Nov 5, 2015

बचपन के वो पल

बचपन की याद आते ही - स्कूल के क्लास की कहानियां, साथ खेलने वाले मित्रों के साथ बिताये अनेकों पल, और इन सबों से मिलते जुलते अनेकों घटनाएं - अचानक से किसी दुसरे दुनिया में ले जाते हैं। किसी घुमावदार पहाड़ी सड़क की तरह अनेकों मोड़ को लेते हुए यादों का काफिला आगे बढ़ती जाती हैं। इतने सालों बाद भी बचपन के बिताये वो हर पल आज भी उतनी ही ताज़ी और अपना सा लगता है- उन यादों के जंगल में जितनी बार जाओ, जी चाहता है कि बस भटकता ही जाऊँ!
इस सड़क पर कितनी मर्तबा दौड़े, गिरे, और फिर दौड़े थे..... 

तीन-पुलिया - इसके आगे जाना वर्जित था, हमारे घर के सुरक्षा कवच से बाहर का क्षेत्र सा  

इस खिड़की से मैं गली में बच्चों को इकट्ठा कर -"ढैन टन-न ना" के धुन पर सिनेमा जैसा कुछ दिखाता था! 

मेरे बचपन के स्वर्णिम यादों के  बरगद पेड़ सा - "नानी-घर"


मेरे मिठाइयों से प्रथम साक्षात्कार इसी मथुरा मिष्टान्न भंडार से हुआ था  

बचपन के दूसरे चरण का रंग-मंच  

रमेश स्टेशनरी दूकान का रमेश - इंजीनियरिंग के तैयारी के दौरान ढेर सारी कॉपियाँ खरीदने के कारण इनसे एक अनूठी पहचान सी बन गयी थी  

युवावस्था की चहलकदमी और सुख से दुःख में डूबा देने वाला घर - KD फ्लैट 

आज तक ईश्वर के नाम को याद करते ही इसी रंकणी मंदिर और ख़ास कर माँ काली का स्मरण हो जाता है   

मेरा यह प्रयास है कि इस ब्लॉग के माध्यम से अपने उन सभी सुनहरे पलों को फिर से पुनर्जीवित कर पाऊँ, संभवतः इस प्रयास में मेरे अन्य साथी भी जल्द ही योगदान करेंगे।

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