बचपन और क्रिकेट का साथ रेल के दो पटरियों की तरह हैं - बिलकुल साथ -साथ चलते आये हैं। क्रिकेट की यादें मेरे बचपन के परछाई की तरह हैं - बिलकुल एक दूसरे से जुड़े हुए से हैं। क्रिकेट का जीवन में ऐसा प्रभाव पड़ा है कि सारे जीवन का सारांश क्रिकेट में ही मिल जाता है। जीवन के इतने वसंत को देख लेने के बाद, अब जब इस खेल के बारे में सोचता हूँ, तो मन में एक प्रश्न उठता है कि वास्तव में क्रिकेट एक मानसिक खेल है या शारीरिक? इस खेल में इतने तरह के विविधतायें हैं कि कोई एक मैच किसी दूसरे के जैसा नहीं हो सकता है, क्योंकि किसी भी क्षण खेल का सारा रुख बदल सकता है - जीवन का भी बस यही हाल होता है।
बचपन से क्रिकेट देखते हुए बड़ा हुआ हूँ और इसका परिणाम यह है कि जीवन के किसी भी परिस्थिति को क्रिकेट के लहजे में सोचने लगता हूँ। क्रिकेट में कभी भी कुछ भी हो सकता है, और जीवन में भी लगभग ऐसा ही होता है।
बचपन से क्रिकेट देखते हुए बड़ा हुआ हूँ और इसका परिणाम यह है कि जीवन के किसी भी परिस्थिति को क्रिकेट के लहजे में सोचने लगता हूँ। क्रिकेट में कभी भी कुछ भी हो सकता है, और जीवन में भी लगभग ऐसा ही होता है।
गौर से देखने पर जीवन की शुरुआत एक टॉस सा है, कभी हम क्षेत्ररक्षण के रूप में खुद को बिखेर देते हैं तो कभी ज़िंदगी के पिच पर बैटिंग करते हुए अनेकों सारे समस्याओं के गेंद को झेलते रहते हैं। लाज़मी है कि कभी गेंद के रूप में कोई परिस्थिति पर हम हावी होकर सफलता का छक्का लगा देते हैं तो कभी मात खा कर अपना विकेट गँवा देते हैं। और फिर एक दिन, ज़िंदगी की इन्निंग्स ख़त्म हो जाता है,पर दुनिया एक स्टेडियम सा है, खिलाड़ी आते जाते रहते से हैं पर लोग बैठे रहते हैं अगले खिलाडी के खेल को देखने के लिए - the show must go on !
खिलाडियों को याद करूँ, तो सबसे पुराने कप्तानों में से - अजीत वाडेकर की हल्की सी यादें अब भी कही दिमाग के किसी कोने में है। उन दिनों - शायद १९७४ के आसपास, जब साप्ताहिक पत्रिका - "धर्मयुग" में, उनके अचानक से कप्तानी को छोड़ने और फिर क्रिकेट से हठात संन्यास लेने की खबर छपी थी, तो हमारे घर में काफी मायूसी सा छा गया था - शायद अजीत उन दिनों के चहेते खिलाड़ी थे, और उनके साथ कुछ अन्याय सा हुआ था।
खिलाडियों को याद करूँ, तो सबसे पुराने कप्तानों में से - अजीत वाडेकर की हल्की सी यादें अब भी कही दिमाग के किसी कोने में है। उन दिनों - शायद १९७४ के आसपास, जब साप्ताहिक पत्रिका - "धर्मयुग" में, उनके अचानक से कप्तानी को छोड़ने और फिर क्रिकेट से हठात संन्यास लेने की खबर छपी थी, तो हमारे घर में काफी मायूसी सा छा गया था - शायद अजीत उन दिनों के चहेते खिलाड़ी थे, और उनके साथ कुछ अन्याय सा हुआ था।
उसके बाद के सभी कप्तान - वेंकटराघवन, बेदी और हाल के बाकी सबों की यादें बिलकुल ताजी सी हैं। पुराने गेंदबाजों में - मदनलाल, करसन घावरी, भागवत चंद्रशेखर, इरापल्ली प्रसन्ना, बिशन सिंह बेदी, और भी कई नाम याद आते हैं। उनके फेंके गेंदों को, विकेट के पीछे पकड़ने के काम में व्यस्त, फारुख इंजीनियर और बाद में किरमानी के जिम्मेदारी सम्हालने की यादें अब भी ताज़ा हैं।
गावस्कर के प्रति लोगों के श्रद्धा का एक कारण - खिलाड़ी के तौर पर, उनकी अपनी व्यक्तिगत प्रतिभा तो थी ही। पर उस से भी कहीं ज्यादा- उन दिनों के भारतीय टीम की व्यथा भी जिम्मेदार सी थी, जिस कारण वे टीम के प्राणरक्षक से थे। उन दिनों, भारत के किसी भी पारी की शुरुआत कुछ ऐसा होता था कि हम ईश्वर से मनाते थे कि - "प्रभु अब इस संकट से मुक्ति दिलाओ और किसी तरह से मैच ड्रा हो जाए।" वैसे टॉस के हारने के साथ ही, भारत के मैच हारने का पूरा जुगाड़ तो लग ही चुका होता था।
जैसे ही बैटिंग शुरू होती, भारतीय टीम के लगभग पर्यावाची से बने, गावस्कर का साथ - अंशुमन गायकवाड़ - और बाद के सालों में - चेतन चौहान देते थे। भारत के ये सभी शुरुआत के बल्लेबाज, बहुत जल्दी में होते थे। इसलिए अपना मैदान में रस्म पूरा करने ने बाद किसी - "बाहर जाती गेंद के साथ छेड़-छाड़" करने जैसा कुछ कार्यक्रम कर देते थे। और इसके बाद - "आया राम, गया राम" की तर्ज़ पर, एक-एक कर सभी पैवेलियन चल जाते थे। जल्द ही, टीम के आल आउट होने के संकट से बचाने का सारा भार, भारतीय क्रिकेट के एक unsung hero- गुंडप्पा विश्वनाथ के कंधे पर आ जाता।
भारतीय टीम के कर्णधार - सुनील मनोहर गावस्कर
बल्लेबाज के नाम आते ही, बस सिर्फ एक नाम याद आता है, जो बचपन से लगभग होश सम्हालने के उम्र तक, भारत के हार और ड्रा के बीच - भारतीय टीम के रीढ़ की हड्डी की तरह होता था। वो नाम था - सुनील मनोहर गावस्कर! शायद अब यह नाम लोगों के यादों में जरा धुंधला गया हो, पर मैं आपको बता दूँ - मेरे बचपन में यह नाम, एक भगवान की तरह से ही था। हर मैच के दौरान, इनके नाम का जाप सा होता था। अब कोई यकीन करे न करे, पर मैंने बचपन में देखा है कि लोग किस तरह से गावस्कर के शतक के इंतज़ार में, काम काज को छोड़ कर, बेसब्री से अपने खुशी को इज़हार करने के लिए, बेताब से बैठे होते थे!गावस्कर के प्रति लोगों के श्रद्धा का एक कारण - खिलाड़ी के तौर पर, उनकी अपनी व्यक्तिगत प्रतिभा तो थी ही। पर उस से भी कहीं ज्यादा- उन दिनों के भारतीय टीम की व्यथा भी जिम्मेदार सी थी, जिस कारण वे टीम के प्राणरक्षक से थे। उन दिनों, भारत के किसी भी पारी की शुरुआत कुछ ऐसा होता था कि हम ईश्वर से मनाते थे कि - "प्रभु अब इस संकट से मुक्ति दिलाओ और किसी तरह से मैच ड्रा हो जाए।" वैसे टॉस के हारने के साथ ही, भारत के मैच हारने का पूरा जुगाड़ तो लग ही चुका होता था।
जैसे ही बैटिंग शुरू होती, भारतीय टीम के लगभग पर्यावाची से बने, गावस्कर का साथ - अंशुमन गायकवाड़ - और बाद के सालों में - चेतन चौहान देते थे। भारत के ये सभी शुरुआत के बल्लेबाज, बहुत जल्दी में होते थे। इसलिए अपना मैदान में रस्म पूरा करने ने बाद किसी - "बाहर जाती गेंद के साथ छेड़-छाड़" करने जैसा कुछ कार्यक्रम कर देते थे। और इसके बाद - "आया राम, गया राम" की तर्ज़ पर, एक-एक कर सभी पैवेलियन चल जाते थे। जल्द ही, टीम के आल आउट होने के संकट से बचाने का सारा भार, भारतीय क्रिकेट के एक unsung hero- गुंडप्पा विश्वनाथ के कंधे पर आ जाता।
अगर विश्वनाथ कामयाब हुए, तो कुछ समय के लिए भारत की हार टल जाती, वरना जल्द ही - "क्रिकेट की जीत" हो जाती थी। गावस्कर के साथ, विश्वनाथ का नाम नहीं लेना बहुत अनुचित होगा। अनगिनत मैच में, भारत को हार के संकट से निकालने में, या उसे देर तक टाल कर टीम के आत्मसम्मान को बचाने में - विश्वानाथ का बहुत बड़ा योगदान होता था।
शायद आज की पीढ़ी इनको बिलकुल भूल गए होंगे, पर मुझे विश्वनाथ के प्रति लोगों की श्रद्धा-भाव आज भी याद है !
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