एक करार है मेरा स्वयं से कुछ अनकही सी,
वापसी का, जहाँ से हुई शुरुआत सफर की,
मचलते मेरे अरमान उसी उन्माद से आज भी,
याद आते हैं सुनहरे से वे किस्से जब कभी,
अल्हड सी बचपन की जब अपने होते थे सभी,
न कोई मंजिल होता था, बस यात्रा अंतहीन,
कई मोड़ और पड़ाव, नज़्ज़ारे थे सारे रंगीन,
सपने लेते थे अंगड़ाइयां, चाहतें थीं इठलाती,
जब इंद्रधनुष अपना सा और नभ थे मेरे करीब,
उन्मुक्त पंछी सा स्वच्छंद उड़ान लेता दूर कहीं,
सपने बड़े होते जिसमें मैं अपने हिस्से का अमीर,
खोया अल्हड बचपन मानो बन के कोई फ़कीर,
भटकता मिलता है कहीं, करता है बातें अजीब,
पूछता है, हुआ क्या जो भूल गए मुझे छोड़ वहीँ,
जहाँ कभी साथ खीचते थे हम ख्वाबों के लकीर,
आज जैसे पास हो के भी दूर हैं आसमान से जमीन,
भटकती सी ज़िंदगी जो अक्सर कर देती है ग़मगीन,
शायद कभी साथ उसके जिंदगी हो फिर से हसीन!
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