतिहास में स्वर्णाक्षर में लिखा जाना चाहिये, पर वैसा नहीं होगा - क्योंकि उसने जिस तरह से पारम्परिक क्रिकेट बोर्ड्स को धत्ता बताया था, उसकी कड़वाहट, क्रिकेट के "महा-पंडितों" में आज तक बरक़रार सा है। दरअसल उसने जिस अनुबंधित राशि का प्रलोभन विश्व के सभी खिलाड़ियों को दिया था, उतना हर देश के क्रिकेट बोर्ड्स अपने खिलाडियों को दे पाने में असमर्थ थे।आज जब आईपीएल में वही सब कुछ, वैसा ही हो रहा है, जिसकी कल्पना केरी पैकर भाई साहब ने ३० साल पहले की थी - तो मैं उसके दूरदर्शिता के लिए नत-मस्तक हूँ। आज दबे स्वरों में लोग उनके प्रयास को जरूर सराहते होंगे। पर इतिहास में ये कोई पहली बार नहीं हुआ है, जब अज्ञानता और भय के घने बादल, हठता में बदल कर, नए विचार के किरणों को ढंकने की कोशिश करते रहे और अंततः प्रकाश ने अपना रास्ता ढूंढ ही लिया हो। केरी पैकर ने क्रिकेट के नए रूप का जो पौध लगाया वह आज टी-२० और आईपीएल सरीखे अनेकों लीग के बनकर बरगद पेड़ सा बन चुका है और शायद क्रिकेट का यही रूप आने वाले कई बरसों तक चलने वाला है !
कुल मिला कर क्रिकेट एक नए दौर में आ गया था। केरी के क्रांतिकारी परिवर्तन का असर था कि अब खेल का स्तर काफी ऊंचा हो गया था। वैसे भी बदलते दौर में लोगों के पास कुछ काम-काज सा आने लगा था और क्रिकेट को देखने के आलावा भी कुछ करने जैसा और भी काम आ गया था इस लिए अब लोग छह दिनों तक के धीमी गति वाले खेल से ऊबने लगे थे।
समय के नज़ाकत को समझते हुए धीरे धीरे टेस्ट मैच से "रेस्ट डे" को अब हटा दिया गया है और लगातार पूरे पांच दिनों तक खेला जाता है। वैसे टेस्ट मैच में लोगों की, ख़ास कर नयी पीढ़ी के गिरते लोकप्रियता से ये अटकलें लगाई जा रही है कि - आखिर और कब तक? टेस्ट मैच अपनी अंतिम सांसें गिन रही हैं, क्योंकि अब दर्शकों के पास पूरे एक दिन का समय वन-डे देखने के लिए भी नहीं है और सभी टी -२० ज्यादा पसंद करने लगे हैं।
शुरुआत में वन डे इंटरनेशनल - ओडीआई - ६० ओवर्स का होता था और धीरे-धीरे उसमे कई सारे परिवर्तन लाये गए। अब यह सिर्फ ५० ओवर्स का खेल हो गया है। कई तरह के और परिवर्तन आये जैसे फील्ड रेस्ट्रिक्शन्स, पावर प्ले, नो बॉल के बाद एक बोनस बॉल पर -फ्री हिट - जिस पर बल्लेबाज आउट नहीं हो सकते हैं, इस तरह के और भी कई सारे फेर-बदल!
क्या सोचते हैं आज केरी के आलोचक?
क्रिकेट खेल में लोगों की रोचकता पहले से बहुत ज्यादा बढ़ गयी है। अब ५० ओवर्स से कही ज्यादा २० ओवर्स के टी-२० ने ज्यादा लोकप्रियता पा ली है। आज अगर केरी पैकर्स होते तो उन्हें बहुत आश्चर्य सा होता कि उनके धुर -विरोधी भी उन्ही के क्रांतिकारी परिवर्तन की देन - क्रिकेट के व्यवसायीकरण के कारण खुशहाली के दिन देख पा रहे हैं! सुनील गावस्कर और बिशन सिंह बेदी ने भले ही केरी पैकर के प्रस्ताव को ठुकरा दिया हो, पर आज कमेंट्री बॉक्स में बैठ कर एकदिवसीय, टी-२० और न जाने असंख्य लीग मैचों के ऊपर अपनी प्रतिक्रिया देकर जितने पैसे कमाए हैं, उस कारण उनकी अंतरात्मा, एक बार केरी पैकर को जरूर धन्यवाद देता होगा!४० सालों बाद, आज भी पुराने दिनों के लोग मानते हैं कि "वनडे क्रिकेट के आ जाने से, क्रिकेट के कलात्मक खेल के स्तर में ह्रास हुआ है।" परन्तु वे यह भूल जाते हैं कि उस कलात्मकता को बचाये रखने के चक्कर में आज शायद क्रिकेट के प्रति लोगों का प्यार ही ख़त्म हो जाता। समय के हिसाब से बदलाव जरूरी है- अगर लोग किसी खेल में बदलाव चाहते हैं, और उनके इच्छा की अपेक्षा होती रहे, तो धीरे धीरे लोग उस खेल के प्रति अपना नजरिया बदलने लगते हैं - और अंततः किसी दूसरे विकल्प की खोज में निकल पड़ते हैं। अगर क्रिकेट में बदलाव नहीं होता तो शायद लोग क्रिकेट को छोड़ किसी और खेल में ज्यादा रूचि लेने लगते।
केरी पैकर ने क्रिकेट में आज से कई साल पहले जितने भी प्रयोग किये थे, लगभग उन सभी को आज आईपीएल में सफलता पूर्वक प्रयोग में लाया जा रहा है और मेरा उनके दूरदर्शिता को सलाम! उनके और वैसे ही सोच वालों के, उनके समय के अनेक रूढ़िवादी विचारधारा के लाखों विरोध के बावजूद, क्रांतिकारी पहल का नतीज़ा है कि अब क्रिकेट अपने नए फॉर्मेट टी-२० में अमेरिका और कई और अन्य देशों में भी धीरे धीरे लोकप्रिय होता जा रहा है।

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