पिछले पतझड़ में ही तो मैं एक ठूंठ पेड़ बन गया था..
सारे सपनों के पत्ते लाल पीले और रंगीन हो के autumn के सुनहरे रंगीनयों को दिखाते हुए झर गए थे....
और मैं अपनी हकीकत को लिए वही जमीन से जुड़ा और खुद को सिमेटे खड़ा रहा..
समय बदला, फिर बहारें आयी, और मेरे सारे सपने फिर से हरे हो उठे.
अब तो ऐसे कई मौसम देख चुका हूँ....
और इस तरह के रोलर कोस्टर की सवारी से अब इस बदलाव की आदत हो गयी है....
पर, "दिल है कि मानता नहीं, मुश्किल बड़ी है रस्म-ए-मुहब्बत, ये जानता ही नहीं है...."
जीवन के यथार्थ से वाकिफ हूँ, पर हमेशा अपने इस सोच पर किसी के मुहर लगाने की प्रतीक्षा में बैठा हूँ.
अपने घर के एक कमरे को ऑफिस बनाया हुआ हूँ और वहीँ से काम करता रहता हूँ......
सुबह से वही कैलेंडर, मीटिंग्स, नए मीटिंग्स को arrange करना, कुछ mails भेजना या जवाब देना...
इन सब के बीच कमरे के एक हिस्से में खिड़की से दिन के आरम्भ से ढलने तक का सिलसिला किसी चलचित्र सा लगता है...
सुबह की ताज़गी और तेज़ शाम होते होते बस कमज़ोर और मंद होता सा रोज़ देखता हूँ...वही लचर सा तिमिर के चादर ओढ़े कहीं दूर और फिर वही अँधेरा...
ये सिलसिला जीवन का समानांतर सा लगता है, रोज घटते देखता हूँ, कई लोगों के जीवन में इसी के प्रतिरूप को झांकता हूँ, मनन करता हूँ और फिर संतोष कर लेता हूँ...
अंततोगत्वा सभी को इस इह लीला से गुजरना है - हर किसी का सूरज अस्त होता है - कभी किसी का शौर्य स्थायी नहीं रह पता है - फिर ये कैसी प्यास है जो इस realization के घूंट पी पी कर भी नहीं बुझ रही है?
जी चाहता है उन्मुक्त हो के स्वछंद जीवन को जीयूं
कहीं कोई बंधन न हो
न ही कोई अपेक्षा और न ही अब तक के जीए जीवन की उपेक्षा...
संभव है....
पर खुद पर implement करने में बहुत दिक्कतें हैं...
अब तक जो भी कर पाया और जो कुछ भी पाया हूँ, बस है
हाँ और बहुत कुछ हो सकता था पर ये भी क्या कम है? संतुष्टि है पर आंकाक्षा और पाने की है....
आकांक्षाएं जीवन को गति देता है और अपने क्षमताओं को टटोलने को विवश भी करता है...
कई प्रयास आवश्यकता से ज़्यादा आंकाक्षाओं के उड़ान को realize कराने के लिए होता है...
पर ये अनवरत संघर्ष चलता रहता है...
एक सपना देखा था कभी...
क्यों देखा था पता नहीं?
आँखें मेरी देखी थीं पर उन सपनों को पर पूरा करने की हिम्मत मुझमें नहीं थी...
प्रयास करता रहा और देखो कहाँ तक पहुँच गया!
कभी अपने मन में ये पंक्तियाँ कही या किसी की लिखी को ही पढ़ा होऊंगा,
हमेशा बुदबुदाता रहता हूँ...
"सपने देखने में कोताही मत करो - उतने ही बड़े बनोगे जीतने बड़े सपने देखोगे..."
बस, इसी प्लॉट पर मेरे जीवन की स्टोरी चल रहा है, कई मोड़ आये और कई अनवरत थकाने वाले अनवरत दौड़
पर सपने कहीं आसमान में Wycliffe मॉर्निंग स्टार की तरह - वहीँ के वहीँ ..
फिर सूरज उगता है और वो तारा कहीं विलुप्त और फिर कहीं से दिखने लगता है
और इन सब के बीच मैं चलता रहता हूँ....
पर एक और वाक्य - सपनों की रफ़्तार ज़िंदगी से तेज़ है - काफी हद तक ब्रेक लगा देती है और रुकते चलते ज़िंदगी चल रही है....
कल और आज का मैं-
मिल के समझौता कराएँगे अपने सपने और जिंदगी का -
यही नया फार्मूला है मेरे जीवन के इस पड़ाव का....
सारे सपनों के पत्ते लाल पीले और रंगीन हो के autumn के सुनहरे रंगीनयों को दिखाते हुए झर गए थे....
और मैं अपनी हकीकत को लिए वही जमीन से जुड़ा और खुद को सिमेटे खड़ा रहा..
समय बदला, फिर बहारें आयी, और मेरे सारे सपने फिर से हरे हो उठे.
अब तो ऐसे कई मौसम देख चुका हूँ....
और इस तरह के रोलर कोस्टर की सवारी से अब इस बदलाव की आदत हो गयी है....
पर, "दिल है कि मानता नहीं, मुश्किल बड़ी है रस्म-ए-मुहब्बत, ये जानता ही नहीं है...."
जीवन के यथार्थ से वाकिफ हूँ, पर हमेशा अपने इस सोच पर किसी के मुहर लगाने की प्रतीक्षा में बैठा हूँ.
अपने घर के एक कमरे को ऑफिस बनाया हुआ हूँ और वहीँ से काम करता रहता हूँ......
सुबह से वही कैलेंडर, मीटिंग्स, नए मीटिंग्स को arrange करना, कुछ mails भेजना या जवाब देना...
इन सब के बीच कमरे के एक हिस्से में खिड़की से दिन के आरम्भ से ढलने तक का सिलसिला किसी चलचित्र सा लगता है...
सुबह की ताज़गी और तेज़ शाम होते होते बस कमज़ोर और मंद होता सा रोज़ देखता हूँ...वही लचर सा तिमिर के चादर ओढ़े कहीं दूर और फिर वही अँधेरा...
ये सिलसिला जीवन का समानांतर सा लगता है, रोज घटते देखता हूँ, कई लोगों के जीवन में इसी के प्रतिरूप को झांकता हूँ, मनन करता हूँ और फिर संतोष कर लेता हूँ...
अंततोगत्वा सभी को इस इह लीला से गुजरना है - हर किसी का सूरज अस्त होता है - कभी किसी का शौर्य स्थायी नहीं रह पता है - फिर ये कैसी प्यास है जो इस realization के घूंट पी पी कर भी नहीं बुझ रही है?
जी चाहता है उन्मुक्त हो के स्वछंद जीवन को जीयूं
कहीं कोई बंधन न हो
न ही कोई अपेक्षा और न ही अब तक के जीए जीवन की उपेक्षा...
संभव है....
पर खुद पर implement करने में बहुत दिक्कतें हैं...
अब तक जो भी कर पाया और जो कुछ भी पाया हूँ, बस है
हाँ और बहुत कुछ हो सकता था पर ये भी क्या कम है? संतुष्टि है पर आंकाक्षा और पाने की है....
आकांक्षाएं जीवन को गति देता है और अपने क्षमताओं को टटोलने को विवश भी करता है...
कई प्रयास आवश्यकता से ज़्यादा आंकाक्षाओं के उड़ान को realize कराने के लिए होता है...
पर ये अनवरत संघर्ष चलता रहता है...
एक सपना देखा था कभी...
क्यों देखा था पता नहीं?
आँखें मेरी देखी थीं पर उन सपनों को पर पूरा करने की हिम्मत मुझमें नहीं थी...
प्रयास करता रहा और देखो कहाँ तक पहुँच गया!
कभी अपने मन में ये पंक्तियाँ कही या किसी की लिखी को ही पढ़ा होऊंगा,
हमेशा बुदबुदाता रहता हूँ...
"सपने देखने में कोताही मत करो - उतने ही बड़े बनोगे जीतने बड़े सपने देखोगे..."
बस, इसी प्लॉट पर मेरे जीवन की स्टोरी चल रहा है, कई मोड़ आये और कई अनवरत थकाने वाले अनवरत दौड़
पर सपने कहीं आसमान में Wycliffe मॉर्निंग स्टार की तरह - वहीँ के वहीँ ..
फिर सूरज उगता है और वो तारा कहीं विलुप्त और फिर कहीं से दिखने लगता है
और इन सब के बीच मैं चलता रहता हूँ....
पर एक और वाक्य - सपनों की रफ़्तार ज़िंदगी से तेज़ है - काफी हद तक ब्रेक लगा देती है और रुकते चलते ज़िंदगी चल रही है....
कल और आज का मैं-
मिल के समझौता कराएँगे अपने सपने और जिंदगी का -
यही नया फार्मूला है मेरे जीवन के इस पड़ाव का....
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