Dec 7, 2015

किंकर्तव्यविमूढ़

यह चित्र मुझे इंटरनेट पर मिल गया। मैं नहीं जानता कि यह चित्र कैसे, कहाँ से और किस प्रयोजन से लिया गया है - बहरहाल, मुझे यह बहुत पसंद आया, और मुझे इस पर, कुछ लिखने का मन कर गया, इस लिए, इसे यहाँ प्रस्तुत किया हूँ।




इस चित्र में, एक गधे को मझधार में पड़े एक नाव पर, बिना किसी सहारे के दिखाया गया है। गौर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि गधे को, इस बात का कोई इल्म भी नही है, कि वह किस मुसीबत में फंस चुका है! ऐसा उसका गधा होने के कारण है या स्थिति ने उसे गधा बना दिया है - गधा एक संज्ञा के रूप में लेना चाहिए या विशेषण? गधा - तो गधा होता ही है, पर क्या स्थिति भी किसी को "गधा" बना देता है?
मुझे इस गधे को देख कर, अपने देश की शिक्षा पद्धत्ति के परिणाम के तौर पर, कॉलेज से डिग्री ले कर निकले छात्रों का बोध होता है। कुछ विचार-बिंदु :
१. चारों तरफ पानी काफी गहरा है- इस से साबित होता है कि मामला काफी गंभीर है।
२. इस स्थिति में वह स्वयं नहीं आया है, बल्कि किसी ने लाकर छोड़ दिया है।
३. इतनी दूर तक वह हठात् नहीं आ गया है, बल्कि आने में काफी considerable समय लगा होगा।
४. यथास्थित में बने रहना कोई option नहीं है।
५. "What got you here will not take you there" - स्पष्ट रूप से यहाँ तक आने का जो भी तरीका था, अब वह इसके लिए नहीं उपलब्ध है, अतः किनारे तक वापस जाने के लिए, इसे तैरना होगा या फिर कोई और जुगत लगानी पड़ेगी।
६. यह परिस्थिति, इस गधे के लिए एक "टर्निंग पॉइंट" हो सकता है - क्योंकि इसके बाद वह काफी जागरूक रहेगा और इस तरह के स्थिति में स्वयं को कभी नही देखना चाहेगा।

मैं बचपन में, विनोबा भावे का लिखा एक निबंध - "जीवन और शिक्षण"  - पढ़ा था,  जिसमे विद्यार्थी जीवन से यथार्थ के यात्रा को - "हनुमान -कूद" - की उपमा दी गयी है! ये एक विसंगति नहीं है तो क्या है कि - शिक्षण पद्धति को यथार्थ जीवन के लिए व्यवहारिक बनाने हेतु, उनके बताये सुझावों और अन्य सन्देशों का, हमारे शिक्षा-विदों पर यह असर हुआ कि - व्यवहारिकता के समावेश या ज्यादा महत्व देने वाले इस निबंध को ही पाठ्य-कर्म में डाल कर उनके विचारों की तिलांजलि दे दी गयी। हम सभी ने इस निबंध के रट्टे लगा कर, अच्छे अंक प्राप्त कर लिए, और विनोबा के ज्ञानों को रद्दी के टोकरी में डाल कर, लगभग उनका उपहास ही कर बैठे, और उस निबंध के ५० साल बाद भी समस्या यथावत है और आज भी छात्र जीवन से यथार्थ की कूद - "हनुमान -कूद" ही है! लेख की कुछ पंक्तियों बरबस याद आ जाते हैं। इतने साल के अनुभव के साथ आज वे ज्यादा तर्कसंगत लगते हैं-

संम्पूर्ण गैरजिम्मेदारी से संम्पूर्ण जिम्मेदारी में कूदना तो एक हनुमान-कूद ही हुई । ऐसी हनुमान-कूद की कोशिश में हाथ-पैर टूट जाय तो क्या अचरज? - विनोबा भावे
आज भी, हमारे देश की शिक्षा-पद्धति, व्यवहारिक से इतनी दूर है, कि जब छात्र पढ़ाई पूरी कर के वास्तविक जीवन में प्रवेश करता है - तो स्कूल में पढ़ाये गए सभी ज्ञान - धरे के धरे रह जाते हैं, और हर किसी के लिए, हकीकत की दुनिया, एक बिलकुल नयी सी  - जहाँ पूरी की पूरी पढाई निरर्थक, और कोई मतलब की नहीं नज़र आती है! हर कोई स्वयं को एक बिलकुल अजीबोगरीब सी स्थिति में पाता है - "किंकर्तव्यविमूढ़"!

6 comments:

  1. कमल देव सिंहDecember 9, 2015 at 6:37 AM

    पता नहीं, तय नहीं कर पा रहा हूँ कि गदहा किसे कहूँ। गदहे को या गधे को गदहा साबित करने के लिए जिसने इतनी मेहनत की उस गदहे को।

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    1. धन्यवाद KD! सही कहा आपने कि किसे दोष दिया जाए, जिसने उस गधे को बीच मझधार में लाकर छोड़ दिया या फिर उस नादाँ सा दिखने वाले गधे को ? वस्तुतः, हमारे समाज की मान्यताओं को - जो शिक्षा के बोझ के तौर पर - हमारे कंधे पर डाल कर पूरे १०+२ +४ =१६ सालों की पढाई करा के, हमें इतना निकम्मा बना देती है कि हम सिर्फ "नौकरी" करने योग्य ही रह जाते हैं - हमारी मौलिकता को समूल ख़त्म कर दिया जाता है, और - संज्ञा रूप में भले हम गधे हो या न हों, पर अंततोगत्वा, विशेषण के तौर पर गधे ही तो बन जाते हैं - जिंदगी के अध्याय को पढ़ने का मौका तो हमें २० के बाद ही मिल पता है - उस से पहले की लम्बी पढाई - न जाने जिंदगी के किस महायुद्ध की तैयारी के लिए, हमारे ऊपर थोपा जाता है!

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  2. चंद्रशेखर तिवारीDecember 9, 2015 at 6:42 AM

    धन्यवाद संजय भाई, मन हर्षित हो गया, आपके लेख और शब्दों के चयन को पढकर, मै तो कल्पना कर रहा था कि विदेश मे रहने के कारण हिन्दी के शब्दकोश का ज्ञान धुंधली पड़ चुकी होगी. लेकिन मेरी सोच गलत निकली. संजय.

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    1. धन्यवाद तिवारीजी, हिंदी मेरी मातृभाषा है, ऊपर से ललन तिवारी जैसे शिक्षक का मुलम्मा चढ़ा हुआ है - तस्वीर धुंधली पड़ जाने से तहरीर में कोई कमी नहीं आ जाती! मैं हिंदी, खूब पढता हूँ - अभी जमशेदपुर के पुस्तक-मेला से करीब ५००० रू के बेशकीमती पुस्तके धरोहर के तौर पर खरीद कर लाया हूँ - फ्लाइट में वजन का restriction है, वरना मैं और खरीद के लाता!

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    2. चंद्रशेखर तिवारीDecember 9, 2015 at 6:59 AM

      संजय भाई, हिन्दी के प्रति आपके जज़्बे को नमस्कार!

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  3. अक्षयवर मिश्राDecember 9, 2015 at 6:56 AM

    संजय तुमने वाकई ललन तिवारी के धरोहर को बखूबी सम्भाल कर रखे हो, बल्कि उसे एक नई ऊँचाई तक ले जाने का भरपूर प्रयास किये हो,जो तुम्हारे ब्लॉग मे झलकता भी है ! इसमें राम कुमार,सुमन,के डी और चंद्रशेखर तिवारी का सराहनीय योगदान है !इससे अच्छी श्रद्धांजलि, शायद LT सर के लिये कुछ न होगा !

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